कश्मीर’ पर ‘अब्दुल्ला और महबूबा’ के विगड़े बोल ?

                     प्रभुनाथ शुक्ल 

भारत में अभिव्यक्ति यानी बोलने की स्वतंत्रा का दुरुपयोग हो रहा है। जिम्मेदार पद पर बैठे लोग गलत बयानी करते रहते हैं। उनकी असंसदीय टिप्पणी और बयानों का समाज और राष्ट्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस बेफ्रिक रहते हैं। जिसकी वजह से समाज में हिंसा, घृणा, जातिवाद, अलगाववाद की जड़ें मज़बूत हो रहीं हैं। अभी हाल में उच्चतम न्यायालय ने तबलीगी जमात के मामले में साफ तौर पर कहा है कि देश में बोलने की आजादी का दुरुपयोग किया जा रहा है। सरकार को इस मामले में अदालत ने फटकार भी लगाई है। जब से वर्चुअल मीडिया का अभ्युदय हुआ है तब से यह स्थिति और घातक हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्लाह की तरफ़ से कश्मीर पर दिया गया एक विवादित बयान इसी की कड़ी है।

फारुख के इस बयान के खिलाफ पूरे देश भर में विरोध हुआ है। लोग उन्हें भारत विरोधी और देशद्रोही बता रहे हैं। सोशलमीडिया पर इस बयान की तीखी आलोचना हो रहीं है। सरकार से लोग उन्हें जेल भेजने की मांग कर रहे हैं। निश्चित रूप से इस बयान की जितनी निंदा की जाय कम है। कश्मीर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने मुखर विरोध किया है। कश्मीर में धारा- 370 और 35- ए की समाप्ति के बाद कश्मीरी नेताओं को घाटी का महौल शांत रखने के लिए नज़रबंद किया गया था। महबूबा मुफ्ती भी रिहाई के बाद जहरीले बोल बोले हैं। फारुख अब्द्दुला का बयान भारत के खिलाफ है। उस हालत में और जब दोनों देशों के बीच युद्ध के हालात हों, फ़िर फारूक कश्मीर और देश को क्या संदेश देना चाहते हैं यह पता नहीँ है। फारुख ने कहा है कि काश्मीर से धारा 370 हटने की वजह से भारत और चीन के बीच तनाव है। चीन भारत की इस नीति के खिलाफ है और उसकी कोशिश है कि 370 की पुनः बहाली हो। यह फारुख का दिवा स्वप्न है कश्मीर अब कोई मसला नहीँ है। दुनिया भारत के क़दम का कबूल कर चुकी है। तुम्हें क्या कबूल है यह तुम्हारी मर्जी।

पूर्व मुख्यमंत्री के इस बयान से साफ होता है कि फारुख और दूसरे राजनीतिक दल धारा- 370 के मसले की मशाल अभी जिंदा रखना चाहते हैं। क्योंकि अलगाववादी और कश्मीरी नेताओं के पास कोई मसला नहीँ है। घाटी की पुरी सियासत इसी पर आधारित होगी। कश्मीरी नेताओं की यह पुरी साजिश होगी कि आम कश्मीरी कभी मुख्यधारा में ना लौटे। क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो फ़िर उनकी राजनीति कैसे चलेगी। आज भी आम कश्मीरी देश के साथ है। वह किसी भी प्रकार की अलगाववादी नीतियों का समर्थन नहीँ करता है। वह घाटी में अमन चाहता है। लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था में सहभागी बनना चाहते हैं। लेकिन फारुख जैसे बेशर्म और राष्ट्रविरोधी लोग कभी कश्मीर को शांत नहीँ देखना चाहते हैं। वह कश्मीर में भारत विरोधी नीतियों को सुलगाए रखना चाहते हैं। कभी चीन तो कभी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाएंगे जबकि भारत के तिरंगे को आग के हवाले करेंगे। अब्दुल्लाह तुम भूल जाओ अब तुम्हारी साजिश कामयाब होने वाली नहीँ है। अब चीन नहीँ उसका बाप भी भारत का कुछ नहीँ बिगाड़ सकते हैं।

फारुख अब्दुल्ला जैसे लोग शांत घाटी में एक रणनीति के तहत काम कर रहें हैं। कश्मीर में धारा- 370 हटने के बाद वहां शांति है। जिसकी वजह से राजनेताओं को सरकार रिहा कर रहीं है। काश्मीर में ठंड के साथ घाटी में बर्फबारी शुरू हो जाएगी। जिसके बाद पाकिस्तान से आतंकवादियों की घूसपैठ आसान नहीँ होगी। उस हालात में कश्मीरी नेता इस तरह का बयान देकर वहाँ एक महौल पैदा करना चाहते हैं। इस तरह के बयानों के बाद निश्चित रूप से भारत विरोधी महौल तैयार होगा। आम कश्मीरी नागरिकों की भावनाओं से खेला जाएगा। घाटी में आक्रोश पैदा करने की कोशिश होगी। हिंसा और आगजनी भड़काने की साजिश रची जाएगी। जिसे रोकने के लिए सेना और पुलिस अपना काम करेगी। जबकि अब्दुल्ला सेना और पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ महौल बनाएंगे। लोकतंत्र की दुहाई देंगे। मीडिया के माध्यम से दुनिया से अपील करेंगे कि कश्मीर में लोकतंत्र का गलाघोंटा जा रहा है। पुलिस और सेना मानवधिकारों के प्रति दमनकारी नीति अपना रही है। फ़िर चीन और पाकिस्तान कश्मीर पर यूएन में विलाप करेंगे। कश्मीर को लेकर दुनिया में एक महौल तैयार किया जाएगा। लेकिन अब यह सब सम्भव नहीँ है। सरकार और सेना को ऐसे लोगों के खिलाफ कठोर नीति अपनानी चाहिए। क्योंकि कश्मीर अब कोई मुद्दा नहीँ है।

भारत विरोधी मुहिम में लगा कश्मीर का कोई भी राजनेता कभी भी राष्ट्रवाद की बात नहीँ करता है। वह फारुख अब्दुल्लाह , उमर, गिलानी, महबूबा, मुफ्ती मोहम्मद सईद और अनगिन चाहे जो लोग रहे हों सभी ने कश्मीर पर भारत की नीतियों का खुला विरोध किया है। सवाल उठता है कि कश्मीरी नेता भारत से कश्मीर को अलग क्यों देखते हैं। वह विशेष राज्य का दर्जा क्यों चाहते हैं। वह भारत में रहकर कश्मीर को अलग क्यों मानते हैं। राष्ट्र की मुख्यधारा और उसकी आत्मा से क्यों नहीँ जुड़ना चाहते हैं। आम कश्मीरी को कोई दिक्कत नहीँ है। वह चाहता है कि घाटी का महौल शांत रहें। यहाँ अमन- चयन लौटे। सेब की अच्छी खेती हो। डल झील में शिकारा आबाद रहे। भारी संख्या में पर्यटक आएं और उनकी रोज़ी- रोटी चलती रहे। देश के साथ दुनिया भर के सैलानी कश्मीर की खूबसूरती देखना चाहते हैं। लेकिन अलगाववादी और राजनेता चाहते हैं कि कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मसला बनाए रखा जाए। यह कैसी घृणित सोच है।

फारुख अब्दुल्ला ने कहा है कि हमने धारा- 370 हटाने को कभी स्वीकार नहीं किया है। जो इन्होंने पाँच अगस्त को किया है, वो यहाँ कबूल करने के लिए कोई तैयार नहीं है। फारुख अब्दुल्ला आप जैसे अनगिनत लोग इसे कबूल नहीँ करना चाहते हैं। अब आपके चाहने से देश नहीँ चलेगा। देश आम सहमति से चलेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था से चलेगा। आपके कठमुल्लेपन से नहीँ चलेगा। जिस पाकिस्तान और चीन की हिमायत करते हो क्या पाकिस्तान और चीन में जाकर ‘भारत जिंदाबाद’ के नारे लगा सकते हो ? अगर दम है तो करके दिखाओ, फ़िर भारत विरोधी बात करो। चीन में उईगर मुसलमानों की बात क्यों नहीँ उठाते हो। पाकिस्तान में हिन्दुओं की प्रताड़ना पर क्यों आँखों पर पट्टी बाँध लेते हों। कश्मीरी पंडितों के पलायन पर क्यों साँप सूंघ जाता है। फारुख अब्दुल्ला, मैडम महबूबा जैसे लोग पाकिस्तान और चीन परस्त बातें कभी भूल कर भी नहीँ करते, लेकिन हमारी राजनीति और सत्ता की चाहत ने उन्हें आँखों पर बिठा दिया। यह बोलने की आजादी का सीधा दुरुपयोग है। सरकार को राष्ट्र विरोधी तागतों के खिलाफ सख्त से सख्त क़दम उठाने चाहिए। इस तरह के बयानों से देश की एकता और अखंडता कमजोर होती है।

1 thought on “कश्मीर’ पर ‘अब्दुल्ला और महबूबा’ के विगड़े बोल ?

  1. सच कहा है,”भारत में अभिव्यक्ति यानी बोलने की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हो रहा है।” और इसे क्योंकर रोका जाए पर गहन विचार विमर्श होना चाहिये। कल तक नेहरु की इंडिया में घोर अनैतिकता व भ्रष्टाचार के चलते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी तो आज युगपुरुष मोदी जी के नेतृत्व के अंतर्गत केंद्र में स्थापित राष्ट्रीय शासन में नेहरु के अनुयायियों को स्वयं बोलना होगा कि क्योंकर उन पर रोक न लगे! मैं स्वयं मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास रखता हूँ लेकिन उसके लिए उपयुक्त वातावरण अति आवश्यक है। आज कोविद-१९ जैसे संक्रामक महामारी से जूझने व रोकथाम हेतु संसार के सभी देशों में मानवाधिकार पर किसी न किसी प्रकार की रोक लगी है तो मैं पूछता हूँ कि इंडिया में १९४७ से बनी ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस-१८८५ से रोग-ग्रस्त लोगों पर क्योंकर रोक न लगाईं जाए?

    तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात से ही कांग्रेस-१८८५ जैसे भयंकर रोग का इलाज केवल कांग्रेस-मुक्त इंडिया ही नहीं बल्कि अभी तो इंडिया का पुनःनामकरण द्वारा राष्ट्र को भारत के नाम से पहचानना होगा।

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