लेखक परिचय

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी

लेखक एन.डी. सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष हैं।

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भारत को एक कृषि प्रधान देश माना जाता है एवं काफी लंबे समय से यह कहा जाता है कि इस देश की 70 प्रतिशत आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। भारत की कृषि परंपरा का इतिहास काफी पुराना है। समृद्ध कृषक राष्ट्र होने के कारण एक समय भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। लेकिन समय के साथ तस्वीर बदलती रही और एक समय ऐसा आया कि जब चालीस के दशक में अविभाजित भारत के बंगाल क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा और अनाज की कमी के कारण लाखों लोग मौत का शिकार बने। इस अकाल की वीभिषिका के लिए तत्कालीन ब्रीटिश साम्राज्य की व्यवस्थाओं को दोषी माना गया।

आजादी के बाद भारत के नीति निर्माताओं ने बंगाल की उस घटना से सबक लेते हुए धीरे-धीरे इस दिशा में कार्य करना प्रारंभ किया कि आने वाले समय में भारत को अकाल जैसी समस्याओं से जूझना ना पड़े और ऐसी परिस्थितियां ना बने कि देश के नागरिक भूखमरी का शिकार बने। इसके परिणामस्वरूप 60 व 70 के दशक में हरित क्रांति जैसा शब्द सामने आया जिसमें बढ़ती आबादी के अनुपात में कम लागत पर अधिक अन्न उत्पादन का संकल्प लिया गया। इस हरित क्रांति में अधिक से अधिक कृषि योग्य भूमि तैयार करना, एक कृषि सत्र में दो फसलें लेना एवं उन्नत किस्म के बीज एवं उर्वरकों का प्रयोग करना जैसी बातों पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसमें से भी दो फसल एवं उन्नत बीज के उपर ज्यादा जोर दिया गया। इस हरित क्रांति के इन उपायों के फलस्वरूप 70 के दशक के अंत तक भारत दुनिया में हरित क्रांति से सबसे ज्यादा लाभ उठाने वाले देशों की श्रेणी में सम्मिलित हो गया एवं स्थितियां यहां तक पहुंची कि हम अतिरिक्त अनाज का उत्पादन कर विदेशी मुद्रा भी कमाने लगे। लेकिन इस हरित क्रांति के संसाधनों ने भारतीय कृषि भूमि की उर्वरता धीरे-धीरे कम करना शुरू कर दिया, जिसका कि पता हमें काफी देर से चला। इस क्रांति के सिध्दांतों के अनुसार अधिक फसल प्राप्त करने की प्राथमिकता में रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का प्रयोग जमकर हुआ जो कि पूर्व में गोबर एवं अन्य देसी उपायों के विपरीत थे। इन रासायनिक उर्वरकों ने फसल की उत्पादकता तो बढ़ायी लेकिन लंबे समय के बाद दुष्प्रभाव के रूप में भूमि की उर्वरता को कम करने के साथ-साथ खाद्यानों की गुणवत्ता एवं पौष्टिकता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया।

इक्कीसवी शताब्दी की शुरूआत से ही विश्व सहित भारत वर्ष में भी इन रासायनिक खेती के विकल्पों के बारे में विचार करना शुरू हुआ जिसमें ऐसे विकल्पों के विकास की बात की गयी जो खाद्यान्नों की गुणवत्ता, पौष्टिकता एवं मात्रा को बढ़ाते हुए किसान हित की बात करें और इस तरह से जैविक खेती का आगमन हुआ, क्योंकि रासायनिक खेती से उत्पन्न पदार्थों ने अन्य दुष्प्रभावों के साथ-साथ कई तरह की घातक बीमारियों को भी बढ़ावा दिया जो कि पूर्व से ही भारत के लोगों को अपनी गलत दिनचर्या एवं जीवनशैली के कारण परेशान कर रहीं थीं।

यद्यपि जैविक खेती की तकनीक एवं विधा रासायनिक खेती की तुलना में अभी महंगी है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाला समय जैविक खेती का ही होगा। आज के समय में भारत में अनाज का भंडार पर्याप्त है लेकिन फिर भी अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो आज भी देश में 5 वर्ष से कम आयु के लगभग दो करोड़ से अधिक बच्चे काल के ग्रास बनते हैं जिसमें से आधे कुपोषण के कारण मरते हैं। यदि बड़े अंतर्राष्ट्रीय संगठनों जैसे विश्व बैंक की सोच का अंदाजा करें तो इन सबका इशारा भारत में खेती की व्यवस्था एवं पद्धति में अमूल-चूल परिवर्तन करने का हैं, लेकिन यह परिवर्तन अपने साथ भारत में कृषि की दशा एवं दिशा निर्धारित करने वालों की मानसिकता एवं सोच को भी बदले तो अधिक प्रभावी होगा।

अब जबकि देश के प्रधानमंत्री जी ने नवीन हरित क्रांति का आव्हान किया है तो इस दिशा में कुछ गंभीर प्रयास जरूरी, सिर्फ गाल बजाने से कुछ नहीं होगा। आने वाले दस वर्षों के लिए कृषि भूमि एवं कृषक को प्राथमिकता पर रखना पड़ेगा, क्योंकि अभी तक ऐसा कुछ भी ठोस कदम अब तक नजर नहीं आया है जबकी हम एक और हरित क्रांति लाना चाहते हैं। हम अपनी अर्थव्यवस्था की विकास दर को खेती से संबंधित कर (जैविक खेती को अपनाकर) बढ़ सकते हैं। वहीं राष्ट्रीय कृषक आयोग के सुझावों पर गंभीरता से ध्यान देकर अमल करने की महती आवश्यकता है। इसके साथ-साथ मानसून जल व भूमिगत जल के अधिकतम उपयोग के साथ पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में कृषि योजना बनानी आवश्यक है। विशेष औद्योगिक क्षेत्रों की भांति विशेष कृषि क्षेत्र के गठन पर गहन चिंतन एवं अमल की जरूरत है। इस हरित क्रांति के लिए बीजों की उन्नत प्रणाली पर शोध भी एक गंभीर मुद्दा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि को देखते हुए यह आज से सोचना पड़ेगा कि आने वाले समय में यदि फसलचक्र बदला जिसकी की पूर्ण संभावना है, तब क्या पद्धति एवं उपाय होंगे जो कृषि भूमि एवं कृषक के हितों का संरक्षण करेंगे। क्योंकि आज भी किसान की आय का अधिकांश भाग कृषि संसाधनों के लिए ही व्यय हो जाता है व उसका हाथ अंतत: खाली ही रहता है। देश के अनेक भागों में किसानों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाएं हुई जो शायद बगैर योजना के कृषि संसाधनों में किये गये निवेश का परिणाम थीं। क्योंकि आज के समय में किसान पशुधन के बजाय मशीनों पर ज्यादा निर्भर हो चुका है। ऐसे समय में पशुधन के सदुपयोग की योजनाएं भी बनानी पड़ेंगी क्योंकि आज के वातावरण के परिपेक्ष्य में पशुधन का उपयोग भी कृषक के हित में है। इसके अतिरिक्त खेती के लिए सहकारिता का मॉडल भी अपनाया जा सकता है। अभी तक सहकारिता का प्रयोग कर्ज बांटने एवं उपज बेचने जैसे कामों के लिए ज्यादा हुआ है। अब यदि खेती करने के लिए कृषि भूमि का समूह सहकारिता के आधार पर बनाया जाये तो बड़ी भूमि पर कम लागत व शामिल लागत में अधिक उपज के लिए खेती के संसाधन प्रयोग में लाए जा सकते हैं फिर वो चाहे ट्रेक्टर व सिंचाई पंप हों, जैविक उर्वरकों का उपयोग हो या फिर हार्वेस्टर से फसल काटने की बात।

यह जैविक हरित क्रांति बाकी परिणामों के अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन भी रोकेगी क्योंकि जब गांव में ही बेहतर कृषि विकास होगा व पर्याप्त धन उपलब्ध होगा तो कोई क्यों शहर की ओर जावेगा। यदि हम संयुक्त राष्ट्र संघ की आंकलन की यकीन करें तो शहरों की ओर बढ़ते कदमों से सन 2017 तक भारत के 500 से ज्यादा शहरों की आबादी 20 करोड़ होने का अनुमान है जो आगे चलकर भारत के सामाजिक ताने-बाने को पूर्णत: क्षतिग्रस्त करने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि आज भी ”शहर का भारत” ”गांव के भारत” से भिन्न है और दुखद यह है कि इन दोनों भारत के बीच का अंतर भारत के हित में नहीं है। देश के कृषि मंत्री एवं योजना आयोग के उपाध्यक्ष की माने तो बढ़ती हुई महंगाई सीधे-सीधे फसल उत्पादकता से जुड़ी है। फिर भी चिंता का विषय है कृषक एवं कृषि भूमि आज भी सरकार की प्राथमिकता के क्रम में बहुत पीछे है। कहीं ऐसा ना हो कि ज्यादा विलंब हो जाने पर चिड़िया खेत चुग जाए और हम पछताते रह जाएं।

-पंकज चतुर्वेदी

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