ताकत त्रिदेवियों की!

भारत भूमि हर मायने में सशक्त नारियों की धरती रही है। चाहे पौराणिक काल में दुर्गा, काली, जैसी महादेवियों द्वारा प्रचंड दानव दलन रहा हो और चाहे आधुनिक काल में भारत की गुलामी के दौर में रानी झासी, रानी चेन्नमा, बेगम हजरत महल व झलकारी बाई जैसी वीरांगनाओं का गोरों के छक्के छुड़ाना।
आजादी के बाद पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इन्दिरा गांधी को दुनिया ऐसे ही लौह महिला नहीं मानती थी। और अब सुषमा स्वराज, निर्मला सीता रमण व ईनम गंभीर जैसी महिलाये देश के उस हर दुश्मन को हर तरीके से मुंहतोड़ जवाब देने को तत्पर है जो भारत पर बुरी नजर रखता है। जिस तरह बीते सप्ताह संयुक्त राष्ट्रसंघ के विश्व व्यापी मंच से पहले ईनम गंभीर फि र सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान के हुक्मरानों के झूठे दावो के परखचे उड़ाते हुये उन्हे मुंह छुपाने पर मजबूर कर दिया उसी तरह निर्मला सीतामरण की रणनीति से पाकिस्तानी आतंकियों का नेस्तनाबूद होना तय है। हां यदि भूल से भी पाकिस्तान ने भारत से भिडऩे की कोशिश की तो निर्मला रणचंडी का रूप भी धारण कर सकती हंै।

 

संयुक्त राष्ट्र सभा में गत सप्ताह शुक्रवार व शनिवार को भारत की दो सशक्त महिलाओं ने जिस तरह पाकिस्तान के पिलपिले हुक्मरानों पर करारा हमला बोला उससे न केवल वे भारत व पूरी दुनिया से मुंह छिपाते नजर आये वरन् अपने देश पाकिस्तान में भी अपनी फ जीहत से नहीं बच सके हैं।
शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव ईनम गंभीर ने पाक प्रधानमंत्री अब्बासी की ऐसी        फ जीहत की जिसे वो शायद ही ताजिंदगी भूल पायें। भारत पर उनके झूठे व मनगढ़ंत आरोपों का करारा जवाब देते हुये ईनम ने अब्बासी को छठी का दूध याद दिला दिया।
पाकिस्तान को ‘टेररिस्तान’ की संज्ञा देते हुये ईनम ने कहा कि पाक हुक्मरानोंं को याद रखना चाहिये कि अब उसके सभी पड़ोसी तथ्यों को तोड़ मरोडऩे, धूर्तता, बेईमानी तथा छल-कपट पर आधारित कहानियां तैयार करने की उसकी चालों से भलीभांति परिचित हो चुके है और परेशान है। उन्होने जोर देकर कहा कि वैकल्पिक तथ्यों को तैयार करने के प्रयासों से वास्तविकता नहीं बदल जाती।
भारतीय राजनायिक ईनम ने कहा कि पाकिस्तान अपने छोटे से इतिहास में आतंक का पर्याय बन चुका है। पाकिस्तान के नाम पर चुटकी लेते हुए उन्होने कहा कि पाक का अर्थ है शुद्ध अथवा पवित्र लेकिन वह भूमि जिसे पाक बनाना था वह अब वास्तव में विशुद्ध आतंक की भूमि बन चुकी है। पाकिस्तान अब टेरनिस्तान है जहां वैश्विक आतंकवाद का फ लता-फ ूलता उद्योग है जो आतंक पैदा कर रहा है और उसका निर्यात कर रहा है। उन्होने कहा कि उसकी वर्तमान स्थिति का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि लश्कर ए तैयबा जिसे संयुक्त राष्ट्र ने आतंकी संगठन घोषित किया है, उसका प्रमुख हाफि ज मोहम्मद सईद अब राजनीतिक दल का नेता बनने की तैयारी कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार ईनम गंभीर के करारे हमले से सदमें में पहुंचे पाकिस्तान के हुक्मरान तब कोमा जैसी स्थिति में आ गये जब शनिवार को भारत की विदेशी मंत्री सुषमा स्वराज ने उन्हे महासभा में ही नंगा करके छोड़ा।
सुयंक्त राष्ट्र महासभा में अपने सम्बोधन में सुषमा स्वराज ने कहा कि भारत ने आईआईटी, एम्स, आईआईएम बनाये। डाक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक बनाये लेकिन पाकिस्तान ने आतंकवादी और जिहादी पैदा किये। डॉक्टर मरते हुये लोगो की जिंदगी बचाते है और आतंकी जिंदा लोगो को मौत के घाट उतारते हंै।
विदेश मंत्री श्रीमती स्वराज ने पाक के प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी के भारत पर लगाये गये सभी आरोपों का सिलसिलेवार ढंग से जवाब दिया लेकिन आतंकवाद पर उनकी सबसे ज्यादा बखिया उधेड़ी। उन्होने कहा कि भारत तो गरीबी से लड़ रहा है लेकिन पड़ोसी हम से लड़ रहा है। जो हैवानियत की हदें पार कर लोगो को मार रहा है वो हमें इंसानियत और मानवाधिकार का पाठ पढ़ा रहा है।
जिन्ना के शांति और दोस्ती की विरासत का हवाला देने के खाकन के बयान की खिल्ली उड़ाते हुए सुषमा ने कहा कि जिन्ना ने क्या कहा और क्या नहीं कहा यह तो इतिहास की बात है। मगर पीएम नरेंद्र मोदी ने शांति और दोस्ती का हाथ बढ़ाया, मगर शांति किसने बदरंग की है यह पूरी दुनिया जानती है।
जम्मू-कश्मीर में तीसरे पक्ष की भूमिका के खाकन के बयान पर पाकिस्तान को आईना दिखाते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि शिमला समझौते और लाहौर घोषणा पत्र में द्विपक्षीय बातचीत से मसले हल करने की बात पाकिस्तानी हुक्मरानों को याद कर लेनी चाहिए। वे सब कुछ भूल जाते हैं। द्विपक्षीय वार्ता से भागने के पाकिस्तानी रवैये को बेनकाब करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि जब हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन के लिए वह इस्लामाबाद गई थीं तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ समग्र द्विपक्षीय वार्ता पर सहमति बन गई थी। इस पर बात आगे क्यों नहीं बढ़ी इसका जवाब पाकिस्तान को देना है हमें नहीं।
सूत्रों के अनुसार जहां दो सशक्त भारतीय महिलाओं ने सयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से पाकिस्तान को दिन में तारे दिखा दिये वहीं देश की रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पाकिस्तान के आतंकियों को चुन-चुनकर भारत के भीतर व बार्डर पर ही ढेर करने की सेना व सुरक्षाबलों को पूरी छूट दे चुकी है। वो देश के तीनों सेनाओं के अध्यक्षों से मुलाकात कर इतनी पुख्ता रणनीति बना चुकी है कि यदि पाकिस्तान की सेना बार्डर पर जरा भी हरकते करें तो उसका बदला पाकिस्तान के अंदर तक घुसकर दिया जाये।
वास्तव में सच तो यह है कि भारत की तीनों सशक्त महिलाओं ने अपनी-अपनी रणनीतियों से भारत की पौराणिक काल की जहां दुर्गा व काली जैसी महादेवियों की तो आधुनिककाल की वीरंागनाओं व विदुषी महिलाओं की यादें ताजा करा दी।
पाकिस्तान ही नहीं पूरी दुनिया को ध्यान में रखना चाहिये कि भारत हमेशा से हर मायने में सशक्त नारियों का देश रहा है। पौराणिककाल में जहां दुर्गा व काली जैसी महादेवियों ने बड़े-बड़े दानवों का संघार  कर डाला था वहीं आधुनिककाल में झांसी की रानी, रानी चेन्नमा, बेगम हजरत महल व झलकारी बाई जैसी वीरागंनाओं ने ब्रिटिश शासकों के छक्के छुड़ा दिये थे।
देश की आजादी के बाद भला पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इन्दिरा गांधी की बहादुरी को कौन भूल सकता है। १९७१ के भारत पाक युद्ध में भारत ने न केवल पाकिस्तान के ९३ हजार सैनिको को आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया था वरन् उसने पाकिस्तान के दो टुकड़े करवा दिये थे जो आज दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश के रूप में मौजूद है।

 

काश! वो एक आदर्श राजनेत्री सिद्ध हो पाती
पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अतीत की जुझारू राजनीति भला कौन भूल सकता है। १९७० में कांग्रेस पार्टी से राजनीति की शुरूआत करने वाली ममता बनर्जी यदि बामपंथियों के गढ़ में अपने को राजनीतिक रूप से स्थापित कर सकी। यदि वह २०११ के बामपंथियों के अभेद्य किले को ध्वस्त कर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन सकी तो नि:संदेह यह उनकी सादगी व विरल संघर्षो की राजनीति का ही परिणाम रहा है।
वामपंथी सरकार के विरूद्ध समय-समय पर आंदोलन चलाने वाली ममता ने सड़कों पर पुलिस की जितनी लाठियां खाई हैं, उतनी लाठियां शायद ही देश की  किसी अन्य महिला राजनेत्री ने खाई हों। बार-बार पुलिस की बर्बरता का शिकार होने वाली ममता दीदी ने अंतत: बंगाल की धरती पर राजनीति का जो नया             फ लसफ ा लिख डाला उसकी मिसाल भी मिलनी मुश्किल है।
१९८४ के लोकसभा चुनाव में जब ममता दीदी ने बामपंथी राजनीति के एक प्रमुख स्तम्भ माने जाने वाले सोमनाथ चटर्जी को पटखनी दे दी थी तो बामपंथी राजनीति में भूचाल सा आ गया था।
एक सूती धोती व हवाई चप्पल के पहनावे के चलते आम जन के बीच सादगी व त्याग की पर्याय बन चुकी ममता दीदी ने कालांतर में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से बढ़ते मतभेदों के चलते आखिरकार १९९६ में पार्टी ही छोड़ दी और १९९७ में उन्होने तृणमूल कांग्रेस के नाम से नई पार्टी का गठन कर लिया।
इसके बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनकी धाक बढ़ती चली गई। १९९९ के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद वह भाजपा से गठबंधन करके राजग सरकार में शामिल हो गई और उन्हे सरकार में रेल मंत्री का पद मिला।
ममता दीदी की ज्यों-ज्यों राजनीतिक ताकत बढ़ती गई त्यों-त्यों उनके तेवर भी बदलते गये। बात-बात में वह सरकार के शीर्ष नेतृत्व से भिडऩे लगी। ऐसे में उन्होने राजग तो कभी सप्रंग का दामन थामा। अलबत्ता इसी बहाने खासकर बंगाल के लोगो को वह दिखाती/बताती व जताती रही कि वह बंगाल के लोगो के हितों के लिये कुछ भी कर सकती है।
उन्हे सकल सुफल तब प्राप्त हुआ जब २०११ के विधान सभा चुनाव में उन्होने बुद्ध देव भट्चार्य की बामपंथी सरकार का तख्ता पलटकर सत्ता पर कब्जा कर लिया। यकीनन करीब तीन दशकों तक पश्चिम बंगाल में एक छत्र राज्य करने वाली बामपंथी सरकार का किला ढहाकर उन्होने नया इतिहास रच डाला था।
सत्ता हथियाने के बाद पांच वर्षो के अपने शासन काल में ममता दीदी ने शनै:-शनै: एक आदर्श राजनेत्री का चोला उतार फ ेंका। उन्होने सत्ता बनाये रखने के वे सारे गुण-अवगुण सीख/समझ लिये जिनके लिये अन्य दलों की सरकारें व राजनेत्री /राजनेता बदनाम रहे हैं।
पराकाष्ठा तो तब दिखी जब वह भी छद्म धर्म निर्पेक्षता के रास्ते महज इसलिये चल पड़ी कि बंगाल के कोई २७ फ ीसदी मुसलमानों का वोट उनके हाथ से न निकलने पाये। यही कारण था कि उन्होने खुले तौर पर हिन्दुओं को अपमानित करने का खेल शुरू कर दिया। फि र तो हिन्दुओं के त्योहारों पर पाबंदियां लगाई जाने लगी। गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी उन्होने हिन्दुओं के त्योहारों पर पाबंदियां लगाई तो उच्च न्यायालय ने पुन: उन्हे कड़ी हिदायत देने में चूक नहीं की। हाईकोर्ट ने यहां तक कहा कि सरकार के पास अधिकार हैं पर असीमित नहीं हैं।
कोई भी आसानी से समझ सकता है कि माननीय हाईकोर्ट के फैसले का उन पर असर न पडऩा उनकी सोची समझी विकृति राजनीति का ही उदाहरण है।
हाईकोर्ट के आदेश के बहाने उन्होने अपनी प्रतिक्रिया में अल्पसंख्यकों का पक्ष लेने का कोई मौका नहीं गवाया। वो अल्पसख्यकों को रिझाने के लिये ही भाजपा व संघ के नेताओं के कार्यक्रमों को नहीं होने देती। रोहिग्या मुसलमानों को पश्चिम बंगाल में शरण देने की वकालत के पीछे उनका राजनीतिक मकसद भी छिपा नहीं है।
यहां यह भी गौरतलब है कि अब तक उनकी पार्टी, सरकार के कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के मुकदमें दर्ज हो चुके है। कुछ तो जेल की कोठरी में पहुंच चुके है पर ममता दीदी इसे साजिश बताती है। वो लालू प्रसाद यादव जैसों के साथ मंच साझा करके केन्द्र की मोदी सरकार को चलता करने की हुंकार भरती हैं।
कल तक पूरा देश जहां उन्हे एक आदर्श राजनेत्री के रूप में देख रहा था, आने वाले कल में यदि वो औरो की तरह सिर्फ  एक सम्प्रदाय विशेष की नेत्री रह जाये तो आश्चर्य की बात न होगी।

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