लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी

देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम आ जाने के पश्चात इन परिणामों का विश्लेषण व समीक्षा जारी है। एक ओर जहां मीडिया व राजनैतिक विशेषज्ञ आज जनता की आवाज़ बनने की कोशिश कर इन चुनावों के परिणामों पर अपने विचार व्यक्त करने की कोशिश कर रहे हैं वहीं लगभग प्रत्येक राजनैतिक दल के नेताओं द्वारा अपनी अगली रणनीति को मद्देनज़र रखते हुए अलग-अलग आशय के वक्तव्य दिए जा रहे हैं। कई पार्टियां व उनके नेता ऐसे भी हैं जो हार के वास्तविक कारणों से जनता का ध्यान हटाने के लिए अपनी हार को अपने ही तरीक़े से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। यानी चुनावों में पराजय जैसी बड़ी ठोकर खाने के बावजूद हार की असली वजह पर पर्दा डालने का प्रयास किया जा रहा है।

हालांकि देश की जिन पांच विधानसभाओं में पिछले दिनों चुनाव संपन्न हुए उनमें पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर व गोवा जैसे राज्य भी शामिल थे। परंतु पूरे देश की निगाहें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर टिकी हुई थीं। देश उत्तरप्रदेश के मतदाताओं के रुख को इसलिए और भी गंभीरता से ले रहा था क्योंकि यह चुनाव देश में बढ़ती हुई महंगाई के दौरान संपन्न हुए तथा देश में गत् तीन वर्षों के भीतर कुछ राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित करने वाले घोटाले व भ्रष्टाचार उजागर हुए। मनरेगा योजना में धांधली व एन आर एच एम घोटाले जैसे बड़े भ्रष्टाचार उत्तर प्रदेश में सुनने को मिले। देश ने इसी दौरान अन्ना हज़ारे की भ्रष्टाचार विरोधी ऐतिहासिक मुहिम में हिस्सा लिया। उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के सिलसिले में ही कभी इंजीनियर तो कभी मुख्य चिकित्सा अधिकारी की हत्याओं के समाचार मिले। चुनावों के मद्देनज़र भाजपा ने फायरब्रांड नेता उमा भारती क मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश में बुलाकर बहुसंख्य मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश की तो राहुल गांधी ने जी तोड़ मेहनत कर कांग्रेस के पक्ष में कुछ चमत्कार हो जाने की उम्मीद रखी। निश्चित रूप से इन हालात में उत्तर प्रदेश के मतदाता किस करवट बैठेंगे इस पर पूरे देश की नज़रें लगी हुई थीं। और यह कथन तो अपनी जगह पर था ही कि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम केंद्र की भविष्य की राजनीति निर्धारित करते हैं।

बहरहाल उत्तर प्रदेश के परिणाम आ चुके हैं। सत्तारूढ़ रही बहुजन समाजवादी पार्टी जिसे कि 2007 के चुनाव में 206 सीटों के साथ पहली बार राज्य में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ था वह इस बार के चुनावों में मात्र 80 सीटों पर सिमटकर रह गई। यानी उसे 126 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा जबकि ठीक इसकेविपरीत समाजवादी पार्टी जिसे कि 2009 में 97 सीटें प्राप्त हुई थी उसे मतदाताओं ने 224 सीटों के प्रचंड बहुमत से विजय दिलाई है। यानी सपा को 2007 के मुकाबले में 127 सीटों का लाभ हुआ। हालांकि देश के सभी चुनावी पंडित इस भविष्यवाणी को लेकर तो एकमत थे कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी। परंतु कय़ास यह लगाए जा रहे थे कि सपा को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस पार्टी के समर्थन की ज़रूरत पड़ सकती है। चुनाव परिणमों ने इन सभी अनुमानों को धराशयी करते हुए सपा को अप्रत्याशित रूप से पूर्ण बहुमत दिला दिया। ज़ाहिर है सपा नेता इस जीत को अपनीमेहनत, अपने कार्यकर्ताओं के अथाह पश्रिम विशेषकर सांसद अखिलेश यादव की संगठनात्मक कार्यशैली को श्रेय दे रहे हैं। परंतु पराजित मुख्यमंत्री मायावती का इन नतीजों के विशषण करने का अंदाज़ ही कुछ अलग है।

मायावती अपनी इस हार के लिए प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं तथा मीडिया को जि़म्मेदार ठहरा रही हैं। उनका कहना है कि उनकी सरकार के विरूद्ध मीडिया द्वारा किए गए दुष्प्रचार तथा मुस्लिम मतदाताओं द्वारा समाजवादी पार्टी के पक्ष में किए गए एकतरफा मतदान के चलते उनकी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। साथ ही साथ वे यह दलील भी पेश कर रही हैं कि उनका दलित वोट बैंक अपनी जगह से ज़रा भी नहीं हिला है। अपने इस तर्क के पक्ष में वह 80 सीटों पर पार्टी के विजय पाने को बता रही हैं। उनका कहना है कि दलित वोटों की वजह सेही उन्हें 80 सीटें मिल सकी हैं। क्या मायावती की यह टिप्पणी न्यायसंगतहै? ऐसा कहकर वह क्या संदेश देना चाहती हैं तथा उनकी इस टिप्पणी के बाद सवाल यह भी उठता है कि आखिर बीएसपी की हार का वास्तविक कारण था क्या? निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं को इस बात को संदेह रहा होगा कि मायावती भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश कर सकती हैं। संभव है इस भय के चलते मुस्लिम मतदाताओं ने बसपा के बजाए विकल्प के रूप में सपा को चुना हो। परंतु यह भी सही है कि इस देश में अब तक संभवत: कोई ऐसा शीर्ष राजनेता नहीं हुआ जिसने कि जाति विशेष के स्वाभिमान का बहाना लेकर जनता के पैसों का दुरुपयोग करते हुए स्वयं अपने ही बुत बनवाकर बहुमूल्य स्थानों पर लगवाए हों। यह मायावती ही थीं जिन्होंने 2007 में पहली बार बहुमत में आई अपनी पार्टी की सरकार के नशे में चूर होकर प्रदेश में कई स्थानों पर बाबा साहब अंबेडकर, व बसपा संस्थापक कांशीराम के साथ-साथ अपनी व अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की तमाम बेशकीमती मूर्तियां लगवा डालीं। लखनऊ से लेकर नोएडा तक इस प्रकार की मूर्तियां दलित स्वाभिमान के नाम का बहाना लेकर मायावती द्वारा लगवाई गईं।

ज़ाहिर है प्रदेश के जागरूक मतदाता आम जनता के पैसों की इस बरबादी को पांच वर्षों तक देखते रहे तथा मायावती के इस फैसले का विरोध करने के लिए 2012 के विधानसभा चुनावों की केवल प्रतीक्षा करते रहे। मायावती की हार का दूसरा कारण 2007 की जीत के बाद उनके भीतर समा चुका बेपनाह अहंकार भी रहा। हालांकि इस देश में मायावती के अतिरिक्त सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज, जयललिता, ममताबैनर्जी व शीला दीक्षित जैसी नेत्रियां भी हैं। परंतु मायावती को गत् पांचवर्षों से जिस अंदाज़ से जनसभाओं में आसन ग्रहण करते दिखाया जाता है वह अंदाज़ तो संभवत: महारानी एलिजा़बेथ व महारानी विक्टोरिया का भी नहीं देखा गया।

आश्चर्य तो इस बात का है कि मायावती के समर्थक नेतागण किस प्रकार से मायावती के इस सामंती व राजशाही के अंदाज़ को स्वीकार करते रहे। उनका विशाल सोफा, शानदार आसन तथा उसपर स्वयं अकेले बैठना उनके दाएं-बाएं किसी नेता कान होना तथा प्रत्येक व्यक्ति का मात्र उनके पीछे खड़े होना उनके घोर अहंकार को दर्शाता था। मंत्रियों व विधायकों के साथ भी उनका व्यवहार शिष्टाचार से काफी दूर था। अपने मंत्रियों व विधायकों से पैर छुलवाने में भी वे अत्यंत सुखद आनंद की अनुभूति महसूस करती थीं। परंतु अपने इन्हीं मंत्रियों, विधायकों व पदाधिकारियों को उनका यह निर्देश भी था कि वे मीडिया में कतई न जाएं, किसी प्रकार की बयानबाज़ी या अखबारबाज़ी हरगिज़ न करें। छोटी-छोटी बातों के लिए भी वे स्वयं ही मीडिया से रूबरू होना पसंद करती थीं। ज़ाहिर है मायावती के इस प्रकार के निर्देशों से घुटन महसूस करने वाले नेताओं ने चुनाव के समय अपनी उस घुटन की भड़ास भी निकाली है।

इसके अतिरिक्त पूरे देश ने देखा कि देश के इतिहास में पहली बार किस प्रकार मायावती ने करोड़ों रुपये कीमत की नोटों की माला अपनी पार्टी के मंत्रियों व नेताओं के हाथों से सार्वजनिक रूप से स्वीकार की। इस घटना की आलोचना होने के बाद मायावती ने इस पर खेद व्यक्त करने या अपना बचाव करने के बजाए कुछ ही दिनों बाद नोटों की एक और बड़ी माला पहन डाली। मीडिया के कुछ हलक़ों में तो इस घटना के बाद मायावती का नाम मालावती भी लिखा जाने लगा। निश्चित रूप से प्रदेश की जनता को मायावती के नोटों की माला पहनने का वह अंदाज़ भी कतई नहीं भाया। इसके अतिरिक्त दर्जनों मंत्रियों का भ्रष्टाचार के चलते चुनाव घोषणा से पूर्व हटाया जाना जबकि पांच वर्षों तक धन इकट्ठा करने के लिए उन्हीं का जमकर दोहन करना, जेल से लेकर बाहर तक भ्रष्टाचार के मामले में कई लोगों की रहस्यमयी ढंग से हत्याएं हो जाना, मनरेगा को लेकर केंद्र सरकार द्वारा मायावती सरकार पर बार-बार लगाए जाने वाले घोटालों के आरोप भी मायावती की हार का मुख्य कारण बने।

परंतु अफसोस की बात तो यही है कि मायावती उपरोक्त वास्तविकताओं से आंख मूंदकर धर्म व जाति आधारित मतदान को अपनी हार का कारण बता रही हैं। उधर दूसरी मुसलमानों के बसपा को मतदान न किए जाने के वक्तव्य को दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी सिर्फ इसलिए सही ठहरा रहे हैं ताकि उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की जीत का सेहरा उनके सिर बंध सके। बुखारी भी यही कह रहे हैं कि 28 जनवरी को उनकी अपील के बाद प्रदेश के मुस्लिम मतदाता सपा की ओर घूम गया अन्यथा वह कांग्रेस पार्टी में मतदान करने जा रहा था। दरअसल बुखारी की इस बात में भी उतना दम नहीं है जितना कि वह बता रहे हैं। निश्चित रूप से सपा को पर्याप्त मात्रा में मुस्लिम मत प्राप्त हुए हैंपरंतु इन का विभाजन भी खूब हुआ है। मीडिया को कोसने का भी मायावती को कोई अधिकार नहीं है। मीडिया ने मायावती की जिस शैली को देखा वही देश को दिखाया। ऐसे में ज़रूरत अपने अंदाज़ व अपनी कार्यशैली को बदलने की है न कि मीडियाया मुस्लिम मतदाताओं को कोसने की।

 

 

6 Responses to “मायावती को मीडिया व मुस्लिम नहीं बल्कि भ्रष्टाचार व अहंकार ले डूबा”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    विवेकानन्द जी का पढा हुआ स्मरण है, कि,
    “बिना संस्कृति शासक धन तो कमा सकता है, पर समृद्ध नहीं हो सकता।”
    पैसा सही रीति से खर्च करने वाले को ही सुसंस्कृत कहते हैं। नहीं तो धन तो जुआरी भी कमाता है।
    आगे कहते हैं शासन किसीका(किसी वर्ण का) भी हो, उसका सुसंस्कृत होना परमावश्यक है।
    धनी कोई भी हो सकता है, समृद्ध होने के लिए विवेक चाहिए।
    जूठे बरतन में डाला हुआ, शुद्ध जल भी जूठा हो जाता है।
    क्या मायावती पैसे को थाली भरकर भोजन करती है?
    बहुजन समाज चेत जाए।

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  2. डॉ. राजीव कुमार रावत

    क्या इस देश में कोई कानून नाम की चीज है जो आदरणीय मायाबती जी से यह जान सके कि मात्र 8 वर्षों में उनकी संपत्ति 111 करोड कैसे हुई, उनका क्या कारोबार, फैक्टरियां या नौकरी है, बैसे भी पुरानी कहावत है कि ये माया बडी ठगिनी है अब पता नहीं मायाबती जी क्या हैं, काश आप अपना सत्ता का सदुपयोग करतीं।.

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  3. yamuna shankar panday

    myawati ji ! varsh 1977 se purv rajdhani ki sadakon me keval apni naukari ke lie daur
    lagati thin , iswar kripa se manyvarkanshiram ji mile, aur mayawati ka bhagy Ka PITARA ,, khul gaya savarno ko gali di gai,aur rato rat prashidhi mil gai, kisi tarah jatiwad ke jarie gaddi hasil kar liya ! chuki dhan na hone ke karan vah rajniti me nahi chal pa rahi thi, atah dhan ki ugahi prarambh ki gai , aur aaj 111 karod rupae ki maya hai,, uske kabhi baap ne bhi nahi kabhi dekhe, rajniti ka khel dekho chor- chor mausere bhai ki kahani chalane lagi, kyon ki saare rajnitigy chor aur bhrsht hai, janata ke samachh koi vikalp nahi hai, atah ghum fir kar yahi chor chune jate hai !! ab netaon ke bachhe aa gae hai , usake baad unake bachhe, bash wad chalate -2 ek din raj tantr me badal jaega yah kahana atishayokti na hogi!! ek viplav ki avasyakata hai, in karan dharon ko bhagana hi hoga!!

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  4. GGShaikh

    निर्मल रानी जी,
    पसंद आया आपका आलेख.
    जनता से जिनका सिरे से कोई सरोकार नहीं,
    वैसे नेता और पार्टी हांसिए पर जा रहे हैं…
    इन नेता और पार्टियों की मनमानी शायद कोई रोक न पाए, पर जब जनता की बारी आती है तो वे उन्हें सबक सिखा देती है…
    किसी भी सिरे से हमारी मुख्य पार्टियों की चिंताएं हमारी आम जनता की चिंताओं से, उनके सुख-दुख से मेल नहीं खाती है…

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  5. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    0 मायावती को जिताने का ठेका किसने लिया था?
    कुर्सी यानी सत्ता वाकई ऐसा नशा है कि इसके छिनते ही आदमी बौखलाने लगता है। अब बहनजी को ही देख लीजिये हार से आपा खो बैठी हैं। बजाये अपनी गल्ती मानकर जनादेश स्वीकार कर लोकतंत्र का सम्मान करने के अहंकार और गुस्से में कह रही हैं कि कांग्रेस भाजपा और मीडिया ने उनको हराया है यानी जनता इतनी मूर्ख है कि सही और ईमानदार होने के बावजूद भ्रमित होकर बहनजी को ना जिताकर सपा को जिताने की भूल कर बैठी। वे यह भी बार बार दोहरा रही हैं कि मुसलमानों ने 70 प्रतिशत वोट सपा को दिये हैं। उनकी बातों से ऐसा लगता है कि कांग्रेस, भाजपा, मीडिया और मुसलमानों ने उनको जिताने का ठेका लिया था और धोखा देकर मानो जिता दिया सपा को। बहनजी एक बात नोट करलें कि राहुल ज़मीन चाट चुके हैं, उत्तराखंड में उनकी मां यानी कांग्रेस आलाकमान बनी बैठी तानाशाही चला रही सोनिया को वहां के मेहनती और कर्मठ कांग्रेसियों ने सीएम के चुनाव को लेकर खुली चुनौती दे दी है अब बहनजी की क्या हैसियत और औकात जनता के सामने इसलिये वे यूपी के नौजवान सीएम अखिलेश से अभी से घबरा कर दिल्ली राज्यसभा में मुंह चुराकर मैदान छोड़कर भाग रही हैं जिससे पांच साल बाद हो सकता है उनकी यूपी में जनता नो एन्ट्री ना कर दे? बसपा जब तक दलित वोट बैंक की राजनीति करती रही तब तक वह अपने बल पर सत्ता में नहीं आ सकी लेकिन जैसे ही उसने ‘तिलक तराजू और तलवार इनके मारो जूते चार’ का विषैला नारा छोड़कर बहुजन समाज से सर्वजन समाज बनने का व्यापक कदम उठाने का फैसला किया वैसे ही देखते देखते उसके साथ न केवल ब्रहम्ण, क्षत्रिय जुड़ा बल्कि मुसलमान भी बड़ी तादाद में शामिल होने लगा। विडंबना यह रही कि जिस तरह से रामराज लाने का दावा कर भाजपा सरकार ने भ्रष्टाचार और पक्षपात के कीर्तिमान बनाये थे ठीक उसी तरह बसपा को यह गलतफहमी हो गयी कि केवल गैर दलित समाज के चंद लोगों को टिकट देकर विधायक और मंत्री बना देने से उनका समर्थन सदा बसपा को मिलता रहेगा। मायावती यह भी भूल गयी कि जिन दो दर्जन मंत्रियों और सौ से अधिक विधायकों को भ्रष्टाचार के आरोप में उन्होंनेे पौने पांच साल तक उनके ज़रिये सत्ता की मलाई चाटकर बाहर का रास्ता दिखाया उससे उन अपमानित किये गये जनप्रतिनिधियों की बिरादरियां बुरी तरह नाराज़ हो सकती हैं। बहनजी को चााहिये कि वे आत्मविश्लेषण करें।

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