सियासत के चश्मे से शहनावाज़ की बिहार वापसी!

सियासत में कुछ भी निर्धारित नहीं होता यह अडिग सत्य है। जिसका मुख्य कारण यह है कि सियासत में जब भी जहाँ भी जैसी आवश्यकता होती है राजनीति उसी अनुसार गतिमान हो जाती है। जी हाँ बिहार की राजनीति ने एक बार फिर से नई करवट ली है जिसकी जिम्मेदारी एक सधे हुए पुराने अनुभवी नेता को दी गई है। अब देखना यह है कि बिहार की राजनीति का ऊँट किस करवट बैठता है। क्योंकि राजनीति में कोई भी फैसला साधारण रूप से नहीं लिया जाता। सियासत में जब भी कोई भी फैसला लिया जाता है वह एक बड़ी योजना के अंतर्गत लिया जाता है। जिसके निश्चित ही दूरगामी परिणाम होते हैं। अगर बिहार की राजनीति की बात करें तो बिहार एक ऐसा प्रदेश है जहाँ की राजनीति दशकों से जातीय आधार पर फलती-फूलती रही है। बिहार की राजनीति का इतिहास अगर उठाकर देखें तो क्षेत्रीय दल ही बिहार की राजनीति का मुख्य हिस्सा दशकों से बने हुए हैं। यदि शब्दों को बदलकर कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा कि बिहार की राजनीति क्षत्रपों के इर्द-गिर्द ही परिकरमा करती नजर आ रही है। कभी आरजोडी का दबदबा तो कभी जेडीयू का। आरजोडी प्रमुख लालू प्रसाद बिहार की राजनीति के ताकत के आधार पर ही केंद्र की सत्ता में अपना मजबूत दबदबा रखते थे। वोट बैंक की बात की जाए तो उत्तर प्रदेश की तर्ज पर बिहार में भी मुस्लिम यादव गठजोड़ ने आरजेडी को सत्ता के केंद्र में दशकों तक बनाए रखा। जिसमें कभी लालू प्रसाद तो कभी राबड़ी देवी बिहार की कमान संभालते रहे। इसके बाद जब बिहार की राजनीति में परिवर्तन हुआ तो नीतीश कुमार बिहार की सत्ता पर काबिज हो गए जोकि कभी अपनी रणनीति से तो कभी गठबंधन के सहारे बिहार की सत्ता को अपने इर्द-गिर्द घुमाते रहे। यदि जदयू की राजनीति के अंदर भी झाँककर देखा जाए तो इसमें भी कोई ज्यादा बदलाव नहीं दिखता। जदयू की राजनीति भी जातीय आधार पर ही फलती-फूलती रही। जैसे राजद का वोट बैंक मुस्लिम-यादव के गठजोड़ के आधार पर था तो वहीं जदयू का भी वोट बैंक इसी फार्मूले के पास ही घूमता रहा। जदयू के वोट बैंक का आधार मुस्लिम-कुर्मी तथा अति पिछड़ा वर्ग आधार बना। जिसे नीतीश ने बड़ी ही चतुराई के साथ एक साथ जोड़ने का कार्य किया जिसके बलबूते नीतीश ने बिहार की सत्ता में दशकों तक राज किया। जातीय आधार पर क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा बिहार की राजनीति में मजबूत होता चला गया। सत्ता तो बदलती रही परन्तु समीकरण नहीं बदलते रहे। जातीय गठबंधन के आधार पर बिहार की राजनीति लगातार तीन दशकों से परिकरमा करती रही।
खास बात यह कि तमाम प्रयासों के बाद भी केंद्र की सियासी पार्टियाँ कभी भी बिहार की राजनीति में एक नम्बर की पार्टी नहीं बन पाई। कांग्रेस की बात करें तो काँग्रेस भी बिहार की राजनीति में लालू के पीछे-पीछे ही चलती नजर आई। क्षेत्रीय छत्रपों के उदय के बाद कभी भी बिहार की राजनीति में कांग्रेस भी बड़े भाई की भूमिका नजर नहीं आ सकी। लालू के बाद समय आया नीतीश की राजनीति का तो नीतीश की राजनीति में भाजपा का इंट्री हुई। भाजपा नीतीश के साथ सरकार में आई लेकिन बिहार के सियासी समीकरण वही पुराने ढ़र्रे पर ही चलते रहे। बिहार की राजनीति में नीतीश ने अपने आपको मजबूत किया। उसका परिणाम यह हुआ कि केंद्र में मजबूत सत्ता के साथ भाजपा बिहार में मुख्य रूप से अगुवाई नहीं कर पाई। बिहार की राजनीति में भाजपा नीतीश के पीछे-पीछे ही चलती आई। जिसका अंदर खाने भाजपा में बिहार की राजनीति में विरोध भी हुआ। लेकिन सबकुछ चाहकर भी भाजपा बिहार की राजनीति आगे आकर लीड नहीं कर पाई। अगर बात करें 2020 के विधान सभा चुनाव की तो भाजपा बिहार की राजनीति में नीतीश को पीछे धकेलने में सफल तो हुई लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि लालू की पार्टी बिहार की राजनीति में सबसे बड़ी पार्टी बनकर फिर से एक बार उभर आई जिससे कि सत्ता परिवर्तन की प्रतिदिन घंटी बजती रहती है। कब रात के अंधेरे में कितने विधायक फुर्र हो जाएं और सुबह होते ही बिहार की राजनीति में नया उदय हो जाए इसकी शंका बनी रहती है।
सियासत की बरीक नजरों से देखा जाए तो चिराग पासवान ने नीतीश को भारी सियासी नुकसान पहुँचाया लेकिन यह अलग बात है कि वह अपनी पार्टी में जान फूँकने में पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए। लेकिन बिहार के गढ़े हुए सियासी समीकरण पर पैनी नजरों को डालें तो बिहार के चुनावी दृश्य साफ नजर आते हैं। क्योंकि चिराग का पूरा फोकस नीतीश को सीमित करने पर ही था क्योंकि चिराग लगातार यही कहते हुए नजर आ रहे थे कि बिहार की सत्ता पर अब नीतीश कुमार का कब्जा नहीं होगा। चिराग कहना था कि अब नीतीश कुमार बिहार के अगले मुख्यमंत्री नहीं होंगे। चिराग की बातों को अगर गहराई के साथ समझा तो चिराग यहाँ तक कहते थे कि अब बिहार की राजनीति में भाजपा का मुख्यमंत्री होगा और सरकार के गठबंधन में लोजपा मजबूती के साथ भाजपा के साथ खड़ी होगी। चिराग जिस बात के संकेत दे रहे थे वह बहुत ही गहराई के साथ समझने वाली बात है। क्योंकि चिराग का यह कहना कि अब बिहार की राजनीति में भाजपा का मुख्यमंत्री होगा। यह सियासत की दुनिया में एक बड़ा ही अहम सवाल है जिसे साधारण रूप से कदापि नहीं समझा जा सकता है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री शहनवाज़ हुसैन की बिहार की राजनीति में फिर से वापसी और चिराग के बयान को अगर जोड़कर देखा जाए तो स्थिति बहुत दूर तक साफ हो जाती है। क्योंकि शहनवाज़ हुसैन कोई छोटे नेता नहीं हैं। बल्कि शहनवाज हुसैन एक ऐसा बड़ा नाम है जोकि राजनीति की दुनिया में अपनी अलग पहचान रखता है। शहनवाज हुसैन को बिहार की राजनीति में भाजपा ने क्यों भेजा इस बात को समझने की जरूरत है। कहीं ऐसा तो नहीं कि बिहार की राजनीति में भाजपा अपने कैडर को और मजबूत करना चाहती हो। जैसा चिराग संकेत दे रहे थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि बिहार की राजनीति में जातीय गठबंधन के खेल को कमजोर करने के लिए शहनवाज को भाजपा ने भेजा हो। क्योंकि बिहार की राजनीति में मुस्लिम मतदाता एक ऐसा रूप है जोकि बिहार की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। क्योंकि जब मुस्लिम मतदाता राजद की ओर झुकता है बिहार की राजनीति में राजद का सितारा बुलंद हो जाता है। और यही मुस्लिम मतदाता जब बिहार की राजनीति में जेडीयू की ओर झुकता है तो नीतीश को सत्ता की कुर्सी पर विराजमान कर देता है। इसलिए राजनीति के जानकारों का मानना है कि बिहार की राजनीति में शहनवाज की इंट्री भाजपा का एक अहम फैसला है। क्योंकि शहनवाज हुसैन प्रदेश स्तर के नेता कदापि नहीं हैं अपितु शहनवाज हुसैन राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं। लेकिन उन्हें बिहार की राजनीति में अगर भेजा गया है तो किसी खास उद्देश्य के अंतर्गत बिहार की राजनीति में भेजा गया है। राजनीति के जानकार तो यहां तक मानते हैं कि शहनवाज को बिहार की राजनीति में इसलिए भाजपा ने वापस भेजा है कि वह नीतीश तथा लालू के मुस्लिम वोटों में मजबूती के साथ सेंध लगा सकें जिससे कि आने वाले चुनाव में भाजपा की मजबूत सरकार बन सके जिसमें भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाने की दिशा में कार्य कर सके। जिसमें बिहार की राजनीति में भाजपा बड़े भाई की भूमिका में खुलकर सामने आ सके साथ ही जेडीयू के मुस्लिम वोट बैंक में मजबूत सेंधमारी कर सके। जानकारों का तर्क है कि अगर भाजपा को किसी मुस्लिम कार्यकर्ता को ही अगर बिहार की राजनीति में आगे पहुँचाना था तो बिहार की राजनीति में ऐसे बहुतेरे नाम हैं जिनको भाजपा विधान परिषद भेज सकती थी। लेकिन भाजपा नें ऐसा नहीं किया। इसलिए राजनीति के जानकार यह मानते हैं कि भाजपा ने शहनवाज को वापस बिहार की राजनीति में भेजकर एक तीर से कई निशाना साधा है। जिसमें बंगाल का चुनाव भी शामिल है। शहनवाज को बिहार की राजनीति में भेजकर भाजपा उन्हें कैबिनेट मंत्री अवश्य ही बनाएगी। जिससे कि बंगाल की सियासत को भी साधा जा सके। क्योंकि मुस्लिम वोट बैंक बंगाल की राजनीति में निर्णायक भूमिका रखते हैं। जिससे शहनवाज को बंगाल के चुनाव में बतौर बिहार के कैबिनेट मंत्री के रूप में चुनावी अभियान में उतारा जाएगा। जिससे कि मुस्लिम मतदाताओं को बीच बड़ा संदेश जाएगा। अतः शहनवाज़ हुसैन की बिहार की सत्ता में वापसी से भाजपा को बड़ा सियासी लाभ होना तय है।

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