अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाली पाठशालाएं हिंसा का पर्याय बनती जा रही हैं

अखिलेश आर्येन्दु

सात महीने पहले कोलकाता के मार्तिनेर स्कूल के एक छात्र रौवनजीत रावला की स्कूल के अध्यापकों द्वारा बेंतों से बेतहाशा पिटाई करने के बाद आत्महत्या कर ली थी। तब पुलिस प्रशासन ने दोषी प्रिंसिपल और अध्यापकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की थी। लेकिन सामाजिक संगठनों और राश्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सभी दोशी अध्यापकों को गिरफ्तार करने की मांग उठाई थी। बढ़ते दबाव की वजह से पिछले दिनों पुलिस प्रशासन ने कार्रवाई कर उन्हें गिरफ्तार किया, लेकिन धारा 305 के तहत जो कार्रवाई होनी थी उसकी जगह महज लापरवाही बरतने की धारा लगाई गई और मामले को हल्का कर दिया गया। स्कूलों और पाठशालाओं में बच्चे के साथ हिंसा की बारदातें कोई नई बात नहीं है। देश के सभी हिस्सों में स्कूलों और पाठशालाओं और गुरुकुलों में आए दिन हिंसा की वारदातें होती रहतीं हैं। इसके खिलाफ सामाजिक संगठन और राश्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग दोशी प्रधानाचार्यों और अध्यापकों पर कार्रवाई करने का दबाव भी डाला जाता है लेकिन बहुत कम ऐसे मामले होते हैं, जहां दोशी को सजा दी जाती है।

पाठशालाओं में हिंसा की वारदातें जिस तरह से लगातार बढ़ रही हैं उससे लगता है, बच्चों के मानसिक विकास के प्रति अध्यापकों का जो रवैया है वह उचित नहीं है। हिंसा की जो संस्कृति पाठशालाओं मैं विकसित हो रही है उससे तो यही लगता है कि अब मानसिक विकास का एक मात्र तरीका शारीरिक दंड देना ही रह गया है। महान चिंतक जदु कृष्‍णमूर्ति के मुताबिक आधुनिक शिक्षा बच्चों में हिंसा को रोपित करने का कार्य करती हैं। बच्चों को कक्षा में ऐसे तमाम सख्‍त निर्देश दिए जाते हैं जो उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का कार्य करते हैं। मानसिक हिंसा बहुत बारीक किस्म की होती है इस लिए इसे पहचाना और रोकना दोनों मुश्किल होता है। बच्चों के मानसिक प्रताड़ना के तरीके भिन्न-भिन्न होते हैं। कई बार ऐसा होता है कि बच्चा अध्यापक से इतना डर जाता है कि वह स्कूल जाने के लिए मना कर देता है। कुछ बच्चे इतने ज्यादा परेशान हो जाते हैं कि वे आत्महत्या तक कर लेते हैं। तमाम बच्चे मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाते हैं। सबसे ताज्जुब की बात यह है कि यह सब उनके कथित विकास के नाम पर होता है। कई केसों में इस संदर्भ में न्यायालयों ने सक्त निर्देश भी जारी किए, इसके बावजूद स्कूल और पाठशालाओं में बच्चे के प्रति अध्यापकों में कोई संवेदना नहीं जगी।

पुरानी षिक्षा पद्धति से चलने वाले गुरुकुलों की हालात तो और भी बद्तर है। पिछले साल आशाराम बापू के गुरुकुल में घटी घटनाएं इसका प्रमाण हैं। देश का शायद ही कोई गुरुकुल हो जहां बच्चों को बेतहाशा शारीरिक दंड न दिया जाता हो। दंड देने के यहां भी वहीं घिसापिटा तर्क दिया जाता है कि बच्चों को सुधारने और उन्हें पाठ याद कराने के लिए शारीरिक दंड देना जरूरी है। इतना ही नहीं, इनका यौन शोषण भी बहुत बड़े पैमाने पर किया जाता है। गुरुकुल के नाम पर बच्चों के साथ जैसा व्यवहार किया जाता है वह अमानवीय तो है ही अपराधजनक भी है। कई गुरुकुलों में वहां के अध्यापक और आचार्य उन्हें ऐसी घृणित गालियां देते हैं कि सुनकर कोई भी व्यक्ति उन्हें गुरुकुल नहीं कह सकता है। चिंता की बात यह है कि शासन और प्रशासन इस तरफ गौर नहीं करते। यानी बच्चों के साथ हिंसा, उनका यौन षोशण और गैरइंसानी बर्ताव के प्रति किसी को कोई संवेदना नहीं है।

बच्चों के प्रति हिंसा और उनके शोषण की वारदातें बढ़ रही हैं यदि उसपर रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले वक्त में हमारी शिक्षा का पूरा का पूरा ढ़ाचा चरमरा सकता है। इस तरफ स्कूल प्रशासन, षिक्षा मंत्रालय, शिक्षा निर्देशालय, पुलिस प्रशासन और राष्‍ट्रीय बाल संरक्षण आयोग को उचित कदम उठाने होंगे। अध्यापकों और प्रधानाचार्यों को भी प्रशिक्षण देने की जरूरत है। जिससे बाल हिंसा को रोका जा सके।

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