लेखक परिचय

डॉ. मनोज मिश्र

डॉ. मनोज मिश्र

एशोसिएट प्रोफेसर भौतिक विज्ञान विभाग, डी0ए-वी0 कालेज, कानपुर।

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डॉ. मनोज मिश्र

इस समय आबादी वृध्दि, औद्योगिकीकरण व अन्य कारणों से घटती जमीन, आर्थिक विकास तथा अन्तर्राष्ट्रीय चुनौतियों के कारण भारत की कृषि जबर्दश्त दबाब से गुजर रही है। सन् 1965 के आसपास गेहूं से लदे जहाज प्रतिदिन अमेरिका से भारत आ रहे थे तथा ‘सिप टू माऊथ’ की स्थिति के कारण हमारी दशा दयनीय थी, परन्तु सन् 1970 तक आते-आते हम खाद्यान्न के मामले में आत्म निर्भर हो गये थे। इस आत्मनिर्भरता के पीछे हमारे कृषकों और कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अपनाई गई पहली हरित क्रान्ति जिम्मेदार थी। आज फिर देश के समक्ष अनाज का संकट उत्पन्न होता दिख रहा है। किसान आत्महत्या कर रहे तथा खेती करना अब दिन प्रतिदिन चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। दूसरी तरफ एक अनुमान के अनुसार सन् 2020 तक देश की आबादी 130 करोड़ हो जायेगी तथा इस आबादी का पेट भरने के लिए 3400 लाख टन अन्न की जरूरत पड़ेगी। अत: देश के अनाज को वर्तमान उत्पादन के सापेक्ष 2 से 2½ गुना वृद्धि करनी होगी जिसके लिये हमें दूसरी हरित क्रान्ति की आवश्यकता पड़ रही है।

पहली हरित क्रान्ति के दौरान पारम्परिक कृषि में तीन महत्वपूर्ण बदलाव हुए जिनमें अधिकाधिक भूमि सिचांई के अन्तर्गत लाई गई, वर्तमान कृषि भूमि पर फसल को उपजाया गया तथा महत्वपूर्ण उच्च उत्पादकता वाले बीजों की विभिन्न किस्मों के साथ उवर्रकों का प्रयोग किया गया। भारत के आत्म निर्भर हो जाने के बाद कृषि के क्षेत्र की ओर ध्यान कम कर दिया गया। चॅूकि पहली हरित क्रान्ति के समय मुख्य लक्ष्य खाद्य निर्भरता थी जिसे प्राप्त कर लिया गया था। बाद में भविष्य की कोई नीति न होने के कारण अब फिर भारत के समक्ष खाद्यान्न आयात की आवश्यकता समय-समय पर महसूस होने लगी है। भारत की सरकार ने सेवा क्षेत्र तथा उत्पादन क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दिया एवं कृषि तथा कृषक को उपेक्षित किया। परिणाम स्वरूप खेती और किसानों की हालत खस्ता हुई तथा अन्न उत्पादन भी बढ़ती आबादी के अनुरूप तालमेल नहीं बिठा पाया।

अब देश के समक्ष दूसरी हरित क्रान्ति के प्रमुख तीन लक्ष्य होने चाहिए जिनमें खाद्यान आत्मनिर्भरता, उचित बफर स्टाक तथा अनाज का बड़े पैमाने पर विदेश को निर्यात है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कृषि के क्षेत्र में वैज्ञानिक दृष्टि से काम करना होगा। आधुनिक तकनीकों का उपयोग तथा कृषि उत्पादों का मूल्य सवर्ध्दन करना पड़ेगा। लगभग सभी विकसित देशों में प्रति हेक्टेयर अन्न का उत्पादन भारत के सापेक्ष 2½ से 3 गुना है अत: इन्ही तकनीकों का इस्तेमाल कर भारत में भी अन्न का उत्पादन इसी अनुपात में किया जा सकता है। उदाहरण स्वरूप कृषि वैज्ञानिक स्व0 एस0के0 सिन्हा द्वारा बिहार और पूर्वी भारत के 15 गॉवों में सिस्टम एप्रोच से भूमि विश्लेषण, बीज चयन, कृषि ऋतु, उर्वरक चुनाव तथा कृषकों को रिमोट सेन्सिग डाटा के इस्तेमाल का प्रशिक्षण कर उत्पादन में 3 गुना वृध्दि हुई तथा किसानों की आय में भी दो गुना से ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई।

भारतीय किसानों की आय बढ़े तथा कृषि उत्पादन दो से तीन गुना हो इसके लिए कृषि के क्षेत्र में आधुनिक तकनीक द्वारा मिट्टी का परीक्षण कर उसके गुणों में कमी एवं अधिकता की जानकारी कर उपयुक्त फसल उगानी होगी। जल प्रबन्धन करना होगा जिसमें ड्रिपइरिगेशन (टपकन विधि) का उपयोग कर जल की बर्बादी रोकनी होगी। जल संग्रहण करना होगा ताकि धरती के ऊपरी सतह पर पानी की उपलब्धता बढ़े। अधिक उत्पादन क्षमता के लिए उचित फसल चक्र अपनाना होगा तथा उच्च उत्पादन क्षमता से युक्त हाईब्रिड बीज तथा जैव तकनीक का इस्तेमाल करना होगा। जैव तकनीक का उपयोग कर उचित रूप से मिट्टी का जॉच कर सिचांई पर नियन्त्रण किये जाये तो उवर्रकों का प्रयोग कम किया जा सकता है तथा कार्बनिक उर्वरक उपयोग में लाये जाने चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की जीवाणु नियन्त्रक तकनीक न जानने के कारण भारत सर्वाधिक दुग्ध उत्पादक देशों में होने के बावजूद दुग्ध एवं दुग्ध उत्पादों के निर्यात में काफी कठिनाइयॉ आती है। यहॉ किसानों को जीवाणु नियंत्रण तकनीक का ज्ञान करना होगा, निर्यात बाजार तक पहुंचने के लिए कृषि उत्पादों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का होना चाहिए। कृषकों द्वारा परम्परागत फसलों के साथ-साथ नगदी फसल के उत्पादन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। भारतीय किसानों की गरीबी तथा कम शिक्षा के कारण वे कृषि के नये विकास से अपरचित है। अत: सूचना तकनीक और दूर परामर्श के द्वारा प्रसार मृदा समृध्दता, बीज का उचित चुनाव तथा मानसून के आगमन की सूचना आदि से उन्हे परिचित कराना होगा।

खेती तथा किसानों के लिए मात्र अधिक अन्न उपजाना ही काफी नहीं है वरन् उनकी आय बढ़ानी होगी। इसके लिए उन्हे देश एवं समाज की आधुनिक जरूरतों के हिसाब से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का लाभ उठाना होगा। बाजार तक पहुंचने के क्रम में सुचारू एवं अच्छी यातायात व्यवस्था करनी होगी। अन्न, फलों एवं सब्जियों आदि के उचित भण्डारण तथा प्रणाली के अनुरूप विपणन की उचित व्यवस्था करनी होगी। कृषि के बाजार के लिए किसानपरक नीतियॉ अपनानी होगी और वैश्विक चुनौतियों जैसे डब्लू.टी.ओ. तथा गैट का सामना बुद्धिमानी एवं कुशलता से करना होगा। विकसित देश अपने यहॉ के किसानों को सब्सिडी व सस्ते मूल्य पर कृषि उपकरण मुहैया कराते हैं अत: हमें भी इस तरह की सुविधाये अपने किसानों को देनी होगीं। पर्यावरण सम्बन्धी चुनौतियों तथा विश्व व्यापार की नीतियों को भारतीय कृषि एवं किसानों के हित में उपयोगी बनाना होगा।

भारतीय कृषि को मात्र अन्न उत्पादन तथा भारतीय उपभोक्ता बाजार तक सीमित न कर उसके लिए वैश्विक बाजार की तालाश करनी होगी। भारतीय किसान को अपनी भूमिका उत्पादक से कृषि उद्यमी के रूप में स्थापित करनी होगी। विश्व बाजार में मॉग के अनुसार अचार, चटनी, फल, सब्जियॉ, अण्डा पाउडर, प्रसंसाधित फल सब्जियॉ आदि का मूल्यवर्धन कर किसानों की आय बढ़ानी होगी। इस समय कम्प्यूटर का उपयोग भी बढ़ाना होगा तथा किसानों को कम ब्याज पर ऋण देकर उनकी कृषि में निवेश की क्षमता को भी बढ़ाना पड़ेगा। कृषि शिक्षा का विकास इस समय बेहद महत्वपूर्ण है देश के अन्दर उपलब्ध कृषि विश्वविद्यालय, संस्थान, महाविद्यालय तथा शोध संस्थान अपर्याप्त मात्रा में है तथा इनकी गुणवत्ता भी संदेहपूर्ण है। जिस तरह से तकनीकी एवं उच्च शिक्षा को विश्व स्तर की करने की चर्चा हो रही है उसी तरह एक मिशन के तौर पर कृषि शिक्षा को भी अपनाना होगा। बिजली की अनुपलब्धता भी किसानो के लिए एक चुनौती रही है। इसलिए बिजली के तारों का संजाल बिछाना होगा और सस्ती बिजली की उपलब्धता बढ़ानी होगी। बिजली के क्षेत्र में भी सौर ऊर्जा और बायो डीजल आदि के विकास की दिशा में भी काम करना होगा। चूॅकि कृषि का विकास ग्रामीण क्षेत्र में गरीब उन्मूलन का आधार माना जाता है अत: दूसरी हरित क्रान्ति समय की सबसे बड़ी मॉग है। कृषि प्रधान देश होने के कारण अभी सर्वाधिक लोगो की निर्भरता कृषि पर ही है। अत: सरकार को इस क्षेत्र पर मुख्य ध्यान देना होगा।

One Response to “खेती में दूसरी हरित क्रान्ति”

  1. Onkarlal Menaria

    लेखक की चिंताए बहुत वाजिब है तथा दूसरी हरित क्रांति के लिए सुझाव समयोचित है. पर dukh to is बात ka है की हमारे निति निर्माता इस बात को गंभीरता से नहीं ले रहे है. इसके फलस्वरूप खेती की उपजाऊ जमीन आवासों, कारखानों, व्यवसायिक गतिविधियों में बड़ी बे दर्दी से समाप्त की जा रही है. उपजाऊ भूमि प्रकृति का मनुष्य को अनमोल तोहफा है जिसे kisi कारखाने में उत्पादित नहीं किया जा सकता एवम उसी को समाप्त कर सभी पैसा इकठा कर रहे हे है. कृषि उत्पादों का मूल्य में अपेक्षित कम बढोतरी के साथ उत्पादन लागत में बेतहाशा बढोतरी से किसान खेती से दूर होता जा रहा है व् दिनों दिन कर्जदार हो रहा है . इसको रोकना जरूरी है . लेखक के सुजवों के साथ एक सुजाव और है की कृषि जिंसों का मूल्य निर्धारण किसानो द्वारा हो जैसे की किसी फेक्ट्री में उत्पादित मॉल का मूल्य निर्धारण कारखाने द्वारा किया जाता है.

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