मौन पीएम, विदेशी कर्ज और रुपयें की गिरती कीमत

devaluation of rupee

मौन पीएम, विदेशी कर्ज और रुपयें की गिरती कीमत
आजादी पश्चात् हमारे ऊपर न तो कर्जा था न हमारी मुद्रा डॉलर से कमतर थी। हां एक चीज थी वह अंग्रेजी चारण भाटों की मौजूदगी। फिर क्या इन्हीं चारण भाटों की बदौलत विदेशी ताकतें अपनी नीतियों, लूट के दुष्चक्र को दुबारा यहां फैलाने में सफल हुईं।…
26 सितम्बर 1932 को पंजाब में जन्में मनमोहन सिंह को अबतक के सबसे चूप रहने वाले मौनमोहन पीएम की संज्ञा दिया जाने लगा है। यह वही मनमोहन है जिनकी दुनियाभर में तारिफों के पुल बांधे जाते है। यह वही मनमोहन है जो वर्ल्ड बैंक में वर्षों काम कर चुके है। मनमोहन सिंह रिजर्व बैंक के गर्वनर, भारत के तीन-तीन सरकारों के सलाहकार, दिल्ली विश्वविद्यालय के बहुत बड़े अर्थशास्त्री रह चुके है। इनके वित्त मंत्री बनने से पहले मई 1991 में फ्रांस के एक अखबार लमॉन्ड में छपा था कि “हमारे विश्वस्त सूत्रों के अनुसार भारत में अगले वित्त मंत्री मनमोहन सिंह होंगे।” और मई 91 में चुनाव नहीं हुये थे। यह वहीं वर्ल्ड बैंक और आई.एम.एफ है जो सदस्य देशों से अंशदान लेकर और उन्हें ही कर्ज देकर उनको शर्तों के कर्ज के गर्त में धकेल चुका है। वर्ल्ड बैंक और आई.एम.एफ की स्थापना 1944 को अमेरिका के ब्रेटन वुड कांफेरेन्स में हुआ। वर्तमान में इसमें लगभग 180 देश शामिल है। 27 दिसम्बर 1947 को भारत वर्ल्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का सदस्य बना। इन दोनों संस्थाओं में सदस्य देश सहयोग राशि जमा करते रहे और फिर जरुरत पड़ने पर कर्ज भी लेते रहे। भारत भी इस भेड़ चाल में शामिल रहा और 1947 से 52 तक दोनो संस्थाओं में इसने अरबों डॉलर सहयोग राशि जमा की। 1952 में ही पंचवर्षी योजना के कार्यान्वयन के लिए भारत को कर्जे की आवश्यकता पड़ी। अरबों रुपये अंशदान के रूप में डकार चुके इन दोनो संस्थाओं ने भारत को कर्ज देने के एवज में रुपये के अवमूल्यन करने की शर्त रखी। भारत ने अपने रुपये की कीमत जो उस समय अमेरिका के डॉलर के बराबर हुआ करता था उसे गिरा दिया। फिर लगभग सभी पंचवर्षीय योजनाओं के समय भारत ने कर्ज लिया और शर्त स्वरूप रुपये की कीमत कम की।
ग्लोबलाइजेशन, लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन जैसे शब्दों का असर दुनिया के लगभग सभी देशों में देखने को मिला। 1986 में सोवियत रुस में भी यह चला था। लैटिन अमेरिका के कई देशों में यह 1970 के आस-पास चला था। वास्तव में ये शब्द वर्ल्ड बैंक और आइ.एम.एफ द्वारा निकाले गये है। भारत में 1991 का उदारीकरण और वैश्विकरण के लिए मनमोहन से अच्छा सारथी कौन हो सकता था। कुछ समय पहले एक कांग्रेसी नेता से मेरी मुलाकात हुई तो उनका कहना था कि ”कांग्रेस में मनमोहन जितना योग्य व्यक्ति कोई नहीं”। और इस योजना को यहां लाने के लिए हमारी सरकारों द्वारा कहा गया कि इससे निर्यात में बढ़त, रोजगार सृजन, तकनीकी का आगमन और विदेशी पूंजी की बढ़त होगी। जबकि अगर आप आंकड़े उठा ले तो ठीक इसके उलट हुआ है।
आप सभी को पता होगा की बकरे की बली देते समय उसे अक्षत और मिठाई दी जाती है और जैसे ही वह उसे खाने में तल्लीन होता है उसकी बली चढ़ा दी जाती है। और कुछ इसी प्रकार से भारत के साथ होता आया है और हो रहा है। 1991 तक फिर भी गनीमत थी। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय विद्वान अर्थशास्त्री मनमोहन की दूरदर्शिता में 1991 में वैश्विकरण भारत में आयी जोकि इन दोनों संस्थाओं की शर्तों पर था। राजीव दीक्षित के अनुसार भारत में 91 के बाद ग्लोबल हो गया। ग्लोबल इसलिए हो गया क्योकि इसने अपने मुद्रा का अवमूल्यन किया। मनमोहन सिंह आये और कहां कि भारत के लिए जरूरी है कि इसके रुपये का अवमूल्यन किया जाये। 2 जुलाई 91 को मनमोहन ने कहा कि मै 12 से 13 फीसदी से ज्यादा अवमूल्यन नहीं करूंगा। फिर 3 जुलाई को स्टेटमेन्ट आता है कि इससे ज्यादा नहीं होने वाला और 4 जुलाई को पता चला कि लगभग 23 प्रतिशत अवमूल्यन हो गया। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनो मिलाकर देखा जाये तो लगभग 30-35 प्रतिशत अवमूल्य हुआ। फिर इन दोनों संस्थाओं का मानना था कि भारत अभी पूरा ग्लोबल नहीं हुआ है और पूरा ग्लोबल होने के लिए इसे इम्पोर्ट ड्यूटी हटाना होगा। फिर मनमोहन ने वह भी कर दिया। फिर इन दोनों संस्थाओं के आज्ञानुसार हमारे स्टॉक एक्सचेन्ज के दरवाजे भी फॉरेन इन्वेस्टमेन्ट के लिये खोल दिये गये। और जबसे फॉरेन इन्वेस्ट की यहां बाढ़ आयी है तबसे हमारा स्टॉक मार्केट भी हमारे घरेलू बाजार की तरह विदेशियों के कब्जें में पहुंच गया है। चारो तरफ विदेशी शराब, विदेशी बैंक, विदेशी ठंडा, विदेशी मॉल से लेकर विदेशी ही विदेशी यहां नजर आ रहा है। एक बार राजीव गांधी ने अमेरिका से सुपर कम्प्यूटर मांगी फिर वहां से निराशा मिलने पर रूस से मांगी और दोनों देशों से निराशा ही हाथ लगी। फिर क्या था भारत के सीडैक से परम 10000 तैयार किया। तो अमेरिका और अन्य कोई देश हमें लीख पर भी तकनीकी नहीं देने वालें वे सिर्फ यहां की बहुमूल्य प्राकृतिक सम्पदा, जमीने, खाद्यान्नें और बाजार लूटना चाहते है।
अंकटाड के 1995-96 के रिपोर्ट अनुसार 120 गरीब देशों में अमीर देशों का 500 बिलियन डॉलर (कर्जा, विदेशी पूंजी और विदेशी सहायता) के रूप में आया और गरीब देशों से अमीर देशों में 725 बिलियन डॉलर चला गया तब स्वतः स्पष्ट है कि पूंजी किधर से आती है और किधर जाती है। 1986-89 में मनमोहन साउथ सेन्टर के कमीशन के महासचिव थे तो इन्होंने एक केस स्टडीज किया था जिसमें इसी बीच 17 गरीब देशों और अमीर देशों के बीच पूंजी आने और जाने के आंकड़े प्रस्तुत किये थे और इस रिपोर्ट में कहा गया था कि अमीर देशों से गरीब देशों में 216 बिलियन डॉलर आया और 345 बिलियन डॉलर गरीब देशों से अमीर देशों में चला गया।
2013 आते आते हमारा विदेशी कर्जा तीन गुणा ज्यादा हो चुका है। हमारी मुद्रा की कीमत एक डॉलर के मुकाबले 60 रुपये से ज्यादा हो चुकी है। रुपये की कीमत कम होने के दुष्परिणाम यह हुआ की अगर हम 1952 में कोई निर्यात करते तो 100 रुपयें के निर्यात पर हमें 100 डॉलर का विदेशी मुद्रा प्राप्त होता और आज अगर वहीं निर्यात हम करें तो हमें 1.7 डॉलर के आसपास आयेगा। अंग्रेजों, फ्रांसिसियों, डचों, स्पेन आदि द्वारा सैकड़ों 400 वर्षों तक लूट चुकने के बाद भी जो शर्मनाक स्थिति भारत को नहीं देखनी पड़ी थी वैसी स्थिति आज देखनी पड़ रही है। हमारे नेता आज भी उस युरोप में अपनी समृद्धि निहार रहे हैं जिसने इस देश को लूटा, कूचला और अधमरा करके 15 अगस्त 1947 को इसे छोड़ा। कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत इस दुष्चक्र से तभी निकल सकता है जब वह इतना अधिक ताकतवर हो जाये की वैश्विक संस्थायें उसपर ऐसी शर्तें थोपने की जरूरत न कर पायें। और इसी परिप्रेक्ष्य में अमेरिका और चंद वैश्विक ताकतें यह कतई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं कि अन्य कोई देश इतना ताकतवर हो जाये की उनका और उनके द्वारा पैदा किये गये संस्थाओं और उनकी शर्तों का विरोध कर सके। ईराक, रुस, अफगानिस्तान आदि देशों की स्थिति इसी नीति का हिस्सा है। भारत और पाकिस्तान जैसे परमाणु शक्ति सम्पन्न देश चन्द ताकतवर देशों के लिए सिरदर्द बने हुये है। और अमेरिका सरीखे लोग भारत और पाकिस्तान जैसे देशों को एनपीटी पर साइन करवाने के फिराक में ताकी इनके आण्विक हथियार नष्ट करवायें जा सके ताकि भविष्य अगर ये हमारी नीतियों को समझ भी जायें तो हमसे युद्ध करने की स्थिति में रहें। वर्ल्ड बैंक सरीखे संस्थायें कर्जतले दबे विश्व के अनेकों देशों से प्राकृतिक सम्पदा, कच्चा माल आदि कौड़ियों के दामों प्राप्त करते आ रहे और फिर अपना धंधा और उन्हीं मालों को तीसरी दुनियां के देशों में खपा रहे है। और इसी परिप्रेक्ष्य में अमेरिका, ब्रिटेन, जापान सरीखे देश कतई नहीं चाहते की ये तीसरी दुनिया के देश ताकतवर हो।
क्या भारत अपने अतीत को भूल चुका है? क्या विदेशी कंपनीयों के 400 सालों के लूट को भूल गया है? हां शायद! अगर नहीं भूला होता तो वर्तमान वैश्विक कर्जे, बेरोजगारी, भूखमरी, भ्रष्टाचार की स्थिति जो यहां व्याप्त है वह न होती। आई.एम.एफ और वर्ल्ड बैंक की शर्तों में पड़कर भारत अबतक बहुत कुछ लूटा चुका है। और यह लूट ब्रिटेन, स्पेन, डच, पुर्तगाल और फ्रांसिसियों द्वारा 400 वर्षों की लूट से भी ज्यादा है। क्यांेकि उनकी लूट के बाद हम कर्ज में नहीं थे। 1952 तक तो कतई नहीं। और लेकिन आजादी पश्चात् और खासकर के 91 तक। आज हम अपने अर्थ को अनर्थ कर चुके है और इसे लूटा चुके है। और इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार वो लोग है जिनके कंधों पर यह देश सवार रहा। हमने इम्पोर्ट ड्यूटी कम की और अपने घरेलू उद्योगों की बली चढ़ा दी। एक तरफ अमेरिका जैसे देश अपने घरेलू बाजार की सुरक्षा हेतु Buy America Act ला रहे हैं तथा अपनी भाषा, अपने ब्रेन को ब्रेन ड्रेन की कठोर पॉलीसी बनाकर अपने यहां रोक रहे है तो दूसरी तरफ हम हमारे ब्रेन, अपनी भाषा निलाम करने में लगे है। दूसरों की भाषा और दूसरों के समान प्रयोग कर आखिर हम ही तो गौरवान्वित भी होते रहे हैं। तो इसके दुष्परिणाम भी तो हमकों भुगतना होगा। हम कब समझेंगे की जिस यूरोप में 1950 महिलाओं को बैंक में खाता खोलने पर रोक थी, उन्हें वोट देने का अधिकार भी नहीं था, और यूरोप के सबसे बड़े दार्शनिकों जैसे प्लेटों, डेकार्टे, अरस्तु आदियों का मानना था कि औरतों में आत्मा नहीं होती और वे मेज और कुर्सी के समान होती है। तो हम ऐसे यूरोप वालों के पीछे आज भी भाग रहे है।
मुर्ख तो गड्ढे में गिरते है लेकिन विद्वान गड्ढ़े का निर्माण कर उसमें गिरते हैं और चारण भाट अपने आकाओं के इशारे पर गड्ढे में गिरते है। हमारे देश के विद्वानों का भी यही हाल है। 1952 से 1991 तक इनको सोचना चाहिये था अगर कोई विदेशी कंपनी उसके समान, भाषा और उसकी नीति अगर उनके द्वारा भारत को दी जा रही है तो अवश्य ही उसमें उनके निहितार्थ होंगे। लेकिन हमें धिक्कार है कि जिस 1947 तक हम आजादी आजादी चिल्ला रहे थे वहीं आज हम कर्जा कर्जा चिल्ला रहे है।

4 thoughts on “मौन पीएम, विदेशी कर्ज और रुपयें की गिरती कीमत

  1. ऐसे मैं इसके बारे में कुछ कहूँ तो यह शायद वह प्रसंग के बाहर लगे,पर मैं अपने अनुभव से यह कह सकता हूँ की भारत न तोपूंजीवादी व्यवस्था में पनप सकता है और न उस व्यवस्था में जो१९९१ के पहले था. भारत का उत्कर्ष तभी संभव है,यदि हम सता के साथ साथ आर्थिक विकेंद्रीकरण की ओर लौटे. न महात्मा गाँधी ग़लत थे और न पंडित दीन दयाल उपाध्याय. ग़लत उन दोनो के अनुयायी निकले. अगर आज भी हम गावों की ओर लौटते हैं और सत्ता और अर्थ का केंद्र उसकों बनाते हैं,तो शायद स्थिति में सुधार आना आरम्भ हो जाए. प्रश्न यह है कि यह होगा कैसे? पहले इस विचार धारा को मान्यता दीजिए. फिर वह भी हो जाएगा.

    1. जी सर,

      बिकुल सही कहा आपने … आपसे पूरी तरह सहमत हूँ… हमें गांवों को सुदृढ़ बनाना होगा… तभी गरीबी हटेगी, आर्थिक एटीएम निर्भरता बढ़ेगी… अभी हमारी आर्थिक स्थिति एक सांप की बाम्बी जैसी है.. जो जाने कब ढह जाये…क्योंकि सब कुछ विदेशी ताकतों द्व्रारा संचालित हो रहा है…

    2. जी सर,

      बिकुल सही कहा आपने … आपसे पूरी तरह सहमत हूँ… हमें गांवों को सुदृढ़ बनाना होगा… तभी गरीबी हटेगी, आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ेगी… अभी हमारी आर्थिक स्थिति एक सांप की बाम्बी जैसी है.. जो जाने कब ढह जाये…क्योंकि सब कुछ विदेशी ताकतों द्व्रारा संचालित हो रहा है…

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