क्या सेकुलरिज्म का ठुस पटाखा फिर चलाया जायेगा ?

विनायक शर्मा

चुनावों के नतीजे आने से पूर्व अटकलों का बाज़ार गर्म हो गया है. मीडिया वाले, विशेषकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया वाले हैं कि दौड़- दौड़ कर इससे पूछ और फिर उससे पूछ जिसने जो बोला उसे कांट-छाँट कर हमारे सामने परोसने के कार्य में अति व्यस्त हो गए हैं. अब एक शिगूफा यह छोड़ा गया कि माया सरकार का एक बड़ा अधिकारी भाजपा के एक बड़े नेता के पास मिलने गया. फिर इसी तथाकथित घटना के इर्द-गिर्द दिन भर अनेक मनघडंत संभावनाएं व्यक्त की गईं और उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के ताने-बाने बुने दिए गए. इसी बीच सरकार बनाने के लिए सेकुलर पार्टियों से समर्थन लेने और देने की शर्त को भी हवा देने का प्रयत्न किया गया है जो नतीजों की घोषणा होने के पश्चात कई कोनों से पुनः उछाला जायेगा जिसकी कमान संभवता अकेले लालू प्रसाद यादव जैसे नेता संभालेंगे जिनकी गिनती न तो नौ में है और न ही तेरह में. इसमें कोई दो राय नहीं कि अंततः नतीजे आने के पश्चात् स्थिति को देखते हुए निश्चय ही सरकार बनाने की संभावनाएं सभी पक्षों द्वारा तलाशी जायेंगी. यहाँ बड़ा प्रश्न मात्र उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का ही नहीं है. ठीक उसी प्रकार जैसे रामायण की रचना के समय केवल रावण के वध का प्रश्न नहीं था. रावण के वध के साथ-साथ तमाम अन्य श्रापों और वरदानों को भी समाहित कर संहार और उद्धार करने का कार्य भी भगवान को अवतार लेकर करना था. राष्ट्रीय परिपेक्ष में अनेक सहयोगियों के समर्थन पर टिकी केंद्र सरकार को बचाए रखना, ३० मार्च को होने जा रहे राज्य सभा के चुनावों पर नजर और इसी वर्ष राष्ट्रपति के चुनावो में विभिन्न दलों का समर्थन प्राप्त करने की विकट समस्या का सामना भी कांग्रेस को करना है. इसके साथ ही यह भी याद रखना होगा कि इस वर्ष के अंत तक हिमाचल और गुजरात जैसे प्रमुख राज्यों के चुनाव भी होने वाले है जिसमें गुजरात की मोदी सरकार को हटाना कांग्रेस और अन्य दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बनेगा. कांग्रेस और भाजपा को यह भी समझना होगा कि समाजवादी पार्टी जिसकी उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की सम्भावनाये सबसे अधिक बताई जा रही है, का आधार केवल उत्तर प्रदेश में ही है. वहीँ मायावती की बसपा न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि उत्तराखंड, पंजाब राज्य की सरकारें बनाने की चाबी रखने के अतिरिक्त लोक सभा व राज्य सभा में भी अपनी ताकत के बल पर केद्र सरकार के लिए परेशानी खड़ी करने की ताकत रखती है.

पांच राज्यों के चुनावो के नतीजे बहुत हद तक तो स्पष्ट ही है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा की सरकार नहीं बनानेवाली है. मणिपुर में कांग्रेस तो गोवा में भाजपा की राह सरल और स्पष्ट है. पंजाब और उत्तराखंड में बराबर की टक्कर के कारण बसपा और अन्यों की कीमत पड़ सकती है. इन सब के बीच प्रश्नचिंह उभर कर यह आता है कि राहुल द्वारा चुनावों के दौरान माया व मुलायम पर किये हमलों से क्या अब यह दोनों दल कांग्रेस के साथ चलने के लिए रजामंद होंगे ? राष्ट्रीय परिपेक्ष में माया का पलड़ा मुलायम से कहीं अधिक भारी है, इसकी गणना कांग्रेस और भाजपा के चिंतकों ने अवश्य ही की होगी. जैसे कि एग्जिट पोल के सर्वेक्षणों से परिलक्षित हो रहा है कि पंजाब और उत्तराखंड में कांग्रेस और भाजपा के बहुमत न आने की स्थिति में बसपा और निर्दलियों की सहायता की आवश्यकता तो दोनों दलों को होगी. ऐसी स्थिति में बसपा की अनदेखी हर सूरत में दोनों दलों के लिए घातक सिद्ध होगी.

पूर्व में तो सेकुलरिज्म के नाम पर भाजपा के विरोधियों का ध्रुवीकरण करने में कांग्रेस अवश्य ही लेफ्ट पार्टियों के दम पर सफल हो गई थी,परन्तु अब तो यह पटाखा भी ठुस हो चुका है. कांग्रेस से मोह भंग होने और पश्चिम बंगाल में ममता से पिटने के पश्चात वाम दलों की स्थिति अब कुछ और है. ममता का भी कांग्रेस से मोह भंग हो गया लगता है और तमिलनाडू में करूणानिधि के जाने व जयललिता की सरकार बनने से अब परिस्थितियों में बहुत बदलाव आ चुका है. गठबंधन के इस दौर में छोटे व प्रादेशिक दल भी अब पुनः कांग्रेस की चाल में आएंगे, ऐसा लगता नहीं. एक सप्ताह बाद आनेवाला बजट सैशन केंद्र में सरकार चला रही कांग्रेस के लिए अग्नि परीक्षा साबित होने वाला है. उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनावों के नतीजों से कांग्रेस को बहुत ही आशा है. यहीं से निर्वाचित होने वाले विधान सभाओं के कांग्रेसी सदस्यों की दम पर ही उसको ३० मार्च को होने जा रहे राज्य सभा के द्विवार्षिक चुनावों में कांग्रेस के राज्यसभा के सदस्यों में बढ़ोतरी होने की आस है, जिनके बल-बूते पर ही राज्य सभा में लंबित पड़े तमाम बिल पारित हो सकेंगे. वैसे भी सरकार और विपक्षी दलों के अड़ियल आचरण के चलते संसद का अधिक समय तो हो-हल्ले में ही व्यतीत हो जाता है. विगत २२ नवम्बर से २९ दिसंबर तक ३८ दिनों के लिए बुलाये गए संसद के शीतकालीन सत्र की केवल २४ दिनों की बैठक ही हो पाई थी. सरकार के पिछले और इस सत्र में पेश किये गए अनेक महत्वपूर्ण बिलों को पारित नहीं किया जा सका है. जिनमे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए बहुचर्चित लोकपाल जैसा अति महत्वपूर्ण बिल सदन का सत्र तीन दिनों तक बढ़ाने के बावजूद भी सरकार राज्य सभा में पारित नहीं करवा सकी थी. संविधान विशेषज्ञ इस परंपरा को लोकतंत्र की सेहत के लिए उचित नहीं मानते. राज्य सभा में सरकार का बहुमत न होने व विपक्षी दलों के संशोधनों को सरकार द्वारा स्वीकृत न किये जाने के कारणों के चलते रिटेल सेक्टर में एफडीआई, पेंशन बिल, फूड सिक्युरिटी बिल, जुडिशरी सुधार के लिए बिल, एचआरडी के लगभग एक दर्जन बिल, करप्शन को रोकने के लिए बिल जैसे महत्वपूर्ण बिलों को पारित करवाना सरकार के लिए टेडी खीर साबित हो रहा है. बताया जाता है कि संसद में लगभग 96 विधेयक लंबित पड़े है और इनमें सबसे पुराना बिल है दिल्ली रेंट संशोधन बिल १९९७.

छोटे छोटे मुद्दों को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेने वाली कांग्रेस पार्टी को आने वाले समय में बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. प्रादेशिक स्तर के समर्थक दलों के समक्ष तो उनकी क्षेत्रीय राजनीति है जिसमें वह अपने लाभ-हानि की गणना करके तुरंत पाला बदलने में कोई देर नहीं करते. देशव्यापी घटते जनाधार के इस माहोल में कांग्रेस को अपने दल के हित और राष्ट्र हित में बहुत ही संभल कर कदम उठाने होंगे अन्यथा उत्तर प्रदेश जैसी परिस्थिति का निर्माण अन्य राज्यों होने में अधिक समय नहीं लगेगा.

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