विकास का पहिया विस्थापन के लिए ही क्यों घूमता है?

अखिलेश आर्येन्दु

केंद्र सरकार पिछले कई सालों से विस्थापितों के पुनर्वास की एक मुक्कमल नीति बनाने की बात कहती रही है। लेकिन आजादी के 63 साल बाद भी अंग्रेजों द्वारा बनाया गया 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून कुछ संशोधनों के साथ आज भी पूरे देश में लागू है। जो संशोधन किए गए, वे विस्थापितों के हक में आज भी नहीं हैं। यही वजह है कि जब विकास का मदमस्त हाथी जिस क्षेत्र विशेष में तथाकथित विकास के लिए चिंघाड़ भरता है आसपास के सारे निरीह प्राणी डर की वजह से अधर-उधर भागने पर मजबूर हो जाते हैं। पिछले महीने जब मायावती की तथाकथित विकास का पर्याय ‘यमुना एक्सप्रेस’ परियोजना के विरोध में उत्तार प्रदेश के किसान ज्यादा मुआवजे के मांग करते हुए आंदोलन पर उतर आए तो राज्य सरकार ने उसे दबाने के लिए पुलिसिया हथकंडा अपनाया और आंदोलन को बेरहमी के साथ दबा दिया। ऐसा महज उत्तार प्रदेश में नहीं हुआ बल्कि सभी राज्य सरकारें यही हथकंडा अपनाती हैं।

एक आंकड़े के मुताबिक आजादी से लेकर अब तक 3,81,500 लोग और 76300 परिवार विकास की पहिया के नीचे बेरहमी से कुचल दिए गए। सबसे ताज्जुब की बात यह है कि इसमें वे राज्य सबसे ज्यादा हैं जहां वनवासी सदियों से रहते चले आए हैं। आंकड़ा बताता है कि झारखंड, जो प्राकृतिक सम्पदा से सबसे ज्यादा मालामाल है, वहां विस्थापन सबसे ज्यादा हुआ। यानी वनवासियों को उनके वसाहट से विस्थापित करने का कार्य सबसे ज्यादा किए गए। सोचने वाली बात यह है कि इनको खदेड़ने का पराक्रम उन मुख्यमंत्रियों के समय में ज्यादा हुआ जो खुद को आदिवासी परिवार से होने और आदिवासियों के हितुआ बताते रहे हैं।

दरअसल विस्थापन का ताल्लुक सीधे आधुनिक विकास से है, इस लिए जो भी इसके विरोध में आंदोलन करता है या सरकार को कटघरे में खड़ा करता है उसे सरकार विकास विरोधी बताकर किसी न किसी अपराध में फंसा दिया जाता है या काउंटर करवा दिया जाता है। ऐसे सौ पचास नहीं, हजारों लोगों के साथ हुआ है। यानी आजाद भारत की केंद्र और राज्य सरकारें उजाड़े गए लोगों के साथ वैसा ही रवैया अपनाती हैं, जो गोरे अंग्रेज अपनाते रहे हैं। दमन की वजह से विस्थापितों के लिए चलाए जाने वाले आंदोलनों को भी कभी-कभी पीछे हटना पड़ता है। सोचने की बात है यदि गैरइंसाफी के विरोध में आंदोलनकारियों को पीटपाटकर पीछे धकेल दिया जाता है तो गुलामी और आजादी का क्या मायने रह जाता है।

एक आंकड़े के मुताबिक उड़ीसा, झारखंड, पश्चिमी बंगाल, उत्तार प्रदेश, मध्य प्रदेश, केरल और आंध्र प्रदेश से आजादी के इन 63 सालों में जो लाखों की तादाद में लोगों को विकास के पहिए के नीचे कुचल दिया गया, आज उनकी हालात जस की तस बनी हुई है। यह चाहे नर्मदा बांध परियोजना से विस्थापित हुए लोग हों, या टिहरी बांध परियोजना से विस्थापित हुए लोग हों। एक बहुत अचरज की बात यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें, विकास को विस्थापन से जोड़कर ही देखतीं आईं हैं। पिछले दिनों एक मंत्री महोदय ने इस बात को बड़े मासूमियत के साथ कहा भी-विकास करना है तो विस्थापन तो होगा ही।

जहां तक विस्थापितों को रोजगार और आवास मुहैया कराने का सवाल है, वह भी हर राज्य सरकार की नीतियों के तहत ही किया जाता है। इस संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि राज्यों में बने कानून और नीतियां अलग-अलग तो हैं ही, बहुत ही सीमित संदर्भ में कार्य करतीं हैं। इस लिए विस्थापितों को न तो उचित मुआवजा मिल पाता है और न ही रोजगार ही। ऐसी दशा में अपना सब कुछ गंवा चुके ‘बेचारे’ लोगों के पास दर -दर भटकने या भुखमरी से मरने के अलावा कोई चारा नहीं होता है। चूंकि विस्थापित बहुत ही निम्न तपके से ताल्लुक रखते हैं, इस लिए इनमें न तो मुकादमा लड़ने की क्षमता होती है और न तो सरकार के खिलाफ जबान खोलने की। यानी लाचारों की सुनने वाला महज कुदरत के अलावा कोई नहीं होता।

अब सवाल यह उठता है कि क्या तथाकथित विकास विस्थापन के बगैर नहीं हो सकता? क्या बड़े उद्योगों से ही विकास और खुशहाली का सूर्योदय होगा? और क्या उन वनवासियों और किसानों की जमीन पर ही विकास का पहिया दौड़ता है, जो सदियों से सम्पूर्ण आजीविका के साधन रहे हैं ? इनका सवालों का जवाब जब तक राज्य और केंद्र सरकार के पास नही होग तब तक विस्थापन और तथाकथित विकास, एक-दूसरे के विरोधी बने रहेंगे।

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