श्राद्ध क्या है इसके बारे में कुछ जानकारी

सा कि आप सभी को पता है कि 20 सितम्बर दिन सोमवार से श्राद्ध शुरू होने वाले हैं जिसको हम आम भाषा में कनागत भी कहते है। यह हिन्दी महीने के अश्विन मास के प्रारंभ होने के यानी शुक्ल पक्ष से प्रारंभ हो जाते है। वैसे तो सभी हिन्दू समाज के सभी व्यक्ति इससे परिचित है परन्तु आज के नई पीढ़ी के बच्चे इससे ज्यादा परिचित नहीं है। इसका एक मात्र कारण यह कि हम बड़े बूढ़े लोग इसके बारे में भी उनको जानकारी नहीं देते है इस कारण इससे वे अनभिज्ञ रहते है और साथ में आजकल स्कूल कालिजो में भी इसके बारे में कोई जानकारी भी नही दी जाती क्योंकि आजकल पढ़ाई भी पाश्चात्य सभ्यता से रंगी है।इस बारे में कुछ जानकारी देना चाहूंगा जो आजकल के बच्चो को काफी उपयोगी होगी ऐसा मेरा विश्वास है। जैसे कि मैने बताया कि श्राद्ध 20 सितंबर से शुरू हों रहे है। इनका तिथिवार वर्णन इस प्रकार से है। हमारी हिन्दू मान्यता के अनुसार जिस तिथि को जिस व्यक्ति की मृत्यु होती है उसी तिथि को उसका श्राद्ध करने की परंपरा है।
श्राद्ध-20 सितंबर से प्रारंभ है और 6 अक्टूबर तक इनकी समाप्ति है।

20 सितंबर 2021, सोमवार: पूर्णिमा श्राद्ध
21 सितंबर 2021, मंगलवार: प्रतिपदा श्राद्ध
22 सितंबर 2021, बुधवार: द्वितीया श्राद्ध
23 सितंबर 2021, बृहस्पतिवार: तृतीया श्राद्ध
24 सितंबर 2021, शुक्रवार: चतुर्थी श्राद्ध
25 सितंबर 2021, शनिवार: पंचमी श्राद्ध
26 सितंबर 2021,पंचमी का श्राद्ध
27 सितंबर 2021, सोमवार: षष्ठी श्राद्ध
28 सितंबर 2021, मंगलवार: सप्तमी श्राद्ध
29 सितंबर 2021, बुधवार: अष्टमी श्राद्ध
30 सितंबर 2021, बृहस्पतिवार: नवमी श्राद्ध
1 अक्तूबर 2021, शुक्रवार: दशमी श्राद्ध
2 अक्तूबर 2021, शनिवार: एकादशी श्राद्ध
3 अक्तूबर 2021, रविवार: द्वादशी, सन्यासियों का श्राद्ध
4 अक्तूबर 2021, सोमवार: त्रयोदशी श्राद्ध
5 अक्तूबर 2021, मंगलवार: चतुर्दशी श्राद्ध
6 अक्तूबर 2021, बुधवार: अमावस्या श्राद्ध

वर्ष 2021 मे पितृ पक्ष 20 सितंबर 2021, सोमवार को भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से आरंभ होगा। पहला श्राद्ध 21 सितम्बर को तथा इस वर्ष पितृ पक्ष का समापन 6 अक्टूबर 2021, बुधवार को आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को होगा। अमावस्या के दिन ही सभी प्रतीश्वरों का श्राद्ध किया जाएगा ।।

शास्त्रो मे मनुष्यो के लिए तीन प्रकार के ऋण कहे गये है, देवऋण, ऋषिऋण तथा पितृऋण । संबधित लेख पितृऋण के विषय मे आधारित है ।

पितृऋण का अर्थ है, अपने दिवंगत माता-पिता तथा अन्य पूर्वज, जिनके द्वारा हमने दुर्लभ मनुष्य योनि मे जन्म लिया। अपने उन पूर्वजो के निमित्त फर्ज या कर्तव्य को ही पितृऋण क्हा जाता है ।
शास्त्रानुसार माना जाता है कि चौरासी लाख योनियों मे जन्म लेने, या भटकने के पश्चात ही हमे सबसे उत्तम मनुष्य योनि प्राप्त होती है ।

पितरीऋण को कई अलग-२ प्रकार से चुकाया जाता है, जिसमे से पितृपक्ष यानि कनागत अथार्त पितृपक्ष के इन पंद्रह दिनो के दौरान श्राद्ध कर्म, पितृरो के ऋण चुकाने का एक मुख्य तथा महत्वपूर्ण कर्म है । प्रतिवर्ष साल मे एक बार, अश्विन मास कृष्णपक्ष के पंद्रह दिनो मे लिए पितृपक्ष (कनागत/श्राद्ध) आते है, इन दिनो मे, जिन माता-पिता अथवा पूर्वजों ने हमे पैदा किया, जीवन दिया हमारी आयु, आरोग्यता, शिक्षा तथा सुख-सौभाग्य के लिए अनेकों प्रकार के दुखो को झेला, उन पूर्वजो के ऋणो से मुक्त होने पर ही मनुष्य का जीवन अथवा जन्म सार्थक होता है।

माता- पिता तथा अन्य बडो की सेवा प्रत्येक मनुष्य को जीवनभर करनी ही चाहिये, शास्त्रो मे क्हा गया है कि :-

*पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता ही परमं तपः ।
*पितिरिम प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवता ॥

अथार्त पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता निश्चय ही सबसे बडी तपस्या भी है, पिता के प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण देवता भी प्रसन्न हो जाते है, जिस संतान की सेवा से माता-पिता संतुष्ट होते है उस संतान को गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है ।

माता समस्त तीर्थो के समान है और पिता सम्पूर्ण देवताओं के स्वरूप है, इसलिए हर प्रकार से माता-पिता की आजीवन सेवा के उपरांत उनकी मृत्यु के पश्चात भी उनके निमित्त श्राद्ध और तर्पण करना भी परमधर्म है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण और मनुस्मृति में ऐसे लोगों की घोर भत्र्सना की गई है जो इस मृत्युलोक (पृथ्वीलोक) में आकर अपने पितरों को भूल जाते हैं और सांसारिक मोहमाया, अज्ञानतावश अथवा संस्कार हीनता के कारण अपने दिव्य पितरों को याद नहीं करते है।
अपने पितरों का तिथि अनुसार श्राद्ध करने से पितृ प्रसन्न होकर अनुष्ठाता की आयु को बढ़ा देते हैं। साथ ही धन धान्य, पुत्र-पौत्र तथा यश प्रदान करते हैं। श्राद्ध चंद्रिका में कर्म पुराण के माध्यम से वर्णन है कि मनुष्य के लिए श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याण कर वस्तु है ही नहीं इसलिए हर समझदार मनुष्य को पूर्ण श्रद्धा से श्राद्ध का अनुष्ठान अवश्य ही करना चाहिए। स्कन्द पुराण स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में कहा गया है कि श्राद्ध की कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं जाती, अतएव श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

आजकल कुछ लोग श्राद्ध-तर्पण को ढकोसला तथा समयाभाव कहते हुए श्राद्ध कर्म नही करते, अथवा श्राद्ध का भोजन ब्राह्मण की जगह गरीबों, भिखारियों या अंपगो को खिला देते है, ऐसा करना ये सर्वदा अनुचित या गलत है।

सुयोग्य तथा विद्वान ब्राह्मण, जोकि कर्मकाण्ड और वेदो का ज्ञाता हो ऐसे ब्राह्मण को, दिवंगत आत्मा का नाम, गोत्र तथा संकल्प पूर्वक पितृरो के निमित्त दिया गया भोजन या श्राद्ध निश्चित रूप से पितृरो को प्राप्त होता है, और उन्हे संतुष्ट करता है।

श्राद्ध का भोजन किसी गरीब व्यक्ति,अपंग तथा अपाहिज व्यक्ति को तथा चरित्रहीन, लोभी-अज्ञानी गैरकर्मकांडी ब्राह्मण को भी नही दिया जा सकता

इस प्रकार के व्यक्ति तथा ब्राह्मण को दिया भोजन श्राद्ध के रूप मे पितृ स्वीकार नही करते, इस प्रकार दिया गया भोजन केवल सामान्य अन्नदान ही माना जायेगा श्राद्ध नही।

  1. महर्षि पराशर के अनुसार “देश,काल और पात्र” के अनुसार हविष्यादि विधि द्वारा जो कर्म, तिल-जौ-कुशा तथा मंत्रो से युक्त होकर किया जाये, वही श्राद्ध है।
  2. पितरो के उद्धार हेतु श्रद्धा पूर्वक किये गये श्राद्ध कार्य (दूध, दही, धी, खीर, हलवा, पूरी आदि पकवान) को श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मण को खिलाने के कारण ही इसका नाम श्राद्ध पडा है ।

श्रद्धा से श्राद्ध करने वाले के घर तथा कुल मे दुख, हानि, क्लेश, अथवा किसी भी प्रकार की कोई कमी नही रहती, ऐसा हिन्दू धर्म शास्त्रों मे स्पष्ट उल्लेखित है ।
श्राद्ध के इन पंद्रह दिनो मे सभी पितृ धरतीलोक पर अपने वंशजो के घर के द्धार पर आते है और अपने वंशजो से अपेक्षा करते है कि वह सुयोग्य ब्राह्मण को घर बुलाकर हमारे निमित्त श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करे, पितृपक्ष के दौरान वंशजो द्वारा ब्राह्मण को निमंत्रण दिए जाने पर वे ही घर मे प्रवेश करते है, और ब्राह्मण के रूप मे “वे” भोजन को प्राप्त करते है, और ब्राह्मण के भोजन से संतुष्ट होने पर उनकी भी संतुष्टि होती है, जिससे वे अपने वंशजो को आर्शिवाद देकर अपने धाम को प्रस्थान कर जाते है ।

परंतु इसके विपरीत यदि उनकी श्राद्ध तिथि पर भोज नही करवाया जाता अथार्त ब्राह्मण को श्राद्ध के लिए नही बुलाया जाता तो वे श्राद्धों के अंतिम दिन तक यानि अमावस्या के दिन तक अपने वंशजो के दरवाजे पर निमंत्रण का इंतजार करते रहते है, और अंतिम दिन- अमावस्या को अतृप्त तथा कुपित होकर श्राप देकर दरवाजे से ही लौट जाते है, जिसके परिणाम स्वरूप जीवन मे कठिनाइयां, रूकावटे, धन हानि, व्यापारिक हानि तथा संतान संबंधी कष्ट उठाने पडते हैं।

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