लेखक परिचय

डॉ. राजेश कपूर

डॉ. राजेश कपूर

लेखक पारम्‍परिक चिकित्‍सक हैं और समसामयिक मुद्दों पर टिप्‍पणी करते रहते हैं। अनेक असाध्य रोगों के सरल स्वदेशी समाधान, अनेक जड़ी-बूटियों पर शोध और प्रयोग, प्रान्त व राष्ट्रिय स्तर पर पत्र पठन-प्रकाशन व वार्ताएं (आयुर्वेद और जैविक खेती), आपात काल में नौ मास की जेल यात्रा, 'गवाक्ष भारती' मासिक का सम्पादन-प्रकाशन, आजकल स्वाध्याय व लेखनएवं चिकित्सालय का संचालन. रूचि के विशेष विषय: पारंपरिक चिकित्सा, जैविक खेती, हमारा सही गौरवशाली अतीत, भारत विरोधी छद्म आक्रमण.

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– डॉ. राजेश कपूर, पारम्परिक चिकित्सक

हथियार बेचकर अरबपति बने विदेशी व्यापारी वासना का व्यापार करने से कब बाज आने वाले थे। लगे हाथ भारत के चरित्रवान समाज को चरित्रहीन और एड्स का संम्भावित शिकार बनाने का मौका भी मिल गया। इतना तो आप जानते हैं न कि अति वासनापूर्ण जीव जीने वाले आसानी से एड्स से ग्रसित हो जाते हैं। नहीं जानते तो जान लें कि एड्स का वायरस बड़ी मेहनत से डैट्रिक (अमेरीका) की प्रयोगशाला में तैयार किया गया और दुनिया में फैलाया गया जिसका शिकार व्यभिचारी आसानी से बनते हैं। प्रमाणों की कमी नहीं, अनेक हैं। (www.conspiracy planet.com देखें) ‘वैलेण्टाइन-डे’ के नाम पर युवाओं के यौन आकर्षण को नकद भुनाने का काम अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारियों ने बड़ी चालाकी से कर डाला है। मीडिया का इस्तेमाल सदा के समान बड़ी कुशलता से किया। अरबों रुपये के कार्ड, फूल, गिफ्ट, चॉकलेट का नया बाजार तैयार हो गया, जिसमें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अच्छी-खासी हिस्सेदारी है। अनैतिक सम्बन्धों के फलने-फूलने का अधिक अनुकूल वातावरण तैयार करने का अवसर मिल गया। तभी तो अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस की तरह टूटते-बिखरते परिवार भारत में भी नजर आएंगे। चीन और भारत से घबराए ओबामा साहिब की घबराहट कुछ कम हो सकेगी और कण्डोम और सन्तती निरोध के साधनों का विशाल बाजार फटाफट तैयार।

हम न जानते हो तो यह भी जान लें कि न टूटने वाले परिवार भारत की बहुत बड़ी ताकत हैं, जिनके सुरक्षित वातावरण में मानसिक और शारीरिक रूप से सशक्त व स्वस्थ सन्तानें विकसित होती हैं। यूरोप और अमेरिका में सुरक्षा का यह वातावरण, न टूटने वाले परिवार दुर्लभ हैं। वहां तो बस पशुओं की तरह साथ सोए और अलग हो गए। पशु तो फिर भी मौसम के अनुसार सहज प्रवृत्तिा से व्यवहार करते हैं पर वहां की माया निराली है। स्त्री-पुरुषों में कोई आपसी वफादारी, ईमानदारी मुद्दा ही नहीं है, विचार का विषय ही नहीं। बस मल-मूत्र त्याग की तरह एक हाजत (Natural call) है जिससे जब चाहे निपट लिया, जहां चाहे हो गया। यदि यह सभ्यता है तो असभ्यता क्या होगी? तेजी से बढ़ते यौन रोग इसका एक स्वाभाविक परिणाम है। भारत के लोग उन्हें लांछित न करें, इसका प्रबन्ध बड़ी चालाकी से वे कर रहे हैं। उसी अभियान का एक हिस्सा है हमारी नालायक सरकार के सहयोग से स्कूलों में बच्चों को एड्स से बचाव के नाम पर यौन शिक्षा का प्रयास, लीव इन रिलेशनशिप को मीडिया में खूब महिमामण्डित करना, चन्द समलैंगिकों के अधिकारों की रक्षा के नाम पर उसे प्रोत्साहित करने की शरारत, गर्भनिरोधकों का खुला अश्लील प्रचार, आईटम गर्ल के नाम पर वेश्याओं जैसा बनने की प्रेरणा हमारी बच्चियों को देने के लिये मीडिया पर ऐसियों का महिमामण्डन और सम्मान करना व उन्हें बोल्ड बताना। यानी बोल्ड बनने की कसौटी अब कपड़े उतारना है, नग्नता है।

भारतीय समाज में इन विषयों को लेकर जो शालीनता, शर्म और संउसे समाप्त करने का सुनियोजित प्रयास है, प्रचार तंत्र और झूठ के दम पर। अमेरिका दुनिया का नियन्ता और आदर्श बनने के प्रयास में है। भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार हर युग में कोई दानव, राक्षस, रावण, कंस, दुर्योधन होते हैं। तो क्या क्या आज का रावण अमेरिका नही है? तो फिर आज का राम कौन है? ज़रा सोचिये आप भी और हम भी सोचते हैं।

31 Responses to “यौनाचार का प्रायोजित व्यापार”

  1. lavi

    aapke bichar hamare chetna ko jagate hain……
    ek prasn aapse– ek jawan ladka jise lagta hain ki uske padhai se le kar ke aur kamane ke aur ushe lagta hain ki woh kuch ucha kar sakta ….. toh wo kya kare….vichar dhara aadhyatm ki taraf khichti hain ushe….toh kya kare… kirpaya mere email me sujhw bhejne ka kasht kare….. toh kya kare?

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  2. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    आदरणीय भाई सिंह जी, बड़ी प्रसन्नता की बात है की आप इस रहस्य को जानते हैं कि सकारात्मक सोच से, प्रसन्न रहने से हम सदा स्वस्थ रहते हैं. इसलिए आप सदा प्रसन्न रहते हैं और अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में सदा सकारात्मक सोच बनाकर रखते हैं. इसीलिये आपको जीवन में कभी भी दवा नहीं खानी पडी. ईश्वर कृपा करे और आप सदा स्वस्थ बने रहें.
    पर कृपा करके यह सोचने और बताने का कष्ट करें कि जो फार्मूला आपके स्वास्थ्य के लिए अछा है , वह समाज के स्वास्थ्य के लिए क्यों नहीं? क्या आप अपने देश और समाज को बीमार बनाना चाहते हैं? नहीं न ? फिर क्यों दोहरे मापदंड अपना रहे हैं? जो सकारात्मक सोच आपके स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है, वही ज़रूरत आपके इस देश और समाज की भी है. जिसके अन्न, जल,वायु से आप सबल और स्वस्थ बने हैं, उसके प्रति अपनी प्रतिभा का सदुपयोग करने की कृपा करें और स्वस्थ,सकारात्मक वातावरण बनाने में अपना योगदान करें न की बिगाड़ने में. इतना ही सादर, विनम्र निवेदन आप से है.

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  3. आर. सिंह

    R.Singh

    Ab aapko ek do baaten bataa kar is vivaad se vidaa letaa hoon. Meri umar satar ke karib pahuch rahi hai.Pichle baarh barshon mein maine kisi dawaa ka sevan nahi kiya.Jahan tak mujhe yaad hai mujhe shayad hi kabhi sardard hua ho..Mujhe hypertension ityadi life style waali kisi rog ki shykayat nahi hai .Aaj bhi main kam se kam 4kms daily walking 35minute mein khatm karta hoon.Meri positive thinking and hameshaa khus rahna mere healthyhone ka kaaran hai.Senior citizens ko aina dikhaana meri hobby hai,kyon ki Bharat ki vartamaan durdasa ka mool kaaran main unhi logon ko samajhta hoon.Aam bhaartiyon ko ye bataanaa main apna kartabya samajhta hoon ki doosron kaa dosh nikaalne ke pahle apni taraf dekho. Agar main maan bhi loo ki hamaare purbaj bahut achhe the to bhi unki achaai hamlogon mein naajar nahi aati,aise ham bahas jitna karle .Jarurat hai apne ko sudhaarne ki.Mere ek mitra ne kabhi kahaa tha ki tum itna khus kaise rahte ho.Mera jawab tha:GEET GATA HOON MAI GUNGUNATA HOON MAIN,
    MAINE HASNE KA WADA KIYA THA KABHI,ISLIYE SADA MUSKURATA HOON MAIN.Main bachpan se aisa hi hoon.Geeta ka ek slok mera mantra hai:KARMANYEWA ADHKAARSTE,MAA FLESHU KADAACHAN.Shlok bhi ho sakta ki sampuran sahi roop mein na byakat hua ho.Geet ki panktiyon mein bhi kuch galtiyan ho sakti hai,par main samajhta hoon ki arth samajhane mein koi dikkat nahi honi chaahiye

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  4. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    उन्हें भारत में बुराईयों के सिवा कुछ भी नज़र नहीं आता ,
    हमें भारत की अच्छाईयों के सिवा कुछ नज़र नहीं आता.
    नज़र अपनी-अपनी,ख़याल अपना -अपना. एक विज्ञान की खोज की जानकारी देना चाहता हूँ. पीजीआई,चंडीगढ़ के एडिशनल प्रो. यशपाल शर्मा जी ने एक बड़ी महत्वपूर्ण ख़ोज की है,जिसके बारे में दुनियाभर के समाचारों में इसलिए चर्चा हुई क्योंकि अमेरिका का कहना है कि उसने इसपर खोज की है. यानी खोज का विषय अंतरराष्ट्रीय महत्व का है. प्रो. यशपाल के अनेक वर्षों के इस शोध के अनुसार ————
    *जो लोग झूठ बोलते हैं, बेईमानी करते हैं, धोखा, फरेब, छल-कपट करते हैं उन्हें कैंसर हो सकता है. क्योंकि उनके हईपोथेल्मस केंद्र से इसप्रकार के स्ट्रेस हार्मोन निकलते हैं जिनसे कैंसर विकसित होने में मदद मिलती है.
    *जो माता-पिता तनाव ग्रस्त नहीं रहते उनके बच्चे बिना किसी अपवाद के छ: फुट के होते हैं.
    ## जीवन का स्वर्णिम सूत्र ये है कि जो लोग बुरे से बुरे हालत में भी सकारात्मक सोच बनाए रखते हैं और सकारात्मक तथा उत्साह की बात करते हैं वे अपने आस-पास के और दुनिया के हालात बदलने की ताकत रखते हैं, बूरे से बुरे हालत को अछा बना सकते हैं.
    ## जो लोग नकारात्मक सोचते हैं, नकारात्मक बोलते हैं, उन्हें अछे से अछे हालत में भी शिकायत करने को कुछ न कुछ मिल ही जाता है.
    ऐसे लोग बुरी परिस्थितियों को कभी भी बदल नहीं सकते. उनके कारण हालात बद से बदतर होते चले जाते हैं.
    ## हम जैसा सोचते और बोलते हैं, हमारे एंडोक्राईन ग्लेंड्स उसीके अनुसार अछे और बुरे यानी तन-मन को स्वस्थ या रोगी बनानेवाले हार्मोन
    निकालते हैं. यानी जैसा हम सोचेंगे वैसे ही हम बन जायेंगे. * जैसी हमारी सोच होगी, वैसी अन्तरक्षीय शक्तियाँ और ऊर्जा हमारे आसपास घनी भूत होजायेगी. उसी के अनुसार हमें लोग मिलते जायेंगे, वैसी ही घटनाएँ हमारे साथ घटती जायेंगी.
    *पौराणिक काल से आजतक सदा ही अछे-बुरे हालात बनते रहे, भले-बुरे लोग जन्म लेते रहे. हमारे खुद के हित में है कि हर हाल में; बुरे से बुरे हालात में भी कुछ अछा ढूढ़ लें. यही जीवन जीने की कला है. ऐसा न कभी हुआ और न होगा कि सबकुछ ठीक होजाए. अछे-बुरे का संघर्ष एक सतत प्रक्रिया है. घृणा, शत्रुता के बिना मानव हित के कार्य करने का प्रयास शक्ति-सामर्थ्य के अनुसार करते जाना,यही जीवन का आदर्श है.
    # मुझे लगता है कि सृष्टी को समझने, मानव जीवन के उद्देश्यों को जानने और अपने कर्तव्यों का निर्धारण करने का सर्वोच्च दर्शन भारत के पास है. सड़क पर चलते हुए हम किनारे की नाली की तरफ देखेंगे तो गदगी और बदबू से हमारा वास्ता पडेगा. सुन्दर भवनों, गाड़ी, पार्कों को देखेंगे तो सुखद लगेगा. अस्तित्व तो दोनों का है. बुध के ज्ञान, तप को देखोगे तो नतमस्तक होजाओगे. उनके भीतर भरे मल-मूत्र को देखोगे तो घिन आने लगेगी. है तो सबकुछ. हमारी नज़र क्या देखती है ,हम क्या सोचते हैं, ये तो हम पर निर्भर करता है.
    $ चिकित्सकीय परामर्श : बरसात के रोगों से बचने और उन्हें ठीक करने के लिए होम्योपैथी की दवा ‘डल्कामारा-३०’ का प्रयोग करें. भीग जाएँ तो उक्त दवा कि २-४ गोली चूसलें. भीगकर बीमार हों तो भी यही दवा लें. लाभ होतो ३-४ घंटे के अंतर पर लेते जाएँ. लाभ न हो तो किसी दुसरे उपाय के बारे में सोचें.
    {महोदय में चिकित्सक हूँ, रह नहीं सकता, बस-ट्रेन में आते-जाते बिन मांगे परामर्श देता रहता हूँ. मेरा सौभाग्य है कि मेरा १० पृष्ठ का एक पत्र ‘आयुर्वेद विद्या पीठ’ के प्रकाशन में भी छपा है.विषय है ‘ह्रदय रोग- कारण और निवारण’, चाहें तो प्रवक्ता (जिस पत्रिका पर हम संवाद कर रहे हैं )
    के ‘स्वास्थ्य’ स्तम्भ में ‘कैंसर’ और ‘हेपेटाईटिस-बी’ पर भी मेरा लेख देख लें, शायद आपको पसंद आये.}

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  5. आर. सिंह

    R.Singh

    Dear Dr.Kapoor,
    Aapki yah pichhli tipri padh kar mujhe jyada aashcharya nahi huaa aur na uske baad ke do(two) appreciations par.Mai shaayad ab kuchh likhta bhi nahi par aapne jo dawa khane ki salaah de daali to mujhe is vivaad ko phir aage badhaane par majboor hona pada.Mujhe koi khas boora nahi lagaa par yahi mahsoos hua ki maine apni pahli pratikriya jo di thee vah theek hi tha.(MYOPIC AND PERVERT AUR APNE MUNH MIAN MEETHOO.) Aapko main ye bataa doon ki 1956 mein maine jo apne sahpaathi ko joothe ghee ko na bechne ki salaah di thi main aaj bhi wahi hoon,par afsos yahi hai ki jindgi ke daur maine dekha ki 99% se jyada bhaartiye mere sahpaathi jaise hain.Unme se kuch ko maine synthetic milk banaate huye paayaa(aisa duniya ke kisi kone mein nahi hota),kuchh ko nakli dawaaon ko manufature aur bikri karte huyepaayaa,kuchh jahrili shraab banaate huye paye gaye.Kya kya nakali nahi bnaate dekha aur kya kya milawaten nahi dekhi..Main kuchh dino tak America mein bhi rahaa hoon.Wahan Bhaartyon jaisi annushaanhinta ki ek jhalak bhi kahi dekhne ko nahi mili..Hamaare ex.President A.P.J.Abdul Kalam ne bhi kahi likha tha ki ham bhi jab videsh jaate hain to anushaashit ho jaate hain par apne desh mein waisa kyon nahi karte?Uska kaarn yahhai ki apne desh mein ham apne asli chehre mein rahte hain,wahan to pressure mein apne ko badlana padta hai.99% BEIMAAN PHIR BHI BAARAT MAHAAN kab tak chalegaa? likhne aur kahne ke liye aabhi bahut kuchh hai,par kabhi kabhi lagta hai ki ham bhaartiya deuniya mein sabse bharast aur bemimaan hote huye bhi apne ko mahaan mante hai,shaayad yahi hamaari sabse badi mahaanta hai.Jahan tak bhaartiya darshan ka sawaal hai jinka aapne jagah jagah ulekh kiya uske baare mein main kuchh nahi kahunga,par reality kuchh aur hai.
    Ek baat aur,hamari kamjorion se mera matlab yudh mein kaayarta nahi,balki,naitik kamjori tha.aise yudh mein bhi desh ka itihaas jaychando se bharaa hua hai atah us disha mein bhi ham bahut khyatiwaan nahi hain ,par uska jikra phir kabhi.Abhi to maine kewal yahi prasna uthaaya tha ki ham mansik aur naitik roop mein itne kamjor kyon hain ki hame sabki buraiyan hi aakarshit karti hain aur ham unho ko aapnaa lete hain?

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  6. ANIL GAIKWAD

    जय भारत Jai Bharat (NOT JAI INDIA)
    सेवा में
    डा. राजेश कपूर Dr.Rajesh Kapoor

    सादर प्रणाम
    आपके लेख मन की गहराई को छूते है,
    धन्यवाद्
    आपके सहयोग की अपेक्षा भारत बोलो आन्दोलन के लिए
    To promote the use of name BHARAT at the national & international levels
    आप अपने हिसाब से उपरोक्त विषय पर लेख लिखने की कृपा करे

    आपका आभारी
    अनिल गायकवाड

    To promote the use of name BHARAT at the national & international levels

    Reply
  7. Vinay Dewan

    काश इस तरह के लेख प्रमुख समाचारपत्रों मैं प्रकाशित हो तो हमारे युवाओं को कुछ बुद्धि मिले…जो भारतीय गौरवशाली परिवार परंपरा को गर्त में ले जाने के लिए तत्पर हैं…

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  8. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    ***हम कमज़ोर हैं क्या ?*** कई बार सच हमारे सामने होता है पर हम उसे देख नहीं पाते. भारत पर इस्लामी आक्रमणों के बारे में कुछ ऐसा ही हुआ है. अपनी स्थापना के चन्द दशकों के भीतर इस्लाम ने सारे अरब, अफ्रीका, आधे यूरोप को जित लिया. इतिहास में ऐसा जोश और किसी में नज़र नही आता. यह कमाल मुहम्मद साहेब की दूर- दृष्टी का है. ‘भूतो न भविष्यती’ की कहावत जैसी स्थिति है. इससे पहले न कोई ऐसा सम्प्रदाय बना और न बनने की अब उम्मीद है. ऐसा कभी न हारनेवाला जनूनी मज़हब भारत पर सन ७०० के बाद से एक हज़ार साल तक हमले करता रहा पर उसे सफलता न मिली. ७०० साल के लम्बे संघर्ष के बाद कुछ सफल हुआ. क्या कायर भारत यह कमाल कर सकता था ?
    दुनिया में भारत के इलावा और कौन है जो इस्लाम के आगे टिका ही नहीं, अपनी पहचान को भी बनाए रख सका. और कोई कर सका यह कमाल ? फिर हम कायर कैसे ? भारत में अपने आगमन से अपने शासन की समाप्ती तक एक भी मुस्लिम शासक ऐसा नहीं था जिसका पूरे देश पर राज्य स्थापित हो सका हो.
    एक भी विदेशी शासक ऐसा नहीं जो एक रात भी चैन की नीद सोया हो. एक भी दिन उसके शासन का ऐसा नहीं जब उसके राज्य में आज़ादी के लिए युद्ध या संघर्ष न हुआ हो. एक भी दिन ऐसा नहीं जिस दिन किसी देशभक्त का रक्त आज़ादी पाने के लिए न बहा हो.
    # दुनिया के इतिहास में एक भी उदाहरण नहीं है जब किसी समाज ने मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ इतना लंबा संघर्ष किया हो और अपनी पहचान, अपनी संस्कृती को बना-बचा कर रखा हो. इतनी लम्बी आजादी की लड़ाई लड़ने का एक भी उदाहरण संसार में नहीं मिलता.
    स्मरणीय बात यह है कि यदी हम सदा हारते रहे, हम कायर थे तो फिर अरबी आक्रामकों को भारत में घुसने में ५-६ सौ साल कैसे लग गए.?
    हज़ार साल तक विदेशी आक्रमणकारियों के साथ कोई कायर लड़ सकता है क्या? यह वह सच्चाई है जो सामने होते हुए भी हमको नज़र नहीं आती.
    # निराशा-हताशा की बातें करने वालों को एक चकित्सक के रूप में मेरी सलाह है की वे ‘बैच फ्लावर रेमेडी’ की जेंशीयन नामक दवा १०-१५ दिन तक रोज़ ३ बार खा लें. ये लोग ऐसे होते हैं जिन्हें सकारात्मक नज़र नहीं आता. हमेश आधा गिलास खाली ही नज़र आता है. यह दवा
    खाने के बाद दुनिया को देखने की नज़र बदल जायेगी. अपने देश, अपनी संस्कृती में कमियां ही कमियां देखने की निराशावादी सोच में काफी अंतर आजायेगा.

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  9. आर. सिंह

    R.Singh

    Dr.Kapoor,Dhanyabaad.Aapki pida aur meri pida ek hi hai.Fark sirf itna hai ki aap doosron ko dosh dete hain aur main apne aap ko doshi maanta hoon.Jin sandarbhon ka aapne ulekh kiya hai,usme se bahuton ka gyan mujhe bhi hai,par meri pida ka kaaran hai ki ham hamesha itna kamjor kyon rahen?Bbharat ka, yon kahiye ki utter bharat (North India)ka itihaas maine kewal padha hi nahi hai,balki analyse karke bhi dekha hai aur usko main baar baar ausar chukne ka itihaas maanta hoon.Jaisa hona chahiye tha waisa kabhi nahi hua.Pahle ke itihaas ko chod bhi diya jaye to 1526 se aaj tak ya ni aajaadi ke pahle tak ya uske baad bhi sab kuchh ulta hua.Usme aajadi ke baad teen baten mere vjchaar se mahatva purn rahi,ek to apni rastrabhaasa ka vikaas nahi karna, doosra apni audogik nitiyon ko desh ke anukul nahi rakhna aur teesra purn nashaabandi nahi lagoo karna.Main angreji shiksha ka samarthak nahi hoon to uska purna virodhi bhi nahi hoon,par usko rastrabhaasa ko peechhe dhakel kar aage badhane ke paksha mein main kabhi nahi raha.Aaj ke patan ka aise main sabse badaa kaaran sharaab ko maanta hoon. Rahi baat hamaari charitrahinta ki to main phir repeat karunga ki yah shodh ka vishay hai ki ham hameasha itna kamjor kyon shaabit huye. Aise main vigyan ka kchhatra raha hon aur peshe se abhiyanta hoon ,atah main ye to nahi kah sakta ki mujhe in sab baaton ka bahut gyan hain par ye mera observation hai.Main galat bhi ho sakta hoon par yah kashta mujhe hamesha se raha hai ki ham har baar itne kamjor kyon saabit hoten hai.

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  10. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    प्रिय मित्र सिंह जी, आपकी आज की टिप्पणी पढ़कर समझ आगया कि समस्या कहाँ है. ‘मित्र’ मैंने आपको इसलिए कहा क्यूंकि आपके कथनों से आपकी वैचारिक इमानदारी झलकती है. आपके कारण इतना कुछ कहने का अवसर मिल गया, अछा हुआ. कृपा करके कुछ बातों पर विचार करें—————-
    # भारतीयों के पतन का काम मैकाले द्वारा १८४० में पहला कॉन्वेंट स्कुल खोलने के साथ शुरू हुआ. पर इसके कोई विशेष परिणाम अनेक दशकों तक नज़र नहीं आये. धीरे- धीरे ये कान्वेंट स्कूल बढ़ते गए और तथाकथित आज़ादी के बाद बहुत तेज़ी से बढे. तब हमारा चारित्रिक पतन अधिक तेज़ी से हुआ. जापान ने इस कान्वेंट स्कूलों के खतरे को समझ लिया था, अतः उन्होंने आज़ादी मिलते ही जो पहले काम किये उनमें एक था इन कान्वेंट स्कूलों को बंद करना.
    मेरा, आपका जन्म भारत के इस पतन के बाद ही हुआ है न ? अतः भारत की जो तस्वीर हम-आप देख रहे हैं वह असली भारत नहीं है. क्या इसे देखकर विदेशी विद्वान भारत के दीवाने बने और बन रहे हैं ? उन्हों ने पश्चिम की असलियत और असली भारत की असलियत को ठीक से देखा है, जो आप (क्षमा करें) नहीं देख पारहे. आपकी जानकारी का सरोत क्या है, भारत के बारे में ? कुछ वे घटनाए जो पतित होते भारत के कुछ लोगों के व्यवहार से आपके संवेदनशील और आदर्शवादी कोमल मन पर अंकित हो गयीं. यह वर्तमान परिदृश्य असली भारत नहीं, यह वह भारत है जो मैकाले जैसों ने बनाने का षड्यंत्र किया था. इसको झूठ को चीर कर असली भारत को देखना थोड़ा सा मुश्किल ज़रूर है, पर असम्भव नहीं.
    आप किसी एक क्या अनेक कहानीकारों और साहित्यकारों का उदाहरण दे सकते हैं जिन्हों ने भारत के बारे में बहुत कुछ बड़ा अपमानजनक लिखा है. ऐसे ही लोग पैदा करने केलिए मैकाले जैसों ने मेहनत की थी जो आपने आप को, अपनी जननी, अपनी मातृभूमी, अपनी परम्पराओं को गाली देने में प्रसन्न हों. अडिगा ने भारत के बारे में कितनी झूठी गंदगी अपने उपन्यास ‘व्हाईट टाईगर’ में फैलाई है, उसे बुकर पुरस्कार मिल गया. ये भारत को कमजोर बनाने के प्रयास और षड्यंत्र ही तो हैं.
    इसका एक प्रमाण देखिये , ## जेम्स मिल को भारतीय इतिहास का अधिकृत विद्वान मानागया है. शायद दस खण्डों में उसने भारत का इतिहास अनेक वर्षो की मेहनत से लिखा. किस नीयत से लिखा, ज़रा इसकी बानगी देखिये. भूमिका में वह कहता है की ” ये वे लोग हैं जो संसार में सभ्य समझे जाते हैं, ये वे लोग हैं जो हमें ( अंग्रेजों को ) असभ्य मानते हैं. हमें इनका इतिहास इस प्रकार से लिखना है कि हम इनपर शासन कर सकें.” मेरे दोस्त, इन कथनों को समझ लोगे तो बहुत कुछ साफ़- साफ़ समझ आजायेगा. जेम्स मिल के इस छोटे से वक्तव्य से समझ आजाता है कि ————————–
    *१* सन १७००-१८०० के बाद तक भी सारे संसार में भारत की पहचान एक बड़े सभ्य समाज और राष्ट्र की थी. तब आप-हम तो थे नहीं, अतः लिखे प्रमाणों से जानना-समझना पड़ेगा न. यह भारत की वह छवि है जिसके बारे में आपकी तरह भारत के करोड़ों लोग नहीं जानते, बतलायेंगे तो आपकी तरह उन्हें विश्ववास ही नहीं आयेगा. इतनी बुरी तरह हीनता, दीनता, छोटेपन के शिकार हम बन चुके हैं. ये है अंग्रेजों की कुटिल चालों की सफलता.
    *२* दूसरी बात जो मिल के कहने से समझ आती है वह ये कि भारतवासी अंग्रेजों को असभ्य मानते थे. यही सच भी है, १८०० के बाद तक भी यूरोप की हालत भिखारियों जैसी थी. बेचारे भूखे मरते थे, ऐसे मैं सभ्य कैसे बनते. अब हमारी हालत उन्हों ने अपने अतीत जैसी बना दी है. मेरे कहने पर तो आप शायद विश्वास न करें. प्रथम गवर्नर जनरल राबर्ट क्लाईव एक लुटेरा ही नहीं ,एक डकैत था जो लूटकर भारत के केवल बंगाल क्षेत्र से ९०० जहाज़ सोने के भर कर लेगया. बात सामने तब आई जब उसने इस लूट में ब्रिटेन के सांसदों और रानी को हिस्सा नहीं दिया और उनमें झगडा होगया तथा इस बात पर मुकद्दमा चला. ऐसे ही क्रूर लुटेरे और डकैत ८४ अँगरेज़ गवर्नर भारत में आये थे.
    इतने लुटेरे और डकैतों की लूट के बाद हम निर्धन बने. अपने सारे काले कुकर्मों पर पर्दा डालनेवाला, अंग्रेजों-मुगल आक्रमकों की तारीफों से भरा इतिहास लिख कर हमें दे गए जिसे पढ़कर आप सरीखे सज्जन तैयार हुए जिन्हें लाख कहने पर भी अपने देश भारत की श्रेष्ठता पर विश्वास नहीं आता.
    *३* जेम्स मिल के कथन से तीसरी बात यह साफ़ हो जाती है कि उसने ( उसके अग्रज, पूर्वज तथा काले भारतीय मैकाले पुत्रों ने ) भारत का इतिहास सच्चा नहीं लिखा, पूर्वाग्रह और के विशेष सोच, भारतीयों में हीनता जगाने के लिए लिखा. सच लिख कर यह होना संभव कहाँ होता.
    ## आप को नहीं लगता कि कई बार हम न चाहते हुए भी भ्रमित हो जाते हैं. ” बुरा जो ढूढन मैं चला…… ” इस ज्ञान की बात से गांधी, सुभाष, भगत सिंह, स्वामी विवेकानंद, झांसी की रानी, श्री कृष्ण और श्री राम परिचित होते तो झगडे होते ही नहीं , है न ? भ्रमित होने की ज़रूरत नहीं. धर्म यानी सत्य की, न्याय की स्थापना के लिए सही, गलत की पहचान करनी ही पड़ेगी अन्यथा दुनिया में सदा दानवों का ही राज चलेगा. व्यक्तिगत, आध्यात्मिक विकास के लिए कही बात को आप राष्ट्र जीवन, समाज जीवन पर लागू करने का प्रयास कर रहे हैं . सदर्भ से काटकर निकले अर्थ अनर्थ कर सकते हैं.
    ## अब भी अपने मुह मियाँमिट्ठू ….. ? विदेशियों द्वारा हमारी प्रशंसा के इतने प्रमाण काफी नहीं क्या ? चलो एक और सही- —- #जापान के इतिहास के विद्वान् प्रो. नाकामुरा ने लिखा है कि उनकी सभ्यता, संस्कृति, धर्म भारत की ही दें है. # चीन के अमेरीकी राजदूत ने आपके देश चीन के बारे में कहा है ,
    ” भारत ने एक भी सैनिक भेजे बिना बीस शताब्दियों तक चीन पर अपना साम्राज्य जमाये रखा.” है न क माल की बात , पर ये सब बातें हमारे इतिहास की पुस्तकों में क्यों नहीं ? यानी यह सच है की हमसे हमारा सच्चा इतिहास छुपाया गया है.
    # अंत में एक मनोविज्ञान के तथ्य के बारे में कह कर समाप्त करता हूँ, भौतिक संपत्ति की तरह हमारे विचार और मान्यताएं भी हमारी संपत्ति बन जाते हैं, जिनके छूटने या टूटने पर हमें दुःख और कष्ट होता है. पर ज्ञान और सत्य के अमृत को पाने के लिए यह कष्ट तो करना ही पड़ता है. अन्यथा हमारे पूर्वाग्रह हमारी बेड़ियाँ बन जाते हैं, हमें तालाब का ठहरा पानी बनाकर सड़ा डालते हैं. अतः आर्यसमाज के इस नियम का पालन करना उचित है ” असत्य को त्यागने और सत्य को ग्रहण करने में सदा उद्यत रहना चाहिए.”
    मेरे विचारों को आलोड़ित करने हेतु आपका धन्यवाद !

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    • Agyaani

      आदरणीय डा. कपूर जी,
      बेशक आर. सिंह के बहाने ही सही आपसे मुझे भारत के बारे में इतनी ज्ञानवर्धक बातें मिली जो शायद शिक्षा के दौर में शायद ही मैंने कभी पढ़ी हो!
      “सार्थक बहस होनी चाहिए”, मैं भी इस बात का पक्षधर हूँ! क्या ये सम्भव नहीं की जो हमने आजतक नहीं किया इसकी शुरुआत की जाए और हमारे पढाई के तौर तरीकों (जो कभी भी मुझे पसंद नहीं रहे) को बदलने का प्रयास किया जाए! पैसा कमाने की मशीन बनते जा रहे स्कूलों की जगह गुरुकुल पद्धति को वरीयता देने का अभियान चलाया जाए!
      आप जैसे विद्वान लोग इस तरह के अभियान का मार्गदर्शन करें तो मेरे जैसे अनेक लोग इससे जुड़ने में सम्मानित महसूस करेंगे!

      धन्यवाद

      Reply
  11. आर. सिंह

    R.Singh

    Dr.Kapoor,
    Aapke adhyan aur knowledge ka loha to main maan rahaa hoon,par aab bhi main kahta hoon ki aaj HI nahi, janm se maine jo dekha hai aur shayad aapne bhi dekha ho wah to kuchh aur hi kahta hai.Maine apni aankhon dekhi ka thoda example aapko address kiye huye comment ke pahle wale comment mein dene ki koshish ki hai jisme maine likha hAI ki ham charitrawan the hi kab?
    Main1956 mein shool hostel mein rahta tha.Ek sahpaathi ke ghar se ghee aayaa tha karib 3 ser.Ghee ke dabeko kutte ne jootha kar diya.Usne mere mana karne par bhi vah ghee bazzaar mein halwaai ko bech diya.Wah sahpathi baad mein engineer bana.Usne kya kiya hoga,aapbhi soch sakten hain,par aap to poochhenge ki sexually wah kaisa tha,kyonki janta kaa maal loot kar ghar bharna to ham Hindustaniyon ke nigah mein charitrahinta hain hi nahi.Sahadat Hasan Manto ki kahani baad mein padhi jisme ek English lady ne apne hindustani paying guest ko kewal isliye nikaal diya tha kyonki usne doodh mein paani milaane ke liye kahaa tha.Aise likhne aur dikhawa karne mein to ham hamesha se tej rahe hain,par asliyat kuchh aur hi hai jo foreigners ko tab dikhta hai jab ham uske achhe behavior ko sex ka invitation samajhkar uska rpe karne ki koshish karte hain aur kabhi kabhi safal bhi ho jaate hain.Kapoor Sahib,main phir Kabir ko quote karunga,BOORA JO DEKHAN MAIN CHALA BOORA NA MILA KOY.JO DIL DHNDHA AAPNA MUJHSA BOORA NA KOY.Literally yahi satya hai.Ham Bhaartiyon ko kewal anterman mein jhank kar dekhni hai ki kya really hamse booraa duniya men koi hai?Aise yah kaam darpan ke saamne khadaa hokar sochne se bhi hosakta hai.
    Dr Sahib.aaj main phir muhaware ko correct karke ke doohraata hoon ki ham APNE MUNH MIYAN MEETHOO HAIN.

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  12. डॉ. राजेश कपूर

    Dr. Rajesh Kapoor

    सिंह साहिब, मुझ अल्पgya , अज्ञानी, बुकिश नोलेज वाले का कुछ तो ज्ञान बढाने की कृपा करें, बताएं कि आपकी अखियन की देखी असलियत क्या है ? दर्जनों विदेशी विद्ववान भारत kii महानता पर हजारों पृष्ठ लिख गए, फ्रांसिसी विद्वान् गोयटर, अमेरिकी विद्वान् डेविड फ्राउले जैसे आज भी भरत की महानता के गीत गा-गाकर एक ही बात कह रहे हैं कि अगर दुनिया को बचाना है तो भारत और भारतीय संस्कृति को बचालो. ये सारे के सारे विद्वान भारत की असलियत को देखने-समझने में गलती कर रहे हैं क्या ? मैं तो केवल किताबी ज्ञान की बातें करता हूँ, सच को देखने में मेरी आँखें / बुधी अक्षम है, ऐसा आपका मत है. पर मेरे प्यारे विद्वान भाई आर. सिंह जी, क्या ये सब विदेशी भी मेरी तरह किताबी ज्ञान वाले और सच को देखने में असमर्थ, नासमझ लोग हैं ? इसका मतलब हम सब के पास वह दिव्य दृष्टी, वह ऊंची समझ नहीं है जो आपके पास है. यह तो बड़ी अछी बात है. ज़रा कृपा करके हमारी gyaan वृधी करें और बतलाएं कि आपकी अखियन की देखी क्या है ?
    # कुछ बताने से पहले कुछ सच्ची बातें सुन लें. जर्मन विद्वान् पाक हेमर ने एक 700 पृष्ठ की किताब भारत की महानता से अभीभूत होकर लिखी है जिसका नाम है ‘ इंडिया-रोड टू नेशनहुड’ इसकी भूमिका में वे लिखते हैं कि ‘ जब मै भारत का इतिहास पढता हूँ तो मुझे नहीं लगता कि यह भारत का इतिहास है. यह तो भारत को लूटने, हत्याकांड, आक्रमण करने वालों का इतिहास है. ‘ आगे वह लिखता है ‘ जब ये (भारतीय) अपने सही इतिहास को जान jaayenge तो दुनियां को बतादेंगे कि ये कौन हैं.’ पाक हेमर को नज़र आरहा है कि हमारा कहलाने वाला हमारा सच्चा इतिहास नहीं है. वह तो भारत को लूटने वालों का इतिहास है. दूसरी बड़ी खास बात वे कह रहे हैं कि अपने सही इतिहास को जानने के बाद हम इस लायक होजाएंगे कि अपना लोहा सारे संसार से मनवा लेंगे. बस यही तो खतरा है. हमारे desh के dushman jaante हैं कि jisdin हम अपने सही इतिहास को जान गए, हम sarii दुनिया के sirmour banne की taakat haasil कर लेंगे. यही बात है जो वे नहीं hone denaa chaahte .

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  13. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    # तिवारी जी ,प्रोत्साहन हेतु धन्यवाद. भारतीय संस्कृती पर आक्रमण बहु आयामी हैं, उनका सामना सारे संवेदलशील लोगों को मिलकर करना होगा. आप सरीखे विचारशील व अध्ययनशील साथियों का सहयोग और मार्गदर्शन सदा अपेक्षित है. आपका कथन एक ठोस सच्चाई है कि भारतीय संस्कृती, परम्पराओं से सभी समस्याओं का समाधान संभव है. सारे संसार की समस्याओं का समाधान करने की सामर्थ्य हम में है, पर अवसर अभी नहीं मिला. सुनिश्चित मानें कि अब यह अवसर मिलने ही वाला है.
    # भारतभूषण जी, प्रोत्साहक टीप हेतु आभार ! आप सरीखों के वर्धापन से बड़ा बल मिलता है. हम सब में अस्सीम क्षमता है, बस ज़रा सब को स्मरण करवाने की ज़रूरत है. आपकी मंगलकामनाएं अव्यर्थ नहीं.
    # अज्ञानी जी, अपनी प्रतिक्रियाएं भेजते रहकर लेखकों का मार्गदर्शन करते रहना भी एक बड़ा योगदान है, कृपया जारी रखें. प्रतिक्रिया से ही तो लेखक मूल्यांकन कर पाते हैं कि वे अपने उद्देश्य में कितने सफल या असफल हुए.
    # विजय प्रकाश जी की सहमती भी कम महत्व नहीं रखती. यानी प्रयास सार्थक हुआ लेखन का.
    # अभिषेक जी, चंद शब्दों में लग गया कि आप इस विषय को पहले से ही ठीक से समझ रहे हैं. इसपर आपकी दृष्टी बड़ी स्पष्ट है. ऐसे ही लोगों की आज देश और समांज को भारी जरूरत है.
    # पटेल जी आप विषय को गहराई से समझने का प्रयास कर रहे हैं, संतोष और सुख कि बात है. यही तो उद्देश्य है लेखन का. यदि हो तो अगली प्रतिक्रया की प्रतीक्षा है.

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  14. आर. सिंह

    R.Singh

    Now I would like to take reply of Dr.Kapoor further,though I do not think ithat we are going to reach on some conclusion.He has quoted not from our history or literature,but also from foreigners.This shows his study and knowledge,but bookish knowledge and quotations apart,ground reality is that what I have tried to describe in my comment before this.Here I would like to quote Kabirdas:TUM KAHTA KAGAD KI LEKHI MAIN KAHTA AANKHAN KI DEKHI.Tathastoo.

    Reply
  15. आर. सिंह

    R.Singh

    Pankajji,hum charitrawaan kab the?Maine bachpan se to kewal charitrahin hi dekhen hai aur meri umra bhi ab satar ko chhune ja rahi hai.Han, mukh mein ram bagal mein chhuri main bachpan se dekhta aa raha hoon.INDIATODAY magazine ke July’07 ke ek issue mein senior citizens ke plight ke bare mein kuchh chapa tha aur maine likha tha ki senior citizens specially jo 1928 aur 1947 ke beech paida huye hain ve na kewal apni durdasa ke wajah khud hain,balki Bharat ke Bartaman halat ke liye bhi ve hi jimmewar hain.Indiatoday ne usko thoda kant chaat karke chhap bhi diya tha.Aaj bhi mera vichar badla nahi hai..Isliye aaj ki khulepan ,jisko aap charitrahinta kahte hai uski aalochana ke pahle sochye ki hamne vartaman generation ko diya hi kya hai?
    Jis din first five years plan bana us din se aj tak log kewal dono hathon se paisa hi to batorate rahe hain.Bharat kabhi charitrawan raha hoga,par aajaadi ke yani jabse maine hos sambhala charitawan ike dooke hi dikhe.Aise doosre ki biwi ko bahga kar enjoy karne ke baad kharesari (always standing )sadhoo bhi hamne dekhe hain.Agar aise logon ko charitrawan kahe to hosta hai bahutere charitrawan mil jayen.

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  16. श्रीराम तिवारी

    shriramtiwari

    एक समसामयिक दुरूह समस्या को सभी आशंकाओं के मद्दे नज़र प्रुस्तुत करने पर साधुबाद .इस सन्दर्भ में कितने सकारात्मक प्रयाश या विकल्प हो सकते है ये तो पता नहीं .किन्तु यह नितांत सत्य है की भारत की संस्कृति योग .सामाजिक मर्यादा एवं आधुनिक चिकत्सा विज्ञानं के समवेत प्रयासों में इसका निदान संभव है.

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  17. भारत भूषण

    Bharat Bhushan

    धन्यवाद डॉ. राजेश कपूर जी आपके सटीक व सारगर्भित लेख के लिए, आपका लेख से भी जोडदार आपने Mr Singh को जो जवाबी प्रतिक्रया लिखी है वो और भी ज्यादा सूचनात्मक और कटु सत्य है जो तथाकथित अपने को पाप की संतान मानने वाले वामपंथियों को हिला कर रख देगा, आप इसी तरह के और भी अपनी संसकृति से जुड़े लेख लिखते रहें
    आपके लिए मंगल कामना सहित.

    भारत भूषण

    Reply
  18. डॉ. राजेश कपूर

    Dr. Rajesh Kapoor

    अज्ञानी जी कहाँ रहे इतने दिन ? आज ही प्रात आपकी याद पता नहीं कैसे आगई और इधर आपका सन्देश पहुँच गया.
    आपके सारे सुझाव सही हैं.पर कहावत है कि चोर को नहीं, चोर की माँ को मारो. यानी समस्या की जड़ को काटो. ये सच है कि अश्लील साहित्य पहले भी था. अश्लील साहित्य ही क्यों, वेश्यालय और वेश्याएं भी थीं. जुआरी, व्यभिचारी, वेश्यागामी भी भारत में थे. पर हमारा समाज ऐसे लोगों और कर्मों को गर्हित व त्याज्य समझता था. ऐसे लोग और कर्म समाज में कभी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं करते थे. unhen प्रतिष्ठा dilaane के pryaas कभी नहीं kiye jaate थे. और आज……?

    मानवीय दुर्बलताएं कब,कहाँ,किस युग में नहीं रहीं. पर उन दुर्बलताओं को संतुलित, नियंत्रित करने की एक सुविचारित-अनुभूत व्यवस्था भारतीय समाज में सदासे प्रचलित थी. भारत में ऐसे लोग तथा कर्म कभी भी आदर्श या प्रेरक नहीं बने. कुमार्ग पर चलने कि preranaa का एक भी srot भारत में durlabh था. islaami aakramkon के aane tak yahii sthitii thii. uske baad hi naitik patan का praarambh हुआ. angrezon के aanepar unkii kuchaalon se patan की prakriyaa और tez hogaii. maikaale की chaalon और shikshaa के baad haalat bad se badtar hote chle gaye.
    आज sabse kharab और khatarnaak baat yah ho rahii है कि prachaar madhyamon का dur-upyog karke ashliilataa, asabhyataa, kutiltaa, paariwaarik shdyantron, younaachaar ou khulii veshyaavritti को maanyataa, saamman, pratishthaa और adhikaar dilaane banane और sthaapit करने का एक aisaa khatarnaak prayaas chal rhaa है jo vishw के itiihaas में कभी नहीं हुआ. atah ise samajhanaa, fir rokne का pryaas karnaa आज की एक bahut badii zaruurat है. dhyaan रहे कि ये pryaas vishw की kuchh bahut badii vyaapaari taakton dwaaraa kiye jaa रहे हैं. aap jaise sanwedansheel लोग ispar dhyaan denge to sab kuch saaf-saaf ,सामने nazar aane lagegaa.

    आपके sateek pryaasonko rokne के pryaas har tareeke se kite jayenge. udhaaran hetu dekhen कि aapki mail block की jaa saktii है. aapakaa software kaam n kare और angrezi se hindii n बने. wayras का khub badaa aakraman hojaaye. ये sab sambhaawnaayen हैं. pashchimii taakton की har baat को dimaag की chalnii में thiik se chaananaa hogaa.

    shesh aglii bar . आपकी tippni hetu aabhaar.

    Reply
    • Agyaani

      आदरणीय लेखक महोदय,
      आपके विस्तारपूर्ण उत्तर से मैं निरुत्तर किन्तु आह्लादित हूँ ! मैंने जाने अनजाने ही अपना नाम अज्ञानी चुना लेकिन सच में मेरा ज्ञान अभी अल्प है! मैं इस लेख से पहले आपके बारे में ज्यादा नहीं जानता था लेकिन आपके लेख ने आपमें मौजूद उस गुणी लेखक का आभास करवा दिया था!
      इस लेख के जैसे और भी लेख हमें पढने एवं ज्ञानार्जन को मिले ये अभिलाषा है!
      धन्यवाद

      Reply
  19. डॉ. राजेश कपूर

    Dr. Rajesh Kapoor

    पंकज जी, वर्धापन हेतु आभार. सही कहा आपने, प्रगतीशील हम पर हंसेंगे, आलोचना भी करेंगे. आपने दुर्योधन का प्रसिद्ध कथन सुना होगा,” जानामी धर्ममपी न मे प्रवृत्ति, जानामी अधर्ममपी न मे निवृत्ति ” दुर्योधनों के लिए हम मेहनत कर रहे हैं क्या ? उसको तो योगीराज कृष्ण भी न समझा सके, हम-आप क्या चीज़ हैं. मेरे विचार में हमारी सारी मेहनत तो सात्विक शक्तियों के जागरण के लिए है. दुर्योधनों और रावणों के साथ तो युद्ध हीकरना पड़ता है,वे समझाने से कब, किस युग में समझे हैं ?
    आपकी प्रोत्साहक टिप्पणी हेतु पुनः आभार.

    Reply
  20. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    ap bilakul sahi kah rahe hai,bharat ke bachche bigad jaye is liye bachapan se hi unhe unmukt bano taki vo america adhi desho ke logo se pratishpradha nahi kar paye,ye lakshay lekar hi sara ka sara media or sarkari tantr laga hai,ore jane anajane hamari pujani v sammaniy adalate bhi unako sahyog kar rahi hai………………apaka comment mul lekh se bhi jyada preranaspad tha………………sadhuvad lekh ke liye………….

    Reply
  21. sunil patel

    डॉ. कपूर साहब जी ने लिखा तो बिलकुल ठीक है. भाषा काफी तीक्ष्ण है क्योंकि बहुत छोटे से लेख (१५ २० लाइन) में बहुत बहुत कुछ कहा है. हाँ लेख की फोटो कुछ ज्यादा ही बोल्ड है, सब्जेक्ट बहुत गंभीर है इसलिए लिखने से पहले सोचना पड रहा है. सच तो कडवा होता है.

    Reply
  22. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    श्रीमान सिंह जी, आपने लेखक को अदूरदृष्टि वाला व भटका हुआ बताया है. भारत की महान संस्कृती प्रारम्भ से ही भ्रष्टाचारी और ढोंगी रही, यह भी आपका कहना है. आप कहते हैं कि इस लेख में कुछ नया नहीं है. यह अपने मुह मियाँ मिट्ठू ( मुहावरा सुधार लें ) बनना है . आपकी टिप्पणी पर मेरा निवेदन है —-

    *१* मुझे बताने की कृपा करेंगे कि भारत की प्रशंसा और भरतीय गौरव गान के कारण लेखक नासमझ व भटका हुआ है या भारत को वासना का शिकार बनाने के प्रयासों की ओर संकेत करने के कारण, या फिर आपकी पीड़ा का कारण अमेरिका की आलोचना है ? बताने का कष्ट करें कि आप इतने विचलित किस बात से हुए कि लेखक के बारे में इतने ऊंचे (?) विचार प्रकट कर दिए. क्या भारत की प्रशंसा बर्दाश्त नहीं हुई या पश्चिम की आलोचना असह्य लगी ? मुझे जो भी विशेषण आप देना चाहें , मंजूर हैं, पर एक कृपा तो करें कि उसका कोई तर्क पूर्ण आधार तो बताएं, कुछ झूठा-सचा प्रमाण तो दें. निराधार कुछ भी कह देना तो उचित नहीं.

    *२*आपकी नज़र में भारत सदा से ढोंगी और भ्रष्ट रहा है. कौन कहता है ऐसा ? भारत को ऐसी कठोर गाली कोई भारत का शत्रु या फिर मैकाले द्वारा के भारत के बारे में फैलाए झूठ का शिकार ही कह सकता है. यदी सच को सुनाने का सहस और उदारता है तो देखिये भारत के बारे में सच क्या है——

    # बर्नार्ड शा भारतीयों को देखकर इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने लिखा ” किसी भारतीय के मुख पर आप जीवन की प्राकृतिक आभा देख सकते हो
    जिसे हमने बनावटीपन से ढक दिया है. इनके चेहरों की पवित्र रेखाओं में ईश्वरीय छाप नज़र आती है.” स्पष्ट है कि ऐसे पवित्र, चरित्रवान व इमानदार लोग उसने पहले कभी संसार में नहीं देखे थे.

    –लार्ड विलिंग्टन कहता है ” अमीर, गरीब या राजा; झोंपड़ी या महलों में में रहनेवाले; ये सभी भारतीय इस धरती पर सबसे ईमानदार और सज्जन लोग हैं.”
    विलिंग्टन को भारतियों जैसे सज्जन लोग संसार में कहीं नज़र नहीं आते और एक आप हैं जो अपनी जन्म भूमि की प्रशंसा नहीं सुन पाते, उसपर विश्वास तक नहीं करते. क्या हो गया है हमारे अपने लोगों को जो ऐसी नकारात्मक सोच का शिकार बनकर भारत को कमज़ोर बनाने कि अदूरदर्शिता कर रहे हैं.

    –काउंट बायर्न स्टीरना ने अपनी पुस्तक ‘थिओगनी ऑफ़ हिंदूज़’ में लिखा है ” ग्रीकों से हिन्दू लोग कहीं अधिक उन्नत होने के कारण वे ग्रीकों के गुरु रहे होंगे और ग्रीक उनके शीश्य. बायर्न स्टीरना आगे लिखते हैं ” विश्व में हिन्दुओं की कोई बराबरी नहीं कर सकता. हिन्दुओं की उच्च सभ्यता फैलते-फैलते पश्चिम में इथियोपिया, इजिप्ट और फिनिशिया तक गई. पूर्व में स्याम , चीन, जापान, सीलोन, जावा,सुमात्रा तक फैली. उत्तर में ईरान,ग्रीस और रोम तक फैली.”
    यानी हम भारतीयों ने कभी असभ्य ग्रीक ही नहीं, सारे संसार के लोगों को सभ्य बनाया. है इसपर हमें विश्वास ?

    कमाल है कि भारत की केवल आलोचना करने वाले इन एतिहासिक तथ्यों को देखना-जानना ही नहीं चाहते. क्या सिंह जी आप भी ऐसे ही हैं या आपको इन तथ्यों की जानकारी ही नहीं है? भारत की महानता की प्रशंसा करने वाले विदेशी विद्वान कोई एक नहीं, दर्जनों हैं.
    डेविड फ्राउले का नाम तो शायद ही आपने सुना होगा. गूगल सर्च में देख लें, भारत की संस्कृती को संसार की सबसे ऊंचा और महान साबित करते हैं. मेरी समझदारी का जो प्रमाणपत्र आपने मुझे दिया है वह फ्राउले साहब को भी आप भेजना चाहेंगे क्या ? बाकी के उपरोक्त विद्वान तो दूसरी दुनियां में जा चुके हैं, वहां तो बस चलेगा नहीं.

    *३* आपकी नज़र में अपने राष्ट्र, संस्कृती और परम्पराओं कि प्रशंसा करना शोभनीय नहीं. तभी मैंने विदेशियों द्वारा की गई भारत की महानता के गुणगान आपकी जानकारी में लाने का प्रयास किया है. अब यह तो न कहना कि हम विदेशियों को क्यों उधृत करते हैं. वैसे आप बतलायेंगे कि विश्व का कौनसा देश है जो अपने देश, समाज और परम्पराओं की प्रशंसा कर-कर के देश भक्ति, स्वाभिमान और गौरव की भावनाओं को बार-बार जगाने का भापुर प्रयास नहीं करता ? चाहें तो कोशिश कर के देख लें, आप असफल होजाएंगे, एक भी देश ऐसा नहीं मिलेगा.

    भारत सरकार तो राष्ट्रीयता, स्वाभिमान जगाने और देश और देश को मज़बूत बनाने का कम करती नहीं. हम जैसे अनेक लोग यह महत्वपूर्ण काम, यानी सारे रोगों कि जड़ काटने का प्रयास कर रहे हैं तो किसी भी देशभक्त, सज्जन, समझदार व्यक्ती को क्यों ऐतराज़ होना चाहिए ? व्यक्तीगत प्रशंसा के छोटेपन और अपने समाज, संस्कृती, परम्पराओं और राष्ट्र की महानता के गीत गाने के बडप्पन में अंतर करने की साधारण समझ तो हम सबको होनी ही चाहिए.

    *४* आप कहते हैं कि लेख में कुछ नया नहीं है. आपने लेख ध्यान से पढ़ा और समझा है न? मैंने बताने का प्रयास किया है कि भारत पर हो रहे छद्म आक्रमणों में से एक आक्रमण हमें पतित, वासना का कीड़ा बनाकर शरीर व दिमाग से कमज़ोर बनाने और अरबों रूपये का कामवासना का बाज़ार भारत में बनाकर हमें लूटने का है. आप इन सब बातों को पहले से जानते हैं ? तब तो सचमुच मेरे लेख में आपके लिए कुछ भी नया नहीं है. पर आपकी टिप्पणी से लगता तो नहीं कि आप इस गंभीर पक्ष के बारे में कुछ भी जानते हैं. मुझे प्रसन्नता होगी अगर आप अपनी बातों को ठीक से स्पष्ट कर सकें.

    *** अंत में इतना ही कि, लेख पर टिप्पणी करने के लिए आपका धन्यवाद. आपके कोई प्रश्न हों तो स्वागत है. कोई आक्षेप, आलोचना हो तो उसका भी सहर्ष स्वागत. मैंने आपकी किसी बात का बुरा नहीं माना है. संवाद, वाद-विवाद में मानना ही नहीं चाहिए. आशा है की आप भी बुरा नहीं मानेंगे. बस ,यथासंभव हम अपनी बात पूर्वाग्रहों के आधार पर नहीं, तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर, तर्कसंगत कहें तो अछा है .

    Reply
  23. गिरीश पंकज

    girish pankaj

    सही दिशा में सोचने वाला लेख है.आज समाज का एक वर्ग आपके मुद्दों से नाराज़ ही होगा. दरअसल चरित्रहीनता हमारे आचरण का हिस्सा बन रही है. ऐसे दायर में आप जब मूल्यों की बात करेंगे, तो तथाकथित प्रगतिशील हँसेंगे. फिर भी हमें अपनी बात कहानी ही है. आपने अच्छा मुद्दा उठाया है. इसकी दिलसे तारीफ करूंगा मैं.

    Reply
  24. Agyaani

    ज्वलंत मुद्दे पर एक लघु लेकिन सार्थक लेख. मेरी लेखक महोदय से प्रार्थना है कि इस विषय पर हमारा और ज्ञानार्जन करें. मेरा लेखक महोदय से यह प्रश्न है कि क्यूँ न हम लोग दूसरों पर लांछन लगाने से पहले अपने घर पर झाड़ू पोछा कर लें.

    आज मीडिया युग है इसमें कोई दो राय नहीं परन्तु जितना अश्लील साहित्य रूपी कूड़ा करकट हमे बस स्टैंड और बुक स्टालों से मिलेगा उतना कहीं नहीं होगा.

    बेहतर तो ये हो कि आप जैसे प्रबुद्ध लोग प्रशासन और पुलिस के साथ मिलकर इस गंदगी को दूर करें!

    विअग्रा और बंगाली बाबाओं के विज्ञापन हम लोग बचपन से देखते आ रहे हैं. क्यूँ न एक सेंसर बोर्ड विज्ञापन के लिए भी स्थापित किया जाए जो इमानदारी से काम करे?

    आज का युग शाहरुख़ द्वारा सांवले लोगों को गोरा करने में है. कोई उनसे ये प्रश्न नहीं पूछता कि क्या ये क्रीम अश्वेत लोगों पर भी उतना ही असर करेगी?

    एक वैज्ञानिक कि असामयिक मौत पर मीडिया वाले लौकी का पोस्टमार्टम करने पर तुले हुए हैं. बेचारी लौकी का इसमें क्या दोष जब उगाने वाले ने ही उस पर भरपूर रसायनिक खाद का प्रयोग किया हो तो?

    इतना वक़्त अगर वो लोग आयुर्वेद, योग के प्रचार प्रसार में लगायें तो सरकार का अरबों रुपया बचाया जा सकता है. ………………….. शायद यही कलयुग है!

    Reply
  25. आर. सिंह

    R.Singh

    This js not only myopic but pervert thinking.Hypocracy and corruption had been part of our great civilization from the beginning,so there is nothing new in this write up also. YAH TO KEWAL,APNE MAN MIAN MEETHOO BANNA HAI.

    Reply

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