लेखक परिचय

रामदास सोनी

रामदास सोनी

रामदास सोनी पत्रकारिता में रूचि रखते है और आरएसएस से जुडे है और वर्तमान में भारतीय किसान संघ में कार्य कर रहे है।

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 रामदास सोनी

दूसरे काले पन्ने को भारत का काला पन्ना कहा जाये या विश्व का ही एक काला पन्ना माना जायेए इसे भविष्य तय करेगा। क्योंकि इस पन्ने में कालापन और दर्द की कसक इतनी ज्यादा है कि यह विश्व की अन्य किसी भी घटना में दिखाई नहीं देती। कल्पना करे कि हमारे शहर या प्रान्त को धर्म के आधार पर बांट दिया जाये तो क्या होगा। अपना पैतृक घर, कीमती सामान वहीं छोड़, सालों की बसाई गृहस्थी उजाड़कर शहर अथवा प्रदेश के दूसरे कोने में चले जाने को मजबूर कर दिया जाए तो ….। कुछ घंटों में घर से भागने को कहा जाये! वह भी ऐसी सड़कों और मोहल्लो से जो भीषण दंगो की चपेट में हो! यह सब इसलिए किया जाये क्योंकि जिस हिन्दु धर्म को हम मानते है उसके लोग दूसरे क्षेत्र में रहते है और यह इलाका मुसलमानों का है। रास्ते में लोग आपकी पत्नी, बच्चे, भाई-बंधु की हत्या कर दे, लूटपाट करे तो आपको कैसा लगेगा!
1947 में भारत के एक हिस्से को धर्म के आधार पर अलग कर, शेष हिस्से में उसी आधार को अस्वीकार करने का जो दो मुंहेपन और दोहरे मापदण्डों वाला तथा राष्ट्र के साथ क्रूर मजाक करने वाला आचरण रूपी अपराध कांग्रेस ने किया है, वह अकेला अपने आप में इतना बड़ा पाप है कि उसके लिए सारे कांग्रेसी सौ पीढ़ियों तक आजीवन प्रायश्चित करें तो भी कम है। विश्व के किसी भी सुसभ्य समाज में इस अपराध के लिए कम से कम नहीं सजा होगी जो कोई सभ्य समाज एक अपराधी को ज्यादा से ज्यादा सजा दे सकता है। संसार में साम्प्रदायिकता का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि देश का हिस्सा धर्म के आधार पर अलग कर दिया जाये। सत्ता प्राप्त करने की जल्दी में लाखों देशवासियों को असमय ही मौत के हवाले कर दिया गया। चोरी और सीनाजोरी तो तब है जब अपने इस अपराध पर विभाजन करने वाले कांग्रेसियों को किसी प्रकार का अफसोस तक ना हो!
आज पाकिस्तान व बांग्लोदेश में जितने मुसलमान निवास करते है उससे कही अधिक भारत में है। धर्म के आधार पर बना हुआ पाकिस्तान अतिमहत्वाकांक्षी राजनेताओं की असफल योजनाओ का वह बदसूरत स्मारक है जिसके नीचे प्रेम नहीं घृणा दफन है। पाकिस्तान जिस सिद्धांत पर बना वह सिद्धांत आज पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। यह प्रमाणित हो चुका है कि समकालीन समय में जिन्होने देश को धर्म के आधार पर बांटने की योजना बनाई, जिन्होने उसमें सहमति दी और जो मौन रहे वे सब इस देश और मानव जाति की नजरों में उन हत्याओं और बलात्कारों के लिए नैतिक रूप से जिम्मेवार है, जो विभाजन के समय हुए थे।लार्ड वावेल ने भारत के सम्बंध में एक बहुत अच्छी बात कही थी, उसने कहा था,
गॉड हेज क्रिएटेड दिस कन्ट्री वन, एंड यू केन नॉट डिवाइड इट इन टू ।जो बात ब्रिटेन में पैदा होने वाले राजनेता को समझ में आई वह भारत में जन्में जवाहरलाल नेहरू की समझ में नहीं आई। वास्तव में दोनो नेताओं में अंतर बहुत थोड़ा भी है और बहुत ज्यादा भी। वावेल ब्रिटेन में खड़े होकर भारत को देख रहे थे और नेहरू भारत में खड़े होकर ब्रिटेन को। एक कहावत है-
आप वहां देखिए जहां आपको जाना है अन्यथा आप वहां चले जायेगे, जहां आप देख रहे है।
पाकिस्तान कैसे बना! इस प्रक्रिया को समझने के लिए नेहरू के विचारों में होते बदलाव को गहराई से समझना आवश्यक है। भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने के पांच साल पूर्व नेहरू से पूछा गया जिन्ना पाकिस्तान की मांग कर रहे है आपका क्या विचार है! नेहरू ने तमतमाते हुए जबाब दिया ”नथिंग इट इज फेंटास्टिक नोनसेन्स!”
देश का संचालन करने की चाह रखने वाले की बोली गई बातो को तार-तार करके पढ़ना चाहिए। समाज उन्हे जो साधन, सुख-सुविधाएं प्रदान करता है वे इसलिए होती है कि वे बेहतर काम कर सके, न कि आमोद प्रमोद करते हुए मदमस्त घूमने के लिए। इन्ही नेहरू की उपस्थिति में भारत का विभाजन हुआ। उनके सामने हुआ, उनकी सहमति से हुआ। देश का उन्होने अपने हाथो से बांटा। समय बीता 1950 में फिर एक पत्रकार ने नेहरू से पूछा पाकिस्तान के सम्बंध में आपके क्या विचार है! नेहरू बोले ”नाऊ इट इज ए सेटल्ड फैक्टस!!” एक राजेनता जो यह ना देख पाया कि देश विभाजन की ओर बढ़ रहा है। देश का प्रधानमंत्री बनने की चाह रखने वाला यह गणित ना लगा सका कि देश बंट रहा है, कटने जा रहा है। सत्ता की वासना ऐसी अनियंत्रित छटपटाहट में बदल जाये कि हमें मरते व कटते हुए हिन्दु-मुस्लिम ना दिखे। सत्ता प्राप्ति की ऐसी भी क्या लालसा कि उसके लिए मानव जाति को इतनी भारी कीमत चुकानी पड़े। क्या फर्क पड़ जाता अगर देश को आजादी 6 महीने पहले मिलती या बाद में। अंग्रेजों को तो जाना ही था, उन्होने अपना सामान बांध ही लिया था। वह छटपटाहट माउंटबैटन या एडविना की नजरों से नहीं बच पाई थी। उस रंगमंच के सभी पात्रों के अपने-अपने सपने थे। सभी के अपने गंतव्य थे। वे सब मिलकर भारत को बांट रहे थे और भारत की भोली-भाली जनता उनके षड्यंत्रों को समझ नहीं पाई। सच तो यह है कि कांग्रेस के डीएनए में सत्ता के प्रति लोलुपता साफ दिखाई देती है। आजादी के बाद सत्ता-प्राप्ति की इस वासना ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया कि उसने करीब-करीब देश की राजनीति का ही कांग्रेसीकरण कर डाला। कपड़े पहनने से लगातार उठने-बैठने तक, बातचीत करने की शैली से लगाकर कार्य करने की पद्धति तक। सबमें समानता आ गई। बहुताय जिले के नेता प्रान्तों की राजधानियों को पत्र-पुष्प् भेन्ट करते है और प्रान्त के लोग चुनाव फंड के नाम पर राष्ट्रीय नेताओं को पैसा देते है। देते समय कहते है चुनाव के लिए है सर! सर लीजिए, लेकिन होती है वह व्यक्तिगत भेन्ट। नेहरू को शरणम गच्छामि लोग पंसद थे। कांग्रेस की संस्कृति में सबसे बड़ा नेता कहता है- तुम बने रहो, संवैधानिक पदों को भोगते रहो, बस हमारी कृपा के पात्र बने रहना। मैं जो चाहूं वही करो, नियुक्ति हो या निष्कासन, निर्णय हम करेगे, क्रियान्वयन तुम करना। मेरी हां में हां रही तो तुम राजपथ पर चलते रहोगे अन्यथा वनवास के लिए तैयार रहो। उन्हे स्वाभिमान से खड़े नेताजी सुभाषचन्द्र बोस अच्छे नहीं लगते। फिर चाहे अपना स्वतंत्र मत व्यक्त करते श्यामा प्रसाद मुखर्जी हो या चन्द्रशेखर आजाद। अगर आपने अपनी आवाज उठाई तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा। बगैर रीढ़ के और सत्ता के लिए कुछ भी करेगें का भाव रखने वाले लोग देश के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कभी भी बैठ जाते है। ऐसे लोगो के नेतृत्व में देश घिसट-घिसट कर रेंग तो सकता है लेकिन संभलकर चल नहीं सकता। आजादी के आंदोलन के समय सुभाष बाबू का देश से बलात निष्कासन और सरदार पटेल को नेपथ्य में धकेलने की जो कूटनीतिक चाले चली गई, उसका परिणाम आज देश भुगत रहा है। सत्ता के लिए कांग्रेसियों के जब प्राण निकल रहे थे जब अंग्रेजों ने कांग्रेस नेतृत्व से पूछा था कि हम देश को आजाद करने जा रहे है, लेकिन पहले काटेगे फिर बांटेगे और फिर तुम्हे सौंपेगे! बोलो तैयार हो!! और दुर्भाग्य है कि कांग्रेस के नेता देश को बांटने के लिए तैयार हो गए। सच तो यह है कि हमने आजादी अंग्रेजों की इच्छा से नहीं, बल्कि अपने बाहुबल से प्राप्त की थी। वे हमें आजाद करके नहीं गए भारतीयों ने उन्हे भगाया। यह बात सड़क पर चलते आम नागरिक की समझ में आ रही थी लेकिन नेहरू की समझ में नहीं आई। उन्हे लगता था कि मांउटबैटन का मूड खराब हो गया तो शायद आजादी दूर चली जायेगी। नेहरू को कौन समझाता कि बंबई बंदरगाह में हुए विस्फोट आजादी के आने का शंखनाद था, न कि माउंटबैटन और एडविना का मायारूपी मकड़जाल।
सैफोलोजिस्ट से प्रभावित आज की राजनीति में उस समय के कुछ चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण करे तो परिणाम बड़े रोचक मिलते है। आज जो पाकिस्तान और बांग्लादेश है वहां 1946 में प्रतिनिधि सभाओं के चुनावों में मुस्लिम लीग हार गई और जो वर्तमान भारत है उसमें मुस्लिम लीग जीत गई। अर्थात वह मुस्लिम लीग जो पाकिस्तान की मांग कर रही थी वह पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में जनता द्वारा अस्वीकार कर दी गई। बलूच, सिंध, पंजाब और बंगाल के मुसलिमों ने मुस्लिम लीग को ठुकरा कर अपना वोट कांग्रेस को दिया था। बलूच प्रान्त के गांधी, खान अब्दुल गफ््फार खान ने जीते जी कभी पाकिस्तान में वोट नहीं डाला। जब तक जीवित रहे हर चुनाव में दिल्ली आते और भारत में वोट डालते थे। उन्होने दिल्ली में अपना आवास सदा बनाए रखा। वे कहते थे, मैं पाकिस्तान के वजूद को अस्वीकार करता हूं। जब तक जिंदा हूं। भारत का हूं और भारत का रहूंगा।
कांग्रेस मुसलमानों से बातचीत के लिए मुस्लिम समाज से गलत प्रतिनिधियों का चुनाव करती रही। अब्दुल गफ्फार खान जैसे देशभक्त को छोड़कर वह जिन्ना को सर पर बिठाए घूमती रही। जिन्ना को ही मुसलमानों का एकमात्र नेता मानती रही। कांग्रेस के नेता जिन्ना से बार-बार कहते रहे – ”जिन्ना मेरे भाई मान जाओं, हम तुमसे प्रार्थना करते है, मान जाओं!” दूसरी ओर जिन्ना उनकी हर मांग को अपनी सिग्रेट के धुंए में उन्ही में मुंह पर उड़ाता रहा। यह कौनसी कूटनीति थी और कैसी राजनीति! तब भी समझ से परे थी और आज भी। भारत को धर्म के आधार पर बांटना भारत की गत शताब्दी का दूसरा काला पन्ना है। इस काले पन्ने के लेखक, नायक और महानायक जवाहरलाल नेहरू और केवल नेहरू है।

5 Responses to “बीसवीं सदी में भारतीय इतिहास के छः काले पन्ने (भाग 3)”

  1. Satyarthi

    “..प्रज्ञा सिंह,असीमानंद जैसे दुर्दांत आतंकवादी पैदा किये जा रहे हैं..” !!! बुद्धि और सत्य और विवेक पर अनुपम पकड़ . निरंकुश जी ने अपने नाम को सार्थक कर दिया . शायद स्वयं को दिग्गी राजा का स्थान ग्रहण करने योग्य सिद्ध करने को आतुर हैं . पता नहीं कितना समय लगे . मणि शंकर ऐयेर बता ही चुके हैं सेवा करो प्रतीक्षा करो . समय आने पर मेवा मिल जायेगा

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  2. sunil patel

    भारत का विभाजन भारतीय इतिहास की भयंकरतम भूल में से एक थी जो सत्ता के लालच में राखी गई थी. युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से लाखो लोग मरते है किन्तु किसी के सत्ता सुख के लिए आजाद देश के विभाजन से लाखो लोग घर बार छोड़कर भागे और मारे जाय – लानत है ऐसे राजनेताओ पर.

    यह घटना हुई है. इतिहास के कागज मिट सकते है, इतिहास नहीं मिटता है, चाहे कोई कांग्रेसी कहे या कोई भाजपाई इससे सच्चाई में तो फर्क नहीं पड़ता है, सत्य तो सत्य रहता है.
    श्री सोनी जी के अगले लेख के इन्तजार में.

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  3. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    सोनी जी इस उत्तम, तथ्य परक लेख हेतु बधाई व अभिनन्दन.

    – इतिहास के तथ्य उपलब्ध हैं की एडविना बैटन की वासना के जाल में फंस कर नेहरू ने अकेले, बिना किसी से चर्चा किये विभाजन का निर्णय लिया था और माउन्ट बैटन को भारत विभाजन का स्वीकृति पत्र सौंप दिया था. प्रधानमन्त्री एटली तक हैरान हो गया था की यह कैसे हो गया. चर्चिल को विश्वास नहीं आया था की ऐसा हो सकता है. पर जब माउन्ट बैटन ने नेहरू का लिखा पत्र उन्हें दिखाया तो विश्वास आना ही था. इतने बड़े मूर्खतापूर्ण देशद्रोह की आशा वे नेहरू से नहीं करते थे.
    – गांधी जी भारतीय संस्कृति पर अगाध आस्था रखने वाले एक इमानदार देशभक्त थे. पर कुछ भूलें भी उनसे हुईं जिनके घातक परिणाम देश को भुगतने पड़े. उनकी अतिवादी अहिंसा देश के लिए हितकर न रही. मुस्लिम समाज के प्रति अतिवादी सहिष्णुता का व्यवहार भी देश के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ. ….पर इन कुछ बातों के इलावा गांधी कितने महान थे , इसका पता उनकी सारे संसार में हुई प्रसिद्धि व सम्मान से चल जता है.
    ” हिंद स्वराज” नामक उनकी एक ऐसी अमर कृति है जिसकी प्रशंसा विश्व के अनेक विद्वानों ने की है. दलाई लामा और रिम्पोचे ने भी इस पुस्तक को अपने लिए मार्ग दर्शन करने वाला एक लघु पर महान ग्रन्थ बतलाया है. गांधी जैसे ऊंचे साधक, देशभक्त और विचारक को बदनाम करने के पीछे वे ईसाई और उनकी साथी व्यापारी ताकतें हैं जो भारत को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट देना चाहती हैं. और चाहती हैं भारत पर अपना पूरा कब्ज़ा. गांधी जी का हरिजन कल्याण व सम्मान का काम इन भारत विरोधियों के रास्ते का काँटा है. ” हिंद स्वराज ” में वर्णित भारतीय दर्शन पर आधारित वैकल्पिक शासन , समाज व आर्थिक व्यवस्था इन कुटिल शक्तियों के लिए मृत्यु दूत के सामान हैं. गांधी जी द्वारा गो रक्षा का समर्थन और ईसाई धर्मांतरण का प्रखर विरोध भी वर्तमान भारत के लिए प्रेरणा स्रोत न बन जाए ; ये खतरा इन ईसाई ताकतों को है. इसी लिए एन- केन प्रकारेण गांधी जी को बदनाम करने के उग्र प्रयास पिछले कुछ वर्षों से प्रायोजित हो रहे हैं. अमेरिका-यूरोप की अमानवीय व्यापारी और ईसाई शक्तियों की जुंडली के लिए जीवित गांधी से कई गुना अधिक खतरनाक मृत गांधी सिद्ध हो रहे हैं. कुल मिला कर स्थिति यह है कि इन्हें भारत के सामने सभी विकल्प समाप्त करने हैं और पूरी तरह इस उपरोक्त ( अमानवीय ) जुंडली का शिकार बनने को विवश कर देना है. इसी लिए ये गांधी जी का उग्र और अत्यंत अनैतिक विरोध चल रहा है कि कहीं गांधी जी की बतलाई व्यवस्थाओं व विचारों की और हम भारतीय आकर्षित न हो जाएँ. यदि ऐसा हो गया तो भारत तो अपने पाँव पर खडा हो जाएगा और इन दुष्ट ताकतों को भारत से बाहर निकाल देगा. एक विशाल बाज़ार इनसे छिन जाएगा. यह है असलियत गांधी विरोध की…. एक प्रकार से ये शुभ भी है, गांधी अधिक प्रासंगिक, अधिक चर्चित हो गए हैं. गांधी को ठीक से जानने- समझने का प्रयास वे भी करने लगे हैं जिन्होंने कभी गांधी की परवाह नहीं की थी. अतः इन पश्चिमी ताकतों को ये गांधी जी के चरित्र हनन का कुटिल प्रयास काफी महँगा पडेगा,
    ऐसा लग रहा है.
    – भारत को टुकड़ों में बांटने व विद्वेष की आग लगाने वाले एक झूठ की जड़ काट देने का उचित समय अब आ गया है. दलित, पिछड़ों के शोषण का जो झूठ फैलाया जा रहा है, उसकी पोल खोलनी होगी. स्वर्गीय धर्मपाल जी द्वारा ३० वर्ष तक ब्रिटिश पुस्तकालयों में बैठ कर किये अध्ययन से अविश्वसनीय व कमाल के तथ्य सामने आये है जिन्हें उन्हों ने १० खडों में प्रकाशित किया है. अंग्रेजों द्वारा किये सर्वेक्षणों व रपटों के अनुसार भारत में अनेक जातियां तो थीं पर किसी के साथ कोई भी अस्पृश्यता, छुआ -छूत, अपमान का व्यवहार नहीं होता था. ” द ब्यूटीफुल ट्री ” नामक पुस्तक के अनुसार द्विज, अन्त्यज, चांडाल व मुस्लिम छात्र, शिक्षक बिना किसी भेदभाव के साथ रहते-पढ़ते, पढ़ाते थे. १८३८ तक के सर्वेक्षणों के अनुसार भारत की यही स्थिति थी. … स्पष्ट है की कुटिल अँगरेज़ ईसाईयों और उनके यूरोपीय सहयोगियों के कुप्रयासों के बाद ही देश में ये जातिवाद की आग सुलगाई गयी जिसमें ये धर्म निरपेक्ष व गुप्त ईसाई ताकतें और विष घोल रही हैं. हमारे डा. मीना जी के हर लेख में समाज को तोड़ने, विद्वेष की आग भडकाने की वही यूरोपीय ईसाईयों वाली बदनीयती साफ़ झलक जाती है. आर.एस.एस. जैसे देशभक्त संगठनों के प्रति उनका पूर्वाग्रह व शत्रु भाव साफ नज़र आ जाता है. देशद्रोह की सारी हदें तोड़ रही वर्तमान कांग्रेस के एजेंट होने की अपनी पहचान वे शायद छुपाना भी नहीं चाहते.
    भाजपा के भ्रष्ट होने के गीत तो वे कई बार गा चुके हैं पर भाजपा से कई गुना अधिक भ्रष्टाचारी ही नहीं, भारत के हितों का सौदा विदेशी शक्तियों के साथ करने जैसा देशद्रोह कर रही कांग्रेस के बारे में मीना जी मौन साधे रहते है. .. अब तो यह तक सामने आ गया है की कांग्रेस के सर्वोच्च शिखर पर बैठे लोगों द्वारा भारत की पुरातत्व सामग्री की तस्करी की जाती रही है और इनके विदेशी खातों में देश का चुराया हज़ारों करोड़ रुपया जमा है. इन सब भयावह तथ्यों पर कहने लिखने की इमानदारी डा. पुरुशुत्तम मीना जी ने कभी नहीं दिखाई. डा. मीना जी जैसे महानुभावों की कथनी करनी को हम ठीक से समझते रहें और उनकी और उनके आकाओं की किसी चाल का शिकार न बने, यह ज़रूरी है.
    – अंत में इतना निवेदन और करना है की भारत के भोले-भाले ईसाईयों का भारत के विरुद्ध दुरूपयोग विदेशी चर्च बड़ी चतुराई से कर रहे हैं. अफ्रिका, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका की तरह स्थानीय निवासियों की संस्कृति को नष्ट कर रहे है, उनका शोषण कर रहे हैं. नेहरू जी द्वारा स्थापित नियोगी कमीशन रिपोर्ट में ये सारे तथ्य सामने आये हैं. ”पुअर क्रिश्चन मूवमेंट” जैसे देशभक्त ईसाई सगठन इन बातों को समझकर विदेशी चर्चों के इशारे पर चलना बंद कर चुके है. आवश्यकता है की इन विदेशी चर्चों की भारत- तोड़क चतुर चालों को और उनके हस्तकों को , भारत के भोले ईसाई, दलित और सभी देश भक्त समझें व इनसे बच कर रहने के इलावा ऐसे देश के दुश्मनों को उचित जवाब भी दें.

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  4. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय रामदास सोनी जी, प्रस्तुत आलेख के लिए आपका बहुत बहुत आभार…
    जिस सच्चाई को यह कांग्रेस ६४ वर्षों से छिपाए रखना चाहती है, उसे आपने उधेड़ कर रख दिया|
    नेताजी सुभाष बाबू को कांग्रेस से निष्काषित करना, नेताजी का रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो जाना, सत्ता के लालच में नेहरु के द्वारा पाकिस्तान को अस्तित्व में लाना, सच में बेहद शर्मनाक है|

    आदरणीय रामदास सोनी जी, जहाँ तक मैं देख सका हूँ, यहाँ केवल दो काले पन्नों के विषय में ही लिखा गया है| क्या लेख का शेष भाग अभी बाकी है? यदि है तो उसकी प्रतीक्षा रहेगी|

    बहुत बहुत धन्यवाद|

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  5. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    आदरणीय श्री रामदास सोनी जी,
    आपने तीन श्रृंखलाओं में परिश्रम करके अपने विचार लिखकर प्रवक्ता के माध्यम से प्रस्तुत किये हैं| पहली किस्त पढने पर शुरू में लगा कि आपका वास्तव में ही देशहित में लिखना लक्ष्य रहा है, लेकिन थोड़ा आगे पढने के बाद ही आपके लिखने का असली मकसद साफ हो गया| इसके उपरान्त भी मैंने पूर्णतन्मयता से आपकी तीनों किस्तों को पढा और तदोपरान्त अपने विचार लिख रहा हूँ| आशा करता हूँ कि आप और आपके समर्थक सहयोगी इस पर संयमपूर्ण विचार रखेंगे न कि गाली-गलोंच की भाषा का इस्तेमाल करेंगे|

    अमर स्वतन्त्रता सेनानी और परमादरणीय सुभाषचन्द्र बोस जी के साथ जो कुछ हुआ वह निसन्देह अन्यायपूर्ण था और आज हर निष्पक्ष व्यक्ति को इसे निंदनीय मानने में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिये| सुभाष जी के साथ और आपके अनुसार सुभाष जी के अभाव में देश के साथ जो अन्याय हुआ, उसके लिये लिए आपने परोक्ष रूप से गांधी को जिम्मेदार मानकर भी अंतत: नेहरू तथा कॉंग्रेस पर ही हमला किया है|

    मेरा सवाल है कि क्या आपको ये लिखने में कोई प्रतिबन्ध या बन्दिश है कि आपके द्वारा वर्णित सारे हालातों से ज्ञात होता है कि गॉंधी ही सुभाष जी का असली दुश्मन था! गॉंधी सुभाष जी जैसे महान लोगों को अपने नजदीक भी नहीं देखना चाहता था|

    आपको भगतसिंह की फांसी के लिये जिम्मेदार गॉंधी के बारे में यह भी तो कुछ लिखना चाहिये था और यह भी कि ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपिता का दर्जा देना कितना सही या न्यायसंगत है? क्या यह सम्पूर्ण राष्ट्र के साथ सबसे बड़ा छल नहीं है? जिसे कांग्रेस लगातार भुनाती चला आ रही है| भारतीय मुद्रा से लेकर नरेगा तक सर्वत्र गॉंधी का महिमामण्डन, उस गॉंधी का लगातार महिमामण्डन जो सुभाष चन्द्र बोस और भगतसिंह के अवसान के लिये जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है|

    निसन्देह भारत के विभाजन के लिये नेहरू भी जिम्मेदार था, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन जैसा कि आपने भी लिखा है कि गॉंधी की सहमति के बिना तत्कालीन कॉंग्रेस में पत्ता भी नहीं हिलता था तो यह भी तो विचारणीय है कि अकेला नेहरू क्या इतना बड़ा निर्णय ले सकता था? यदि आप इन और ऐसे ही अनेकों सामयिक तथा प्रासंगिक सवालों पर विचार करके नेहरू से पूर्व गॉंधी को जिम्मेदार ठहराते तो निश्‍चय ही आपकी लेखमाला को विश्‍वसनीय श्रेणी में रखा जा सका था, लेकिन कुछ पंक्तियों के बाद ही आपकी भाषा कूट-कूटकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ऐजेण्डे को लागू करने के लिये छटपटाती हुई प्रतीत हो रही है|

    वैसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निष्ठावान व्यक्ति के लिये यह स्वभाविक भी है, लेकिन जब हम लेखकीय धर्म का पालन कर रहे हैं और वर्तमान पीढी को राष्ट्रधर्म जैसी आदर्शवादी बातें बतलाने का बीड़ा उठाते हैं तो निजी विचारधारा को सम्पूर्ण मानकर ही सबकुछ अपने ही आईने से लोगों को दिखायेंगे तो पकड़े जायेंगे| इसमें आपका दोष कम, आपकी संस्कृति का दोष अधिक है|

    भाई सोनी जी आपके लेखन से ऐसा लगता है कि आप आर एस एस के कार्यकर्त्ता हैं सो आपको कांग्रेस और निष्पक्ष धर्मनिरपेक्ष लोगों को येनकेन प्रकारेण कटघरे में खड़े करने का ही संस्कार तो दिया ही गया है| ऐसे में कांग्रेस को कोसने की बात तो ठीक है, ये आप लोगों का प्रकट और यदाकदा अप्रकट उद्देश्य रहा है, जिसे सारा देश ही नहीं, अब तो सम्पूर्ण संसार जानता है| इससे मुझ जैसे दलनिरपेक्ष व्यक्ति को कोई दुःख नहीं होता, लेकिन दुःख इस बात का होता है कि आप दुराशयपूर्वक वर्तमान पीढी को गलत रास्ते पर ले जा रहे हैं| आपने पहली किस्त में लिखा है कि-

    ‘‘हमें यह सीखना होगा कि कोई हमारे साथ गलत करे तब हम उसे सजा अवश्य दें| (ताकि) हमलावर पुनरावृत्ति न करे, इस बात के लिए हमने आवश्यक कदम न उठाए तो यह मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नहीं|’’

    आदरणीय सोनी जी आपकी उक्त पंक्तियों को पढने के बाद मैं लिखने को विवश हूँ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आपकी जुबानी प्रकट हुई आर एस एस की इसी नीति (अमानवीय कुनीति) के तहत ही प्रज्ञा सिंह, असीमानंद आदि जैसे दुर्दान्त आतंकवादी पैदा किये जा रहे हैं? यदि ऐसा ही है, फिर तो आर एस एस के लोगों को प्रज्ञा सिंह, असीमानंद आदि आतंकियों से कन्नी नहीं काटनी चाहिए, बल्कि आर एस एस को इन सबका खुलकर समर्थन करना चाहिए!

    वैसे संघ की इस नीति को गोधरा के बाद गुजरात में देश देख चुका है| जिस पर तत्कालीन प्रधानमन्त्र अटल बिहारी वाजपेयी संसार के समक्ष स्वयं को शर्मसार अनुभव कर रहे थे| लेकिन यही संघ की नीति है| आप लोग तो संघ के अनुयाई हो, आपको तो संघ की इस नीति का न मात्र पालन करना है, बल्कि इस नीति को जस्टीफाई (न्यायसंगत) भी ठहराना है|

    श्री मधुसूदन जी भी इस बारे में एक लेख पर टिप्पणी में लिख चुके हैं कि गोधरा की घटना के बाद गुजरात तो ‘‘क्रिया की प्रतिक्रिया’’ थी, जो स्वभाविक था| श्री मधुसूदन जी के अनुसार इसमें कुछ भी गलत नहीं है| इसी बात को आप भी स्वीकार करके आगे बढा रहे हैं|

    मैं फिर से दौहरा रहा हूँ, आदरणीय श्री सोनी जी आप लिखते हैं कि ‘‘हमें यह सीखना होगा कि कोई हमारे साथ गलत करे तब हम उसे सजा अवश्य दें| (ताकि) हमलावर पुनरावृत्ति न करे|’’ इसलिए यहॉं पर एक सवाल आपके मार्फ़त आपके विचारों के जन्मदाताओं और समर्थकों से पूछा जाना प्रासंगिक है, कि जिन भूदेवों ने सम्पूर्ण स्त्री जाति, सम्पूर्ण दलित, सम्पूर्ण आदिवासियों और सम्पूर्ण पिछड़ों को हजारों साल तक अमानवीय, बल्कि पशुवत जीवन जीने को विवश किया है, क्या आपकी नीति के अनुसार उनके साथ भी आगे आने वाले हजारों सालों तक वैसा ही व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए?

    मुझे नहीं पता कि आपका और आपके आकाओं का उत्तर इस बारे में क्या होगा? आप उत्तर देंगे भी या नहीं? लेकिन मैं विनम्रता से यही कहना चाहॅूंगा कि कोई भी क्रिया पहली क्रिया नहीं होती है| जिसे आप क्रिया मानकर प्रतिक्रिया स्वरूप हमला करके लोगों की जान लेते हैं| हकीकत में वह कथित प्रतिक्रिया भी किसी पूर्ववर्ती क्रिया की प्रतिक्रिया ही रही होती है| जो आदिम युग में तो ठीक मानी जा सकती थी, लेकिन सभ्य समाज में ऐसी बातों का कोई औचित्य नहीं है|

    आदरणीय श्री सोनी जी मैं यह लिखने को भी आपने विवश किया हूँ कि असत्य बोलने से कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता| आप कॉंग्रेस को सबसे बड़ी साम्प्रदायिक पार्टी सिद्ध करके संघ एवं भाजपा को धर्मनिरपेक्ष एवं न्यायप्रिय सिद्ध नहीं कर सकते| मैं यहॉं पर फिर से दौहरा दूँ कि देश के विभाजन के लिये पूरी तरह से कॉंग्रेस और मूलत: मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी जिम्मेदार था और लेकिन उस समय गॉंधी कॉंग्रेस का कम और हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व अधिक कर रहा था| गॉंधी कट्टर हिन्दू था| अपने हिन्दुत्व को बचाने के लिये उनके पास अपने तर्क थे, जिनके बारे में आज तर्क करके हम सौ फीसदी इंसाफ नहीं कर सकते हैं| लेकिन आज के सन्दर्भ में देश में संघ या उसके सहयोगी मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक घोषित करके, स्त्रियों को अधिकार विहीन करके और दलित, आदिवासी तथा पिछड़ों के आरक्षण को समाप्त करके राष्ट्रहित की बात करता है| ऐसे में संघ के लोगों द्वारा कही जाने वाली नैतिकता की बातों पर हंसी आती है| जो मुठ्ठीभर लोग देश के अठ्यानवें फीसदी आबादी के अधिकारों को छीनकर या अठ्यानवें फीसदी आबादी से सरकारी सेवा एवं व्यवस्थापित में प्रतिनिधित्व करने के संवैधानिक अधिकार को छीनकर केवल दो फीसदी लोगों के हितों के लिये काम करते हैं, वे किस परिभाषा में राष्ट्रवादी, उदारवादी और देशभक्त हैं, ये बात कम से कम मुझ जैसे व्यक्ति के लिये समझना असम्भव है|

    आदरणीय श्री सोनी जी इस देश में कभी की कॉंग्रेस समाप्त हो गयी होती और किसी नये निष्पक्ष और सशक्त राजनैतिक दल का उदय तथा प्रतिस्थापन भी हो गया होता, लेकिन ऐसा आरएसएस एवं उसकी विचारधारा के पोषक लोगों के कारण ऐसा नहीं हो सका| जो हिन्दुत्व को मजबूत करने की बात तो करते हैं, लेकिन हकीकत में उनको देश के निम्न हिन्दू तबके के वोट के अलावा, उनसे कोई सरोकार नहीं है! नाटकीय तरीके से अनेक प्रकल्प खोलकर निम्न तबके के उद्धार का नाटक तो खूब किया जाता है, लेकिन संसद में दलित और आदिवासियों का प्रतिनिधित्व तथा सरकारी सेवाओं में दलित, आदिवासियों और पिछड़ों का आरक्षण उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाता है|

    संघ एवं संघ के सहयोगी संगठनों से जुड़े जो लोग खुद को हिन्दुत्व का संरक्षक और पुरौधा कहते हैं, हकीकत में ये लोग खुद ही हिन्दुत्व के सबसे बड़े दुश्मन हैं| जब तक हिन्दुत्व के ऐसे लोग स्वयंभू नायक बने रहेंगे, देश में शासकदल के रूप में कॉंग्रेस ही जिन्दा रहेगी और कॉंग्रेस का विकल्प नहीं बन पायेगा| बनेगा तो बनने के साथ ही बिखर जायेगा| वर्तमान हालातों में तो मैं अन्त में यही कहना चाहूँगा कि देश और देश के समाजवादी, लोकतान्त्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को जिन्दा रखने के लिये कॉंग्रेस की नहीं, बल्कि देश के प्रबुद्ध लोगों को संघ की विचारधार को आहूती देनी होगी|

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