-ः ललित गर्ग:-
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), जिसने पिछले डेढ़ दशक से बंगाल की राजनीति पर लगभग एकाधिकार स्थापित कर रखा था, आज आंतरिक असंतोष, नेतृत्व संबंधी प्रश्नों और जनविश्वास के संकट से जूझती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं और विधायकों की गतिविधियों ने यह संकेत दिया है कि संगठनात्मक एकता में दरारें उभर रही हैं। यह स्थिति केवल किसी एक राजनीतिक दल का संकट नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में राजनीतिक मूल्यों, जनभावनाओं और नेतृत्व की भूमिका पर पुनर्विचार का अवसर भी है। राजनीति में इतिहास बार-बार यह प्रमाणित करता रहा है कि जब भी सत्ता के साथ अहंकार जुड़ता है, जनता अंततः उसका उत्तर देती है। लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है। चाहे वह इंदिरा गांधी का आपातकाल हो, पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन या दिल्ली में आम आदमी पार्टी का अंत या फिर उत्तर प्रदेश एवं बिहार की अनेक राजनीतिक घटनाएँ-हर जगह जनता ने यह संदेश दिया है कि सत्ता जनता की सेवा के लिए है, शासन के अहंकार के लिए नहीं।
ममता बनर्जी को कभी संघर्षशील, जुझारू और जननेता के रूप में देखा जाता था। उन्होंने वामपंथी शासन के लंबे दौर को समाप्त कर बंगाल में परिवर्तन का नया अध्याय लिखा। किंतु समय के साथ उनकी राजनीति पर अहंकारवाद, व्यक्तिवाद और तुष्टिकरण के आरोप बढ़ते गए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर निर्णय प्रक्रिया का अत्यधिक केंद्रीकरण और कुछ व्यक्तियों का बढ़ता प्रभाव अनेक वरिष्ठ नेताओं को असहज करता रहा है। यही कारण है कि समय-समय पर असंतोष के स्वर उभरते रहे हैं। राजनीतिक टिप्पणीकारों द्वारा प्रकाशित विश्लेषणों में भी यह प्रश्न उठाया गया है कि यदि किसी दल में संगठन से अधिक व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाए, तो वहां असंतोष स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है। हाल के घटनाक्रमों ने इस आशंका को और बल दिया है। जिस प्रकार पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता और विधायक नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं, उससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल व्यक्तियों की नहीं, बल्कि संगठनात्मक संस्कृति की भी है।
भारतीय राजनीति में हाल के वर्षों में आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविंद केजरीवाल का उदाहरण भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। वर्ष 2013 से लेकर 2024 तक दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकले केजरीवाल को जनता ने ईमानदार, पारदर्शी और वैकल्पिक राजनीति के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया। लेकिन समय के साथ सत्ता का केंद्रीकरण, विरोधियों के प्रति असहिष्णुता, राजनीतिक अहंकार और स्वयं को अजेय मान लेने की प्रवृत्ति उनके नेतृत्व पर हावी होती दिखाई दी। जनता ने देखा कि जो दल कभी राजनीतिक शुचिता और नैतिकता की बात करता था, वह भी सत्ता के उसी मोह और व्यक्तिकेंद्रित राजनीति का शिकार होता जा रहा है, जिसके विरुद्ध उसने संघर्ष प्रारम्भ किया था। परिणामस्वरूप दिल्ली की राजनीति में उसका प्रभाव कमजोर हुआ और जनता ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र में कोई भी नेता अथवा दल जनता से बड़ा नहीं होता। यह घटना इस सत्य को पुनः स्थापित करती है कि जनता लंबे समय तक अहंकार, अतिशयोक्ति और आत्ममुग्धता को स्वीकार नहीं करती।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के समक्ष खड़ी चुनौतियों को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। जब किसी दल का नेतृत्व स्वयं को संगठन और जनता से ऊपर मानने लगता है, तब असंतोष जन्म लेता है, कार्यकर्ता दूर होने लगते हैं और अंततः राजनीतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। इतिहास बताता है कि लोकतंत्र में विनम्रता, संवाद, जनभावनाओं का सम्मान और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्धता ही स्थायी राजनीतिक सफलता की कुंजी हैं। किसी भी लोकतांत्रिक दल की शक्ति उसके विचार, संगठन और कार्यकर्ताओं में होती है, न कि केवल एक नेता में। जब दल विचारधारा की बजाय व्यक्तिपूजा पर आधारित होने लगते हैं, तब उनका संकट निश्चित हो जाता है। भारतीय राजनीति में अनेक उदाहरण हैं जहाँ परिवारवाद ने दलों की जड़ों को कमजोर किया। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विभाजन के पीछे भी नेतृत्व और उत्तराधिकार से जुड़े प्रश्न महत्वपूर्ण रहे। बंगाल में भी इसी प्रकार की चर्चाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। तृणमूल कांग्रेस के सामने दूसरा बड़ा संकट उसकी सार्वजनिक छवि का है। शिक्षक भर्ती, नगर निकायों तथा अन्य प्रशासनिक मामलों से जुड़े विवादों ने जनता के मन में अनेक प्रश्न खड़े किए हैं। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही कम हो रही है, तो राजनीतिक नुकसान होना स्वाभाविक है।
इसके साथ ही पश्चिम बंगाल में लंबे समय से चल रही पहचान, नागरिकता, सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़ी बहसों ने भी राजनीतिक वातावरण को प्रभावित किया है। भारतीय जनता पार्टी ने इन मुद्दों को राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया। भाजपा का तर्क रहा है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए और किसी भी प्रकार की तुष्टिकरण की राजनीति अंततः समाज को विभाजित करती है। यही कारण है कि बंगाल में भाजपा ने अपनी राजनीतिक रणनीति को राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और सुशासन के मुद्दों पर केंद्रित किया। भाजपा की बंगाल यात्रा भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अध्ययन का विषय है। कभी केवल दो सीटों तक सीमित रहने वाली पार्टी आज राज्य की सत्ता िशक्ति बन चुकी है। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे वर्षों का संगठनात्मक विस्तार, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का निर्माण, राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता तथा स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने की रणनीति रही है। भाजपा ने बंगाल में यह संदेश देने का प्रयास किया कि वह केवल एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि वैचारिक विकल्प भी है। हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि केवल राष्ट्रवाद या धार्मिक पहचान के आधार पर किसी दल की स्थायी सफलता सुनिश्चित नहीं होती। लोकतंत्र में जनता विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा भी चाहती है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल के लिए आवश्यक है कि वह राष्ट्रीय भावना के साथ-साथ जनकल्याणकारी नीतियों को भी प्राथमिकता दे।
राष्ट्र और राजनीति का संबंध अत्यंत गहरा है। कोई भी राजनीतिक दल तभी दीर्घकालिक सफलता प्राप्त कर सकता है जब वह राष्ट्रहित, संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनभावनाओं के प्रति प्रतिबद्ध रहे। यदि कोई दल ऐसे तत्वों का समर्थन करता हुआ दिखाई देता है जो राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध हों, तो जनता धीरे-धीरे उससे दूरी बनाने लगती है। भारत की लोकतांत्रिक चेतना इतनी परिपक्व हो चुकी है कि वह अंततः राष्ट्रहित और जनहित के बीच संतुलन स्थापित करने वाले नेतृत्व को ही स्वीकार करती है। पश्चिम बंगाल का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य इसी सत्य की पुष्टि करता है। तृणमूल कांग्रेस के सामने चुनौती केवल बगावत या संगठनात्मक असंतोष नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास को पुनः अर्जित करने की भी है। यदि पार्टी आत्ममंथन करती है, संगठन को लोकतांत्रिक बनाती है, पारदर्शिता बढ़ाती है और जनभावनाओं को समझने का प्रयास करती है, तो वह अपनी स्थिति को पुनः मजबूत कर सकती है। लेकिन यदि अहंकार, व्यक्तिवाद और तुष्टिकरण की राजनीति जारी रहती है, तो संकट और गहरा सकता है। यही लोकतंत्र का शाश्वत सत्य है और यही पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीति का सबसे बड़ा सबक भी। लोकतंत्र का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सत्ता स्थायी नहीं होती, किंतु मूल्य स्थायी होते हैं। राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं, लेकिन जनता की अपेक्षाएँ और राष्ट्र की आवश्यकताएँ हमेशा बनी रहती हैं। जो दल इन अपेक्षाओं को समझते हैं, वे इतिहास बनाते हैं और जो इन्हें अनदेखा करते हैं, वे इतिहास बन जाते हैं। आज बंगाल की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि तृणमूल कांग्रेस आत्मसुधार का मार्ग चुनती है या राजनीतिक पतन की ओर बढ़ती है।