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    कोरोना को पराजित करने एकजुटता पहली शर्त

    मनोज कुमार

    समूची दुनिया के साथ मध्यप्रदेश में कोरोना की भयावहता प्रतिदिन देखने को मिल रही है. आंकड़ों को देखकर मन कंपकंपा उठता है. यह ऐसा कठिन समय है जब हम रात में सोते समय मौत के आंकड़े और संक्रमितों की संख्या गिनकर सोते हैं और आंख खुलते ही अखबार के पन्नों पर छपे आंकड़ों को देखकर अफसोस से भर उठते हैं. सिहरा देने वाली खबरों के बीच कुछेक खबरें सुकून देने वाली भी होती हैं लेकिन कोरोना के कयामत के सामने ऐसी खबरें बौनी हो जाती है. कभी लगता है कि बीमारी ने किनारा कर लिया है लेकिन कुछ घंटे बीतते बीतते फिर आंकड़ें डराने लगते हैं. कहा जा रहा है कि सौ साल में ऐसी महामारी आती है लेकिन आजाद भारत में यह शायद पहला मौका होगा, जब उम्र के पचास पार लोग भी इससे दो चार हो रहे हैं. नई पीढ़ी के लिए तो यह एक सबक के समान है. वे अपनी आंखों से मौत का मंजर देख रहे हैं. किसी के पिता, तो किसी का पति, कोई भाई, कोई मां, कोई बहन और कोई दोस्त के अचानक कोरोना के गाल में समा जाने की खबर आती है. सोशल मीडिया पर लगभग हर रोज ऐसी कई खबरें पढऩे को मिल जाती है. साल 2020 के शुरूआत में ही कोरोना ने दस्तक दे दी थी. तब इसकी भयावहता से हम सब बेखबर थे. जैसे जैसे समय गुजरता गया. कोरोना के मौत के डैने पसरने लगा. सुरक्षा और सर्तकता के लिए तालाबंदी की नौबत आ गई. सरकार ने कोरोना के चैन को तोडऩे के लिए तीन महीने का लॉकडाउन ऐलान कर दिया. इस दौरान कोरोना का फैलाव थोड़ा धीमा रहा लेकिन लॉकडाउन में ढील मिलते ही कोरोना को मौका मिल गया और तेजी से वह पसरने लगा. देखते ही देखते आंकड़ों का ग्राफ बढऩे लगा. एक बार फिर जिंदगी को बचाने के लिए कभी एकाध हफ्ते तो कभी दो दिनों का लॉकडाउन करने के लिए सरकार को मजबूर होना पड़ा. शारीरिक दूरियां, मुंह पर मास्क और सेनीटाइजर से स्वच्छ रखने की हिदायत के साथ जनजागरूकता में सरकार जुटी हुई है.  सरकार की इन कोशिशों से जिंदगी के बचाव में आंशिक कामयाबी तो मिली लेकिन जिंदगी पटरी से उतर गई. काम-धंधे चौपट हो गए. बचत के रुपये हवा में उड़ गए. भूख और बेकारी के सामने कोरोना का डर छोटा पडऩे लगा. लोग बेखौफ होकर काम की तलाश में निकल पड़े. सडक़ों पर काम की तलाश में निकलने वाले इन लोगों को भी जिंदगी का भय था लेकिन पेट की आग के सामने मौत भी छोटी लगती है. बेबसी और मजबूरी घरों से सडक़ पर ले तो आयी लेकिन कारखाने बंद, बाजार बंद तो बेकार हाथों को काम कहां से मिले? भूख और भय के बीच जिंदगी हर रोज तमाम हो रही है. आर्थिक रूप से आम आदमी से लेकर सरकार का खजाना भी सन्नाटे में हैं. अखबारों में छपने वाली खबरें इस बात की तस्दीक करती हैं कि हालात सुधरने में जाने कितना वक्त लगे. अभी तो खैर मना रहे हैं कि किसी तरह कोरोना किनारे हो जाए. जो लोग कुंडली और भविष्यवक्ताओं पर भरोसा नहीं करते थे, अब उनकी गणना पर उन्हें भरोसा करना पड़ रहा है. यह तो नहीं कहा जा सकता कि जो कहा जा रहा है, वैसा ही होगा लेकिन डूबते तो तिनका का सहारा वाली बात को मान लें तो सितम्बर तक वैक्सीन बनने की उम्मीद है और ग्रह नक्षत्र अपनी चाल बदलेंगे तो कोरोना का कहर कमजोर पड़ेगा. यदि ऐसा होता है तो यह राहत की बात होगी. एक तरफ आम और खास सब लोग कोरोना से भयग्रस्त हैं लेकिन राजनीति के पाले में कोरोना शतरंज के मोहरे की तरह बिछाकर खेला जा रहा है. जो सरकार से बाहर हैं, वह सरकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं. उसकी कोशिशों पर सवाल उठा रहे हैं. कौन, कहां इलाज करा रहा है? किसको क्या आर्थिक लाभ हो रहा है, जैसे सवाल लगातार उठाया जा रहा है. यह सवाल इस समय फिजूल का है क्योंकि कोरोना के लिए सब एक धान पसेरी है. कोरोना दोस्त नहीं, दुश्मन है. वह अपना देखती है और ना पराया. उसका एक लक्ष्य है मौत बनकर टूट पडऩा. जो सरकार में हैं, वह अपने तर्क के साथ जवाब दे रहे हैं. सही मायने में राजनेता आम आदमी के आईकॉन होते हैं. उनका व्यवहार आम आदमी को प्रेरित करता है लेकिन जिस तरह से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करने, मास्क नहीं लगाने की राजनेताओं की खबरें देखने और सुनने में मिल रही है, वह आम आदमी को भी लापरवाह बना रहा है. यह तो अच्छा हुआ कि समय रहते सरकार ने जुलूस, जलसे पर पाबंदी लगाकर आम आदमी को संदेश दे दिया कि कोई आम और खास नहीं. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने स्वयं कहा है कि नियमों का उल्लंघन करने वाल मुख्यमंत्री क्यों न हो, कार्यवाही की जाए. कोरोना जैसे संकट के समय में सबको एक साथ चलना होगा क्योंकि यह मौत की बीमारी चिंह कर नहीं आती है. आज सब एकजुट हो जाएं तो पुलिस, प्रशासन, डॉक्टर और कोरोना से जूझने के लिए लगे लोगों में भी साहस का संचार होगा. अपितु कम श्रम और कम खर्च में बेहतर व्यवस्था की जा सकेगी. ऐसे में तंत्र पर किया जाने वाला खर्च नियंत्रित होगा और लोगों के जीवन बचाने में उस बजट का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा. व्यवस्था बनाने में जुटी पुलिस और प्रशासन भी तनाव मुक्त होगा तो लोगों की शिकायतें भी कम होगी. जनप्रतिनिधि जब लोगों को सचेत करेंगे, जागरूक करेंगे तो उनकी बातों का असर दूर और देर तक होगा. लोग बेवजह सडक़ों पर नहीं आएंगे. जो लोग आवश्यक कार्यों से घर से बाहर निकल रहे हैं, वे सावधानी के साथ आएंगे. सोशल डिस्टेसिंग के साथ मास्क लगाकर स्वयं और दूसरों को बचाएंगे. यह समय साथ चलने का है, साथ देने का है और  जहां तक सवाल जवाब का है तो उसके लिए उम्र होगी. कटघरे में खड़े कीजिएगा और जवाब मांग लीजिएगा लेकिन यह तब होगा जब जान हो तब जहान होगा.  

    मनोज कुमार
    मनोज कुमार
    सन् उन्नीस सौ पैंसठ के अक्टूबर माह की सात तारीख को छत्तीसगढ़ के रायपुर में जन्म। शिक्षा रायपुर में। वर्ष 1981 में पत्रकारिता का आरंभ देशबन्धु से जहां वर्ष 1994 तक बने रहे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समवेत शिखर मंे सहायक संपादक 1996 तक। इसके बाद स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य। वर्ष 2005-06 में मध्यप्रदेश शासन के वन्या प्रकाशन में बच्चों की मासिक पत्रिका समझ झरोखा में मानसेवी संपादक, यहीं देश के पहले जनजातीय समुदाय पर एकाग्र पाक्षिक आलेख सेवा वन्या संदर्भ का संयोजन। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रकारिता विवि वर्धा के साथ ही अनेक स्थानों पर लगातार अतिथि व्याख्यान। पत्रकारिता में साक्षात्कार विधा पर साक्षात्कार शीर्षक से पहली किताब मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 1995 में पहला संस्करण एवं 2006 में द्वितीय संस्करण। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता शोध परियोजना के अन्तर्गत फेलोशिप और बाद मे पुस्तकाकार में प्रकाशन। हॉल ही में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा संचालित आठ सामुदायिक रेडियो के राज्य समन्यक पद से मुक्त.

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