लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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विजय कुमार

शर्मा जी के मौहल्ले में जब एक ही महीने में तीसरी बार चोरी हो गयी, तो लोगों के धैर्य का बांध टूट गया। कोई इसे हाइटैक चोरों की चालाकी बता रहा था, तो कोई पुलिस से मिलीभगत। कुछ इसे मोहल्ले वालों की लापरवाही बताकर मामला रफादफा करना चाहते थे; पर काफी सिरखपाई के बाद सबने निर्णय लिया कि अगले रविवार को थाने का घेराव किया जाए।

घेराव को प्रभावी बनाने के लिए उसमें संख्या अच्छी होनी बहुत आवश्यक है। अतः यह भी निर्णय हुआ कि सब लोग अपने मित्रों और नाते-रिश्तेदारों को भी घेराव में शामिल करने का प्रयास करें।

शर्मा जी ने सुझाव दिया कि यदि कुछ नेताओं को भी बुला लें, तो बात में वजन कुछ बढ़ जाएगा; पर यह सुनकर सब उन पर ही चढ़ बैठे। गुप्ता जी तो यहां तक कह गये कि चोरों की पीठ पर पुलिस का और पुलिस की पीठ पर नेताओं का हाथ न हो, तो चोरियां नहीं हो सकतीं। उन्होंने ‘हाथ’ शब्द जोर से बोला, तो कुछ कांग्रेस समर्थक नाराज हो गये। हाथ के नाम पर हाथापाई की नौबत आती देख इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया।

अगले दिन शर्मा जी सुबह मेरे पास आ धमके।

– वर्मा, तुम्हें रविवार को हमारे साथ थाने के घेराव पर चलना है।

– शर्मा जी, सप्ताह में एक ही दिन तो छुट्टी का मिलता है। इस दिन भी घरेलू काम छोड़कर आपके साथ चल दूं, तो रोटी क्या आप खिलाएंगे ?

शर्मा जी ने मुझे पूरी बात विस्तार से समझाकर कहा – मामला किसी एक का नहीं, पूरे मोहल्ले की सुरक्षा का है। सबके मन में यह बात बैठ गयी है कि हम सुरक्षित नहीं हैं।

– देखिये शर्मा जी, इस बारे में तो आप बिल्कुल चिन्तित न हों। भारत जैसा सुरक्षित देश इस दुनिया में कोई दूसरा नहीं है।

– कैसे ?

– आपने सुना ही होगा कि पिछले दिनों केरल के समुद्र तट पर इटली के एक जहाज के दो सुरक्षाकर्मियों ने दो भारतीय मछुआरों की हत्या कर दी। भारतीय पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। बहुत दिन तक वह जहाज भी तट पर खड़ा रहा; पर अंततः किसी दबाव के चलते उसे छोड़ दिया गया।

कुछ दिन बाद इटली के विदेश मंत्री भारतीय विदेश मंत्री श्री कृष्णा से मिले। उनकी मांग थी कि इन बन्दियों को भी छोड़ दिया जाए, जिससे इन पर इटली में मुकदमा चलाया जा सके।

श्री कृष्णा उन्हें समझा रहे थे – आप उन पर भारत में ही मुकदमा चलने दें। दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां देशी हों या विदेशी, बड़े अपराधी सबसे अधिक सुरक्षित रहते हैं।

– मैं समझा नहीं..।

– बोफोर्स तोप सौदे वाले क्वात्रोची और भोपाल गैस कांड वाले एंडरसन के बारे में तो आपने सुना ही होगा। हमारी सरकार ने उनके साथ कितनी उदारता का व्यवहार किया ?

– हां, कुछ सुना तो है।

– संसद पर हमला करने वाले मोहम्मद अफजल और मुंबई के हत्यारे कसाब की सुरक्षा पर करोड़ों रुपया खर्च हो रहा है। उन्हें प्रतिदिन मुर्ग मुसल्लम और बकरा बिरयानी परोसी जाती है, जिससे वे बेचारे दुबले न हो जाएं। बंगलादेश के करोड़ों मुस्लिम घुसपैठियों को हमने राशन कार्ड और वोट का अधिकार दे दिया है। म्यांमार के रास्ते आये बंगलादेशियों को भी हमने दिल्ली में ही सम्मान सहित रख लिया है। कुछ दिन पूर्व कई विदेशी राजनयिक बिना अनुमति नागालैंड घूम आये। हमने उन्हें भी कुछ नहीं कहा। अपनी आदत के अनुसार विपक्षी लोग संसद में थोड़ा शोर करते हैं, फिर सो जाते हैं।

– अच्छा.. ?

– जी हां। नक्सली हों या माओवादी हत्यारे; या फिर उनके समर्थक और दलाल। हम उनके साथ भी मानवता का व्यवहार करते हैं। उन्हें पुरस्कृत कर शासकीय समितियों में रख लेते हैं। क्या दुनिया में कहीं ऐसा होता है ?

– मैंने तो नहीं सुना।

– जगह-जगह हुए बम विस्फोटों में जो लोग पकड़े जाते हैं, हम उन्हें भी छोड़ रहे हैं। कश्मीर से जो लोग आतंक का प्रशिक्षण लेने सीमा पार गये थे, उन्हें उनकी पाकिस्तानी बीवियों और बच्चों सहित वापस बुला रहे हैं। उन्हें सरकारी नौकरी और पैसा भी दिया जा रहा है, जिससे वे मजबूती से अपना बाकी काम कर सकें।

– यह तो बहुत अच्छा है।

– आर्थिक अपराधियों के साथ नरमाई की परम्परा तो हमारे पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी ही डाल गये हैं। बोफोर्स के बारे में तो हमसे अधिक आप जानते होंगे। कलमाड़ी, कनिमोझी हो या ए.राजा, ये सब शूरवीर फिर से संसद की शोभा बढ़ाने लगे हैं।

– पर हमारे उन बन्दी सैनिकों का क्या होगा ?

– आप बिल्कुल चिन्ता न करें। जैसे हमने आपके जहाज को 25 लाख रु0 की जमानत पर छोड़ दिया, वैसे ही ये दोनों भी छूट जाएंगे। फिर ये मामला तो सीधे-सीधे इटली का है, इसलिए ..।

– 25 लाख रुपये कितने होते हैं ?

– लगभग 38,000 यूरो।

– बस..। इससे अधिक तो मेरा वेतन है। अब मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं मि0 कृष्णा, कि आपके रहते हमारे हित पूरी तरह सुरक्षित हैं।

– ऐसा न कहें। जब तक मैडम इटली का हाथ चिदम्बरम् और मनमोहन सिंह जैसे लोगों के सिर पर है, तब तक क्या मजाल कि कोई किसी अपराधी को हाथ लगा दे।

यह कहानी सुनाकर मैंने शर्मा जी की ओर देखा। उनका चेहरा 45 डिग्री गरमी में कुम्हलाये फूल जैसा हो गया था।

– तो वर्मा जी, हमें घेराव स्थगित कर देना चाहिए ?

– घेराव तो करें; पर ‘मा फलेषु कदाचन’ की तरह कोई आशा न रखें। पुलिस वाले नेता और अपराधियों की रक्षा करें या आपकी ? इसलिए सब मौहल्ले वाले मिलकर एक अच्छा चौकीदार रख लें, इसी में भला है।

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