लेखक परिचय

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान युवा पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. आपने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों दैनिक भास्कर, अमर उजाला और हरिभूमि में कई वर्षों तक सेवाएं दीं हैं. अनेक साप्ताहिक समाचार-पत्रों का सम्पादन भी किया है. ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है. आपने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लिए लेखन भी जारी है. आपकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक एक किताब प्रकाशित हो चुकी है, जिसे काफ़ी सराहा गया है. इसके अलावा डिस्कवरी चैनल सहित अन्य टेलीविज़न चैनलों के लिए स्क्रिप्ट लेखन भी कर रही हैं. उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल संपादन और लेखन के लिए आपको कई पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भी शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली है. आप कई भाषों में लिखती हैं. उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और रशियन अदब (साहित्य) में ख़ास दिलचस्पी रखती हैं. फ़िलहाल एक न्यूज़ और फ़ीचर्स एजेंसी में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं.

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बाबरी मस्जिद मामले में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बयान ने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आख़िर मुसलमानों को महज़ ‘वोट बैंक’ ही क्यों समझा जाता है? मुसलमान भी इस मुल्क के बाशिंदे हैं… अगर मुलायम सिंह मुसलमानों के इतने बड़े ‘हितैषी’ हैं तो यह बताएं कि…उनके शासनकाल में उत्तर प्रदेश में कितने फ़ीसदी मुसलमानों को सरकारी नौकरियां दी गईं…? मुलायम सिंह आज मुसलमानों के लिए मगरमच्छी आंसू बहा रहे हैं…मुलायम सिंह को उस वक़्त मुसलमानों का ख़्याल क्यों नहीं आया, जब वो बाबरी मस्जिद की शहादत के लिए ज़िम्मेदार रहे कल्याण सिंह से हाथ मिला रहे थे…?

गौरतलब है कि मुलायम सिंह ने बाबरी मस्जिद मामले में अयोध्या मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अयोध्या विवाद पर आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले से मुस्लिम ठगा सा महसूस कर रहे हैं…हालांकि कई मुस्लिम नेताओं ने मुलायम सिंह यादव के इस बयान की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि इस वक़्त इस तरह के सियासी बयान देकर माहौल को बिगाड़ने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए…

कभी मुलायम सिंह के बेहद क़रीबी रहे अमर सिंह ने मुलायम सिंह पर टिप्पणी करते हुए अपने ब्लॉग पर लिखा है कि…अचरज तो तब होता है, जब अयोध्या में तोड़फोड़ मचाने वाले सरगना साक्षी महाराज को राज्यसभा में, विहिप के विष्णु हरि डालमिया के फरज़न्द संजय डालमिया को राज्यसभा में, कल्याण सिंह के साहबज़ादे राजवीर सिंह को अपने मंत्रिमंडल में और स्वयं कल्याण सिंह को सपा अधिवेशन में शिरकत कराने वाले ‘मौलाना मुलायम’ मुस्लिम वोटों के लिए तौहीने-अदालत करते नज़र आते हैं. अमर सिंह का भी कहना है कि अयोध्या फ़ैसले के बाद दूरदर्शन देखते हुए एक बात अच्छी देखी. लालकृष्ण आडवाणी, मोहन भागवत, नरेंद्र मोदी, जफरयाब जिलानीजी और सुन्नी वक्फ बोर्ड के हाशिम अंसारी के बयान में चैन, अमन और शांति का माहौल बनाए रखने की बात दिखी. अमर सिंह ने कहा कि पहली बार बाबरी के मसले पर मुकदमा लड़ने वाले दोनों पक्षों ने कोई भड़काऊ बयान न देकर सियासतदाओं की उम्मीदों पर पानी फेर दिया.

अगर सपा जैसे तथाकथित सेकुलर सियासी दल मुसलमानों के इतने बड़े ‘हितैषी’ हैं तो आज़ादी के क़रीब छह दशक बाद मुसलमानों की हालत इतनी बदतर क्यों हो गई कि उनकी स्थिति का पता लगाने के लिए सरकार को सच्चर जैसी समितियों का गठन करना पड़ा…? क़ाबिले-गौर है कि भारत में मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए नियुक्त की गई सच्चर समिति ने 17 नवंबर 2007 को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा कि देश में मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा की स्थिति अन्य समुदायों की तुलना में काफ़ी ख़राब है…समिति ने मुसलमानों ही स्थिति में सुधार के लिए शिक्षा और आर्थिक क्षेत्रों में विशेष कार्यक्रम चलाए जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अक्टूबर 2005 में न्यायधीश राजिंदर सच्चर के नेतृत्व में यह समिति बनाई थी.

सात सदस्यीय सच्चर समिति ने देश के कई राज्यों में सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों से मिली जानकारी के आधार पर बनाई अपनी रिपोर्ट में देश में मुसलमानों की काफ़ी चिंताजनक तस्वीर पेश की थी… रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि देश में मुस्लिम समुदाय आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा के क्षेत्र में अन्य समुदायों के मुक़ाबले बेहद पिछड़ा हुआ है. इस समुदाय के पास शिक्षा के अवसरों की कमी है, सरकारी और निजी उद्दोगों में भी उसकी आबादी के मुक़ाबले उसका प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है.

अब सवाल यह है कि मुसलमानों की इस हालत के लिए कौन ज़िम्मेदार है…? क्योंकि आज़ादी के बाद से अब तक अमूमन देश की सत्ता तथाकथित सेकुलर दलों के हाथों में ही रही है…

12 Responses to “मुलायम से सवाल…क्या मुसलमान महज़ ‘वोट बैंक’ हैं…?-फ़िरदौस ख़ान”

  1. इफ्तेख़ार अहमद

    Md. iftekhar Ahmed

    Er. Diwas Dinesh Gaur साहब agar आपके जैसे ही संघ ke सभी logon की rae हो जाए तो कोई कारन nahi जो कोई Muslim किसी संघी se डरेगा या उसे बुरा-भला कहेगा. मई छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान एक बीजेपी के बहुत पुराने मुस्लिम नेता से मिला जो जनसंघ के वक़्त से ही जुड़े थे. मैंने उनसे पूछा की aap तो एक मुसलमान है, फिर संघ से कैसे जुड़े इसपर उन्होंने कहा की मैंने इसकी बहुत बड़ी कीमत chukaai है. जनसंघ के वक़्त लोग मेरी मन से बात नहीं करते थे कहते थे की संघी की मान जा रही है. उन्होंने कहा की मई हमेशा कहता हूँ की हम musalmano से BJP के लिए किस मुह से वोते मांगे, एक नरम हुआ नहीं की दूसरा कोई संघी मुसलमानों के खिलाफ गरम बयां दे देta है.और हमारी आफत हो जाती है. हम मुह दिखने के लायक नहीं रहते है. आप सभी ने बीजेपी leader प्रेम शर्मा ka २००९ लोकसभा chnaw का नारा सुना होगा, हिंदी, हिन्दू, हिंदुस्तान, मुस्लिम जाओ pakistan या फिर जाओ कब्रिस्तान, और वरुण का भी बयां सुना होगा और राजनाथ सिंह साहब ने भी apne ghaziabad chunaw chetra me जो kia wo सभी jante है. aise me भला कोई कैसे संघ pariwar per bharoda karega. ye बात sahi है की is deshke मुसलमानों के pas vikalp नहीं है. kendra me do बड़ी party है बीजेपी और congress बीजेपी मुसलमानों ko kabhi pana manti ही नहीं है lihaja unke netao के ugr bayano से trast hokar मुसलमान door rahne me ही bhalai samajhte है. भला is dunia me kaun aisa murkh होगा जो apne dushman ko power me dekhna chahega. और कोई aisi party नहीं jiska poore desh me janadhar हो. yahi wajah है की sari kamio और khamio के baad भी kendra me condress ही satta me kabij हो जाती है. rajyo me jaha भी majboot teesra और chautha vikalp है. waha ye nak ragad kar भी satta tak नहीं pahuch pati है. कोई भी party jab tak sabko sath me lekar नहीं chalegi kendra me नहीं aasakti है. बीजेपी और संघ parivar ko भी 1925 के yug से bahar aane zaroorat है. वक़्त badal chuka है. jazbaat की rajniti एक hosakti है baar-baar नहीं. संघ ko duwand से nikalkar एक sahi marg apnana chahie. aaphi bataie की aaj kuch hinduo के pakde jane per संघ jis tarah chilla raha है. kia kabhi किसी bekasoor मुस्लिम के pakde jane per chillaya. तो फिर मुसलमान unhe कैसे apna नेता manega.

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  2. sadhak ummedsingh baid

    एक बात बतलाइये, बहन मेरी फिरदौश?
    कितने मुस्लिम संगठन, माने इसको होश?
    माने इसको होश, आपकी बात मानते?
    व्यक्ति का मत कहें, व्यक्ति सब सही मानते.
    कह साधक कवी, संगठनों को होश दिलाएं.
    हाँ बहन फिरदौश, सही यह बात बताएं.

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  3. Nem Singh

    सत्य कहा है असली सम्प्रदायकता के ठेकेदार तो हमारे यही नेता है जो वोट के लिये ही राजनीती करते है इन्हें कुर्सी चाहिया जनता और समुदाय के विकाश से क्या लेना देना. फिरदोस जी aaपने सत्य ही लिखा है ……………..

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  4. Ravindra Nath

    बहन फिरदौस ने हमेशा कि भांति फिर से अपने समुदाय के हित मे एक उम्दा लेख लिखा है, आवश्यकता है कि मुस्लिम बंधु इसको समझें।

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  5. ajit bhosle

    @फिरदोस
    आपने लिखा है की यह हमें समझना होगा की मुसलमानों के लिए वैसे ही अवसरों की कमी रहती है, मै आपसे सहमत नहीं हूँ मुसलमान ही नहीं किसी भी कम पड़े लिखे या हर तरह से अयोग्य व्यक्ति के लिए अवसरों की कमी रहती है, आप एक भी ऐसा उदाहरण नहीं बता पाएंगी जिसमे ज्यादा पड़े लिखे एवं योग्य मुसलमान की जगह हिन्दू को मौक़ा दिया गया हो जबकि तमाम दुनिया में जाती, धर्म के आधार पर साफ़ भेदभाव देखा जा सकता है.

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  6. सुरेश चिपलूनकर

    सुरेश चिपलूनकर

    फ़िरदौस जी,
    आपने सही मुद्दा उठाया है और सटीक प्रहार किया है… पिछले 60 साल से मुस्लिमों को कांग्रेस और सपा जैसी पार्टियों ने वोट-बैंक के तौर पर ही उपयोग किया है। सारी समस्या इसी से शुरु हुई है…। कांग्रेस जैसी पार्टियों ने उन्हें हमेशा संघ-भाजपा से “डराकर” रखा, वोट खींचे और फ़िर भूल गये, कांग्रेस से पूछना चाहिये कि 60 साल सत्ता में रहने के बावजूद उसे रंगनाथ और सच्चर जैसे आयोगों की जरुरत क्यों पड़ती है? किसने रोका था उसे मुस्लिमों की तरक्की करने से?
    समस्या का हल तभी होगा, जब मुस्लिम युवा तालीम ले और कट्टरपंथियों को खुलकर नकारे और दबाये… यदि शाहबानो केस में आरिफ़ मोहम्मद की बात सुन ली जाती तो इतिहास कुछ और ही होता… लेकिन हमेशा उदारवादी मुस्लिम युवा या तो कट्टरपंथियों के सामने झुक जाते हैं या चुप्पी साध लेते हैं… और एक चक्रव्यूह में फ़ँस जाते हैं…जिसमें हिन्दू समझता है कि ये तो “ऐसे” ही हैं, जबकि कांग्रेस-सपा-बसपा-वामपंथी समझते हैं कि “अब कहाँ जायेगा, बेटा…”

    जिम्मेदारी 1992 के बाद जन्मे मुस्लिम युवाओं की है… भारत में अवसर काफ़ी हैं, बशर्ते वे भारत के कट्टरपंथियों और बाहर के तालिबानियों का खुलकर विरोध करें…

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  7. आर. सिंह

    R.Singh

    फिरदौस जी आपने एक बहुत बड़ा सवाल उठाया है की मुलायम सिंह के लिए मुसलमान क्या महज वोट बैंक हैं?आप को इसमें शक क्यों है?केवल मुलायमसिंह के लिए ही नहीं हमारे जितने तथाकथित धर्म निरपेक्ष हिन्दू नेता हैं उन सब के लिए आप महज वोट बैंकहैं.इसमें आपके मजहब वालो का भी कम हाथ नहीं है है,पर उसके बारे में चर्चा करने के पहले मैं ये कहना चाहूँगा की जिस दिन शाहबानो के केश में आपके मजहब के तथाकथित ठेकेदारों का कहना मानकर अदालत के फैसले को बदलने के लिए सम्बिधान में परिवर्तन किया गया था उसी दिन सबके चेहरे से मुखौटा हट गया था.अभी तक हमारे नेताओं ने मुस्लिम समाज को सुरक्षा देने का वादा देकर ऊनसे क्या नहीं करवाया है?ये कहानी इतनी लम्बी है की पन्ने के पन्ने रंग जायेंगे पर इनका खातमा नहीं होगा.संक्षेप में मैं यही कहना चाहूँगा की मुस्लिम युवा समाज को आगे आना होगा और इन सब बातों का पर्दाफास करना होगा और अपना मार्ग अपने आप प्रशस्त करना होगा.

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  8. Rajeev Dubey

    मुलायम जी से कोई सवाल नहीं करिए . वह तो कंप्यूटर के विरोधी हैं . उनकी पार्टी वाले भी ऐसे ही हैं . यह लेख पता नहीं पढेंगे भी कि नहीं .

    मुस्लिम जनता से मोटी मोटी आवाज़ में बात कर वह अपने शहंशाह होने का आभाष दिलाना चाहते हैं … बस और कुछ नहीं .

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  9. deepak.mystical

    deepak dudeja

    फिरदौस जी, बक्त आ गया है, मुस्लिम युवा अपने समाज के संकीर्ण नजरिया को छोड़ दें. इन तथाकथिक धर्मनिरपेक्षवादियों ने हमेश मुस्लिम समाज का दोहन किया है.
    अब सबको खुले दिमाग के साथ जीना होगा – वोट बैंक और फतवों कि राजनीति के चंगुल से खुद को छुडाना होगा.

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  10. Awadhesh

    आपने प्रश्न उठाया है लेकिन अपनी दशा के लिये मुस्लिम खुद जिम्मेदार है, मुलायम जैसे नेता उन्हे वोट बैन्क के रूप मे इस्तेमाल करना चाहते है तो मुस्लिम भी वोट बैन्क के रूप मे इस्तेमाल होकर अपनी बाते मनवाते रहते है. मुस्लिम वोट बैन्क म्युचुअल अन्डरस्टैन्डिन्ग के आलवा कुछ और नही…

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    • फ़िरदौस ख़ान

      फ़िरदौस ख़ान

      अवधेश जी, हम भी यही मानते हैं कि अपनी बदहाली के लिए मुसलमान ख़ुद भी काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं… जिस रोज़ मुसलमान यह समझ जाएंगे कि उनके लिए क्या सही है और क्या ग़लत? उनकी तरक्क़ी के रास्ते खुल जाएंगे…बच्चों को तालीम चाहिए, युवाओं को रोज़गार और औरतों को इज्ज़त से जीने का हक़… बच्चों की दीनी तालीम के साथ-साथ दुनियावी तालीम की भी ज़रूरत है…यह हमें समझना होगा…
      मुसलमानों के लिए अवसरों की कमी रहती है, इसमें कोई दो राय नहीं… इसके लिए भी मुसलमान काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं…हमारे पास ऐसे बहुत से मुस्लिम युवा आते हैं, जो हमेशा शिकायत करते हैं कि फ़लां बन्दा मुसलमान था…उसने मेरी क़ाबलियत की तारीफ़ तो की, लेकिन नौकरी देने से मना कर दिया…कहा कि अगर तुम मुसलमान नहीं होते तो तुम्हें रख लेता…इस हालत के लिए हम किसी और (हिन्दू आदि) को कैसे कुसूरवार ठहरा सकते हैं…?

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    • दिवस दिनेश गौड़

      Er. Diwas Dinesh Gaur

      अवधेश जी…मुस्लिम जिम्मेदार है या नहीं यह तो बाद का प्रश्न है, किन्तु पहले प्रश्न यह है कि मुसलामानों के लिए देश में कितने अवसर हैं? मै आपसे और बहन फिरदौस खान से यही कहना चाहूँगा कि यह देश जितना हिन्दुओं का है उतना ही मुसलामानों का भी है. यहाँ यदि हिन्दू अवसर पा सकता है तो मुसलमान क्यों नहीं? उतार यही है कि मुस्लिम भी इस धरा का ही पुत्र है किन्तु मुलायम सिंह जैसे ढोंगी मुसलामानों का गलत उपयोग अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए करते हैं, उन्हें मीठे मीठे सपने दिखाते हैं, किन्तु अपना अर्थ निकल जाने के बाद भूल जाते हैं. ऐसे में मुसलमान ठगा सा महसूस करता है. मुसलामानों से मेरी प्रार्थना है कि वह इन ढोंगियों के बहकावे में ना आएं. ये लोग किसी के सग्गे नहीं हैं. हमेशा स्वयं को मुसलामानों का शुभ चिन्तक बताने वाले मुलायम के प्रदेश में मुसलामानों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है. शिक्षा, नौकरी, व्यापार सब में पिछड़ा है मुस्लिम यूपी में. और वहीँ क्या कर लिया इस कथित कांग्रेस ने? हमेशा भाजपा और संघ को मुस्लिम विरोधी बताने वाले कांग्रेसी और वामपंथी शायद यह नहीं जानते कि गुजरात का मुसलमान आज देश में अन्य सभी प्रद्शों के मुसलामानों से आगे है.गुजरात उसी मोदी का प्रदेश है जिसे सोनिया गाँधी ने मौत का सौदागर कहा था. और वही मोदी आज मुस्लिम हित में भी काम करता है. और रही बात संघ की, तो कहना चाहता हूँ कि संघ कोई मुस्लिम विरोधी संगठन नहीं है. मै खुद संघ की शाखा से जुड़ा रहा हूँ. मैंने बहुत बार देखा है कि संघ मुस्लिम घर परिवारों की सहायता के लिए जी जान से लगा हुआ है. कसीस मुस्लिम बहुल क्षेत्र में कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए तो संघ सबसे पहले उन्हें संभालने पहुँचता है.
      कहने का तात्पर्य केवल इतना है कि मुसलमान भी इसी माटी की संतान है. आवश्यकता मात्र सही गलत को पहचानने की है. मुलायम जैसों के भरोसे बैठे रहे तो कभी ऊपर नहीं उठ सकेंगे.
      बहन फिरदौस खान aapne ek बहुत ही aawashyak mudda uthaaya है. jb tak muslamaan pichhda rahega देश आगे नहीं badh sakega. wishwaas karen हिन्दू कभी apne bhaai को girne नहीं dega.
      बहन फिरदौस खान nishchint rahen ek diwas aisa aaega jab इन ढोंगियों का pardaafaash hoga. us diwas हिन्दू bhai मुसलमान bhai ek hokar इस देश में rahenge.
      बहुत बहुत dhanywaad ……

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