शख्सियत संगीत

सुमन कल्याणपुर :स्वर की वह शालीन नदी, जो चुपचाप बहती रही

संदीप सृजन

भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम इतिहास का एक और उज्ज्वल अध्याय समाप्त हो गया। सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका सुमन कल्याणपुर के निधन के साथ वह मधुर, कोमल और आत्मीय स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया जिसने कई दशकों तक भारतीय संगीत प्रेमियों के हृदयों को स्पंदित किया। वे उन विरल कलाकारों में थीं जिनकी पहचान केवल उनके गीत नहीं थे, बल्कि उनका सादा व्यक्तित्व, संगीत के प्रति समर्पण और प्रसिद्धि के बीच भी बनी रही उनकी विनम्रता थी। आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो केवल एक गायिका को नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की उस परंपरा को याद करते हैं जिसमें साधना, संस्कार और सुरों की पवित्रता सर्वोपरि थी।

सुमन कल्याणपुर का जन्म 28 जनवरी 1937 को ढाका में हुआ था। बाद में उनका परिवार मुंबई आकर बस गया। बचपन से ही संगीत के प्रति उनका झुकाव था और उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की। संगीत उनके लिए केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था बल्कि जीवन का आधार था। यही कारण था कि उनकी गायकी में कृत्रिमता नहीं बल्कि सहजता और आत्मीयता दिखाई देती थी। जब वे गाती थीं तो ऐसा लगता था मानो कोई बहुत अपना व्यक्ति मन की बात कह रहा हो।

सुमन कल्याणपुर ने ऐसे समय में संगीत जगत में कदम रखा जब लता मंगेशकर, गीता दत्त और आशा भोंसले जैसी महान गायिकाओं का वर्चस्व था। उस दौर में किसी नई गायिका के लिए अपनी अलग पहचान बनाना अत्यंत कठिन था लेकिन सुमन जी ने अपनी प्रतिभा, अनुशासन और निरंतर अभ्यास के बल पर धीरे-धीरे संगीत जगत में अपनी विशिष्ट जगह बनाई। उनकी आवाज़ में एक अद्भुत कोमलता थी जो प्रेमगीतों, विरह गीतों और भावपूर्ण रचनाओं को विशेष ऊँचाई प्रदान करती थी।

उनके करियर की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने कभी किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं की। वे स्वयं को किसी दौड़ का हिस्सा नहीं मानती थीं। शायद यही कारण था कि जब लोगों ने उनकी तुलना बार-बार लता मंगेशकर से की, तब भी उन्होंने कभी कोई कटु टिप्पणी नहीं की। उन्होंने हमेशा कहा कि यदि श्रोता उनके गीतों को पसंद करते हैं, तो वही उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। यह विनम्रता उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी।

सुमन कल्याणपुर के जीवन से जुड़ा एक अत्यंत रोचक किस्सा संगीत प्रेमियों के बीच वर्षों से चर्चित रहा है। उनकी आवाज़ का स्वरूप इतना मधुर और परिष्कृत था कि अनेक बार रेडियो श्रोता उनके गीतों को लता मंगेशकर का गीत समझ लेते थे। कई संगीत प्रेमियों को वर्षों बाद पता चला कि उनके प्रिय गीत वास्तव में सुमन कल्याणपुर ने गाए थे। इस भ्रम को लेकर वे कभी असहज नहीं हुईं। वे मुस्कराकर कहती थीं कि यदि लोग गीत को पसंद कर रहे हैं तो यही सबसे बड़ी बात है। उनके लिए कला कलाकार से बड़ी थी।

1960 के दशक का एक और महत्वपूर्ण प्रसंग उनके जीवन से जुड़ा है। उस समय मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर के बीच रॉयल्टी को लेकर मतभेद हो गया था और दोनों ने कुछ समय तक साथ गाना बंद कर दिया था। संगीतकारों के सामने कठिनाई थी कि रफ़ी साहब के साथ युगल गीत कौन गाए। ऐसे समय में सुमन कल्याणपुर ने अपनी प्रतिभा का ऐसा परिचय दिया कि संगीतकारों का विश्वास उन पर और बढ़ गया। उन्होंने मोहम्मद रफ़ी के साथ अनेक युगल गीत गाए जो बाद में बेहद लोकप्रिय हुए। यह उनकी गायकी की शक्ति थी कि इतने बड़े गायक के साथ भी उनकी आवाज़ पूरी गरिमा और आत्मविश्वास के साथ उभरकर सामने आती थी।

मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर की जोड़ी हिंदी फिल्म संगीत की सबसे मधुर जोड़ियों में गिनी जाती है। दोनों की आवाज़ों में अद्भुत सामंजस्य था। जब भी उन्होंने साथ गाया, ऐसा लगा मानो दो स्वर एक-दूसरे को पूर्णता प्रदान कर रहे हों। उनके अनेक युगल गीत आज भी रेडियो, मंचों और संगीत समारोहों में सुनाई देते हैं। संगीत समीक्षकों का मानना है कि यदि उस दौर की श्रेष्ठ युगल जोड़ियों की सूची बनाई जाए तो रफ़ी और सुमन कल्याणपुर का नाम निश्चित रूप से अग्रणी स्थान पर होगा।

उनकी गायकी की एक और विशेषता थी शब्दों के भाव को समझने की क्षमता। वे केवल सुरों की शुद्धता तक सीमित नहीं रहती थीं। गीत रिकॉर्ड करने से पहले उसके अर्थ, भाव और परिस्थिति को समझती थीं। परिणामस्वरूप उनके गीत केवल सुने नहीं जाते, बल्कि महसूस किए जाते हैं। यही कारण है कि उनके गाए हुए दर्दभरे गीत आज भी श्रोताओं के मन को छू लेते हैं।

सुमन कल्याणपुर का व्यक्तित्व अत्यंत सरल और संकोची था। फिल्म जगत में जहां कलाकारों के लिए लगातार चर्चा में बने रहना महत्वपूर्ण माना जाता है, वहीं उन्होंने हमेशा प्रचार से दूरी बनाए रखी। वे पार्टियों, विवादों और सुर्खियों से दूर रहती थीं। उन्हें लगता था कि कलाकार का सबसे बड़ा परिचय उसका काम होता है। आज के दौर में जब प्रसिद्धि के लिए अनेक प्रकार के प्रयास किए जाते हैं, सुमन जी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि केवल प्रतिभा और परिश्रम के बल पर भी सम्मान अर्जित किया जा सकता है।

मराठी संगीत जगत में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने अनेक मराठी भावगीत और भक्ति गीत गाए जो आज भी लोकप्रिय हैं। महाराष्ट्र के संगीत प्रेमियों के बीच उनका सम्मान किसी दिग्गज कलाकार से कम नहीं था। उनकी आवाज़ में भक्ति और संवेदना का जो अद्भुत मेल था, वह श्रोताओं को सीधे हृदय तक स्पर्श करता था।

उनके जीवन से जुड़ा एक और सुंदर किस्सा अक्सर उनके समकालीन कलाकार सुनाया करते थे। कहा जाता है कि रिकॉर्डिंग के दौरान वे कभी जल्दबाज़ी नहीं करती थीं। यदि उन्हें लगता कि किसी शब्द का उच्चारण और बेहतर हो सकता है या किसी पंक्ति में भाव और अधिक गहराई से व्यक्त किया जा सकता है तो वे कई बार अभ्यास करती थीं। संगीत उनके लिए केवल पेशा नहीं था, इसलिए वे हर गीत को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर गाती थीं।

सुमन कल्याणपुर ने हिंदी के अलावा मराठी, गुजराती, बंगाली, असमिया, भोजपुरी, पंजाबी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी गीत गाए। यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण था। हर भाषा में वे उस भाषा की आत्मा को पकड़ने का प्रयास करती थीं। यही कारण है कि विभिन्न भाषाओं के श्रोता उन्हें अपना कलाकार मानते थे।

उनके करियर का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि उन्होंने अनेक ऐसे गीत गाए जो समय के साथ अमर हो गए। “आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे”, “तुमने पुकारा और हम चले आए”, “ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे”, “मेरे महबूब ना जा”, “अजब है दास्तां तेरी ऐ जिंदगी” और “दिल एक मंदिर है” जैसे गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने अपने समय में थे। इन गीतों की सफलता का कारण केवल उनकी धुन नहीं, बल्कि सुमन कल्याणपुर की भावपूर्ण प्रस्तुति भी थी।

संगीत जगत में उन्हें हमेशा एक सुसंस्कृत और मर्यादित कलाकार के रूप में देखा गया। उन्होंने कभी किसी विवाद का हिस्सा बनने की कोशिश नहीं की। उनकी सफलता का आधार केवल उनका संगीत था। शायद यही कारण है कि उनके बारे में बात करते समय लोग उनकी गायकी के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व की भी प्रशंसा करते हैं।

समय बदलता गया, संगीत की शैलियां बदलती गईं, नई पीढ़ियां आती गईं लेकिन सुमन कल्याणपुर की आवाज़ की मधुरता कभी पुरानी नहीं हुई। उनके गीतों में एक ऐसी शाश्वत ताजगी है जो हर पीढ़ी को आकर्षित करती है। आज भी जब उनके गीत सुनाई देते हैं तो लगता है मानो किसी पुराने मित्र की आत्मीय आवाज़ कानों में गूंज रही हो।

उनके निधन के साथ भारतीय संगीत का एक युग अवश्य समाप्त हुआ है लेकिन उनकी विरासत कभी समाप्त नहीं होगी। वे उन कलाकारों में थीं जिन्होंने यह सिद्ध किया कि महानता का संबंध प्रसिद्धि से नहीं बल्कि गुणवत्ता से होता है। उन्होंने अपने पूरे जीवन में संगीत को पूजा की तरह साधा और उसी साधना ने उन्हें अमर बना दिया।

आज जब हम सुमन कल्याणपुर को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं तो उनके स्वर हमारे भीतर फिर से जीवित हो उठते हैं। वे भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत आने वाली पीढ़ियों तक गूंजते रहेंगे। जब भी कोई संगीत प्रेमी उनके गीतों को सुनेगा, तब वह केवल एक धुन नहीं सुनेगा बल्कि भारतीय संगीत की उस स्वर्णिम परंपरा को महसूस करेगा जिसका सुमन कल्याणपुर एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय थीं।

सुमन कल्याणपुर का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची कला को प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। वह अपने गुणों के कारण स्वयं अमर हो जाती है। उनका स्वर आज भी भारतीय संगीत की स्मृतियों में उसी तरह जीवित है जैसे किसी शांत नदी का मधुर कल-कल नाद, जो दिखाई भले न दे लेकिन सदैव सुनाई देता रहता है। उनकी स्मृति को विनम्र श्रद्धांजलि।

संदीप सृजन