लेखक परिचय

डॉ. सुभाष राय

डॉ. सुभाष राय

जन्म जनवरी 1957 में उत्तर प्रदेश में स्थित मऊ नाथ भंजन जनपद के गांव बड़ागांव में। शिक्षा काशी, प्रयाग और आगरा में। आगरा विश्वविद्यालय के ख्यातिप्राप्त संस्थान के. एम. आई. से हिंदी साहित्य और भाषा में स्रातकोत्तर की उपाधि। उत्तर भारत के प्रख्यात संत कवि दादू दयाल की कविताओं के मर्म पर शोध के लिए डाक्टरेट की उपाधि। कविता, कहानी, व्यंग्य और आलोचना में निरंतर सक्रियता। देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं, वर्तमान साहित्य, अभिनव कदम,अभिनव प्रसंगवश, लोकगंगा, आजकल, मधुमती, समन्वय, वसुधा, शोध-दिशा में रचनाओं का प्रकाशन। ई-पत्रिका अनुभूति, रचनाकार, कृत्या और सृजनगाथा में कविताएं। अंजोरिया वेब पत्रिका पर भोजपुरी में रचनाएं। फिलहाल पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय।

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-डा. सुभाष राय

भाषा, संयम और धैर्य आदमी को जानवर से अलग करने वाले उपकरण हैं। किसी विद्वान ने कभी कहा था कि आदमी एक सामाजिक पशु है। आदमी मूल रूप से जानवर ही है लेकिन उसकी सामाजिकता उसे जंगलीपन के अँधेरे में खो जाने से रोकती है। सामाजिक होने की सबसे बड़ी शर्त होती है, दूसरों की चिंता करना, उनके दुख-दर्द में शामिल होना, उनकी खुशी और गम के लम्हों को पहचानना और उनमें अपनी उपस्थिति दर्ज कराना। यह सब प्रेम और करुणा के बिना संभव नहीं है। और यही वे मूल तत्व हैं जो आदमी को अन्य जानवरों से अलग करते हैं। यही उसे मनुष्य बनाते हैं। आजकल मनुष्यों की ही कमी होती जा रही है, मनुष्यता संकट में है। लोग केवल अपने बारे में सोचते हैं, अपने लाभ की चिंता करते हैं, अपने घर में खुशी देखना चाहते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन जब वे अपनी खुशी के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाने की सीमा तक पहुंच जाते हैं, तो समस्या खड़ी होती है। यही चिंता की बात है। यही मनुष्य के भीतर जानवर का उदय है। इस दिशा में हम बहुत तेजी से भाग रहे हैं। महानगरों, शहरों, कस्बों और गांवों को जंगल में बदलते जा रहे हैं। ऐसा जंगल, जहां हर कोई खतरे में है। सभी अपना जीवन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। जो ताकतवर है, वह कमजोर को, उसके जीने के अधिकार को निगल लेना चाहता है। जो शक्तिशाली है, वही जीवित रहेगा, यही सिद्धांत जंगल में काम करता है, यही हमारे समाजों में भी काम कर रहा है। यही जंगलराज है और कहना न होगा कि हम उसी तरफ बढ़ रहे हैं।

सबको धन चाहिए। ज्यादा से ज्यादा चाहिए। कितना चाहिए, कोई सीमा नहीं बता सकता। लालच कोई सीमा तय नहीं करने देती। जितना मिल गया, उससे ज्यादा चाहिए। कोई कठिनाई नहीं। मेहनत करो और कमाओ। खर्च करो या संग्रह करो, कोई नहीं पूछेगा। पर नहीं, बिना मेहनत के धन चाहिए। फिर क्या रास्ता है। ईमानदारी से तो नहीं मिल सकता। ईमानदारी से तो जीवन चलता रहे, इसी में प्रसन्नता अनुभव की जा सकती है। पर जीवन चलने भर से कोई भी प्रसन्न नहीं दिखता। वह शानदार ढंग से चलना चाहिए। बंगला होना चाहिए, आलीशान गाड़ी होनी चाहिए। इतना धन होना चाहिए कि ऐश्वर्य-वैभव की, विलासिता की, ऐश की जिंदगी जी जा सके। हमारे देश की दिन-ब-दिन बिगड़ती राजनीति ने लोगों के मन में यह लोभ पैदा किया है। सभी देखते हैं कि सड़क पर अदने आदमी की तरह घूमने वाला एक नालायक बच्चा अचानक किसी पार्टी का पदाधिकारी बन जाता है और फिर कुछ ही महीनों में उसकी वेश-भूषा, उसका रहन-सहन, उसकी चाल-ढाल, सब कुछ बदल जाता है। उसके खुरदरे चेहरे पर लुनाई आ जाती है, उसके हाव-भाव में चमक पैदा हो जाती है। देखते ही देखते उसका टूटा-फूटा घर गिर जाता है, वहां कई मंजिला इमारत खड़ी हो जाती है, वह लंबी शानदार गाड़ी में चलने लगता है। मध्यवर्गीय परिवारों के लोग बच्चों को नौकरशाह बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर क्यों लगा रहे हैं? उनके साथ भी यही बदलाव घटता है। राजनीति और नौकरशाही मिल-बांटकर गरीब जनता के हक को हजम कर रहे हैं, उनके लिए बनने वाली सरकारी योजनाओं का धन दोनों हाथों से समेट रहे हैं। अब धनोपार्जन ही नैतिकता है। जिसके पास धन है, वही सम्मानित हो रहा है। इसी बदलाव के मद्देनजर हर कोई किसी भी तरह येन-केन-प्रकारेण धन कमाना चाहता है, ताकि उसे भी समाज में मान-सम्मान मिले, प्रतिष्ठा मिले।

धन का यह लोभ इतना भयानक और विकराल होकर सामने आ रहा है कि लोग अपने लाभ के लिए दूसरों को केवल सामाजिक या आर्थिक ही नहीं बल्कि जान की क्षति भी पहुंचाने से नहीं चूक रहे। मिलावट, जमाखोरी, ठगी का साम्राज्य तेजी से फैल रहा है। नकली सामानों से बाजार पटा पड़ा है। फल, सब्जियां, खाद्यान्न सब कुछ मिलावटी है। कृत्रिम तरीके से सस्ते और खतरनाक रसायनों से दूध और घी बनाने की फैक्ट्रियां चल रही हैं। नकली दवाइयां बाजार में पटी पड़ी हैं। लोग इतने निर्मम हो गये हैं कि मौत का सामान बेचकर रातोंरात अपनी तिजोरियां भर लेना चाहते हैं। कोई मरे तो अपनी बला से। हाल के वर्षों में राजनीति में अपराधियों का जिस तेजी से प्रवेश हुआ, उसके पीछे भी कुछ इसी तरह का लोभ काम कर रहा है। अपराधियों को साफ नजर आता है कि तमाम राजनेता तो उनसे ज्यादा धन बटोर रहे हैं और कानून उनके प्रति या तो मौन है या लाचार। राजनेताओं का बहुत सारा काम अपराधियों के खद्दर में उतर आने से आसान हो गये। इस नाते दोनों का गठजोड़ बहुत मजबूत हुआ। कानून और न्याय का मूल तंत्र निहायत गैर-जिम्मेदार है और काफी हद तक अपराध और अपराधी के संरक्षण में जुटा हुआ है। आखिर इस तंत्र में शामिल लोगों को भी तो ऐश की जिंदगी की अपनी आकांक्षा पूरी करनी है। थाने, चौकियों से लेकर पुलिस अपसरों के दफ्तरों में क्या-क्या खिचड़ी पकती है, यह अब किसी से छिपा नहीं है। मीडिया का एक वर्ग भी इस लूट-तंत्र में बाकायदा हिस्सेदारी कर रहा है। सही मायने में तो दलालों ने सारी व्यवस्था का अपहरण कर लिया है और सब मिलकर लोगों की जेबें हल्की करने में लगे हुए हैं। गरीब जनता मूक और कातर इस कंचन-कीर्तन को देख रही है जबकि मध्यवर्ग इसे अपनी नियति मानकर रिश्वत देकर अपने काम कराने के लिए अभिशप्त है। अमीरों को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके पास दलालों, अपराधियों और घूसखोर अफसरों पर खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसा है।

धन और सत्ता को अन्योन्याश्रय का संबंध है। सत्ता व्यक्ति को शक्ति देती है और शक्ति से आप किसी का उपकार भी कर सकते हैं और किसी को तबाह भी कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में इस तरह के उदाहरण बार-बार दिखायी पड़ते रहे हैं। सत्ता के लोभ ने राजनीति का चरित्र ही बदल दिया है। सैद्धांतिक विरोध और असहमति की जगह राजनेताओं में व्यक्तिगत शत्रुता की भावना देखी जा सकती है। यह भाव उनके समर्थकों में भी दिखायी पड़ता है। दरअसल राजनीति को अब जनकल्याण के माध्यम के रूप में नहीं देखा जाता बल्कि अपने स्वार्थों की पूर्ति के तंत्र के रूप में देखा जाता है। इसीलिए हर पार्टी सत्ता में पहुंचना चाहती है, हर नेता मंत्री बनना चाहता है। और एक बार वहां पहुंच जाने के बाद कीर्ति और कंचन के गुह्य द्वार अपने-आप खुल जाते हैं। बहुत कम नेता मिलेंगे, जो ईमानदारी से जनता की सेवा करने के लिए राजनीति में आये हों। राजनेताओं के पास अकूत धन कहां से आ जाता है। जीवन भर परम साधुत्व का लबादा ओढ़कर रहने वालों के पास भी जीवन की संध्या में करोड़ों की रकम बच जाती है, जिसके लिए उनके परिजनों में द्वंद्व छिड़ जाता है। आशय स्पष्ट है कि सत्ता ताकतवर और अमीर बनने की कुंजी है। इस कुंजी को हथियाने के लिए नेता सारी मर्यादाओं को ताक पर रख सकता है, अपनी भाषा को, अपने संयम को तलाक दे सकता है। यह हो भी रहा है। सदनों में मारपीट, जूते-चप्पल चलना आखिर किस ओर संकेत करता है। जब हाथ में चप्पल, गमले, कुर्सी आ जायं तो समझना चाहिए कि व्यक्ति ने खुद को भाषा में व्यक्त करने की संभावना खो दी है। यह पागलपन है, यही आदमी को जानवर हो जाना है।

ऐसी हालत में मीडिया पर बड़ी जिम्मेदारी है, पर मीडिया पर भी ज्यादातर उन्हीं लोगों का नियंत्रण है, जो इस बदलाव में कोई बुराई नहीं देखते। आखिर उन्हें भी तो अपना व्यापार चलाना होता है, ज्यादा से ज्यादा पाठक और विज्ञापन जुटाने होते हैं। यह नजरिया मीडिया को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से विचलित करके उसी अँधेरी सुरंग में जाने को विवश करता है, जहां सब केवल धन उगाहने में जुटे हैं। मीडिया की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता पर यदा-कदा ऊंगलियां उठती दिखायी पड़ती हैं लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि वह अभी भी पूरी तरह स्खलित नहीं हुआ है। सर्वतोमुखी भ्रष्टाचार और सिद्धांतहीनतावाद के बावजूद मीडिया और ऊंची अदालतों में अभी सांस बाकी है। हमने देखा है कि रुचिका के परिजनों को न्याय दिलाने में, आयुषी के मामले में जांच का पीछा करने में, मट्टो कांड को कब्र से बाहर घसीट लेने में, सांसदों को रिश्वत लेते पकड़ने में और इस तरह के तमाम ऐसे मामलों को न्याय की देहरी तक ले जाने में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, जो अपराधियों और पुलिस की मिलीभगत से लगभग दफन ही कर दिये गये थे। टीआरपी और पाठक संख्या बढ़ाने की होड़ में हालांकि मीडिया ने भी अपना चेहरा काफी गंदा कर लिया है लेकिन उससे नाउम्मीद होने का कोई कारण नहीं दिखता। धीरे-धीरे हाल के वर्षों में मीडिया के भीतर एक और मीडिया जन्म ले रहा है, जो अपेक्षाकृत ज्यादा स्वाधीन, उग्र और आक्रामक दिखता है लेकिन अभी उसके भविष्य के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। स्वतंत्रता जिस आत्मसंयम की मांग करती है, वह कठिन काम है। अगर यह नया मीडिया संयम, निर्लिप्तता और मानवीय मूल्यगत प्रतिबद्धता के साथ अपनी जिम्मेदारियां पूरा करने के रास्ते पर चल सका तो निश्चित ही यह एक सार्थक और ताकतवर मंच की तरह उभरेगा। मीडिया को मनुष्य के लिए लड़ना है, इसलिए उसे अपनी स्वतंत्रता को संयमित रखना होगा, अपनी पक्षधरता बनाये रखनी होगी।

5 Responses to “जंगल की भाषा बोलता आदमी”

  1. banshidhar mishra

    bahut achchha lekh. rai sahab ko gambhir chintan ke liye sadhuvad. vyakti ke girawat ki puri tasvir khinchata hai apka aalekh. manav ka vikas path vichalit hua sa lagata hai. ishwar manushya ko sadbudhi de.

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  2. Anil Sehgal

    राजनेता, खद्दर में अपराधी, अधिकारी, मीडिया और अदालत का एक वर्ग भारत को एक हीन देश चूका है.
    वेसे भी खोर कल युग आ गया है.
    अवतरण भी हो गया है. श्री राम या श्री क्रिशन.
    थोडा इंतजार करें, सत युग आने ही वाला है.
    भारत का उद्धार निकट में ही है.
    जय श्री राम – जय श्री क्रिशन

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  3. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    मीडिया के तीनो रूप दृश्य. श्रव्य .छप्य.में एक साथ तीन तीन मोलिक समानताएं दृष्टव्य हैं .वे स्वयम्भू हैं .सबसे ज्यादा ताकतवर हैं .और सबसे ज्यादा प्रभावशीलता से सुसज्जित हैं .लोकतंत्र का चतुर्थ खम्बा जैसा मानद सम्मान किसी और ने नहीं बल्कि मीडिया ने स्वयम अपने लिए जन मानस के बीच गढ़ा है .
    मीडिया के भीतर एक और मीडिया के जन्म का उटोपिया अब वास्तविक रूप धारण करने लगा है .यह सर्व विदित है की वैश्विक आवारा पूंजी ने मानवता के सभी
    मूल्यों को बाज़ार की वस्तु वनाकर रख दिया है ..
    राजनीत आर्थिक मामले .तो पहले ही मीडिया के कब्जे में थे या यों कहें की मीडिया उनके कब्जे में था .अब सामाजिक स्संस्क्रुतिक और अध्यात्म क्षेत्रों को भी मीडिया ने अपनी छतरी के भीतर समेत लिया है .प्रस्तुत आलेख के अधिकांश मुद्दों से सभी सहमत हैं .

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  4. शहरोज़

    totally agree wth mr ray
    धन का यह लोभ इतना भयानक और विकराल होकर सामने आ रहा है कि लोग अपने लाभ के लिए दूसरों को केवल सामाजिक या आर्थिक ही नहीं बल्कि जान की क्षति भी पहुंचाने से नहीं चूक रहे। मिलावट, जमाखोरी, ठगी का साम्राज्य तेजी से फैल रहा है। नकली सामानों से बाजार पटा पड़ा है। फल, सब्जियां, खाद्यान्न सब कुछ मिलावटी है। कृत्रिम तरीके से सस्ते और खतरनाक रसायनों से दूध और घी बनाने की फैक्ट्रियां चल रही हैं। नकली दवाइयां बाजार में पटी पड़ी हैं। लोग इतने निर्मम हो गये हैं कि मौत का सामान बेचकर रातोंरात अपनी तिजोरियां भर लेना चाहते हैं। कोई मरे तो अपनी बला से।

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