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    सियासत के ब्रांडिंग चेहरों का मौसम

                          प्रभुनाथ शुक्ल 

    पादुका यानी जूता संस्कृति हमारे संस्कार में बेहद गहरी पैठ बना चुका है। यह अतिशयोक्ति नहीँ होगी कि मानव के अभ्युदय के साथ ही सम्भवतः पादुकाओं का आविर्भाव हुआ होगा। आजकल पादुकाऐं भी ब्रांडेड आने लगी हैं। कुछ दशक पूर्व सिर्फ एक नामी गिरामी कम्पनी की पादुकाओं का जलवा था। लेकिन समय के साथ इंसान और पादुकाओं में भी कई किस्में आ गई हैं, बस जिसका बाजार चल जाए वहीँ सिकंदर। क्योंकि बाजारवाद का ही दौर है। कहते हैं जो दिखता है सो बिकता है। बाजारवाद का फण्डा है जो अपनी जितनी अधिक ब्रांडिंग करेगा वह उतना बिकेगा। बिकने के लिए चाहे कितना गिरना पड़े यह दीगर बात है। 

    हमारे जीवन में ब्रांडिंग की महत्वता तेजी से बढ़ रही है। घर के अंदर से लेकर बाहर तक ब्रांड चाहिए। ब्रांड की चाहत में वह दौर दूर नहीँ जब ऑनलाइन जीवन साथी की भी डिलेवरी हो जाएगी। जैसे चुनाव आते ही सियासी दलों में ब्रांडेड चेहरे की तलाश होने लगती है। अपन के मुलुक में ब्राण्डेड पोलटिक्स का सीजन सदाबहार रहता है। क्योंकि पोलटिक्स मौसम आधारित बाजार है। आजकल ब्रांडेड चेहरों का आगमन प्रवासी पक्षियों की तरह होने लगा है। अब यह आप पर है कि आप जिस क्षेत्र में हैं उसकी कितने अच्छे तरीके से ब्रांडिंग कर पाते हैं।
     आजकल सेल बजार हो या राजनीति जितनी आप ब्रांडिंग कर लेंगे उतना सफल रहेंगे। जिन्होंने ब्रांडिंग कर लिया वह हिट कर गए जो टिक नहीँ पाए वह बैक टू पैवेलियन हो गए। वह कितना भी चिल्लाएं कोई सुनता नहीँ, जबकि कुछ लोग हल्की मुस्कुराहट और और तालियां पिट कर ही बजार लूट लिए। अब क्या कहेंगे जनाब, यह वक्त का तकाजा है।  वैसे हमारी देशी-विदेशी राजनीति में सियासी चेहरों और पादुकाओं की ब्रांडिंग होती रही है। चाहे पादुका से पीट कर ब्रांड बन गए या पादुका सिर पर रख। जबकि पादुका देने वाले तो फकीरी में हैं। जिन्हें मार्गदर्शक कहते हैं। 

    मीडिया युग में ब्रांडेड पादुकाओं से पिटने वाला बेहद सौभाग्यशाली और टीआरपी वाला माना जाता है। राजनीति में कहावत भी है कि जिसने पादुकाऐं नहीं खायी वह कुछ भी नहीं कर पाया। हाल के वर्षों में कई चर्चित पादुकाऐं और सैण्डिल स्कैण्डल चर्चित उदाहरण हैं। कई लोग तो पादुकाओं की माला पहन कर भी महान बन गए। कितनों के पुतलों को भी यह सौभाग्य मिला। विरोधियों को क्या कहें, उन्हें तो शर्म आती नहीं, वह एयर और पादुका स्ट्राइक में अंतर नहीं कर पाते। अब नारा लगाते फिर रहे हैं कि पादुकाऐं हैं तो सब कुछ मुमकिन है।

    कलयुग में ब्रांडेड पादुकायें अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष से जुड़ी हैं। आजकल लोग आपकी औकात चेहरे से नहीँ पादुकाओं से करते हैं। इसमें सतो और तमो गुण की प्रधानता होती है। इसका परिस्कृत उत्पाद सैंडिल है। जिसने भी पादुकाओं का स्वाद चखा वह नेतृत्वकर्ता बन गया और सैंडिल जिसके भाग्य में आयी वह प्रेमिका के गले का हार बन गया।  आजकल के महौल में पादुकायें धनार्जन के साथ परिमार्जन से भी जुड़ी हैं। पादुका प्रहार की संस्कृति राष्ट्रीय नहीं अंतरराष्ट्रीय भी है। देश और विदेश के कई भूतपूर्व और वर्तमान नेता राष्ट्राध्यक्ष पादुकाओं के महाप्रहार से भूतपूर्व से अभूतपूर्व बन गए हैं। 

    सालियों के लिए तो जीजू की पादुकायें मुनाफे का अच्छा सौदा हैं। पिछले दिनों हम सुसुराल गए तो मुँह बोली साली ने कहा जीजू आपकी पादुकायें चुराने का जी करता है। हमने का क्यों भाई। उन्होंने कहाँ आजकल ब्रांडेड पादुकायेंओं  और चेहरों का ज़माना है। हमने कहां डियर!  आजकल पादुकायें खाने में जीतना मजा आता वो चुराने में कहां ? आप तो अच्छी तरह जानती हैं कि पादुका और जुबान तो परिणय सूत्र में बंधे हैं। किसी महान कवि ने इस पर एक दोहा भी लिखा है… जीभिया ऐसी वावरी, कही गई सरग पताल!! आपुनि कहि भीतर गई, जूती खात कपार!! बात-बात में यह कहावत भी खूब चलती है कि आपकी जूता मेरा सिर। फ़िर मौसम जब ब्रांड, बाजारवाद और दल बदल का हो तो फ़िर चूकना भी गुनाह है। 

    प्रभुनाथ शुक्ल
    प्रभुनाथ शुक्ल
    लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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