शरीफ में अब नहीं रही शराफत


सुरेश हिन्दुस्थानी
पाकिस्तान के बारे में जैसा कहा जाता है ठीक वैसा ही सार्क देशों के सम्मेलन में प्रदर्शित हुआ। एक कहावत है कि कुत्ते की पूंछ कभी सीधी हो ही नहीं सकती, इसी तर्ज पर वर्तमान में पाकिस्तान का व्यवहार होता जा रहा है। केवल नाम के शरीफ साबित हो रहे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज से अब शराफत उम्मीद करना बेमानी सा लगने लगा है। इसके परिदृश्य में पाकिस्तान के सत्ता प्रमुखों की अपनी अंतरनिहित परेशानियां हो सकतीं हैं, क्योंकि पाकिस्तान के बारे में यह आसानी से कहा जा सकता है कि वहां जितनी भी सरकारें रहीं हैं, वे आतंक के पर्याय बन चुके कट्टरवादियों के खिलाफ नहीं जा सकतीं। सार्क देशों के सम्मेलन में जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंकवाद का मुद्दा उठाया तो शराफत के तहत पाकिस्तान को भी जवाब देना ही चाहिए, लेकिन नवाज शरीफ ने जवाब देना तो दूर की बात मोदी से मिलने की आवश्यकता भी महसूस नहीं की। इससे पाकिस्तान की इस मानसिकता का पता चलता है कि वह आतंक को खत्म करना ही नहीं चाहता।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कितनी सारगर्भित बात कही कि सार्क देश पास-पास तो हैं, लेकिन साथ साथ नहीं हैं। मोदी के इस प्रकार के चिन्तन से एक बात तो साफ दिखाई देती है कि अलग अलग दिखने से सामूहिक शक्ति का प्राकट्य नहीं हो सकता, लेकिन अलग अलग रहेंगे तो दुनिया में हमारा वजूद सीना तानने लायक भी नहीं बचेगा। हम यह भली भांति जानते हैं कि कोई भी देश तभी विश्व को झुका सकता है, जब उसके पास सामथ्र्य होगा यानि उसका पड़ौसी देश उसका साथ देने को हमेशा तत्पर रहता हो। भारत का चिन्तन कहता है कि सारा विश्व एक परिवार की तरह है, इसके विपरीत सार्क के अनेक देश अकेले चलने में ही अपना भला समझता है। अकेले चलने वाला चिन्तन शक्तिहीनता का परिचायक है।
यह बात सही है सार्क देशों के अपने अपने राष्ट्रीय हित हैं, लेकिन चूंकि सार्क (दक्षेस) देशों का एक ऐसा समूह है, जिसमें सामूहिक हितों का अभाव साफ देखा जा सकता है। ऐसे में दक्षेस समूह का क्या निहितार्थ है। जब आपस में ही रागात्मक एकता का अभाव परिलक्षित होता दिखाई दे रहा है तब इस समूह की सार्थकता पर अनेक सवाल खड़े हो जाते हैं। समूह की कल्पना क्या होती है यह संभवत: पाकिस्तान को पता ही नहीं हैं, क्योंकि उसको भारत के दर्द का अहसास तक नहीं हो रहा। अगर सार्क एक समूह है तो उसका सामूहिक दर्द भी दिखना चाहिए, लेकिन ऐसा बिलकुल भी दिखाई नहीं देता।
पाकिस्तान के इस प्रकार के व्यवहार से सार्क देशों के इस सम्मेलन की सफलता पर अभी से सवाल उठने प्रारंभ हो गए हैं। चलो मान लेते हैं कि मोदी और नवाज में परस्पर अभिवादन नहीं हुआ, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री ने जो दर्द बयां किया, नवाज को उसका जवाब तो देना ही चाहिए। नवाज ने ऐसा न करके एक प्रकार से अपने अलग होने का परिचय दिया है। इस सम्मेलन में सामूहिक चिन्तन की आवश्यकता थी, लेकिन नवाज अकेले ही चले और चलते गए। अब सवाल यह आता है कि क्या पाकिस्तान को दक्षेस राष्ट्रों के सदस्य के तौर पर इस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। वैसे कई अवसरों पर जो पाकिस्तानी चरित्र दिखाई दिया, उससे इस बात पाकिस्तान की ओर से अच्छी बातों की उम्मीद करना बेमानी सा ही लगता है। यह बात सही है कि अपने अपने देशों के अंदर राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होना चाहिए, लेकिन जब समूह में बैठे हों तब सामूहिकता का भी ध्यान रखना जरूरी है। पाकिस्तान ने इस बात का ध्यान ही नहीं रखा।
भारत के राजनीतिक दलों के नेताओं में भी इस प्रकार का रोग दिखाई देने लगा है, जिसमें राष्ट्रीय हितों के अवसरों पर राजनीतिक बयानवाजी की जाती है, अभी हाल ही में कांगे्रस के प्रवक्ता राशिद अल्वी ने जो बयान दिया उससे तो यही लगता है कि कांगे्रस राष्ट्रीय भाव को व्यक्त करने वाले विषयों पर राष्ट्रीय हित का भाव प्रदर्शित नहीं करती। इसके विपरीत उसका विरोध जरूर कर देती है। कांगे्रस को समझना चाहिए कि यह कांगे्रस या भाजपा की बात नहीं, बल्कि विदेशों में पूरा भारत ही होता है, प्रधानमंत्री द्वारा कही गई बात पूरे राष्ट्र की आवाज होती है। वास्तव में ऐसे मुद्दों पर कभी भी राजनीति नहीं की जानी चाहिए।
हमारे देश में एक कहावत बहुत ही प्रचलित है। जो जैसा खाता है उसका मन भी वैसा ही बन जाता है। अगर कोई सात्विक भोजन करेगा तो उसका विचार कभी भी अहितकारी नहीं हो सकता, इसके विपरीत अगर कोई तामसी भोजन ग्रहण करता है तो उसके विचारों में भी उस भोजन का प्रभाव दिखाई देगा। दक्षेस देशों के सम्मेलन में यह बात भी अंकित की गई, कई समाचार पत्रों में प्रकाशित भी हुई, उसके मुताबिक यह बात सामने आई कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केवल शाकाहारी भोजन ग्रहण करेंगे, और नवाज शरीफ मृत जीव के शरीर से पकाए हुए व्यंजनों को खाएंगे। इस बात से यह साफ कहा जा सकता है कि दोनों व्यक्तियों के चिन्तन की अवधारणा किस प्रकार की हो सकती है। मांसाहारी भोजन करने वाला व्यक्ति कभी दूसरों का हित सोच ही नहीं सकता। भारत और पाकिस्तान के चिन्तन में बस यही फर्क है, जहां भारत हमेशा शांति और सुख की कामना करता है वहीं पाकिस्तान मुंह में राम बगल में छुरी वाली कहावत को चरितार्थ करता हुआ दिखाई देता है। अब समय आ गया है कि भारत के इस दर्द के बारे में दक्षेस देशों का सामूहिक भाव से चिन्तन हो, और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर उसका हल निकाला जाए।

0 thoughts on “शरीफ में अब नहीं रही शराफत

  1. शरीफ नाम के जरूर शरीफ हैं, और वह भी नवाज शरीफ, लेकिन काम काज व व्यवहार में कभी भी शरीफ नहीं रहे , यह उनका अतीत भी बताता है , इसलिए ज्यादा अपेक्षा रखना न तो उचित था, और न होगा। वैसे भी वे अब कितने दिन सत्ता में रहने वाले हैं?

Leave a Reply

%d bloggers like this: