लेखक परिचय

शिव शरण त्रिपाठी

शिव शरण त्रिपाठी

वरिष्ठ पत्रकार सम्प्रति सम्पदक-दि मॉरल
मो – 9450329077

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के तीस दिनों के काम-काज से सूबे के जहां विपक्षी दलों के नेतागण स्तब्ध है वहीं जनता को सब कुछ सपने जैसा लगा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी ने तीस दिनों में जिस रफतार से निर्णय लिये हैं उससे यदि उनकी सरकार को सुपरफ ास्ट योगी सरकार कहा जाने लगा है तो कतई ठीक ही है। ३० दिनों में तीन कैबिनेट बैठके कर योगी ने जहां एक इतिहास रच दिया वही बतौर एक मुख्यमंत्री लगातार १६-१८ घंटे तक काम करने का नया रिकार्ड भी बना डाला।
शाही अंदाज में काम करने वाली नौकरशाही जहां काम की रफतार से पसीने-पसीने हो रही है वहीं भ्रष्टाचार पर जारी कड़े प्रहार से भ्रष्ट नौकरशाहों की नींद हराम हो चली है।
शिवशरण त्रिपाठी
महज तीस दिनों में प्रदेश के लोगो की बेहतरी के लिये तीस से भी अधिक निर्णय लेकर योगी सरकार ने अपने इरादे जाहिर कर दिये हंै। मुख्यमंत्री जानते है कि सरकार का एक-एक दिन महत्वपूर्ण है और बदहाल प्रदेश को पटरी पर लाने में उनकी सरकार को एक साल का समय भी कम होगा।
मुख्यमंत्री श्री योगी अच्छी तरह जानते है कि बीते १५ सालों में किस तरह प्रदेश के लोगो की गाढ़ी कमाई को बेदर्दी से लूटा गया है इसीलिए वो प्रदेश के विकास के साथ-साथ ऐसे भ्रष्टाचारियों की कमर तोड़ देने का भी काम कर रहे है। जिस तरह कुछ अधिकारियों के यहां पड़े आयकर के छापों में ही करोड़ों की अकूत दौलत बरामद हुई है उससे इस बात से भला कौन इंकार कर सकता है कि अतीत में सरकार के संरक्षण में अधिकारियों ने बेखौफ होकर जनता की गाढ़ी कमाई को दोनो हाथों से लूटने में जरा भी कोताही नहीं बरती।
योगी सरकार ने न केवल पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र के एक-एक वादों को जल्द से जल्द अमली जामा पहनाने का प्रयास तेज कर दिया है वरन् प्रदेश के लोगो की जरूरतों के मद्देनजर भी ताबड़तोड़ फ ैसले लिये जा रहे हैं। मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ ने सरकार की पहली कैबिनेट बैठक के पूर्व जहां जनहित के कई कठोर निर्णय लिये वहीं पहली कैबिनेट बैठक में वादे के अनुरूप लघु एवं सीमान्त किसानों के कर्ज माफ करने की घोषणा करके किसानों के मुरझाये चेहरों पर रौनक ला दी।
मंत्रियों/नौकरशाहों को अपनी सम्पत्तियों की घोषणा करने का आदेश देकर जहां मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया कि अब उनकी सरकार में भ्रष्टाचार किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं होगा वहीं कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये पुलिस के आला अधिकारियों के इस तरह कान ऐंठे कि पुलिस प्रशासन हिल सा गया। चौराहों-चौराहों पर जहां पुलिस दिखने लगी वहीं पुलिस की गश्त भी तेज हो गई। लड़कियों व महिलाओं को शोहदो व गुण्डों से पूरी तरह महफ ूज बनाने के लिये उन्होने एंटी रोमियो दस्ते के गठन का आदेश क्या दिया शोहदे थर्राने लगे।
सूबे भर में धड़ल्ले से चल रहे बूचडख़ानों के खिलाफ सख्त कार्यवाही शुरू कर दिये जाने से मानो भूचाल ही आ गया। मुस्लिम समाज के कुछ लोगो ने नेतागीरी करने की कोशिश की तो सरकार ने साफ कर दिया कि अवैध बूचडख़ाने किसी भी कीमत पर नहीं चलने देगें और किसी ने भी आदेश का पालन नहीं किया तो उसे कड़ी सजा भुगतने को तैयार रहना ही होगा। नतीजतन देखते ही देखते अधिकांश अवैध बूचडख़ानों पर ताले लटक गये और जो लोग गलीकूचों में चोरी छिपे बूचडख़ाने चला रहे थे वे भी दहशत में आकर उसे बंद करने को मजबूर होते देखे गये।
कार्यालयों में तम्बाकू खाने पर पूर्ण प्रतिबंध लागू करने के फ रमान के साथ योगी सरकार ने कार्यालयों को साफ -सुथरा रखने के लिये सख्त निर्देश जारी कर दिये। मुख्यमंत्री ने जहां अपने कैबिनेट के मंत्रियों को स्वच्छता अभियान की शपथ दिलाई वहीं ऐसा ही फ रमान सारे विभागों को जारी कर दिया।
सरकारी कार्यालयों में चौपट हो चुकी कार्यसंस्कृति को पुन: बहाल करने की दृष्टि से मुख्यमंत्री ने जहां सभी कार्यालयों में बायोमैट्रिक हाजिरी लगाने की व्यवस्था करने के निर्देश जारी कर दिये वहीं मंत्रियों को औचक निरीक्षण करने के भी आदेश जारी कर दिये। नि:संदेह उनके सभी सहयोगियों ने अपना काम शुरू भी कर दिया चाहे कृषि मंत्री श्री सूर्य प्रताप शाही हो, चाहे खादी एवं ग्रामोद्योग मंत्री श्री सत्यदेव पचौरी अथवा वक्फ मंत्री श्री मोहसिन रजा ताबड़तोड़ छापों से लापरवाह व कामचोर अधिकारियों/कर्मचारियों को समय पर आने को मजबूर कर दिया।
मुख्यमंत्री ने दूसरी कैबिनेट बैठक में भी जनहित के कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये। आलू किसानों को राहत देने की नीयत से जहां उन्होने तत्काल प्रभाव से किसानों से ४८७ रूपये प्रति क्वंटल आलू खरीदने का फ रमान जारी कर दिया वहीं सूबे के जिला मुख्यालयों में २४ घंटे बिजली देने के लिये केन्द्र के साथ पावर फ ॉर आल एमओयू पर समझौते का निर्णय लिया और १४ अप्रैल को उसे पूरा भी कर दिखाया।
जनहित में जहां १५ जून तक सभी सड़कों को गड्ढा मुक्त करने का आदेश जारी किया वहीं भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार
जारी रखते हुये अवैध खनन रोकने के लिये टास्क फ ोर्स के गठन का प्रस्ताव किया। इसी कैबिनेट बैठक में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, लखनऊ, कानपुर, गाजियाबाद अथॉरिटी में १० करोड़ से ऊपर के हुये सभी कामों की जांच कराने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया।
योगी सरकार की कैबिनेट की तीसरी बैठक में भी महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये। जिनमें किसानों के हितों को सर्वोपरि रखा गया। बैठक में जहां प्रधानमंत्री फ सल बीमा योजना लागू करने को मंजूरी दी गई वहीं खराब फ सल का समय सीमा में भुगतान किये जाने का निर्णय लिया गया। किसानों के हितों के पोषण के लिये प्रदेश में २० नये कृषि विज्ञान केन्द्र बनाये जाने का फ ैसला लिया गया। दिव्यांगोंको सम्मान देने की दृष्टि से विकलांग जनकल्याण का नाम बदलकर दिव्यांग जन विकास सशक्तिकरण नाम किया गया।
अलावा उपरोक्त के आगरा एयरपोर्ट का नाम पं. दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रखा गया तो एयरफ ोर्स स्टेशन गोरखपुर के सिविल टर्मिनल का नाम महायोगी गोरखनाथ के नाम पर रखे जाने का फ ैसला लिया गया।
इस बैठक में भी भ्रष्टाचार पर चोट करने की सरकार की कवायद जारी रही। निर्णय लिया गया कि अब प्रदेश में सभी विभागों में ई-टेंडरिंग से ठेके दिये जायेगें।
योगी सरकार के ३० दिनों के फ ैसलों को देखा जाये तो साफ पता चलता है कि योगी सरकार ने सूबे के समग्र कल्याण की दृष्टि से निर्णय लिये है वहीं बिना किसी विभेद के समाज के सभी वर्गो के लिये योजनाएं प्रस्तुत की है।
जानकार सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ एक साल के भीतर प्रदेश की तस्वीर बदलने की दृष्टि से काम कर रहे है। उन्हे अच्छी तरह पता है कि यदि २०१८ तक वह अपनी सरकार के काम-काज से प्रदेश की जनता को संतुष्ट न कर सके तो २०१९ के आम चुनाव में लोगों की नाराजगी भी झेलनी पड़ सकती है। फि लहाल जिस समर्पण व पारदर्शिता के साथ योगी सरकार कदम दर कदम प्रदेश के समग्र कल्याण हेतु कार्य करने में जुटी है उसके सार्थक नतीजे आने से कोई रोक भी नहीं सकता।

लोकतंत्र मुस्कराया….!
जब देश को गोरों की दासता से मुक्ति मिली तो आमजन को आस बंध चली कि अब उन पर गोरों व उनकी कृपा से पल्लवित/ पुष्पित होने वाले सामंती मानसिकता के काले अंग्रेजों के अत्याचार तो सदा के लिये बंद हो ही जायेगे। अपनों के ही बीच कोई विधायक बनेगा तो कोई सांसद। उनमें से ही कोई मुख्यमंत्री बनेगा, कोई प्रधानमंत्री तो कोई राष्ट्रपति। यानी सब अपने ही होगें, अथवा अपनो के बीच के होगे। ऐसे ही अपना ही, अपनों के बीच का ही कोई दरोगा बनेगा तो कोई कलेक्टर। ऐसे में उसके ठाठ न भी होगे तो कम से कम वो खुलकर अपनी समस्या तो बता सकेगा, शिकायत तो दर्ज करा सकेगा। उसे कोई दुत्कारेगा तो नहीं। कोई उसे कमतर तो नहीं आंकेगा।
आजादी के बाद शुरूआती दिनों में उसकी उक्त सोच साकार होते हुये दिखी। चाहे मुख्यमंत्री हो, चाहे प्रधानमंत्री बिना किसी ताम-झाम के लोगो के बीच जब आते थे हर कोई उनसे मिलकर अपनी बात कह सकता था। विधायक/सांसद भी अपने घरों पर तो आमजन से आत्ममीयता से मिलते ही थे कार्यवश जब वे साइकिल से निकलते थे सबसे मिलते जुलते सबकी सुनते सुनाते ही आगे बढ़ते थे।
आजादी के दिन ज्यों-ज्यों बीतते गये त्यों-त्यों अपनों के ही रंग ढंग बदलने लगे। अतीत में लाल व नीली बत्ती की इजाजत अपनों को महज इसलिये दी गई होगी कि उन्हे अपने कार्य निष्पादन में परेशानी न हो पर परिणाम इसके विपरीत आते दिखे और फि र तो लाल व नीली बत्ती की बढ़ती अपसंस्कृति उन्हे अपनों से अलग दिखने व विशिष्ट बनने का एक हथियार सी बन गई।
लाल व नीली बत्ती की बढ़ती ताकत का ही नतीजा रहा कि कालांतर में चोर, उचक्कों से लेकर डकैतों, हत्यारों तक में लाल बत्ती पाने की ललक पैदा होने लगी। फि र क्या था देखते ही देखते अनेक ऐसे लोगो ने अपनो के कंधो पर चढ़ कर येन-केन प्रकारेण लाल बत्ती हथियाने में भी सफलता प्राप्त कर ली। नतीजतन जो एक अदने पुलिसवाले को देखकर चेहरा छुपाते रहे हो, जो रास्ता बदलने को मजबूर होते रहे हो वे अपने घरों पर सिपाही छोड़ कप्तानों तक की हाजिरी लगवाने लगे। उनकी छत्र छाया में उनके गुर्गो ने भी लाल बत्ती का लाभ उठाना शुरू कर दिया। लाल नीली बत्ती में वसूली, छिनौती, डकैती डाली जाने लगी। टोल बूथों पर टोल मागने पर कर्मचारियों की पिटाई होने लगी।
लाल बत्ती से जब माननीयों का दिल नहीं भरा तो उन्होने अपने को अतिविशिष्ट दिखाने की गरज से तथा अपनो से और दूरी बनाने के लिये सुरक्षा दस्तों व हूटर लगी गाडिय़ों की व्यवस्था बना ली। हांऊ-हांऊ, चांऊ-चांऊ करती लाल बत्ती लगी गाडिय़ों के आगे पीछे १०-२० जवानों से लैस पुलिस की गाडिय़ां सुरक्षा प्रदान करते चलती तो आम आदमी सिवाय माथा पीटने के कर भी क्या सकता था। अपनी आंखों के सामने अपनो को ही उसकी गाढ़ी कमाई पर गुलछर्रे उड़ाता देख उसका कलेजा ही बैठ जाता। वो सोचता इससे ठीक तो गोरों की गुलामी ही थी क्योकि उससे यह तो संतोष था कि उस पर हुकूम चलाने वाले अपनों के बजाय विदेशी थे।
लाल-नीली बत्ती की हनक के कुपरिणामों से आजिज आकर वर्ष २०१३ में मा. सर्वोच्च न्यायालय ने इसके दुरुपयोग पर आपत्ति जताते हुये इस पर अंकुश लगाने को कहा पर उसकी आवाज मानो नक्कार खाने में तूती की आवाज साबित हुई।
देश का आम आदमी तब भौचक रह गया जब गत बुधवार को मोदी सरकार ने पूरे देश में लाल/नीली बत्ती के उपयोग पर १ मई से रोक लगाने की घोषणा कर दी। सरकार ने सभी नेताओं, जजों तथा सरकारी अधिकारियों की गाडिय़ों से लाल बत्ती हटाने का निर्णय लिया है। इनमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, राज्यों के मुख्यमंत्री व मंत्री तथा सभी सरकारी अफ सरों के वाहन शामिल है। अब केवल एम्बुलेंस, फ ायर सर्विस जैसी आपात सेवाओं तथा पुलिस व सेना के अधिकारियों के वाहनों पर ही नीली बत्ती लगेगी।
मोदी सरकार के इस निर्णय का तत्काल असर भी दिखाई देने लगा है। निर्णय लागू होने से पहले ही अनेक मंत्रियों, अधिकारियों ने अपने वाहनों से बत्तियां स्वयं हटा ली है। केन्द्र के निर्णय के बाद खासकर उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने तो तत्काल प्रभाव यानी गुरूवार से ही लाल बत्ती पर रोक लगा दी और सर्वप्रथम खुद गैर लाल बत्ती की गाड़ी से कार्यालय पहुंचे।
नि:संदेह केन्द्र सरकार के उक्त निर्णय की आम लोगो ने खुलकर प्रशंसा की है हालांकि सभी का मानना है कि माननीयों व अधिकारियों की सामंतवादी सोच समाप्त करने के लिये अभी भी बहुत कुछ यह जाना बाकी है। मसलन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्रियों को छोड़कर किसी भी मंत्री, सांसद, विधायक, अथवा किसी अधिकारी को सरकारी खर्चे पर सुरक्षा नहीं मुहैया करानी चाहिये। जिसे जरूरत हो तो वो स्वयं अपने खर्चे पर सुरक्षा व्यवस्था करें। अलावा उपरोक्त के गैर जरूरी सुविधायें भी तत्काल समाप्त किये जाने की जरूरत है । तभी लोकतंत्र की मुस्कराहट खिलखिलाहट में बदल सकेगी।

 

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