तुलसी बाबा कह गये हैं- ‘आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जग जाना।’ उन्होंने कहा है तो सोच समझ कर ही कहा होगा। आगे-पीछे का अनुमान लगाकर ही कहा होगा। वास्तव में सेवा जितना सरल दिखती है उतनी होती नहीं। बल्कि यूं कहे कि जो दिखती है वह सेवा होती ही नहीं। कहा तो यह भी गया है कि सेवा से चित्त निर्मल होता है पर मेरा मत हैं कि निर्मल चित्त से ही सेवा होती है। चित्त निर्मल हो तो मन-मस्तिष्क में करुणा, मैत्री, समता के अतिरिक्त कुछ शेष रहता ही नहीं। सब अपने। न कोई बैरी, न ही बेगाना। सामने वाली की पीड़ा अपनी हो जाती है। ऐसे में सेवा करते समय मन में किसी ‘बेचारे’ पर दया करने का भाव उत्पन्न ही कैसे हो सकता। सेवा तभी है जब हम अपने संसाधनों को दरिद्र नारायण (साध संगत) को भोग लगाकर पवित्र करने के भाव से करे। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है इसीलिए तो कहा गया है, ‘सेवा-धर्मः परम गहनो योगिना मप्यगम्यं’ अर्थात् सेवा-धर्म बहुत कठिन है। यह तो योगियों के लिए भी बहुत कठिन है। यही बात तुलसी बाबा भरत जी के मुख से कहलाते हैं –
सिर भर जाउं उचित अस मोरा।
सब तें सेवक धरमु कठोरा।।
ऐसे में एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है कि हर व्यक्ति में योगियों वाला भाव नहीं हो सकता। हर हृदय में सबके प्रति स्नेह, संवेदना, अपनत्व नहीं हो सकता तो क्या उनके द्वारा उपलब्ध कराई सेवा को सेवा नहीं माना जाना चाहिए? यदि ऐसा है तो हर आपदा के समय जो कुछ किया जाता है वह क्या है? मेले, सत्संग, समागम के समय जो शिविर लगते हैं वे क्या है? वहां भी तो बैनर टंगे हैं कि यह कार्य ‘फला संस्था अथवा व्यक्ति की ओर से किया जा रहा है’। आज ही क्यों प्राचीन काल में बने सड़क के किनारे, प्याऊ, कुएं , धर्मशाला आदि होते थे अक्सर वहां भी उसे स्थापित करने का नाम होता था।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह भी सेवा है। आज भी अनेक राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक संगठन तो अनेक लोग व्यक्तिगत स्तर में सेवा कार्य करते हुए बेशक अपने बैनर लगाते हैं। उसका चित्र लेकर या विडियो बनाकर अधिक से अधिक प्रचारित करते हैं। आपदा के समय सेवा बहुत जरूरी है। ऐसे समय में साधनहीन को सेवा लेनी पड़ती है तो साधन संपन्न के लिए सेवा उसके साधनों का सदुपयोग है। जीवनभर में जाने-अनजाने ‘अपनी चादर’ पर लगे दाग को धोने का सहज सरल उपाय है।
स्पष्ट है कि एक ही कार्य को सभी लोग केवल एक ही भाव दृष्टि से नहीं करते हैं। अब मंदिर, गुरुद्वारे या किसी भी अन्य धार्मिक स्थान पर जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति का भाव एक नहीं होता है। पुजारी या ग्रन्थी या इमाम, पादरी वहां जीविका के लिए जाते है। कुछ अन्य कर्मचारी भी इन्हीं या ऐसे ही कारण से जाते हैं। उन स्थलों के बाहर फूल, प्रसाद, पुस्तके आदि बेचने वाले भी ऐसे ही कारणों से जाते हैं लेकिन अधिकांश लोग वहां पूजा, उपासना के लिए जाते हैं। वहां जाकर उनके मन मस्तिष्क को शांति मिलती है। कुछ अपने भगवान से कुछ मांगने जाते है। कोई सुख मांग रहा है तो कोई बेटा-बेटी की सफलता मांग रहा है। कोई रोग कष्ट निवारण की प्रार्थना, अरदास लेकर उस दर तक आया है। लेकिन ऐसे लोग भी वहां आते हैं जो निस्वार्थ सेवा के लिए आते हैं। (यही वे लोग हैं जो सरबत दा भला अर्थात सर्वे भवंतु सुखिन को व्यवहार में जी भी रहे है) हालांकि कुछ लोग सेवा का भी प्रदर्शन करते है। लेकिन अधिकांश मौन साधक होते है। वे किसी किस्म का कोई बेनर या पट्टी नहीं टांगते।
ठीक इसी तरह से सेवा करने वालों की भी श्रेणियां क्यों नहीं हो सकती। कोई प्रसिद्धि की कामना से सेवा कर रहा है तो वह फोटो लेगा ही। विडियो बनायेगा ही। बैनर टांगेगा ही। इतना ही नहीं जीवन भर गायेगा भी। यदि अवसर मिले तो वह उस सेवा को राजनीति में भुनायेगा भी। और यदि कामना पूर्ण हुई और कुर्सी पा गया तो ‘अपनी सेवा’ और ‘अपनों की सेवा’ के बाद अगली ‘प्रदर्शन सेवा’ के लिए ‘कुछ’ बनायेगा भी।
मानवीय स्वभाव में कुछ भी संभव है। सबके अपने अपने हस्तिनापुर हैं जिससे वे बंधे हुए हैं। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी हैं जो किसी कामना से नहीं अपितु अपना दायित्व समझ कर करते हैं। हम सब ने करोना काल में देखा कि अनेक खाते-पीते लोग भी कहीं फंसे होने के कारण आश्रम और भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहे। अपने घर से दूर होने के कारण उनके साधन उनके काम नहीं आए। परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए यदि उनके मन में समाज के इस ऋण को चुकाने का भाव और संकल्प उत्पन्न होता है तो सेवा करने वाले की साधना भी सफल है और सेवा लेने वाले की सोच भी सकारात्मक होकर अपने सामाजिक दायित्व बोध से जुड़ती है।
आप कह सकते हैं कि जब सेवा ही निष्काम नहीं होगी तो उसके प्रभाव से सकारात्मक संकल्प कैसे उपजेगे?
सेवा लेने को विवश व्यक्ति का हृदय उस क्षण कृतज्ञ होता है। उसे उस समय अपने दायित्व बोध का भी अहसास होने लगता है। हां, यह भी संभव है कि समय बीत जाने पर समय की धूल उन भावों को दबा दे। तिरोहित कर दे। वहीं क्यों, आज हम अपने देश, अपने समाज, अपनी प्रकृति, अपने परिवेश के प्रति अपने दायित्वों को भूल रहे हैं। यहां तक कि अपने माता-पिता, स्वजन भी हमें बोझ लगने लगे हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि भविष्य में लोग माता-पिता बनना छोड़ देंगे। मित्रता नहीं करेंगे। रिश्ता नहीं रखेंगे। जरूर रखेंगे। हम भी अपने मन में सेवा करने वालों के प्रति न केवल कृतज्ञता का भाव रखेंगे बल्कि उस सेवा को अपनी क्षमता के अनुसार गुणित कर समाज को लौटाने के संकल्प के लिए कार्य भी करते रहेंगे।
संकट में यदि हम किसी के काम आते हैं तो यह उस ऋण के एक अंश का नहीं बल्कि शायद उसके ब्याज का ही भुगतान होगा जो अलग-अलग समय में, हमारी जानकारी में अथवा हमारे अनजाने में समय, समाज और प्रकृति ने हमारे लिए किया है।
ईश्वर से प्रार्थना कि सेवा करने वाले हर व्यक्ति को उसकी भावना के अनुरूप पात्रता प्रदान करे। और जो सेवा को धर्म समझ कर कर रहे हैं, निस्वार्थ भाव से कर रहे हैं,उनके लिए ही बाबा कह गए हैं –
तुलसी मेरे राम को, रीझ भजो या खीज।
भौम पड़ा जामे सभी, उल्टा सीधा बीज।।
बीज बोते समय यह नहीं देखा जाता कि बीज उल्टे पड़े हैं या सीधे। लेकिन यह आशा जरूर होती है कि उसमें जीवन का संचार होगा। नि:स्वार्थ भाव से सेवा संस्कार रूपी बीज बोने वाले महापुरुषों की चरण रंज निज मस्तक पर धारण करना मेरा परम सौभाग्य होगा।
और अंत में उन तथाकथित महापुरुषों को भी नमन करना अपना परम कर्तव्य समझता हूं जो सेवा तो करना चाहते हैं लेकिन, ‘ लेकिन’ उनकी राह रोक देता है। जैसे एक बार संत के पास एक हट्टा-कट्टा व्यक्ति आया और बोला ‘महाराज मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं लेकिन मेरे पास धन नहीं है।’ उसी दिन एक दुबला पतला सेठ भी संत से बोला, ‘महाराज मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं लेकिन बीमार रहता हूं इसलिए कुछ कर नहीं पा रहा हूं।’ संत संभव है मौन मुस्कुराते रहें I लेकिन मेरे जैसा दुष्ट तो पहलवान से कहता, ‘मेरे भाई धन नहीं है और सेवा भावना है तो श्रमदान तो कर ही सकते हो।’ तन से निर्बल लेकिन साधन संपन्न के कान सुनने को तैयार हो या न हो, मैं कठोर शब्दों में कहता, ‘अरे नालायक तन से नहीं कर सकता तो भगवान के दिए पर्याप्त साधनों से सेवा करने से तुझे किसने रोका है। हां अगर तू केवल ढोंग करना चाहता है तो तू ठीक रास्ते पर है। जारी रख।’
मुझसे जो संभव हुआ शब्द सेवा की और आपने इसे पढ़कर भी सेवा दी है। यदि इन शब्दों ने किसी मन में सेवा का भाव उत्पन्न किया हो उसका श्रेय तुलसी बाबा को जिन्होंने क्या खूब कहा है –
सेवक मन मानस मराल से। पावन गंग तरंग माल से।।
डा. विनोद बब्बर