कहो कौन्तेय-३२ (महाभारत पर आधारित उपन्यास-अंश)

(द्वितीय द्यूत-क्रीड़ा और पाण्डवों का वन गमन)

विपिन किशोर सिन्हा

द्रौपदी के चीरहरण के समय हुए चमत्कार से धृतराष्ट्र चकित थे – भयभीत भी थे। दुर्योधन और दुशासन के वध के लिए भीम की प्रतिज्ञा और कर्ण-वध के मेरे संकल्प ने उनके भय में और वृद्धि कर दी थी। अपने सातवें पुत्र विकर्ण और अपने महामंत्री महात्मा विदुर के सार्वजनिक विद्रोह को उनके अन्तःचक्षुओं ने प्रत्यक्ष देखा था। हमें हमारा राज्य लौटाकर उन्होंने अपने पुत्रों के लिए अभयदान की कामना की थी। अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु रणनीति बनाने में वे दक्ष थे। आसन्न विपत्ति को टालने के लिए ही उन्होंने हमारा हारा हुआ राज्य लौटाया, इसमें किसी को भी रंचमात्र भी सन्देह नहीं था। वे अपनी सफलता पर अपनी पीठ स्वयं ठोकते, इसके पूर्व ही दुर्योधन, दुशासन, कर्ण और शकुनि की चाण्डाल चौकड़ी ने उन्हें फिर घेर लिया। वे एक निश्चित योजना पर विचारोपरान्त, निर्णय लेकर, धृतराष्ट्र से अनुमोदन लेने हेतु उनके सम्मुख उपस्थित हुए। दुर्योधन ने अत्यन्त मधुर वाणी में उन्हें समझाना प्रारंभ किया –

“पिताश्री! हमने बड़े यत्न, बुद्धि, कूटनीति और छल से पाण्डवों की राज्यलक्ष्मी प्राप्त की थी लेकिन आप ने एक ही झटके में सब नष्ट कर दिया। सारा राज्य, सारी संपत्ति शत्रुओं के अधीन कर दी। उन्हें तो यश के साथ खोई हुई सत्ता ’श्री’ समेत प्राप्त हो गई। हमें क्या मिला? कलंक और अपयश, यही न। आर्यावर्त में कोई भी पिता अपने शिशु का नाम दुर्योधन या दुशासन नहीं रखेगा। यह सब आपके कारण हुआ पिताजी, आपके कारण। आप क्या समझते हैं – सभागृह में द्रौपदी के आगमन को पाण्डव कभी भूल पाएंगे? वे इन्द्रप्रस्थ पहुंचते ही सैन्यबल व्यवस्थित कर हम पर आक्रमण करेंगे। उनके हाथों हमारा और आपका विनाश निश्चित है। क्रोध में भरकर डंसने के लिए उद्यत विषधर सर्पों को अपने गले में लटकाकर कौन मनुष्य उन्हें उसी अवस्था में छोड़ सकता है? तात! अस्त्र-शस्त्रों से युक्त, रथ में बैठे हुए पाण्डव क्रुद्ध विषधर सर्पों की भांति आपके कुल का संहार कर देंगे।

महाराज! क्या आपको ज्ञात नहीं है कि संसार में अर्जुन के समान पराक्रमी धनुर्धर दूसरा कोई नहीं है। उसने ऐसे-ऐसे अचिन्त्य साहसपूर्ण कार्य किए हैं जो दूसरों के लिए असंभव है। आचार्य द्रोण की गुरुदक्षिणा हेतु केवल भीम को साथ लेकर उसने द्रुपद को बन्दी बनाया। हम कर्ण के नेतृत्व में पूरी सेना के साथ भी यह कार्य करने में असफल रहे। द्रौपदी-स्वयंवर में कर्ण, जरासंध, शिशुपाल समेत आर्यावर्त के सभी प्रतापी नरेशों को अपने बल और पराक्रम से युद्ध में जीत कर उसने शुभलक्षणा द्रौपदी को प्राप्त किया। मनुष्य तो मनुष्य, उसने खाण्डववन दहन के समय देवराज इन्द्र को पराजित किया। इसके पूर्व, अबतक अविजित रहे चित्रसेन गंधर्व को भी युद्ध में पराजय स्वीकार करने के लिए वाध्य किया। राजेन्द्र! देवता, दानव, यक्ष, पिशाच, नाग, राक्षस, गंधर्व, भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा आदि समस्त कौरव महारथी, भूमण्डल के सभी नरेश अकेले अर्जुन को चारो ओर से घेरकर पूरी सावधानी और अपनी संपूर्ण क्षमता, शौर्य एवं पराक्रम से युद्ध करें, तो भी उसका सामना नहीं कर सकते। पिताजी! मैं सभा में अर्जुन को देखता हूं, एकान्त में भी उसे ही देखता हूं, जागृत अवस्था में भी वही दिखाई देता है, स्वप्न में भी वही दीखता है। मैं अचेत और उद्भ्रान्त हो उठता हूं। मेरा हृदय अर्जुन से इतना भयभीत हो गया है कि अश्व, अज और अर्थ आदि अकारादि नाम भी मेरे मन में त्रास उत्पन्न कर देते हैं।

तात्! महाबली भीम भी पुरुषार्थ और पराक्रम में अतुलनीय है। दस सहस्र हाथियों के बल वाले भीम से प्रत्यक्ष युद्ध में पार पाना असंभव है। हम सौ कौरवों को वह जब चाहे रौंद सकता है। उसने बिना किसी विशेष प्रयास के बकासुर और महाबली हिडिम्ब का वध कर दिया। जरासंध जैसे बलशाली मल्लयोद्धा को दो भागों में चीर कर रख दिया। उसके स्मरण मात्र से मेरी रातों की नींद आंखों से भाग जाती है। पांचो पाण्डव अनेक शस्त्र आदि सामग्रियों से संपन्न, रथों पर बैठकर हमलोगों का संहार करने के उद्देश्य से सेना एकत्र करने गए हैं। भीम ने मेरा और दुशासन का तथा अर्जुन ने कर्ण के वध की प्रतिज्ञा भरी सभा में की है। अगर उन्हें जीवित छोड़ा गया तो निश्चित रूप से शीघ्र ही वे अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेंगे। अतः हे तात! उन्हें हमेशा के लिए नष्ट करने की कोई युक्ति आप बताएं।”

धृतराष्ट्र ने शान्त स्वर में उसे परामर्श दिया –

“वत्स! अर्जुन के पराक्रम को मैं जानता हूं। इसीलिए सन्धि करके, उनका राज्य देकर उन्हें इन्द्रप्रस्थ भेज दिया है। पाण्डव जितने पराक्रमी हैं, उतने क्षमाशील भी है। तुम अर्जुन और भीम के प्रति कोई अपराध मत करो। उनके साथ द्यूतक्रीड़ा, शस्त्र-युद्ध अथवा कटु वचन का प्रयोग कभी न करना। स्नेहपूर्ण व्यवहार से उन्हें जीता जा सकता है। जो मनुष्य इस पृथ्वी पर अर्जुन और भीम के साथ स्नेहपूर्ण संबंध रखते हुए उनसे सद्व्यवार करेगा, उसे तीनों लोकों में कोई भय नहीं रहेगा। तुम कटुता को भूल, प्रेम की नींव डालो। तुम्हारा चित्त शान्त होगा और तुम निश्चिन्त निद्रा का सुख भोगोगे।”

“महाराज! आप जितने सरल हैं, शत्रु को भी उतना ही सरल समझते हैं। हम लोगों ने पाण्डवों को सदैव कष्ट पहुंचाया है, अपमानित किया है। द्रौपदी उन पांचो की प्राणप्रिय भार्या है – आत्मा है। हमने उसका घोर अपमान किया है। भीम और अर्जुन इसे कभी विस्मृत नहीं कर पाएंगे। मेरा वध तो सूर्योदय और सूर्यास्त की तरह निश्चित है। लेकिन भीम के हाथों मरने की अपेक्षा मैं आत्म-हत्या करना उचित समझूंगा। अगर आप मेरा परामर्श नहीं मानते तो मैं अभी से अन्न-जल का परित्याग कर मृत्यु का संकल्प लूंगा।”

धृतराष्ट्र एक बार पुनः पुत्रमोह में धर्म का विचार छोड़ बैठे। दुर्योधन से पूछा –

“देखो वत्स! पाण्डवों को छल से समाप्त करने के हमने बहुत प्रयास किए लेकिन सारे के सारे असफल रहे। प्रत्यक्ष युद्ध में उन्हें जीतना असंभव है। अतः कोई अन्य युक्ति तुम्हें समझ आ रही हो तो बताओ – हम विचार करेंगे।

दुर्योधन के म्लान मुख पर स्मित की रेखाएं पुनः अठखेलियां करने लगीं, बोला –

“तात्! हम चाहते हैं कि बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास की शर्त के साथ, हम पाण्डवों के साथ एक बार पुनः कपटद्यूत खेलें। पासे फेंकने में मातुल शकुनि को इस पृथ्वी पर कोई पराजित नहीं कर सकता, अतः युधिष्ठिर की पराजय निश्चित है। पाण्डव वन में जाएंगे, हम निष्कण्टक राज करेंगे। एक वर्ष के अज्ञातवास में, हम अपने गुप्तचरों के माध्यम से उन्हें ढूंढ़ निकालेंगे और उन्हें पुनः वनगमन के लिए वाध्य कर देंगे। उनकी मृत्यु तक यह चक्र चलता रहेगा। हम यहां अखण्ड हस्तिनापुर का साम्राज्य बिना किसी विघ्न-बाधा के भोगेंगे।”

धृतराष्ट्र की अंधी आंखों में भी चमक आ गई लेकिन उन्हें यह शंका भी सताने लगी कि पुनः द्यूत का निमंत्रण यदि युधिष्ठिर ने स्वीकार नहीं किया, तो क्या होगा?

दुर्योधन ने समाधान दिया –

“महाराज! पाण्डव हम सौ भ्राताओं से चाहे जितना द्वेष रखते हों, आपके प्रति उनके मन में सम्मान की भावना सदैव रहती है। युधिष्ठिर तो आपका परम आज्ञाकारी अनुज पुत्र है। वह आपको इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर, दोनों राज्यों का महाराज मानता है। वह आपकी अवहेलना नहीं कर सकता। अतः शीघ्र ही इन्द्रप्रस्थ पहुंचने के पूर्व उन्हें द्यूत का निमंत्रण देकर यहां बुलवाएं। इसी में हम सबका कल्याण है।”

पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, महात्मा विदुर, युयुत्सु, विकर्ण और स्वयं माता गान्धारी ने दुर्योधन के सुझाव का घोर विरोध किया लेकिन धृतराष्ट्र के पुत्रमोह के आगे किसी की एक न चली।

हम लोगों को बुलाने के लिए प्रतिकामी भेज दिया गया। महाराज धृतराष्ट्र का संदेश हमें बीच मार्ग में ही प्राप्त हुआ। युधिष्ठिर ने रथ को पुनः हस्तिनापुर की ओर मोड़ दिया। द्रौपदी समेत हम चारो भ्राताओं ने उनका मार्ग रोक लिया। अविचल रहते हुए उन्होंने कहा –

“मेरे प्रिय भ्रातृगण! मुझे मत रोको। मुझे धर्म मार्ग पर चलने दो………।”

पांचाली उनकी बात काटते हुए क्रुद्ध सर्पिणी की भांति फुफकार उठी –

“कौन सा धर्म? कैसा धर्म मार्ग? आप जिस मार्ग पर जाने को उद्यत हैं, वह घोर अधर्म का मार्ग है। प्रथम द्यूत क्रीड़ा के कारण ही मुझे लांछित किया गया, मेरा अकथनीय अपमान हुआ, फिर भी आपके मन को शान्ति नहीं, सन्तोष नहीं? यही आपका धर्म है? अन्याय का आह्वान स्वीकार करना कभी धर्म नहीं होता। यह आपका अहंकार है। स्त्री, पुरुष, भ्राता, राज्य, शान्ति, सुख-सम्मान, सुरक्षा को पददलित कर आप अपनी धर्मपारायणता और विनम्रता का प्रदर्शन करना चाहते हैं। क्या यही है राजधर्म?

” सम्स्त प्राणी विधाता की प्रेरणा से शुभ और अशुभ फल प्राप्त करते हैं। उन्हें कोई टाल नहीं सकता। पितातुल्य महाराज धृतराष्ट्र की आज्ञा की अवहेलना कर मैं अपयश का भागी नहीं बन सकता।” युधिष्ठिर ने अपना निर्णय सुना दिया।

अबतक मैंने धैर्य धारण कर रखा था। लेकिन अब वह समाप्त हो रहा था। मैंने अपना रथ उनके सामने खड़ा किया, उतरकर उनके रथ पर आरूढ़ हुआ। दोनों हाथों से उनके पैर पकड़ सविनय आग्रह किया –

“भरतकुल भूषण, अग्रज युधिष्ठिर! धर्म के प्रति आपकी निष्ठा सर्वविदित है। समस्त आर्यावर्त आपको धर्मराज के नाम से पुकारता है, अतः धर्म पर मैं आपसे तर्क करने की योग्यता नहीं रखता। लेकिन मेरा मन बार-बार यह कह रहा है कि कपटद्यूत का आमंत्रण स्वीकार करना तब भी अधर्म था, अब भी अधर्म है। पांचाली स्वप्न में भी हम लोगों का अहित नहीं सोच सकती। वह सत्य कह रही है कि अन्याय का आह्वान स्वीकार करना कभी धर्म नहीं हो सकता – चाहे वह पिता के द्वारा ही क्यों न किया गया हो। इतिहास साक्षी है – प्रह्लाद ने अपने पिता हिरण्यकश्यप का अन्यायपूर्ण आह्वान कभी स्वीकार नहीं किया। भगवान नरसिंह द्वारा अपने जनक के वध के वे प्रत्यक्षदर्शी थे। उन्होंने प्रतिकार नहीं किया। स्वयं श्रीकृष्ण ने अपने मातुल का अपने ही हाथों वध किया।

महाराज! क्षुद्र स्वार्थों के वशीभूत होकर ज्येष्ठ पिताश्री धृतराष्ट्र ने द्यूतक्रीड़ा के लिए पुनः आपका आह्वान किया है। पासा फेंकने की कला में शकुनि अत्यन्त प्रवीण है। उसे आप हरा नहीं सकते। द्वितीय कपट द्यूत का परिणाम आप भी जानते हैं, मैं भी जनता हूं, पांचाली भी जानती है। मैं आपसे करबद्ध विनती करता हूं कि कृपा करके घोर अनर्थ को जानबूझकर आमंत्रित मत कीजिए, धृतराष्ट्र का कुटिल आह्वान ठुकरा दीजिए महराज।”

“अनुज अर्जुन! तुम्हें शासक और शासित के अधिकार एवं कर्त्तव्य पूरी तरह ज्ञात नहीं हैं। तुम और पांचाली भावना में बहकर मुझे मेरे कर्तव्य पथ से विचलित करने का प्रयास कर रहे हो। तुम्हें ज्ञात हो कि आज भी ज्येष्ठ पिताश्री महाराज धृतराष्ट्र ही हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ के कार्यकारी नरेश हैं और मैं हस्तिनापुर का वैध युवराज। इन्द्रप्रस्थ का मैं उनके प्रतिनिधि के रूप में महाराज हूं। हस्तिनापुर नरेश के रूप में, वे जो भी आज्ञा देंगे, उनका पालन करने के लिए युवराज युधिष्ठिर वाध्य है। अगर वे बिना द्यूतक्रीड़ा के भी संपूर्ण इन्द्रप्रस्थ की मांग करते हैं, तो मैं पूरा राज्य सहर्ष अर्पित कर दूंगा। मैं राजाज्ञा की अवहेलना नहीं कर सकता। मुझे हस्तिनापुर जाना ही होगा।”

युधिष्ठिर अपने निर्णय पर अटल रहे।

जिनका पतन या पराभव निकट होता है, उनकी बुद्धि प्रायः विपरीत हो जाती है – अर्थपूर्ण उचित परामर्श का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हस्तिनापुर पहुंच हम पुनः उसी सभा में प्रविष्ट हुए। इस बार एक ही दांव था – जीतने वाले को अख्ण्ड हस्तिनापुर का साम्राज्य, हारने वाले को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास – समस्त भ्राताओं और भार्या सहित।

जैसी आशंका थी, युधिष्ठिर एक बार पुनः पराजित हुए। माता कुन्ती को महात्मा विदुर के घर छोड़ पांचाली के साथ मृगचर्म को उत्तरीय वस्त्र के रूप में धारण कर हमने वन गमन किया। सुभद्रा को सभी पुत्रों के साथ इन्द्रप्रस्थ से सीधे द्वारिका प्रस्थान करने का संदेश भिजवा दिया।

क्रमशः 

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