व्यंग्य बाण : स्वच्छता अभियान

0
390

modi jiनरेन्द्र भाई ने पिछले दिनों अमरीका से लौटकर झाड़ू क्या उठाया, पूरा देश झाड़ूमय हो गया। वैसे तो वे अमरीका में ही नवाज शरीफ के इरादों पर झाड़ू फेर आये थे; पर असली काम तो भारत में होना था। हमारे मोहल्ले में भी लोगों ने सुबह कुछ देर सफाई की। फिर उसके फोटो फेसबुक पर डाले और घर में टी.वी. खोलकर बैठ गये। देश के प्रति अपना यह कर्तव्य पूरा कर मैं भी सरसों का तेल लगाकर गरम पानी से नहाया और शर्मा जी से मिलने चल दिया।

वहां पहुंचा, तो देखा कि धूल से सना उनका चेहरा पंचरंगी आम की तरह दमक रहा है। मैं समझ गया कि वे अभी तक सुबह के ही खुमार में हैं। मैंने उन्हें इस देशसेवा के लिए बधाई दी, तो वे बरस पड़े, ‘‘तुम जले पर नमक मत छिड़को वर्मा।’’

– क्यों क्या हुआ शर्मा जी.. ?

– होना क्या है ? मोदी जी की अपील से प्रेरित होकर हमने कल ही पूरा मोहल्ला साफ कर दिया था; पर आज सुबह कुछ पुलिस वाले आकर बोले कि नेता जी यहां सफाई अभियान का उद्घाटन करने आएंगे।

– अच्छा फिर.. ?

– फिर क्या, वे बोले कि आपने उनके लिए तो कुछ काम छोड़ा ही नहीं। इसलिए कुछ कूड़ा लाकर यहां डालिये। जिससे नेता जी उसे साफ करते हुए फोटो खिंचवा सकें। अब तुम ही बताओ, पुलिस से पंगा कौन ले ? सो झक मार कर हमने फिर से कूड़ा यहां डाला। नेता जी तीन घंटे देरी से आये। उनके साथ सैकड़ों लोग, पत्रकार और पुलिस वाले भी थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कुछ देर झाड़ू हिलाया। पत्रकारों ने फोटो खींचे। फिर उन सबने बढ़िया चाय-नाश्ता किया। इस तमाशे में जो कूड़ा फैला, अब हम उसे समेट रहे हैं।

मुझे शर्मा जी के भाग्य पर ईर्ष्या हुई। काश, हमारे मोहल्ले में भी कोई नेता जी आते, तो उनके साथ झाड़ू लिये मेरा चित्र भी अखबारों में छपता। फिर सोचा, ठीक ही हुआ कि नेता जी नहीं आये, वरना हमें भी दोबारा सफाई करनी पड़ती।

खैर, शर्मा जी ने स्नान-ध्यान किया। फिर हम दोनों ने चाय पी। छुट्टी का दिन था। अतः सोचा कि क्यों न कुछ लोगों से मिलकर इस अभियान के बारे में उनके विचार जान लिये जाएं। शर्मा जी ने चलते समय एक झाड़ू भी साथ में ले लिया, जिससे जरूरत पड़ने पर कहीं भी देशसेवा की जा सके।

सबसे पहले हम देश की सबसे महान और गांधी जी के समय से ही चली आ रही खानदानी पार्टी के कार्यालय जा पहुंचे। वहां हर दीवार पर गांधी जी टंगे थे। कोने में कुछ झाड़ू भी रखे थे; पर कोई उन्हें हाथ लगाने को तैयार नहीं था। मैंने एक नेताजी से पूछा, तो वे उबल पड़े, ‘‘झाड़ू लगाना हमारा काम है क्या ? गांधी जी ने इसके लिए जिनसे कहा था, आप उन्हीं से पूछें।’’

– पर मोदी ने तो उन्हीं के नाम पर यह अभियान छेड़ा है ?

– तुम यहां मोदी का नाम मत लो। सरदार पटेल के बाद गांधी जी को भी उसने हमसे छीन लिया है। अब उसकी निगाह नेहरू पर भी है। इन सबके काम उसके खाते में चले गये, तो हमारे पास बस नाम ही बचेगा; और नाम को हम कब तक ओढ़ेंगे और बिछाएंगे ? पिछले चुनाव में तो नाम का जादू भी उतर चुका है।

– पर आप अपने कार्यालय को तो साफ कर ही सकते हैं ?

– हां; पर यह काम हम रात में करेंगे। दिन में किया, तो अखबार वाले फोटो खींचकर हमें भी मोदी का समर्थक बता देंगे।

हम वहां से चलकर ब.स.पा. के कार्यालय जा पहुंचे। वहां बैठी एक बहिन जी से उनकी राय पूछी, तो वे बोलीं, ‘‘झाड़ू वाले हमारे पक्के वोटर हैं; पर मोदी उनके बीच में भी घुस रहे हैं। यह अच्छी बात नहीं है। हमारा जो कुछ जमीन है, वह उ.प्र. में ही है; पर मोदी और अमित शाह ने वहां ऐसी झाड़ू मारी है कि पूरी पार्टी कूड़ेदान में पड़ी सड़ रही है। अब सफाई करने को बचा ही क्या है ?’’

वहां से निकले, तो सामने ही धरने पर बैठे केजरीवाल साब अपनी टोपी से हवा कर रहे थे। उनके चारों ओर कई झाड़ू रखे थे। मैंने कहा, ‘‘केजरी साब, झाड़ू तो आपका टेªड मार्क है; पर मोदी इसे भी छीनने की तैयारी में हैं; आप कुछ करते क्यों नहीं हैं ?’’

– मैं धरना दे तो रहा हूं। जरूरत पड़ी, तो अनशन भी करूंगा। सत्ता तो चली गयी, अब इज्जत के नाम पर चुनाव चिन्ह रूपी एक कपड़ा शरीर पर बचा है, पर ये दुःशासन उसे भी नोच रहा है।’’

इतने में ही उधर से अपनी पंचर साइकिल को घसीट कर ले जाते कठोर सिंह जी दिखे। शर्मा जी ने झाड़ू दिखाकर उन्हें रोकना चाहा; पर वे कुछ जल्दी में थे। बोले, ‘‘हमें न झाड़ू से कुछ लेना है न झाड़ू वालों से। पिछले लोकसभा चुनाव में उ.प्र. में हमारी साइकिल में इतने पंचर हो गये कि कोई मिस्त्री हाथ लगाने को राजी नहीं है। हम लोगों को बता रहे हैं कि मोदी के हाथ में जो झाड़ू है, उसमें संघ वालों की लाठी भी है। कुछ को वो झाड़ू से मारेगा और बाकी को लाठी से। इसलिए सावधान रहें।’’

हम वामपंथियों के कार्यालय में गये, तो वहां मैदान ही साफ था। कुर्सियां तो थीं; पर उस पर बैठने वाले नदारद थे। इस अत्यधिक सफल हड़ताल को देखकर हमने चौकीदार से पूछा, तो वह बोला – झाड़ू के तिनकों की तरह भारत में सैकड़ों वामपंथी गुट हैं। कौन समेटे और कौन लपेटे, इस पर ही विवाद चल रहा है। जनता ने सबको कूड़े में डाल दिया है। एक साल से मुझे वेतन नहीं मिला। आप पर दस रु. हों तो दे दो। सुबह से चाय तक नहीं पी है।

हमने वहां से खिसकने में ही भलाई समझी। घर पहुंचे, तो दूरदर्शन पर राष्ट्रपति महोदय का संदेश आ रहा था कि देश की प्रगति के लिए सफाई को अपना राष्ट्रीय जुनून बनाना होगा।

शर्मा जी ने पूछा – इस संदेश का क्या अर्थ है ?

– मोदी ने कांग्रेस रूपी कूड़े से भारत को मुक्त करने का जो अभियान चलाया था, उसका पहला भाग तो पूरा हो गया। देशभक्त राष्ट्रपति जी शायद अब उसे राज्यों तक पहुंचा देखना चाहते हैं।

शर्मा जी मेरा मुंह ताकने लगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

16,489 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress