पैमान-ए-क़ाबिलियत: जनप्रतिनिधि बनाम लोक सेवा अधिकारी

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निर्मल रानी
कहने को तो हमारे देश का विशाल लोकतंत्र संसदीय व्यवस्था,न्यायपालिका तथा कार्यपालिका जैसे स्तंभों पर टिका हुआ है। हालांकि चौथा स्वयंभू स्तंभ मीडिया अथवा प्रेस को भी कहा जाता है। आज के संदर्भ में इस चौथे स्वयंभू स्तंभ की हालत क्या है इसपर चर्चा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। बस इतना ही कहना काफी है कि आज देश में तमाम लोग ऐसे हैं जो टेलीविज़न देखना छोड़ चुके हैं। बहरहाल लोकतंत्र के तीन मुख्य स्तंभों में जहां तक संसदीय व्यवस्था का प्रश्र है तो इस बात से भी पूरा देश वािकफ है कि इस व्यवस्था में भागीदारी करने के लिए किसी प्रकार की शिक्षा-दीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं होती। जबकि लोकतंत्र के शेष दो स्तंभ कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में शिक्षित हुए बिना आप कोई स्थान,पद अथवा रुतबा हासिल ही नहीं कर सकते। खासतौर पर एक लोकसेवा अधिकारी बनने के लिए परीक्षा के इतने कठोर मापदंड तय किए गए हैं कि साधारण अथवा मध्यम बुद्धि का कोई भी व्यक्ति यूपीएससी की परीक्षा पास ही नहीं कर सकता। गेाया एक लोकसेवा अधिकारी कमोबेश दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों के विषयों की अधिक से अधिक जानकारी भी रखता है तथा उसके पूरे सेवाकाल के दौरान भी उसके अध्ययन तथा प्रशिक्षण का सिलसिला जारी रहता है। यूपीएससी की परीक्षा तथा साक्षात्कार में सफलता अर्जित करने के बाद भी देश के भावी प्रशासनिक अधिकारी को एक वर्ष का ज्ञानवर्धक प्रशिक्षण दिया जाता है तथा विशेष रूप से उसे पूरे देश की संस्कृति,सभ्यता,वहां के खान-पान,रहन-सहन,जलवायु,भाषा आदि की पूरी जानकारी दी जाती है।
दूसरी ओर हमारे देश की संसदीय व्यवस्था में कितनी शिक्षा या कितने प्रशिक्षण की ज़रूरत होती है इसका अंदाज़ा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भारत के प्रधानमंत्री सहित कई केंद्रीय मंत्रियों,सांसदों तथा अन्य जि़म्मेदार नेताओं की शिक्षा तथा उनकी डिग्रियों पर सवाल खड़े किए जा चुके हैं। और मज़े की बात तो यह है कि ऐसे सभी सवाल अभी तक केवल सवाल ही बने हुए है। देश को उन सवालों का अभी तक न तो कोई जवाब मिला है न ही अपनी विवादित डिग्रियों के बारे में ऐसे लोगों ने कोई स्पष्टीकरण दिया है। हां इतना ज़रूर है कि इनमें से कुछ नेताओं ने जिस विश्वविद्यालय की डिग्री अपने पास होने का दावा किया था उस विश्वविद्यालय की ओर से इस बात का खंडन ज़रूर किया जा चुका है कि ऐसा दावा करने वाले अमुक नेता ने न तो यहां से कोई शिक्षा ग्रहण की न ही इस विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें कोई डिग्री जारी की गई। यह हालात इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए काफी हैं कि जनप्रतिनिधि तथा प्रशासनिक अधिकारी में कौन ज़्यादा योग्य और काबिल होता है और शासन व्यवस्था को चलाने की समझ किस में ज़्यादा होती है? वैसे भी इस बात को इस उदाहरण के साथ भी आसानी से समझा जा सकता है कि जब देश में या किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होता है उस समय जनप्रतिनिधिगण तो अपने-अपने राजनैतिक मंसूबों में जुट जाते हैं जबकि राष्ट्रपति शासन लगने वाले राज्य की शासन व्यवस्था पटरी पर दौड़ती ही रहती है। ज़ाहिर है यह लोकसेवा अधिकारी ही होते हैं जो किसी निर्वाचित सरकार के अभाव में भी शासन व्यवस्था को बखूबी चलाने की काबिलियत रखते हैं।
इतना ही नहीं बल्कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि,मंत्री,मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री यहां तक कि राज्यपाल व राष्ट्रपति तक के सलाहकार,सचिव तथा और भी कई वरिष्ठ अधिकारी ही इन लोगों के मुख्य सलाहकार हुआ करते हैं। यह जनप्रतिनिधि भले ही किसी कानून के बनाने का श्रेय स्वयं क्यों न लेते हों परंतु उस विषय विशेष पर पूरा शोध,अध्ययन तथा उसके नफे-नुकसान का नक्शा प्रशासनिक अधिकारियों ने ही बनाना होता है। ऐसे में यदि कभी देश का कोई प्रशासनिक अधिकारी सरकार की किसी लोक लुभावन नीति को लेकर उसपर सवाल खड़ा करे या उस विषय पर अपना दृष्टिकोण रखे तो क्या सीमित ज्ञान रखने वाले इन जनप्रतिनिधियों को उसकी बात सुननी नहीं चाहिए? और क्या इन ‘महाज्ञानी’ जनप्रतिनिधियों को यह शोभा देता है कि वे ऐसे अधिकारियों की सुनने के बजाए उसे कारण बताओ नोटिस देकर उसे मात्र एक सरकारी नौकर होने का एहसास दिलाते रहें? बिहार में राबड़ी देवी के मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार के एक प्रशासनिक अधिकारी ने मुख्यमंत्री के एक आदेश का अनुपालन करने से इंकार कर दिया था और जब मुख्यमंत्री को यह बात बुरी लगी तो उस समय उस अधिकारी ने पूरे साहस के साथ यह भी कहा था कि अमुक आदेश के नफे-नुकसान व उसके भविष्य के बारे में जितना मैं समझता हूं उतना माननीय मुख्यमंत्री महोदया नहीं समझतीं।
आज हमारे देश में सौभाग्यवश सैकड़ों ऐसे प्रशासनिक, विदेश सेवा,पुलिस तथा राजस्व सेवा से जुड़े अनेक ऐसे अधिकारी हैं जो शासन व्यवस्था तथा देश के विकास व प्रगति से जुड़े अनेक विषयों पर आलेख व पुस्तकें लिखते रहते हैं। समय-समय पर इन्हें विभिन्न प्रकार के राज्यपाल व राष्ट्रपति सम्मान भी मिलते रहते हैं। इसके बावजूद अपनी सीमित सोच ,राजनैतिक पूर्वाग्रह तथा लोक लुभावन नीतियों का पोषण करने वाले जनप्रतिनिधियों को प्रशासनिक अधिकारियों में अपने से ज़्यादा काबिलियत दिखाई नहीं देती। यहां नाम लिखने की तो कोई ज़रूरत नहीं परंतु देश जानता है कि स्वतंत्रता से लेकर अब तक न जाने कितने अंगूठा छाप मंत्री व मुख्यमंत्री गण इन्हीं काबिल प्रशासनिक अधिकारियों पर न केवल राज कर चुके हैं बल्कि इन्हें झिड़कियां भी देते रहे हैं। एक बार फिर देश ऐसे ही एक अफसोसनाक घटनाक्रम से रूबरू है। इन दिनों देश में स्वच्छ भारत अभियान के तहत खुले में शौच करने की भारतीय लोगों की आदत बदलने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए तरह-तरह के उपाय अपनाए जा रहे हैं। कहीं शौचालय बनाए जा रहे हैं तो कहीं खुले में शौच करने पर जुर्माना लगाया जा रहा है। परंतु देश की मध्यप्रदेश 1994 बैच की एक काबिल प्रशासनिक अधिकारी दीपाली रस्तोगी ने अपने एक लेख में प्रधानमंत्री की स्वच्छ भारत योजना पर कुछ सवाल खड़े किए हैं। सरकार ने दीपाली रस्तोगी के सवालों का जवाब देने के बजाए उन्हें अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम 1968 के उन प्रावधानों का उल्लेख करते हुए एक नोटिस जारी की है जिसके तहत सरकार की नीति योजना तथा सरकारी निर्णयों की कोई भी अधिकारी आलोचना नहीं कर सकता।
दीपाली रस्तोगी ने अपने आलेख में यह कहने का साहस जुटाया था कि भारत में खुले में शौच मुक्त अभियान की अवधारणा को पश्चिमी देशों से आयातित किया गया है। उन्होंने भारत जैसे देश में जहां कई इलाकों में सूखा पड़ता है, जहां मीलों दूर से घर-परिवार की औरतें व बच्चे अपने सिरों पर पीने का पानी उठाकर लाते हों वहां शौचालय में बहाने के लिए पानी की व्यवस्था कैसे की जा सकती है? खुले में शौचमुक्त अभियान तथा जल बचाव अभियान दोनों एक-दूसरे के विरोधी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि खुले में किया गया शौच एक दिन की तेज़ धूप से ही खाद में परिवर्तित हो जाता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि शहर तथा दूर-दराज़ के गांवों की परिस्थितियां तथा वहां की सुविधाएं चूंकि एक जैसी नहीं होती इसलिए हर जगह एक जैसा कानून या एक जैसी व्यवस्था भी लागू नहीं हो सकती। शहर तथा गांव की ज़मीनी हकीकतें तथा वहां के लोगों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। आिखर इस वरिष्ठ अधिकारी की उपरोक्त बातों में गलत बात क्या नज़र आती है? एक अकेले दीपाली ही नहीं बल्कि और भी अनेक लेखक व बुद्धिजीवी इस विषय पर अनेक लेख व पुस्तकें लिख चुके हैं। परंतु दीपाली को नोटिस देना इस बात का सुबूत है कि काबिलियत के पैमाने पर जनप्रतिनिधियों व प्रशासनिक अधिकारियों में कितना ही अंतर क्यों न हो परंतु एक जनप्रतिनिधि अपने आदेश,नीतियों या लोकलुभावन योजनाओं के विषय में किसी प्रकार की नुक्ताचीनी अथवा आलोचना सुनना व सहन करना नहीं चाहता भले ही वह देश के लिए हितकारी ही क्यों न हो।

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