शपथ ग्रहण समारोह 

इस शीर्षक से आप भ्रमित न हों। मेरा मतलब पिछले दिनों दिल्ली में हुए शपथ ग्रहण से नहीं है। उसमें कुछ मंत्रियों की कुर्सी ऊंची हुई, तो कुछ की नीची। कुछ की बदली, तो कुछ किस्मत के मारे उससे बेदखल ही कर दिये गये। एक पुरानी और प्रखर वक्ता ने जब अपने शरीर का भार नहीं घटाया, तो उनका कार्यभार ही घटा दिया गया।

शर्मा जी बार-बार होने वाले इस कर्मकांड से दुखी हैं। जब भी शपथ ग्रहण की तारीख तय होती है, वे अपने कुरते-पाजामे को हड़प्पाकालीन बक्से में से निकालकर धुलवाते हैं। पता नहीं, कब बुलावा आ जाए; पर प्रतीक्षा करते हुए जिंदगी बीत गयी। देश और प्रदेश में कई सरकारें आकर चली गयीं। उनके साथ के कई लोग विधायक, सांसद और मंत्री बन गये; पर उनके कुरते के भाग्य नहीं खुले। बेचारे शर्मा जी..।

पिछले हफ्ते मैं अखबार पढ़ने उनके घर गया, तो वे नये कपड़े पहन कर तैयार हो रहे थे।

– क्या बात है शर्मा जी, कहीं दावत का निमन्त्रण है क्या ? कभी-कभी हमें भी ले चला करो। आपके साथ हमारी उंगलियां भी तर हो जाएंगी।

– नहीं वर्मा, ऐसी कोई बात नहीं है। एक शपथ ग्रहण समारोह में जा रहा हूं।

– शपथ ग्रहण तो कुछ दिन पहले ही हुआ है। फिर आज.. ?

– आज मुझे अपने पुराने कार्यालय में सबको ‘ईमानदारी की शपथ’ दिलानी है। वहां हर साल ये कार्यक्रम होता है। इसमें शपथ विधि के लिए किसी पुराने व्यक्ति को बुलाते हैं, जिससे वर्तमान पीढ़ी कुछ सीखे। इस बार उन्होंने मुझे बुलाया है। तुम्हारा मन हो तो तुम भी चलो। देखना कितने उत्साह से हम ‘ईमानदारी की शपथ’ लेते हैं।

मेरा चेहरा और कपड़े अभी ठीक नहीं थे। इसलिए मैंने क्षमा मांग ली। इतने में ही टैक्सी आ गयी। शर्मा जी उसमें बैठकर चले गये।

मैं सोचने लगा कि शर्मा जी ने अपने पूरे कार्यकाल में शायद ही कभी ईमानदारी का परिचय दिया होगा। वे ऐसी कुर्सी पर बैठते थे, जहां से गुजरे बिना किसी का काम नहीं होता था। और वहां से निकलने का अर्थ था फाइल पर भार रखना। फिर यह भार पूरी ईमानदारी से कार्यालय में सबको बंटता था। शर्मा जी ने 35 साल ईमानदारी से इस ‘धरम-करम’ का पालन किया। शायद इसीलिए उन्हें शपथ विधि सम्पन्न करने के लिए बुलाया गया था।

इसके बाद कई दिन तक मैं शर्मा जी के घर नहीं जा सका; पर इन दिनों अखबार कई तरह की शपथ ग्रहण के समाचारों से भरे हैं। कहीं गंगा और अन्य नदियों की रक्षा की शपथ ली जा रही है, तो कहीं हिमालय बचाने की। कहीं स्वच्छता, तो कहीं वृक्षारोपण की। कहीं नशे और शोर के विरोध की, तो कहीं साम्प्रदायिक सौहार्द की। कहीं बेटी बचाने और पढ़ाने की, तो कहीं घर और बाहर नारी के सम्मान की।

मैंने अपनी जिज्ञासा शर्मा जी के सामने रखी – शर्मा जी, आजकल हर गली, मोहल्ले, स्कूल और कार्यालयों में शपथ और संकल्प के कार्यक्रम हो रहे हैं। इससे लगता है कि हमारा देश अब स्वर्ग बनने ही वाला है।

– तुम ठीक कह रहे हो वर्मा; पर हमें अपने देश को स्वर्ग बनाकर अभी स्वर्गवासी नहीं होना है। इसलिए हम प्रतिज्ञा लेते तो हैं; पर उसका पालन नहीं करते। यदि सब इनका पालन करने लगें, तो भारत का रंग-रूप ही बदल जाएगा।

– ये तो अच्छा ही होगा शर्मा जी ? मोदी जी इसके लिए काफी परिश्रम कर रहे हैं।

– ये तो पता नहीं; पर हम भारत के लोग जिस माहौल में रहने के आदी है, उसका बदलना हमारे हित में नहीं है। मोदी जी को भी समझना होगा कि भारत कभी रूस, अमरीका, जर्मनी या जापान नहीं बन सकता। तुमने वो कहावत सुनी होगी, ‘‘कौआ चला हंस की चाल, अपनी चाल भूल गया।’’ इसलिए हम कौए ही ठीक हैं। हमें ऐसा ही रहने दें।

मैं सोचने लगा कि यदि हमें कौआ ही रहना है, तो फिर प्रतिज्ञा के पाखंड की क्या जरूरत है ? मैंने काफी सिर मारा; पर इसका सही उत्तर नहीं ढूंढ सका।

कल शर्मा जी के घर गया, तो वे एक बार फिर तैयार होकर टैक्सी की प्रतीक्षा कर रहे थे। आज उनके कपड़े पहले से भी अधिक उजले और कलफदार थे। उन्होंने बताया कि नगर निगम में ठीक दस बजे ‘नियम पालन संकल्प सप्ताह’ का उद्घाटन समारोह है। उसी में मुख्य अतिथि के नाते वे जा रहे हैं। समारोह की अध्यक्षता स्वयं मुख्यमंत्री जी करने वाले हैं।

मैंने अपनी कलाई घड़ी पर नजर डाली। वहां सुइयां ग्यारह बजा रही थीं।

– विजय कुमार

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