लेखक परिचय

बी एन गोयल

बी एन गोयल

लगभग 40 वर्ष भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं। सन् 2001 में आकाशवाणी महानिदेशालय के कार्यक्रम निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। भारत में और विदेश में विस्तृत यात्राएं की हैं। भारतीय दूतावास में शिक्षा और सांस्कृतिक सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। शैक्षणिक तौर पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से पांच विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर किए। प्राइवेट प्रकाशनों के अतिरिक्त भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए पुस्तकें लिखीं। पढ़ने की बहुत अधिक रूचि है और हर विषय पर पढ़ते हैं। अपने निजी पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें मिलेंगी। कला और संस्कृति पर स्वतंत्र लेख लिखने के साथ राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर नियमित रूप से भारत और कनाडा के समाचार पत्रों में विश्लेषणात्मक टिप्पणियां लिखते रहे हैं।

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Manikkvachkarबी एन गोयल

 

ईश्वर के  करो –

जिनको जानने का हर किसी को अधिकार है।

शिव जिन्हें देवतागण भी नहीं जानते।

पुरुष  स्त्री अर्थात् अर्धनारीश्वर  के रूप में उनके  करो।

प्रभु के दर्शन करो, जिनके मैंने स्वयं दर्शन किये हैं।

उस अमृत को चखो जो विपुल कृपा प्रदायक है।

ध्यान करो,  मैंने दया की महानतम मूर्ति के दर्शन किये हैं।

ध्यान करो,  मैंने इसी धरती पर उनके सुन्दर चरणों का स्पर्शकिया है।

ध्यान करो, उन्होंने अपनी कृपा से मुझे अपना दास बनाया।

उनके दर्शन करो,  जिनके अर्ध भाग में नीलकमल नयना देवी हैं ।

एक ही साथ,  प्रभु और देवी के दर्शन करो।                     (तीसरा डिकड: 55.65)

 

प्राचीन समय में मदुरै पाण्डय् राजाओं की राजधानी थी। इसके तिरुवतवूर नामक स्थान पर एक शुद्ध सात्विक ब्राह्मण रहता था। इनके पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों के फलस्वरूप,  ब्राह्मण की सुशील  और कर्तव्यशील पत्नी ने एक सुन्दर बालक को जन्म दिया जिसका नाम उनके स्थान के अनुरूप, वातवूर रख दिया। जैसे-जैसे बालक बड़ा हुआ, उसकी बुद्धि और ज्ञान की चर्चा सब जगह होने लगी। कुशाग्र बुद्धि होने के कारण बालक अल्पायु में ही शास्त्रों और पुराणों में पारंगत हो गया। यहां तक कि वयोवृद्ध ज्ञानी विद्वान और सन्त भी उसकी विद्वता से प्रभावित हुए बिना न रह सके। मदुरै के राजा अरिदमन पाण्डया ने भी उसकी ख्याति सुनी और यह भी सुना कि यह युवक न केवल शास्त्रों पुराणों वरन् आधुनिक प्रशासन में भी अत्यंत प्रखर है। अतः राजा अरिदमन ने उसे अपना प्रधान अमात्य अर्थात प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। इस काम में भी बालक वातवूर ने अपनी निपुणता का परिचय दिया।

 

समय बीतता गया और धीरे-धीरे वातवूर के मन में भौतिक संसार के प्रति अरूचि उत्पन्न होने लगी। उसे संसार का मोह-माया जाल असह्य और जन्म, ज़रा, मृत्यु और पुनर्जन्म का चक्र कष्टकारक लगने लगा। उसका मन ईश्वर भक्ति की ओर झुकने लगा। प्रभु शिवानंद के चरण-कमल ही सच्चा आनन्द हैं – यही धारणा उसके मन में गहरे बैठ गई। राजा के मंत्री पद पर कार्य करते समय भी उसे ज्ञानियों और विद्वानों के साथ वेद-वेदांगों पर चर्चा करना अच्छा लगता था। शीघ्र ही उसे अहसास हुआ कि वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति के लिए गुरू का होना आवश्यक है। उसने गुरू की तलाश शुरू की। वह जहां भी जाता,  वास्तविक गुरू की तलाश में जुटा रहता।

 

एक दिन जब राजा अपने दरबार में थे कि राज्य के अस्तबल के प्रमुख ने आकर बताया, ‘‘महाराज वृद्धावस्था, बीमारी अथवा मृत्यु के कारण राज्य के अस्तबल में घोड़ों की संख्या कम होती जा रही है। अतः नये घोड़ों की व्यवस्था करनी आवश्यक है।’’ राजा ने तुरन्त वातवूर को नये घोड़े खरीदने का आदेश  दिया। वातवूर इस आदेश से प्रसन्न था क्योंकि उसे इस भ्रमण में अपने गुरू को खोजने का भी अवसर मिलेगा। यह एक प्रकार से ईश्वर  प्रदत्त अवसर था। वातवूर ने भगवान सोमासुन्दरार के मन्दिर में पूजा अर्चना की और अपनी यात्रा पर निकल पडा। वह तिरूपेरूतुंरई पहुंचा। वहां पहुंचकर उसने देखा कि तिरूपेरून्तुरई भगवान के मन्दिर के पास एक वृक्ष के नीचे एक विद्वान पूजामग्न था। कुछ लोग उसे घेरे हुए खड़े थे। उन विद्वान के हाथ में ‘ज्ञानबोधम्’ नाम की पुस्तक थी। वेतवूर मन्दिर में गए, पूजा अर्चना की और भगवान की मूर्ति के समक्ष नतमस्त होकर खड़े होकर ईश्वर साधना में लीन हो गए। उनकी आंखों से अश्रुधार बह रही थी। मन्दिर की परिक्रमा करते समय जैसे ही वे वृक्ष के नीचे बैठे प्रवचनकर्ता विद्वान के सामने से निकले तो उनके मन में ईश्वर प्रसंग से एक लहर-सी उठी। उन्हें लगा कि ईश्वर उन्हें कुछ कह रहे हैं। प्रवचनकर्ता विद्वान के व्यक्तित्व ने उन्हें आकर्शित किया। वेतवूर ने दौड़कर विद्वान के चरण पकड़ लिये। उनके व्यक्तित्व में ही एक नया आकर्षण  था। उनके मुंह से एक ही आवाज़ आ रही थी – ‘‘मिल गए, मिल गए – गुरुवर मिल गए। हे प्रभु आप कहां थे, कृपया आप मुझे अपना दास बना लें, अपना आशीर्वाद  दे दें।’’ वातवूर ने उन्हें अपना गुरु मान लिया। गुरु ने भी उनकी विनती स्वीकार कर ली और वातवूर को शिष्यत्व की दीक्षा दी। गुरु ने उन्हें शिव ज्ञान के दैविक रहस्यों से अवगत कराया। शिष्य  भी दैविक ज्ञान की गहराइयों में उतरते ही गए। उन्हें अपनी सुध-बुध ही नहीं थी। काफी समय पश्चात जब उन्हें होश  आया तो वे एक नई आभा से अभिभूत थे। वे कह रहे थे –

‘‘हे प्रभु, मैं कहां था अभी तक। मैं कहां भटक रहा था, अभी-अभी मैं किन दैवीय अनुभूतियों से गुज़रा हूं। मेरे हृदय में आनन्द की लहरें उमड़ रही हैं। मेरी हृदय तंत्री में एक नया स्पंदन हो रहा है। अब मेरे पास अपना कुछ नहीं है। मेरा धन, दौलत, सम्पत्ति, यह शरीर,  मेरी आत्मा, मेरा मस्तिष्क  सभी कुछ प्रभु आपका है। यह सांसारिक नश्वर  सम्पत्ति त्याज्य है। हे भगवान, दया के सागर, अमृत्व प्रदायक,  मैं आपके समक्ष नतमस्तक हूं।’’ यह सब कहते-कहते वातवूर ने अपने सांसारिक वस्तुओं को उतार कर ईश्वर के चरणों में रख दिया। उसी समय उन्होंने सन्यास ले लिया। शरीर  पर पवित्र भस्म लगाई, अपने मन को गुरु चरणों में लगाया और उसी समय से ध्यानावस्थित हो गए। ध्यान टूटने पर उन्होंने स्वयं को अत्यंत प्रसन्न पाया, उनका चेहरा कान्तियुक्त था और मुंह से ईश्वर भजन निकल रहा था।

वातवूर के आध्यात्मिक जीवन का यह प्रारम्भ था। इस मंगल दिवस में, उनके जीवन में एक नया संचार हुआ था,  उन्हें एक नई स्फूर्ति और ऊर्जा मिली थी। वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो गए थे,  ईश्वरत्व  की अनुभूति से वे आनन्दातिरेक थें। इसी दिन से वे वातवूर से माणिक्कावाचकर कहलाये। वे रहस्यवादी कवियों में अग्रणी बन गए। ईश्वर के अनुभूति का मार्ग आनन्दातिरेक अवश्य था, इसमें स्फूर्ति भी थी और ऊर्जा भी, यह दैवीय भी था और मंगलमय भी, सांसारिक कष्टों से दूर,  ईश्वरत्व के समीप, फिर भी इस मार्ग में कठिनाइयां भी थी, पग-पग पर दुःख और पीड़ा थी। यह संसारी मोहमाया दुधारी तलवार है। इस पर चलने के लिए भी कठिन साधना की आवश्यकता होती है।

वातवूर राजा के मंत्री थे,  उन्हें अस्तबल के लिए घोड़ों की खरीदारी का दायित्व दिया गया था। वे राजा को सूचित भी नहीं कर सके और उन्होंने अपने दायित्व का निर्वाह भी नहीं किया था। वे अपना काम भूल गए थे। उनके साथ आये सेवकों ने उन्हें याद दिलाया कि वे काफी समय से बाहर हैं और राजा उनकी प्रतीक्षा करते होंगे। मणिक्कवाचकर ने उन सेवकों से कहा कि वे जाकर राजा को सूचित कर दें कि घोड़े एक महीने में पहुंच जायेंगे। सेवकों ने राजा को यथावत सूचित कर दिया। राजा सारा वृत्तान्त सुनकर क्रोधित हुए। लेकिन प्रतीक्षा करने के सिवाय उनके पास कोई विकल्प नहीं था।

माणिक तिरुपेन्तुरई ईश्वर भक्ति में लीन हो गए अपना अपना राजसी दायित्व फिर विस्मृत कर बैठे। राजसी धन भी समाप्त हो गया। उन्होंने वह सारा धन एक निर्माणाधीन मन्दिर में लगा दिया। एक महीना तक प्रतीक्षा करने के बाद राजा ने फिर सेवक भेजे और उन्हें तुरन्त बुला भेजा। माणिक परेशान  हो गए और उन्होंने ईश्वर के समक्ष अपनी व्यथा सुनाई। ईश्वर से क्षमा याचना करते हुए ईश्वर की अभ्यर्थना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ईश्वर ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और उनसे कहा, ‘‘भक्त, डरो मत। मैं स्वयं सर्वोत्तम प्रकार के घोड़े मदुरै राजा के पास लेकर जाऊंगा। तुम चाहो तो स्वयं जाकर राजा को सूचित कर दो कि अवनिमूलम के शुभ समय पर उसके पास घोड़े पहुंच जायेंगे।’’ इसके बाद ईश्वर अंतर्ध्यान हो गए। कहते हैं, माणिक को आंखें खुलने पर अपने चारों ओर हीरे जवाहरात रखे दिखायी दिए।

दूसरे ही दिन माणिक तैयार हुए और ईश्वर प्रार्थना कर अपने राजसी मंत्री के पदानुकूल वस्त्र पहनकर मदुरै के लिए चल दिए। वहां पहुंचकर उन्होंने राजा के समक्ष नमन किया और उन्हें ईश्वर प्रदत्त हीरे भेंट किए। उन्होंने राजा से कहा – ‘‘राजन्! आपके दिए हुए धन से मैंने पहले ही अच्छे घोड़े खरीद लिए थे परन्तु मैं उन्हें यहां लाने के लिए एक शुभ अवसर की प्रतीक्षा में था। यह शुभ  अवनीमूलम नक्षत्र का दिन होगा और उस दिन आपके पास घोड़े आ जायेंगे। आज मैं आपके आदेश पर उपस्थित हो गया हूं। विलम्ब के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं।’’ हीरे मिलने और घोड़ों के समाचार से राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसने माणिक से अपने कठोर व्यवहार के लिए क्षमा मांगी। माणिक ने घोड़ों के लिए एक नये और अच्छे अस्तबल का निर्माण कराया।

माणिक के सम्बंधियों और मित्रों ने उन्हें अभी सन्यास न लेने के लिए समझाने का काफी प्रयास किया। वे जानते थे कि माणिक धुन के पक्के हैं। फिर भी उनके प्रयास जारी रहे कि वे किसी तरह संसार से वैराग्य लेने के अपने निर्णय को बदल दें। माणिक का उन सबको एक ही उत्तर था – ‘‘मित्रों, जिस दिन ईश्वर ने मुझे अपनाया था,  उसी समय मैंने सांसारिक मोह माया से विरक्ति ले ली थी। मैंने अपना सर्वस्व ईश्वर के चरणों में समर्पित कर दिया था। मेरा अपनी देह से अब कोई नाता नहीं है। मेरा सीधा नाता अब ईश्वर से है,  जो हमारी सभी बुराइयों,  पापों, कुकर्मों को हरने वाला है। उसी का अनुग्रह सबसे बड़ी सम्पत्ति है। मानव जन्म अत्यन्त कष्टकारक है। इसी प्रकार मृत्यु भी कष्टकारक है। वे सभी कार्य जिसमें ईश्वर का अनुग्रह न हो, कष्टकर हैं। मुझे अब इस संसार की कोई चिन्ता नहीं। मैं अपने हाथ में एक भिक्षापात्र लेकर जीवन यापन करना चाहता हूं,  भिक्षा में जो कुछ भी थोड़ा बहुत मिल जाये, उसी से अपना निर्वाह करना चाहता हूं। यह धरती माता मुझे रहने के लिए कहीं भी थोड़ा स्थान दे देगी। फिर मुझे बड़े-बड़े विशाल  घर और निवास स्थल बनाने की क्या आवष्यकता है। मेरे शरीर पर लगी यह भस्म अत्यंत पवित्र है। मेरी एक मात्र सम्पत्ति यह एक रूद्राक्ष की माला है। यही मेरे अनेक जन्मों के पापों से मुझे मुक्त करेगी। अतः मित्रों, जब मैं उस परम पिता परमेश्वर के संरक्षण में हूं, तब मुझे किसी से क्यों भय लगेगा।’’

उधर समय बीत रहा था। घोड़ों का कहीं अता-पता नहीं था। सेवकों ने अन्य लोगों के माध्यम से राजा तक बात पहुंचा दी कि माणिक ने सभी राजकीय धन मन्दिर के निर्माण में खर्च कर दिया है और इसने कोई घोड़ा आदि नहीं खरीदा। राजा ने कुछ लोगों को पेरुन्तुराई भेजकर वास्तविकता का पता लगाया। लोगों का कथन ठीक था। वहां कहीं कोई घोड़ा आदि नहीं था। अतः राजा ने माणिक से धन वसूलने का आदेश दिया, और माणिक को दण्ड देने का निर्णय लिया। दण्ड दिया भी गया। उसने सब कुछ सहन किया लेकिन उसे दिया गया दण्ड,  कहते हैं, माणिक को लेष भी प्रभावित नहीं कर सका। कहते हैं उसकी सारी वेदना ईश्वर ने स्वयं अपने ऊपर ले ली। माणिक शांत रहे। दण्डाधिकारी आश्चर्यचकित थे कि दण्ड का माणिक के शरीर  पर कुछ प्रभाव नहीं हो रहा है। वे अपने ईश्वर की पूजा आराधना में लीन रहे। ईश्वर अपनी लीला रच रहे थे। कहते हैं ईश्वर की इच्छा से उस क्षेत्र के सभी गीदड़ों ने घोड़ों का रूप धारण कर लिया। ईश्वर के दूतों ने घोड़ों का रूप धारण कर लिया। ईश्वर स्वयं एक व्यापारी बन गए और अपने इन दैवीय घोड़ों और सईसों के साथ मदुरै पहुंचे। सभी घोड़े एक से एक सुन्दर बलिश्ठ, गतिवान और स्फूर्त थे। जो भी इन्हें देखता, वह देखता ही रह जाता। ठीक अवनीमूलम् के दिन प्रातः काल में ही यह दैवीय काफिला राजमहल के द्वार पर पहुंच गया। राजा इन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसे माणिक पर इस सम्बन्ध में किए गए अपने दण्ड सम्बन्धी कार्यों पर क्षोभ भी हुआ। उसने माणिक को मुक्त किया और उनसे क्षमा याचना की। माणिक जानते थे यही ईष्वरीय लीला है। उन्होंने तुरन्त घोड़े के व्यापारी बने ईश्वर का नमन किया। राजा ने घोड़ों को अपने अस्तबल में भेज दिया।

कुछ समय पश्चात  छद्म घोड़ों ने अपना वास्तविक रूप धारण किया और गीदड़ बनकर हुंवा हुंवा करते वापिस अपने जंगलों की ओर भाग गए। राजा ने माणिक को कारागार में डलवा दिया। राजा को लगा कि यह माणिक का कोई षडयंत्र है। माणिक ने भगवान से प्रार्थना की। राजा के ऊपर एक और प्रकोप हुआ। पूरे राज्य में बाढ़ आ गई। चारों तरफ पानी ही पानी,  सभी लोग त्रस्त। किसी की भी समझ में इस बाढ़ का कारण नहीं आ रहा था। अचानक कहां से इतना पानी आ गया। त्रासदी के इस समय कारागार में कर्मचारी अपने घर को बाढ़ से बचाने के लिए भाग गए। माणिक ईश्वर की आराधना के लिए मन्दिर गए। भगवान सोमासुन्दरार की आराधना में इतने तन्मय हो गए कि उन्हें अपना होश ही नहीं रहा।

इधर नगर को बाढ़ से बचाने के लिए राजा ने हर परिवार से एक-एक आदमी भेजने के लिए कहा जिससे वह बांध बनाने में सहायता दे सके। सभी को निर्देश  दिए कि अपने अपने घर से हर आदमी मिट्टी की एक-एक टोकरी लेकर आए। एक घर में एक बुढ़िया मात्र थी जो चावल के लड्डू बनाकर बेचती थी। यही उसकी आजीविका का साधन था। वह ईश्वर की भक्त थी। ऐसी स्थिति में भगवान शिव स्वयं उसकी सहायता के लिए कुली-मज़दूर बन कर आये। लेकिन लोगों ने देखा कि बुढ़िया का यह मजदूर सहायक की अपेक्षा बाधक अधिक था। राजा ने इस मज़दूर के आलस्य और काम के प्रति उदासीनता देखकर उसे दण्डित करना चाहा। राजा ने उसकी पीठ पर प्रहार किया। परन्तु आश्चर्य , इस मजदूर की कमर पर पड़ा प्रहार संसार के सभी प्राणियों और जीव-जन्तुओं ने अनुभव किया। राजा ने अपनी गलती महसूस की और उसने माणिक की खोज कराई। राजा के प्रहार को माणिक ने भी मन्दिर में अनुभव किया था। राजा माणिक की तलाश  में मन्दिर पहुंचा और जाते ही उसने माणिक से क्षमा याचना की। राजा ने माणिक से प्रार्थना की कि वह राज्य का भार सम्हाल ले। माणिक ने अस्वीकार कर दिया वरन् राजा से पेरूतुंरई जाने की आज्ञा मांगी। राजा ने केवल माणिक को आज्ञा दी बल्कि माणिक के साथ-साथ मदुरै गया,  वहां ईश्वर की आराधना की। माणिक पेरूतुंरई के लिए चले गये और राजा ने राज्य का त्याग कर स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया और वहीं से महाप्रयाण कर लिया।

माणिक पेरूतुंरई पहुंचकर ईश्वर की प्रार्थना में लीन हो गए। उनकी एक ही विनती थी कि ईश्वर उन्हें गुरु के रूप में निर्देश दें । ईश्वर ने उन्हें चिदम्बरम् जाने का निर्देश दिया। माणिक चिदम्बरम के लिए चल दिए और रास्ते में जहां-जहां भी मन्दिर आये, वहीं पर उन्होंने ईश्वर की पूजा-अर्चना की। चिदम्बरम् पहुंचकर वे भगवान के चरणों में दण्डवत हो गए। वहां वे मन्दिर के पास के उद्यान में ठहरे और वहीं उन्न्होंने ‘तिरुवाचकम्’ की रचना की। यह उनकी एक अनूठी रचना है। जी वंमीकनाथन इसके बारे में कहते हैं – ‘‘तिरुवाचकम् किसी विशेष  उद्देश्य  के लिए किया गया भक्ति गीतों का मात्र एक संग्रह नहीं है। यह रहस्यवाद की धर्मविद्या पर निबन्ध है। यह एक बौद्धिक कृति नहीं बल्कि बहुत ही मधुर गीतों में हृदय की व्यथा और विजय की स्वतःस्फूर्त धारा है।’’

माणिक शैव  सन्त थे लेकिन ईश्वर के प्रति अपनी आस्था और समर्पण में वे किसी भी वैष्णव  से काफी आगे थे। ‘तिरुवाचकम’ उनकी एक अद्वितीय रचना है। इसमें 51 डिकड हैं। डिकड सामान्यतः दस छन्दों की कविता को कहते हैं। इसमें 658 छन्द हैं।

 

दिन प्रतिदिन प्रभु सूरज को प्रभासित करते हैं।

समुज्जवल चन्द्रमा को शीतलता  प्रदान करते हैं।

महाग्नि में प्रभु ताप उत्पन्न करते हैं।

शुद्धको प्रभु व्यापकता प्रदान करते हैं।

प्राणाधार वायु को वेग ऊर्जा प्रभु से प्रदान करते हैं।

वृक्षों की छाया में बहने वाले उठते-गिरते झरनों को

गति की दृढ़ता प्रभु ही प्रदान करते हैं।

इस प्रकार कोटिश:  सांसारिक स्थितियों में

प्रभु इसी प्रकार व्याप्त हैं।

 

तिरुवाचकम् के प्रारम्भिक तीन डिकडों में ईश्वर के बारे में मनुष्य की परिकल्पना की चर्चा है। चौथा  डिकड तीनों का समन्वय है। इसकी समाप्ति वे ईश्वर की स्तुति से करते हैं।

 

हे चिरन्तन कारण, हम तुम्हारी स्तुति करते हैं।

विजय, तुम्हारी विजय हो,  हम तुम्हारी स्तुति करते हैं।

One Response to “दक्षिण भारत के संत: माणिक्कवाचकर”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    दक्षिण भारत के संत: माणिक्कवाचकर का अलौकिक संक्षिप्त परिचय कराने के लिए, विद्वान गोयल जी का धन्यवाद।
    हमारी भरत-भूमि में ऐसे सन्त महात्माओं से भी समृद्ध हैं, इतनी कि कितने ऐसे सन्तों के नाम भी हमें पता नहीं।
    इस दृष्टि से ऐसे आलेख विशेष महत्त्व रखते हैं। पूरी प्रतिपादन शैली पौराणिक शैलियों जैसी प्रतीत होती हैं। पाण्ड्य राजाओं का काल ईसा की प्रारंभिक शतियाँ रहा होगा।
    मैं ने तिरुवळ्ळुवार विरचित तिरुक्कुरळ की पुस्तक, मेरे एक छात्र द्वारा मँगवाई थीं। बोध वचनों का कोष है।
    श्री गोयल जी ने इस आलेख द्वारा, दक्षिण भारत के सन्तका सफल परिचय कराया है।
    मेरी गलती से गोयल जी को उत्तर रूप लिखी इ मैल डिलिट हो गयी थी। यह दूसरी लिख दी। विलम्ब हो गया।
    फिरसे धन्यवाद।

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