धर्म-अध्यात्म

श्रावण और सनातन दृष्टि: धर्म से प्रकृति तक

सनातन धर्म में प्रकृति का स्थान सर्वोच्च है, प्रकृति को माँ की संज्ञा भी केवल सनातान में ही उपस्थित है।
श्रावण मास प्रकृति द्वारा प्रदत्व एक ऐसा माह है, जिसमें मेघों द्वारा अमृतरूपी जल वर्षा कर, प्रकृति में नये-नये पुष्प, वृक्ष पुजवलीत होते हैं, मानव जीवन के लिये अनिवार्य कृषि हेतु अमृतरूपी जल भी श्रावण माह में मेघों से भरपूर मात्रा में मानव, भूमि आदि को सचित कर, प्रकृति में समाहित हो जाता है।

धर्म की दृष्टि से भी श्रावण मास का स्थान सर्वोच्च है। श्रावण मास परमपिता शिव को समर्पित है, जो न केवल मानव जाति, अपितु यक्ष, गंधर्व, नाग, किन्नर, पशु (जीव जन्तु) आदि के पिता पशुपतिनाथ महादेव हैं।

सम्प्रादाय के लिये सम्पूर्ण श्रावण एक विशाल मासिक पर्व हैं, जिसमें शिव को प्रसन्न करने हेतु सभी जलाभिषेक, व्रत (उपवास) आदि रखकर अपनी आस्था शिव के प्रति समर्पित करते हैं।

प्राचीन पुराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले विष को कल्याण के लिये शिव जी ने पान किया, जिस कारण विष की तीव्रता के कारण शिव का गला नील वर्ण का हो गया, अतः वे नीलकंठ कहलाये।
परमपिता शिव के विष की तीव्रता को कम करने के लिये भक्तजन शिव पर जलाभिषेक करते हैं।

अन्य पौराणिक कथाओं के अनुसार, भागीरथ द्वारा गंगा माँ को पृथ्वी पर लाने पर, गंगा मां को शिव ने अपने शीश में स्थान दिया, क्योंकि गंगा का प्रवाह अतितीव्र था। प्रकृति रूप में भी श्रावण मास मानव जनजाति के लिये वरदान की भाँति कार्य करता है। अनेक प्रकार के पुष्प, पौधे, मेघों की अमृतरूपी वर्षा एवं कृषि के लिये आयुक्त वायुमण्डल में योगदान निभाते हैं। भारतीय महाद्वीप में श्रावण मास जीवनरूपी ‘मानसून पवनें’ के साथ इस भूमि को पुनः जीवित कर देता है।

इसी माह में अनेक ग्रामीण लोग श्रावण को समर्पित गीत गाते है एवं हरियाली तीज (हरियाली का प्रतीक), नाग पंचमी (शैव) आदि पर्वो को सहदय मनाते हैं।

परमपिता शिव, जो वैराग्य धारण किये हैं, ब्रह्मस्वरूप शिव को समर्पित करने वाली वस्तुएँ, जैसे घांस, धतूरा, बेल पत्नी, दूध आदि के पीछे भी अनेक गुढ़ रहस्य और कहानियां हैं।
श्रावण मास की मेधरूपी वर्षा द्वारा प्रत्येक स्थान पर घास उग जाती है।

एवं उस घास को शिव को समर्पित किया जाता है, धतूरा रा (एक प्रकार की पौधे से प्राप्त) शिव को समर्पित की जाती है। धतूरा काटेदार पुष्प, फूल आदि है, जो हमें शिव की सहजता व शालीनता का प्रत्यक्ष उदाहरण देता है कि शिव घास, धतूरा, बेल पत्ती से ही प्रसन्न है। शिव को दूध चढ़ाने की प्रथा के पीछे एक गूढ तथ्य यह है कि श्रावण मास में कई प्रकार के विषैल पौधे भी जीवन्त ही जाते हैं, जिन्हें पशु ग्रहण करते हैं और अल्प मात्रा मे दूध में भी वही गुण आ जाता था। इसलिये उस दूध को प्रशपतिनाथ पर समर्पण की विधि उपस्थित है। श्रावण मास में तामसिक भोजन का भी वर्जन किया जाता है। इस माह तामसिक भोजन ग्रहण करने वाले मनुष्य सालिकता अपनाकर सात्विक भोजन करते हैं, जो प्रकृति के प्रति श्रद्धा को व्यक्त करता है। अनेकानेक प्रकार के तंत्रोक्त पद्धतियाँ भी श्रावण मास में स्थगित कर दी जाती हैं।

परमपिता शिव जी सभी प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष जीवनशक्ति की अधिकाष्ठा हैं, जो मानव, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, नाग, किन्नर, यक्ष, गंधर्व आदि जातियों के पिता हैं, और जगदम्बा स्वरूप प्रक्रति माँ, जो इन सभी की जीवन प्रदान करती हैं। श्रावण मास में वन्दनीय हैं।

श्रावण का स्थान धर्म तक सीमित न रहकर प्रकृति की कोख से जुड़ा है।


पवन गोला