पर्यावरण लेख

हिमालय पर कालिख और पिघलते ग्लेशियर 

जयसिंह रावत 

वैश्विक मंचों पर जब भी जलवायु परिवर्तन की गंभीर चिंताएं जताई जाती हैं तो हमारा ध्यान अक्सर औद्योगिक देशों और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर चला जाता है। निसंदेह ये कारक धरती का तापमान बढ़ा रहे हैं, लेकिन जब हम एशिया के ‘थर्ड पोल’ (तीसरे ध्रुव) यानी हिमालय की बात करते हैं, तो संकट का एक और अधिक क्रूर, स्थानीय और तात्कालिक चेहरा सामने आता है। यह संकट, ‘ब्लैक कार्बन’ है। यह वह अदृश्य कालिख है जो हमारी जीवनदायिनी नदियों के उद्गम, हिमालय को प्रभावित कर रही है। इसलिये पर्यावरण के नाम पर हमें केवल रस्म-अदायगी वाले नारों से आगे बढ़कर हिमालयी पारिस्थितिकी के उस भयावह सच का सामना करना होगा, जिसकी गवाही वैज्ञानिक शोध और भूगर्भीय आंकड़े बयां कर रहे हैं।

हिमालय केवल पत्थरों और बर्फ का मूक विहंगम ढांचा नहीं है।यह भारतीय उपमहाद्वीप की संपूर्ण सभ्यता, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का आधार स्तंभ है. देश की आधी से अधिक आबादी जिन नदियों के पानी से अपनी प्यास बुझाती है, उन्हें सदियों से अक्षुण्ण रखने वाले हिमालयी ग्लेशियर आज अभूतपूर्व संकट में हैं। देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, इसरो के नेशनल रिमोट सेंसेरिंग सेंटर और इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की तमाम हालिया रिपोर्ट्स इस बात की तस्दीक करती हैं कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे खिसकने की गति पिछले कुछ दशकों में अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। डरावनी बात यह है कि इस तीव्र गलन के लिए केवल हवा में तैरती अदृश्य गैसें जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि वह सीधी कालिख भी जिम्मेदार है जो पहाड़ों के संवेदनशील पर्यावरण में हमारे अपने लालच और अनियोजित नीतियों के कारण घुल रही है।

इस संकट के वैज्ञानिक पहलू को समझने के लिए हमें प्रकृति के सरल नियम ‘अल्बेडो प्रभाव’ को समझना होगा। प्रकृति ने महासागरों से पानी उठा कर हिमालय पर बर्फ के रूप में बिखेरा हुआ है। साथ ही इन चोटियों को शुद्ध सफेद बर्फ की एक ऐसी चमकदार ढाल प्रदान की है, जब सूर्य की किरणें इस चमकीली और श्वेत बर्फ पर पड़ती हैं, तो यह बर्फ लगभग 80 से 90 प्रतिशत सौर विकिरण और ऊष्मा को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देती है। यही कारण है कि भारी गर्मी के महीनों में भी ये ग्लेशियर सुरक्षित रहते हैं लेकिन जब मैदानों और पहाड़ों की मानवीय गतिविधियों से पैदा होने वाला ब्लैक कार्बन हवा के साथ तैरता हुआ इन उच्च हिमनद क्षेत्रों तक पहुंचता है, तो वह इस सफेद चादर पर एक सूक्ष्म काली परत के रूप में जमा हो जाता है। कालिख की यह महीन परत बर्फ के चमकीले अल्बेडो को सीधे तौर पर नष्ट कर देती है। विज्ञान का स्थापित नियम है कि काला रंग ऊष्मा का सबसे बड़ा शोषक होता है। जैसे ही बर्फ मटमैली या काली होती है, वह सूर्य की किरणों को परावर्तित करने के बजाय उसे सोखने लगती है। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि ब्लैक कार्बन के इस सीधे असर के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की गति दोगुनी से भी अधिक हो गई है।

उच्च हिमालय के इन अत्यंत दुर्गम और जनशून्य इलाकों में इतनी भारी मात्रा में इस कालिख के पहुंचने का सबसे पहला और बड़ा कारण पहाड़ों में पर्यटन और परिवहन का अनियंत्रित और बेतरतीब दबाव है। चारधाम यात्रा मार्गों और अन्य पर्यटन स्थलों पर हर साल लाखों की संख्या में डीजल और पेट्रोल वाहनों का रेला उमड़ रहा है। संकरी पर्वतीय घाटियों में घंटों लगने वाले ट्रैफिक जाम और भारी व्यावसायिक वाहनों से निकलने वाला अनफिल्टर्ड गाढ़ा धुआँ हवा के रुख के साथ सीधे ऊंचे ग्लेशियरों की तरफ बढ़ता है।

दूसरा बड़ा और विनाशकारी कारण हर साल गर्मियों में लगने वाली जंगलों की आग है। इन अग्निकांडों से निकलने वाली टनों राख और ब्लैक कार्बन की सघन मात्रा वायुमंडलीय धाराओं के सहारे सीधे संवेदनशील ग्लेशियरों की गोद में जाकर बैठ जाती है। इसके साथ ही, पहाड़ों में ऑल-वेदर रोड और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और भारी मशीनों का धुआँ भी इस स्थानीय प्रदूषण को चरम पर पहुंचा रहा है। मैदानी इलाकों में सर्दियों और मानसून-पूर्व के महीनों में बड़े पैमाने पर पराली जलाया जाना और औद्योगिक प्रदूषण भी इस तबाही में बराबर का साझेदार है।

वाडिया इंस्टीट्यूट के भूगर्भशास्त्रियों ने अपने दीर्घकालिक अध्ययनों में पाया है कि गंगोत्री ग्लेशियर प्रतिवर्ष औसतन 15 से 20 मीटर की दर से पीछे खिसक रहा है, जबकि कम ऊंचाई पर स्थित अन्य कम मॉस बैलेंस वाले छोटे ग्लेशियरों के सिकुड़ने की रफ्तार इससे भी कहीं अधिक चिंताजनक है। विशेषज्ञों का स्पष्ट अनुमान है कि यदि तापमान बढ़ने और ब्लैक कार्बन के जमाव की यही स्थापित दर बनी रही, तो इस सदी के अंत तक हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के लगभग एक-तिहाई ग्लेशियर हमेशा के लिए लुप्त हो सकते हैं। ग्लेशियरों का यह गलन हमारे जल तंत्र को छिन्न-भिन्न कर रहा है। जब ग्लेशियर सामान्य से अधिक गति से पिघलते हैं, तो वे अपने पीछे भारी मात्रा में अस्थिर पानी और बोल्डर-मलबे का ढेर छोड़ते हैं। यह पानी प्राकृतिक रूप से मलबे के कमजोर बांधों के पीछे जमा होने लगता है, जिसे विज्ञान की भाषा में मोरेन-डेम्ड झीलें कहा जाता है। इन झीलों का आकार जब अपनी वहन क्षमता से अधिक बड़ा हो जाता है, तो ये ‘टाइम बम’ का रूप ले लेती हैं। किसी हल्के भूकंपीय झटके, भूस्खलन या हिमस्खलन के कारण जब इन झीलों के कमजोर प्राकृतिक बांध टूटते हैं तो निचली घाटियों में फरबरी 2021 कर ऋषिगंगा और तीस्ता की जैसी विनाशकारी बाढ़ आ जाती है।

इस जल-पारिस्थितिकी असंतुलन का एक और अधिक गंभीर पहलू यह है कि पहाड़ों का संपूर्ण जनजीवन और वन्यजीव तंत्र पारंपरिक जल स्रोतों पर निर्भर रहा है। सामान्य परिस्थितियों में जब सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है, तो वह बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर पहाड़ों की आंतरिक चट्टानों, दरारों और भूगर्भीय छिद्रों में जमा हो कर यह पानी प्राकृतिक जल स्रोत को साल भर रिचार्ज करता है। लेकिन जब असमय तीव्र गर्मी के कारण बर्फबारी का चक्र ही गड़बड़ा जाता है और जमी हुई बर्फ पानी बनकर तेजी से बह जाती है, तो जमीन को उस पानी को सोखने का समय ही नहीं मिलता। नतीजतन हिमालयी क्षेत्रों के लगभग 50 प्रतिशत पारंपरिक पेयजल स्रोत या तो सूख चुके हैं या सूखने की कगार पर हैं। विशेषज्ञों का मानना है उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्रदूषणकारी वाहनों की संख्या नियंत्रित होनी चाहिये। साथ ही वहन क्षमता के अनुसार ही बड़ी परियाजनाओं को अनुमति मिलनी चाहिये। इसके अलावा, वनाग्नि और वन प्रबंधन के लिए स्थानीय समुदायों और ‘वन पंचायतों’ को पारंपरिक अधिकारों के साथ पुनः मजबूत करना होगा। जब तक स्थानीय नागरिक का जंगलों और जल स्रोतों से भावनात्मक व आजीविका का सीधा जुड़ाव नहीं होगा, तब तक पर्यावरण संरक्षण केवल कागजी रहेगा।

जयसिंह रावत