लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी

किसी भी मनुष्य के दैनिक जीवन में आम लोगों की दिनचर्या का सुचारू संचालन काफी महत्वपूर्ण होता है। बावजूद इसके कि हमारे देश की लगभग 60 फीसदी आबादी देश के गांव में बसती है तथा शेष जनसंख्या शहरों व कस्बों का हिस्सा हैं। इसके बावजूद गांवों की तुलना में शहरी जीवन कहीं अधिक अस्त व्यस्त दिखाई देता है। माना जा सकता है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण शहरीकरण का विस्तार भी बढ़ती हुई अव्यवस्था के लिए जि़म्मेदार है। परंतु यह कहना भी गलत नहीं होगा कि हमारे ही देश के लोगों ने स्वयं ही अपने समाज में कुछ ऐसे ताने बाने रच डाले हैं जो अब स्वयं आम लोगों के लिए परेशानी व मुसीबत का कारण बनते जा रहे हैं। यहां तक कि साधारण उपायों के द्वारा तो संभवत: अब इन या ऐसे दुष्चक्रों से निकल पाना ही आम लागों के लिए संभव नहीं प्रतीत होता।

कस्बों, शहरों व महानगरों में आए दिन लगने वाला भारी जाम भी ऐसी ही मानव निर्मित समस्याओं में एक प्रमुख एक कहा जा सकता है। बेशक शहरों में आए दिन लगने वाले जाम का कारण वाहनों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी होना क्यों न हो या फिर इसके कारण ही हम इसे अनियंत्रित होती जा रही ट्रैफिक समस्या का नाम क्यों न दें परंतु हमारे समाज का ही एक वर्ग इस पक्ष को विकास पक्ष के रूप में भी देखता है। हो सकता है यह एक अलग प्रकार की बहस का विषय भी हो। परंतु हमारे देश में लगने वाले कुछ जाम तो ऐसे हैं जो दशकों से लगते आ रहे हैं तथा ऐसे जाम का न तो किसी व्यक्ति के विकास से कोई लेना देना है न ही ऐसे जाम का कारण देश का विकास या बढ़ते वाहन अथवा ट्रैफिक समस्या आदि है। और वह जाम है पूरे देश में चारों ओर धर्म के नाम पर लगने वाला जाम। धर्म के नाम पर लगने वाला जाम किसी एक समुदाय के अनुयाईयों द्वारा नहीं लगाया जाता बल्कि हमारे आज़ाद देश के सभी आज़ाद नागरिक आज़ादी का पूरा लाभ उठाते हुए जब जहां और जिस अवसर पर भी चाहें वहंीं चंद लोगों को साथ लेकर अपने धर्म संबंधी बैनर,झंडे,निशान या अन्य प्रतीकों को लेकर सडक़ों पर निकल पड़ते हैं। इन धर्मावलबियों को इस बात को सोचने की कभी ज़रूरत ही नहीं महसूस होती कि किसी धार्मिक आयोजन के नाम पर उनके द्वारा लगाया जाने वाला जाम समाज के अन्य लोगों के लिए भले ही उनमें उनके अपने समुदाय के लोग भी क्यों न शामिल हों,के लिए कितनी परेशानी खड़ी कर सकता है तथा इसके दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं।

वैसे भी हमारा देश पर्वों व त्यौहारों का देश कहलाता है। यहां विभिन्न धर्मों व संप्रदायों के तमाम त्यौहार ऐसे हैं जिन्हें मनाने के लिए उन समुदायों से जुड़े लोग कभी जुलूस व जलसे की शक्ल में सडक़ों पर निकलते हैं तो कभी शोभा यात्रा अथवा नगर कीर्तन के रूप में इन्हें सडक़ों पर देखा जा सकता है। कभी मोहर्ररम के जुलूस के नाम पर तो कभी ईद-ए-मिलाद के अवसर पर, कभी जुम्मे व ईद-बकरीद की सामूहिक नमाज़ों के नाम पर मुख्य मार्गों पर कब्ज़ा तो कभी किसी महापुरुष की जन्मतिथि के अवसर पर निकलने वाला धार्मिक जुलूस,कभी गुरुपर्व,कभी रामनवमी,कभी परशुराम जयंती तो कभी अग्रसेन जयंती,कभी रविदास जयंती तो कभी बाल्मीकि जयंती। गोया हमारे देश के लगभग सभी समुदायों से जुड़े लोग अपने-अपने भगवानों,देवी-देवताओं,महापुरुषों अथवा अन्य धार्मिक आयोजनों को मनाने के लिए जब तक सडक़ों पर नहीं उतरते अथवा जब तक अपने आयोजन को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं करते तब तक ऐसा लगता है गोया इन लोगों ने अपनी परंपरा का या तो सही ढंग से निर्वहन नहीं किया या फिर यह लोग अपने धार्मिक आयोजन को दिल खोलकर अंजाम नहीं दे सके।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि अपने किसी भी धार्मिक आयोजन को सडक़ों पर लाने के बाद उस कारण लगने वाले ट्रैिफक जाम के भुक्तभोगियों को होने वाली परेशानियों का जि़म्मेदार कौन है? क्या किसी भी धर्म या समुदाय के किसी महापुरुष ने अपने अनुयाईयों को यह संदेश दिया है कि वे आम लोगों की परेशानियों, दु:ख तकलीफों, व उनकी ज़रूरतों व चिंताओं की परवाह किए बिना अपने धार्मिक आयोजनों को सडक़ों पर लेकर अवश्य जाएं? जिस प्रकार धर्म के नाम पर होने वाले आयोजनों में प्रयुक्त होने वाले लाऊडस्पीकर प्रात:काल अर्थात् ब्रह्ममुहुर्त से लेकर देर रात तक पूरे वातावरण में ध्वनि प्रदूषण फैलाते रहते हैं तथा इसके चलते स्कूल व कॉलेज के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है तथा बुजुर्गों व बीमार व्यक्तियों के आराम में बाधा पहुंचती है उसी प्रकार धार्मिक आयोजनों में लगने वाला जाम भी कभी किसी बीमार व्यक्ति के जाम में फंसने पर उसकी मृत्यु का कारण बन जाता है तो कभी किसी की बस या ट्रेन छूट जाती है, कभी कोई व्यक्ति अपनी परीक्षा या नौकरी संबंधी इंटरव्यू पर सही समय पर न पहुंच पाने के कारण उससे हाथ धो बैठता है। अब यदि इस प्रकार के आयोजन, जलसा-जुलूस,शोभा यात्रा या नगर कीर्तन आदि अन्य लोगों के लिए परेशानी का कारण बनें या किसी के जीवन के साथ ही इन आयोजनों के चलते खिलवाड़ हो जाए ऐसे में क्या ऐसे आयोजनों को धार्मिक आयोजन का नाम दिया जा सकता है?

यहां उदाहरणस्वरूप पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका व ब्रिटेन आदि देशों में होने वाले कुछ ऐसे आयोजनों,जलसा-जुलूसों का जि़क्र करना ज़रूरी है। इन देशों में अधिकांशत: यह देखा जाता है कि अधिक से अधिक भीड़ वाले जुलूस रूपी कोई भी आयोजन प्राय: वहां नियमित रूप से चलने वाले यातायात को क़ तई प्रभावित नहीं करते। जुलूस में शिरकत करने वाले लोग या तो फुटपाथ अथवा पैदल मार्ग को अपने आयोजन का मार्ग बनाते हैं या फिर कुछ ऐसे विशेष स्थान ऐसे कार्यक्रमों के लिए निर्धारित किए गए हैं जो यातायात मुक्त हैं तथा इन स्थानों को विशेषकर ऐसे ही भीड़-भाड़ वाले या जलसा-जुलूस जैसे मकसदों के लिए निर्धारित किया गया है। इन देशों के लोग सामाज की ज़रूरतों को भी उतना ही महत्व देते हैं जितना कि अपनी धार्मिक अथवा राजनैतिक ज़रूरतों को। यही वजह है कि भले ही उक्त देशों में वाहनों की लंबी क़तारों के कारण यातायात समस्या क्यों न खड़ी होती हो परंतु धर्म व राजनीति के नाम पर इन देशों में ऐसे जाम लगते नहीं देखे जाते जैसे कि हमारे देश में प्राय: लगते ही रहते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से यह देखा जा रहा है कि कई धर्मगुरुओं के किसी शहर में जाने पर उनके अनुयाईयों द्वारा गुरु जी के सम्मान में कलश यात्रा के साथ साथ गुरु जी की शोभा यात्रा का आयोजन किया जाने लगा है। यह सिलसिला भी धीरे-धीरे अब एक नया व विशाल रूप धारण करता जा रहा है। अब एक के बाद एक कई शहरों में इस प्रकार के कलश शोभा यात्रा रूपी आयोजन होते देखे जा रहे हैं। ऐसे आयोजनों का तो बिल्कुल ही कोई धार्मिक महत्व नहीं है न ही इनका किसी धार्मिक या ऐतिहासिक तिथि या घटना तक से कोई वास्ता है। यह सब तो धर्माधिकारियों की व्यक्तिगत् प्रसिद्धि तथा उनके व्यक्तित्व के प्रचार व प्रसार का एक ज़रिया मात्र है। ज़ाहिर है इस प्रकार के नित नए शुरु होने वाले आयोजन भी यातायात बाधित करने का एक और नया कारण बनते जा रहे हैं।

ऐसे में हमें अपनी धार्मिक व सांप्रदायिक जि़म्मेदारियों के साथ-साथ सामाजिक जि़म्मेदारियों का भी पूरा ख्य़ाल रखना चाहिए। यदि आज किसी भी समुदाय विशेष का व्यक्ति अपने समुदाय से जुड़े किसी आयोजन के साथ सडक़ों पर उतरता है तथा दूसरों के लिए यातायात बाधित करता है ऐसे में वही व्यक्ति कल किसी दूसरे समुदाय द्वारा आयोजित ऐसे ही किसी आयोजन का स्वयं शिकार होता है। अत: ज़रूरत इस बात की है कि इस विषय पर हम पूरी पारदर्शिता व जि़म्मेदारी के साथ चिंतन करें तथा परस्पर भाईचारे व मेल-मिलाप के साथ यातायात बाधित होने जैसी समस्याओं पर विचार करें। हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि कोई भी धर्म अथवा किसी भी धर्म से जुड़े महापुरुष ने हमें किसी भी व्यक्ति को तकलीफ देने या संकट में डालने अथवा उसके समक्ष किसी प्रकार की समस्याएं खड़ी करने की सीख कतई नहीं दी है।

11 Responses to “धर्म के नाम पर जाम का दंश झेलता हमारा देश”

  1. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    प्रदीप जी आपका आलेख या घटनाक्रम मैंने पूरा पढा है। सबसे पहले तो इसे एडिट करें। इसमें कुछ पेराग्राफ दो बार पेस्ट हो गये हैं।

    जहाँ तक इस मामले में सहयोग या सुझाव की बात है तो मेरा साफ कहना है कि जो व्यक्ति स्वयं अपनी मदद नहीं कर सकता, उसकी दुनिया में कोई भी मदद नहीं कर सकता। आपने अपनी मदद स्वयं की और आपको सफलता मिली।

    लेकिन आपने भी तब ही विरोध किया, जबकि आपको प्रत्यक्षत: हानि होने वाली थी, यदि आपने पहली बार ही पुलिसवाले के खिलाफ आवाज उठायी होती तो आप जल्दी टिकिट प्राप्त कर सकते थे।

    हमारी सबसे बडी यही समस्या है। आप इस बारे में व्यक्तिगत चर्चा करेंगे तो और भी कुछ बता सकता हूँ, लेकिन मेरा मानना है कि ऐसे मामलों से एकजुट होकर लडा जा सकता है।

    हमारे निम्न ब्लॉग भी देखे जा सकते हैं :
    http://baasvoice.blogspot.com/
    http://wwwpardafash.blogspot.com/
    http://baasindia.blogspot.com/

    My Mob : 98285-02666

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  2. Pradeep arya

    आदरणीय पुरुशोताम जी नमस्कार आपकी सहमती के लिए आपको धन्यवाद.. अभी आपके पुराने अभिमत में आपका परिचय जाना आप पत्रकारिता से जुड़े हें.. और आप भ्रटाचार और अत्याचार अन्वेषण संसथान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हें.. अभी १२ देक को mere samne ek ghtana हुई… और वह भी भ्रष्टाचार से जुडी हे में आपको एक ब्लॉग साईट की लिंक भेज रहा हूँ कृपया वो मेरी स्टोरी पढ़ें और आप अगर अपने माध्यम से कुछ कर सकते हें तो में आपका बहुत आभरी रहूँगा… http://powernpolitics.blogspot.com/ मेने अपनी उस ghtna की स्टोरी लिखी हे और में चाहता हूँ ये सब बंद हो…. आपका सहयाग और सुझाव अपेक्षित हे..
    आपका
    प्रदीप आर्य
    8800912306
    delhi
    aryap.aryap@gmail.com

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  3. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    “मीना जी और पुरोहित जी mera मानना ये हे की bahas का बिषय धर्म न होकर.. उपभोगवाद पर लगाम होना चाहिए… नहीतो आने वाले समय में शायद पैदल चलने वाला आम आदमी की वजह से दंश झेलता ट्रेफिक जाम.. और फिर आम आदमी सिर्फ कारों में चलना चाहिए ये बहस का बिषय बनेगा … और एक बात kisi समस्या को धर्म से jodkar dekhana और उस पर बहस करना सर्वथा विवाद उत्पन्न करने वाला हे निदान करने वाला नहीं… aap jaise varisth lekhakon को samasya के मूल तक जाकर उसका निदान सोचना चाहिए…. बहस नहीं…”

    मैं तो आपकी उक्त राय से सहमत हूँ! धन्यवाद!

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  4. Pradeep arya

    मित्रो मेने निर्मला जी का लेख पढ़ा और मन में थोड़ी सी pida hui ki हमको जिन चीजों को लगाम लगाने की जरुरत हे उस पर कोई लेख नहीं आता… निर्मला जी ने धर्म को तो इस जाम का दोषी बता दिया पर इस समस्या का दूसरा पक्ष नहीं रखा….. यहाँ तो ye baat ho gayi की sarkaar ने शिक्षा में सेक्स की शिक्षा को अनिवार्य कर दिया और नेतिक शिक्षा को हटा दिया…. मतलब लेख में धर्म को दंश का जनक बना दिया पर ये भूल गए की आधुनिकता की होड़ और पैसे की चमक ने इस समस्या को जन्म दिया.. जिस घर में ek car की aavashyakta हे wahan teen teen kaar और सड़कों पर अंधाधुंध इनकी मारा मरी और तो और हालत ये हे निर्मला जी कभी डेल्ही की galiyon में aakar dekho मकानों se jyada gadiyan hoti hen और वो भी बेतरतीब तरीके से… क्या इस सब पर vichar hota हे और रही बात धार्मिक रेली और जन sabhaon की तो शादियाँ में निकलने वाली barat भी isme shamil हे और क्या अब बारात पर भी रोक लगनी चाहये.. और आदि कल से आने वाली परम्पराओं को आदुनिकता के कारन समाप्त करना उचित हे… जरुरत हे मर्यादा में बंधने की… क्या पूरी की विशाल रथ यात्रा.. मुंबई और गुजरात या देश के अन्य राज्यों में होने वाले प्रतिमा विसर्जन में लोग सहभागिता नहीं निभाते… तब क्या रोड जाम के समाचार सुने हें क्यों की वहां सब जानते हे की आज उस रस्ते नहीं जाना हे
    और जो जानकर जाता हे उसे तो भुगतना होगा….देश में होने वाले राजनेतिक कार्यक्रमों की वजह से कभी ट्रेफिक जाम नहीं सुना तब कहाँ से आती हे ट्रेफिक पुलिस…. मीना जी और पुरोहित जी mera मानना ये हे की bahas का बिषय धर्म न होकर.. उपभोगवाद पर लगाम होना चाहिए… नहीतो आने वाले समय में शायद पैदल चलने वाला आम आदमी की वजह से दंश झेलता ट्रेफिक जाम.. और फिर आम आदमी सिर्फ कारों में चलना चाहिए ये बहस का बिषय बनेगा … और एक बात kisi समस्या को धर्म से jodkar dekhana और उस पर बहस करना सर्वथा विवाद उत्पन्न करने वाला हे निदान करने वाला नहीं… aap jaise varisth lekhakon को samasya के मूल तक जाकर उसका निदान सोचना चाहिए…. बहस नहीं… आपको मेरी राय कैसी लगी जरुर बताएं.. aryap.aryap@gmail.com

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  5. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    मै आपकी बात से सहमत हु meena साहब ,लेकिन क्या आप को नहीं लगता है आज हम हर बात के लिए धर्म को दोष देते है धर्म क्या है ये ही हम नहीं जानते है क्या आप ne अनुभव नहीं किया है की धर्म ही मनुष्य को अनुशाश्तित करता है धर्म का नियंत्रण ही मानव को मानवोचित कार्य के लिए प्रेरित करता है,रही bat ट्रेफिक जाम की तो उसके लिए पूर्ण रूप से हम भारतीयों की अनुशासन हीनता जिम्मेदार है न की कोई धर्म ,और अनुशासन हीनता ही हमें लें में खड़े हो कर वस्तुए लेने से रोकती है ,ये ही अनुशासन हीनता किसी कूड़े कचरे को उसके स्थान पर दकाने से रोकती है और तो हम इसे है की मूत्रालय के बहार ही मूत्र विसर्जन कर देते है {माफ़ कीजियेगा},कोई मेला हो या कोई बहुत ज्यदा भी भीड़ भाड़ एक जगह एकत्र हो तो उसके बाद क्या नजारा हो ता है हर तरफ गन्दगी ही बिखरी रहती है हमारे तीर्थ स्थलों को देखिये वहा कितने गन्दगी होती है??क्या धर्म सिखाता है एसा करना??नहीं हम को अभी बहुत सीखना है अपनी कमजोरी को हम धर्म पर आरोपित नहीं कर बैठ सकते है ,रस्ते में durर्घताना होती है बहुत ज्यादा तेज चलने से तो क्या हम गाड़ी chalaना या तेज चलाना छोड़ सकते है??हा नियंत्रण तो हर जगह जरुरी है………. वैसे भी जुलुस रोज रोज नहीं निकलते है पर जाम हर अगले मिनट लगते है फिर जो जो चीज हर मिनट घटती है उसका दोष धर्म के जुलुस पर देना बेकार है.
    यहाँ पशचिम की तुलना अपने देश से की है जरा ये तो देखिये वो लोग कितने ज्यादा अनुशासित है फिर उनका “कल्चर” अपने से अलग है वो व्यक्ति वादी ज्यादा हम सामाजवादी हमें अपने देश की सोच के अनुरूप ही कानून वगेरह बनाने होंगे………

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  6. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    इस लेख पर केवल दो टिप्पणीकारों में विमर्श हो रहा है। विशेषकर पुरोहित जी इसे केवल धर्म पर आक्षेप बतलाकर बात को धर्म से ही जोडे जा रहे हैं। दोनों में कौन सही है, इस बात का निर्णय करने का मुझे कोई हक नहीं है। लेकिन श्री पुरोहित जी से इतना जरूर निवेदन करना चाहूँगा (पूर्व में भी किया है) कि अपनी भाषा को संयमित रखकर भी बात कही जा सकती है।

    मेरे विनम्र मतानुसार आपकी निम्न टिप्पणी न तो संयमित और मर्यादित है और न हीं हिन्दू धर्म और संस्कृति के अनुरूप है :-

    “आजाद भारत में सभी को जुलूस निकालने की आजादी है, उसमें हस्तक्षेप करने वाली आप कौन होती हैं?”

    जहाँ तक इस आलेख पर मेरे विचारों का सवाल है तो इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश में अधिकतर कथित धार्मिक जुलूस, धर्म के उत्थान के लिये नहीं, बल्कि दिखावे और व्यक्तिगत या संस्थागत शक्ति प्रदर्शन के लिये होते हैं।

    श्री पुरोहित जी ने संविधान एवं मौलिक अधिकारों की बात कही है, लेकिन पुरोहित जी मेरा विनम्र मत है कि
    “मुझे कोई भी मूल अधिकार तब तक ही प्राप्त है, जब तक कि उस मूल अधिकार के उपयोग से आपके किसी भी मूल अधिकार का हनन नहीं होता है।”

    जहाँ तक जुलूसों का धर्म या आस्था से सम्बन्धित होने का सवाल है तो मेरा विनम्र और स्पष्ट मत है कि-

    “धर्म मानव के लिये है, मानव धर्म के लिये नहीं। अत: मानव जीवन को क्षतिकारी कोई भी आयोजन अमानवीय, अधार्मिक और असंवैधानिक है।”

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
    सम्पादक-प्रेसपालिका (हिन्दी पाक्षिक)
    राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    ०१४१-२२२२२२५
    ०९८२८५-०२६६६

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  7. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    सिह साहब मान लीजिये कोई २ लेन रोड है उसमे एक lan जुलुस के लिए और एक लें यातायात के लिए खोल दी जाती है और मई इसे कही मौको पर गुजरा हु,रही बात अनुशाशन हीनता की वो बात सही की पूरा भारत ही अनुशासन हिन् है ,लेकिन आप ये क्यों नहीं देखते है की जुलुस से कही ज्यादा जाम तो रोज रोज लगता है क्यों??dharmik जुलुस से ही kya apatti है?? matalb saf है is lekh me कही bhi shikshit karane की बात नहीं है purvagrh से grasit lekh ko na jane आप जैसा विद्धवन क्यों समर्थन कर रहा है??आज शायद डेल्ही में ही रोड अन्गेर ने एक जान ले ली,क्या जुलुस के कारन था??धार्मिक जुलुस निकालने को हमारा संविधान इजाजत देता है शांतिपूर्ण सभा करने की इजाजत देता है हमारे इस मौलिक अधिकार का हनन कैसे हो सकता है??धर्म से जिन्हें “एलर्जी” है उनको अपना “इलाज” करना चाहिए न की जुलुस वुलुस का बहाना ले कर लेख छापने का ,वास्तव में ट्रेफिक व्यवस्था सुधारनी है तो कही स्तरों पर काम करना पड़ेगा न एक देशीय सोचने से कुछ सुधरेगा ,वैसे भी बिना अनुमति के कोई भी जुलुस नहीं निकल सकता है और अनुमति milane पर prashashn khud ही sahayog karata है पर log prashasan का sahayog नहीं करते है तब ही जाम लगता है

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  8. आर. सिंह

    R.Singh

    मैं मानता हूँ की प्रशासन अधिकतर मामलों में वैकल्पिक व्यवस्था कर लेती है,पर आपने क्या कभी उस वैकल्पिक व्यवस्था का हस्र अपनी आखों से देखा है?क्या कभी आप उस वैकल्पिक व्यवस्था वाले मार्ग से गुजरे हैं?आपको पता चल जाता की वास्तविक स्थिति क्या होती है?आप मानिए न मानिए पर हमारी व्यक्तिगत अनुशासन हीनता जुलुस में आकर और मुखर हो जाती है.तब कोई भी वैकल्पिक व्यवस्था काम नहीं करती है.आप एक बात भूल जा रहे हैं की हमलोग व्यक्तिगत जीवन में तो अनुशासन हीन हैंही ,तब ऐसे लोगों का जुलुस अनुशासित हो यह तो संभव है नहीं और जब हम नियमित रूप से जाम लगाने में माहिर हैं तो जुलुस की बदौलत तो उसको ज्यादा होना ही है. आप अगर इस पहलू से विचार करके देखे तो शायद मेरी बात का मतलब आपकी समझ में आ जाए. रह गयी बात जुलुस और उसकी उपयोगिता की तो एक अन्य पहलू है और उसपर भी विचार होना चाहिए.

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  9. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    सिंह साहब जब भी किसी स्थान से कोई धार्मिक जुलुस निकलता है वहा पर बहुत पहले से ही वैकल्पिक व्यवस्था प्रशाशन द्वारा हो जाती है समस्या तब उत्प्पन्न होती है जब लोग उस व्यस्था के अनुसार नहीं चल कर अपने पुराने दर्रे से चलते है और ये बात पूर्ण रूप से गलत है की धार्मिक जुलूसो के कारन ही जाम लगता है कितने जुलुस होते है साल में??जबकि जाम तो रोज रोज की समस्या है ,जोसका मुख्य कारन जल्दबाजी एवं “सिविक सेन्स” का न होना है धर्म को कोसने से कोई लाभ नहीं ,मई यह की समूह की बात नहीं कर रहा आम भारतीय म ही नहीं है सिविक सेन्स खास कर उत्तर भारत में ,कानून को तोड़ना अपनी शान समजहते है खास कर “ट्रेफिक कानून” को लेकिन पर्श्तुत लेख में अपने पूर्वाग्र के कारन ही धर्म को दोष दिया गया है जबकि उससे कही ज्यादा जाम तो लोग बिना बात के लगा देते है जैसे गाड़ी गलत जगह कड़ी कर देना,बिच रस्ते पर झगडा शरु कर देना ,एक दुसरे से आगे निकले की होड़ में सामने वाले को रास्ता नहीं देना,रोड अंगेर के कारन,ये सब बाते धर्म के कारन नहीं बल्कि कानून को नहीं पालन करने के कारन है ……………….

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  10. आर. सिंह

    R.Singh

    पुरोहितजी,आपका यह कहना की धार्मिक जुलुस जाम के कारण नहीं है,सरासर गलत है.जाम के कारणों में से यह भी एक बहुत बड़ा कारण है और अगर निर्मलजी ने इस पहलू को स्पर्श किया है तो उन्होंने क्या गलत किया ?मैं मानताहूँ की जाम का विशेष कारण हमारा दैनंदिन जीवन में व्यक्तिगत अनुशासन हीनता है,जिसके चलते हम गाडी पर सवार होते ही अपने को सब कानूनों से ऊपर मानने लगते है,पर वही अनुशासन हीनता जब समूह में आती है,जिसे आप सिविक सेंस की कमी नाम दे रहे हैं तो हम इन जुलूसों के माध्यम से सड़क जाम करने उतर आते हैं.ये दोनों चीजें जो जाम का कारण बनती हैं एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.

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  11. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    आजाद भारत में सभी को जुलुस निकालने की आजादी है उसमे हकश्त्क्षेप करने वाली आप कौन होती है??जाम क्या जुलुस के कारण ही लगता है??सही बात तो ये है की भारत के लोगो ने अभी कानून का पालन करना भी नहीं सिखा है ,”सिviक सेन्स ” की बहुत कमी है भारत में ये ही मुख्यता जम का कारन होता है जिसे सिर्फ व् सिर्फ शिक्षा से ही दूर किया जा सकता है………….

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