शख्सियत समाज

भारतीय राजनीति के नेपथ्य नायक श्री संजय विनायक जोशी

पवन शुक्ला

​भारतीय राजनीति के फलक पर कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो सत्ता के शिखर पर न होकर भी शिखर तक पहुँचने वाले मार्ग का निर्माण करते हैं। संजय विनायक जोशी एक ऐसा ही नाम है, जिन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ‘संगठन शिल्पी’ और ‘अदृश्य चाणक्य’ के रूप में जाना जाता है। उनका राजनीतिक जीवन पद और प्रतिष्ठा की लालसा से दूर, संगठन की जड़ों को सींचने की एक लंबी साधना रहा है।

​सादगी और संगठन का संगम

​संजय जोशी का व्यक्तित्व महाराष्ट्र की उस पारंपरिक स्वयंसेवक संस्कृति से उपजा है, जहाँ व्यक्ति से बड़ा संगठन और संगठन से बड़ा विचार होता है। नागपुर के इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से आने के बाद भी उन्होंने चकाचौंध वाली दुनिया को छोड़कर राष्ट्र सेवा का मार्ग चुना। उनके काम करने की शैली में एक विशेष प्रकार की सौम्यता और स्पष्टता रही है। वे उन गिने-चुने नेताओं में से हैं जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन अनगिनत नेताओं को चुनाव जिताने की रणनीति तैयार की। उनकी सादगी का आलम यह था कि वे कार्यकर्ताओं के बीच जमीन पर बैठकर उनकी समस्याओं को सुनते थे, जो उन्हें एक ‘अभिजात’ नेता के बजाय एक ‘अभिभावक’ के रूप में स्थापित करता था।

​गुजरात का वह स्वर्ण युग और सांगठनिक कौशल

​संजय जोशी के चाणक्य होने का सबसे बड़ा प्रमाण 90 के दशक में गुजरात में देखने को मिला। उस दौर में उन्होंने संगठन मंत्री के रूप में कार्य करते हुए भाजपा को गाँव-गाँव तक पहुँचाया।उन्होंने ‘शक्ति केंद्र’ और ‘पन्ना प्रमुख’ जैसी अवधारणाओं को उस समय मजबूती दी जब तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी। गुजरात में भाजपा की जड़ें इतनी गहरी करने में उनका बहुत बड़ा योगदान था कि आज भी वहां पार्टी का अभेद्य दुर्ग खड़ा है। उन्होंने न केवल कार्यकर्ताओं का एक विशाल नेटवर्क खड़ा किया, बल्कि अनुशासन को पार्टी का अभिन्न अंग बनाया।

​कार्यकर्ता निर्माण की पाठशाला

​संजय जोशी को एक ‘नर्सरी मैनेजर’ की तरह देखा जा सकता है जो छोटे-छोटे पौधों को विशाल वृक्ष बनाने की कला जानते थे। उन्होंने मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी संगठन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि राजनीति केवल भाषणों से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत संपर्कों से चलती है। वे कार्यकर्ताओं के नाम, उनके परिवार की स्थिति और उनके क्षेत्र की समस्याओं को अपनी उंगलियों पर रखते थे। यही कारण है कि आज भी भाजपा का पुराना कार्यकर्ता उन्हें श्रद्धा के साथ याद करता है। वे जानते थे कि किस व्यक्ति को कहाँ उपयोग करना है,और यही एक सच्चे रणनीतिकार की पहचान होती है।

​चुनौतियाँ और मौन साधना

​राजनीति के उतार-चढ़ाव में संजय जोशी को कई कठिन दौर से गुजरना पड़ा। षडयंत्रों और विवादों के बादल भी उन पर मंडराए, जिसके कारण उन्हें संगठन के मुख्य पदों से दूर होना पड़ा। लेकिन यहाँ उनकी महानता उनके ‘मौन’ में दिखी। उन्होंने कभी भी पार्टी के खिलाफ बयानबाजी नहीं की और न ही कोई विद्रोही सुर अपनाया। एक समर्पित स्वयंसेवक की तरह उन्होंने समय के न्याय पर भरोसा किया और नेपथ्य में रहकर भी राष्ट्रहित के कार्यों से जुड़े रहे। उनका यह आचरण सिखाता है कि निष्ठा केवल अनुकूल समय के लिए नहीं होती, बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अडिग रहने का नाम है।

​विचारधारा के प्रति अडिग विश्वास

​जोशी का पूरा जीवन एकात्म मानववाद और अंत्योदय की अवधारणा के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। वे केवल सत्ता परिवर्तन के हिमायती नहीं थे, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की बात करते थे। उनका जोर हमेशा इस बात पर रहा कि राजनीति में सुचिता और नैतिकता का ह्रास नहीं होना चाहिए। उन्होंने कभी भी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया, भले ही इसके लिए उन्हें व्यक्तिगत नुकसान उठाना पड़ा हो। उनकी कार्यशैली में ‘स्व’ का लोप और ‘सर्व’ का भाव हमेशा प्रधान रहा।

​आधुनिक दौर में उनकी प्रासंगिकता

​आज जब राजनीति ब्रांडिंग और इवेंट मैनेजमेंट का खेल बन गई है, संजय जोशी की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। वे उस दौर के प्रतिनिधि हैं जब राजनीति ‘कनेक्ट’ से नहीं, बल्कि ‘रिलेशन’ से चलती थी। उनका जीवन यह संदेश देता है कि संगठन की मजबूती के लिए अहंकार का त्याग और कार्यकर्ताओं का सम्मान अनिवार्य है। उन्होंने सिखाया कि चाणक्य वह नहीं जो केवल जीत दिलाए, बल्कि चाणक्य वह है जो हार के बाद भी संगठन को बिखरने न दे।

​एक निष्काम कर्मयोगी

​संजय विनायक जोशी को केवल एक राजनीतिक रणनीतिकार के चश्मे से देखना उनके साथ अन्याय होगा। वे एक विचार, एक पद्धति और एक निष्काम कर्मयोगी के प्रतीक हैं। उन्होंने भाजपा के उस आधार का निर्माण किया जिस पर आज भव्य महल खड़ा है। भले ही इतिहास के कुछ पन्नों में उन्हें वह स्थान न मिला हो जिसके वे हकदार थे, लेकिन भाजपा के सांगठनिक इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। वे एक ऐसे सेनापति रहे जिन्होंने बिना मुकुट के युद्ध लड़े और जीते।
​उनका जीवन वर्तमान पीढ़ी के राजनेताओं के लिए एक केस स्टडी है कि कैसे बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी पद की लालसा के, राष्ट्र निर्माण के यज्ञ में अपनी आहुति दी जाती है। संजय जोशी भारतीय राजनीति के वह ‘अनाम’ लेकिन ‘अमर’ अध्याय हैं, जिनकी खुशबू संगठन की कार्यप्रणाली में हमेशा महसूस की जाती रहेगी।

लेखक- पवन शुक्ला