लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

Posted On by &filed under कविता, साहित्‍य.


slientकभी कभी एक सन्नाटा,

छा जाता है,  भीतर ही भीतर,

तब कोई आहट , कोई आवाज़,

बेमानी सी हो जाती है।

इस सन्नाटे से डरती हूँ,

क्योंकि इस सन्नाटे में,

अतीत और भविष्य,

दोनो की नकारात्मक,

तस्वीरें उभरने लगती हैं,

वर्तमान का अर्थ ही

बदल जाता है,

सब बेमानी होने लगता है।

इस सन्नाटे से लड़ती हूँ,

तो और गहराता है,

ये सन्नाटा भी एक सच है,

मेरे जीवन का..

मन के एक कोने में,

इसे क़ैद करके रखती हूँ,

कई बार रोकती हूँ,

बाहर आने से,फिर भी,

फूट जाता है ज्वालामुखी सा,

क्या ये सन्नाटा कभी,

मुझे छोड़ेगा…शायद नहीं..

मैं ही इसे छोड़ देती हूँ,

पर कैसे  ?

2 Responses to “सन्नाटा”

  1. vijay nikore

    अच्छी कविता के लिए बधाई।

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *