केंद्र सरकार के शिक्षा विभाग के मातहत कार्य करने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA)) पर पिछले कुछ वर्षों में कई बड़ी परीक्षाओं—विशेषकर NEET (UG), UGC NET और अन्य भर्ती/प्रवेश परीक्षाओं—को लेकर प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा केंद्रों की अनियमितताओं और प्रशासनिक खामियों के आरोप लगे हैं। इससे जागरूक युवाओं के बीच प्रगतिशील मोदी सरकार की छवि प्रभावित हुई है और सरकारी कार्यों की विश्वसनीयता पर उनके मन में संदेह पैदा हुआ है।
यही नहीं, संवैधानिक पदधारियों द्वारा इन्हें रोकने में विफलता से व्यवस्था के अंदर जड़ जमाये भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति के लोगों को बढ़ावा मिलने की चर्चाएं सामने आ रही हैं। हालांकि, यह कहना कि NTA “पूरी तरह विफल” है, एक राजनीतिक और मूल्यांकनात्मक निष्कर्ष होगा, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि सम्बन्धित एजेंसी को परीक्षा सुरक्षा और विश्वसनीयता बनाए रखने में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
जानकारों की मानें तो इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण बताए जाते हैं:-
पहला, परीक्षाओं का अत्यधिक विशाल आकार और सीमित संसाधन: NTA हर वर्ष लाखों अभ्यर्थियों के लिए देशभर में हजारों परीक्षा केंद्रों पर परीक्षाएं आयोजित करती है। इतनी बड़ी व्यवस्था में किसी एक केंद्र की चूक भी पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर देती है। शायद इसके लिए सीमित सरकारी संसाधन भी जिम्मेदार हो सकते हैं। लेकिन इनके प्रमुख शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की कतिपय कार्यशैली से युवाओं की चर्चाएं नाजायज भी नहीं है। यदि वो ओबीसी की जगह सवर्ण कोटे के मंत्री होते तो स्मृति ईरानी और प्रकाश जावड़ेकर की तरह कब की उनकी छुट्टी हो गई होती। लिहाजा उनके पॉलिटिकल बॉस गृह मंत्री अमित शाह की छवि भी इन घटनाओं से धूमिल हो रही है और इन लापरवाहियों को पैसे वालों की परोक्ष मदद के रूप में भी देखा-सुना जा रहा है।
दूसरा, परीक्षा केंद्रों पर निर्भरता और इनकी लापरवाही के विरुद्ध कठोर कानूनों का अभाव: NTA स्वयं अधिकांश परीक्षा केंद्र संचालित नहीं करती, बल्कि विभिन्न स्कूलों, कॉलेजों और निजी संस्थानों पर निर्भर रहती है। यदि किसी केंद्र पर सुरक्षा मानकों का पालन कमजोर हो, तो लीक या अन्य गड़बड़ियों का जोखिम बढ़ जाता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि छात्रों के स्वर्णिम भविष्य के ऐसे हत्यारों और इनकी गम्भीर लापरवाही के विरुद्ध कठोर कानूनों का अभाव क्यों है, किसके खातिर है। यह चिंतन का विषय है और संसद इस पर अविलम्ब कठोर कानून बनाने सम्बन्धी संजीदगी दिखाए।
तीसरा, संगठित नकल एवं पेपर-लीक गिरोह का प्रचलन और कठोर कार्रवाइयों का अभाव: कई राज्यों में वर्षों से सक्रिय संगठित गिरोह तकनीकी और मानव नेटवर्क का उपयोग करके परीक्षा प्रणाली में सेंध लगाने का प्रयास करते रहे हैं। केवल एजेंसी की सतर्कता पर्याप्त नहीं होती; इसके लिए राज्य पुलिस, साइबर एजेंसियों और खुफिया तंत्र का भी सहयोग आवश्यक होता है। चूंकि पैसे के बल पर ये बड़े नेताओं, अधिकारियों और न्यायाधीशों को नामी-गिरामी लोगों, उनके क्लबों के माध्यम से साध लेते हैं, इसलिए इनके विरुद्ध ज्यादा कठोर कार्रवाई संभव नहीं हो पाती है।
पांचवां, डिजिटल और साइबर सुरक्षा चुनौतियाँ: कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं और डिजिटल डेटा ट्रांसफर के दौर में साइबर सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन गई है। प्रश्नपत्र निर्माण, एन्क्रिप्शन, सर्वर सुरक्षा और अंतिम समय तक गोपनीयता बनाए रखना अत्यंत जटिल कार्य है। सवाल है कि सरकार विदेशी दबाव में जितनी जल्दी से डिजिटल प्रचलन को बढ़ावा दे रही है, और इसकी विभिन्न खामियों के चलते आमलोगों को जो खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, इसकी भरपाई सरकार को करनी चाहिए, या फिर ऐसे अव्यवहारिक सिस्टम को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि शिक्षा से ज्यादा वित्तीय डिजिटल धोखाधड़ी से आम लोग परेशान हैं।
छठा, जवाबदेही की बहुस्तरीय व्यवस्था से किसी एक को जल्दी जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता : प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञ, प्रिंटिंग एजेंसियां, लॉजिस्टिक प्रदाता, परीक्षा केंद्र, पर्यवेक्षक और स्थानीय प्रशासन—सभी इस प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। लिहाजा किसी भी स्तर पर हुई चूक का असर पूरी परीक्षा पर पड़ सकता है। लेकिन जवाबदेही की इस बहुस्तरीय व्यवस्था में से किसी एक को जल्दी जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।
छठा, तेजी से बढ़ता परीक्षा दबाव: भारत में उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों के सीमित अवसरों के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं का महत्व बहुत बढ़ गया है। लाखों उम्मीदवारों के भविष्य का दांव होने से परीक्षा प्रणाली को प्रभावित करने की कोशिशें भी बढ़ जाती हैं।
सातवां, संस्थागत क्षमता पर सवाल: आलोचकों का तर्क है कि NTA को जितनी परीक्षाओं की जिम्मेदारी दी गई है, उसके अनुपात में उसकी संस्थागत क्षमता, मानव संसाधन, निगरानी व्यवस्था और जोखिम प्रबंधन तंत्र को पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं किया गया।
आखिर क्या हो सकते हैं इसके समाधान?
एक, प्रश्नपत्र वितरण में एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन। दो, परीक्षा केंद्रों का अधिक कठोर ऑडिट। तीन, AI आधारित निगरानी और रीयल-टाइम अलर्ट सिस्टम। चार, पेपर-लीक मामलों में त्वरित जांच और समयबद्ध सजा। पांच,
संवेदनशील परीक्षाओं में अधिक कंप्यूटर आधारित परीक्षण। छह, NTA की प्रशासनिक और तकनीकी क्षमता का विस्तार। सात, केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय।
अंततः, प्रश्नपत्र लीक की घटनाएं केवल NTA की समस्या नहीं बल्कि भारत की व्यापक परीक्षा-प्रशासन प्रणाली की चुनौती हैं। हालांकि, चूंकि NTA इस व्यवस्था की प्रमुख संचालक संस्था है, इसलिए उसकी जवाबदेही सबसे अधिक तय होती है और उससे उच्च स्तर की पारदर्शिता, सुरक्षा तथा विश्वसनीयता की अपेक्षा की जाती है।
आखिर इससे मोदी सरकार और शिक्षा विभाग की छवि पर कितना असर पड़ रहा है?
हाँ, यदि किसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा रद्द होने, परिणाम विवाद या अन्य अनियमितताएँ बार-बार सुर्खियों में आती हैं, तो उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से केंद्र सरकार, शिक्षा मंत्रालय और परीक्षा संचालित करने वाली संस्थाओं की छवि पर पड़ता है। जहां तक
मोदी सरकार की छवि पर प्रभाव की बात है तो चूँकि NTA शिक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करती है, इसलिए बड़ी परीक्षा संबंधी विवादों का राजनीतिक असर अंततः केंद्र सरकार तक पहुँचता है। विपक्ष अक्सर ऐसे मामलों को प्रशासनिक विफलता, युवाओं के साथ अन्याय और जवाबदेही की कमी के रूप में उठाता है।
विशेष रूप से युवाओं में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की निष्पक्षता को लेकर चिंता बढ़ सकती है। सरकार के “पारदर्शी और तकनीक-आधारित शासन” के दावों पर सवाल उठ सकते हैं। प्रतियोगी परीक्षा देने वाले करोड़ों परिवारों के बीच असंतोष पैदा हो सकता है। विपक्ष को सरकार की आलोचना का एक प्रभावी मुद्दा मिल जाता है।
जहाँ तक शिक्षा मंत्रालय की छवि पर प्रभाव की बात है तो मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और शिक्षा मंत्रालय पर सीधा दबाव अधिक होता है क्योंकि परीक्षा व्यवस्था उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारी के दायरे में आती है। इससे मंत्रालय के सामने तीन चुनौतियाँ खड़ी होती हैं: एक, परीक्षा की विश्वसनीयता बनाए रखना। दो, प्रभावित छात्रों का विश्वास बहाल करना।
और तीन, यह दिखाना कि अनियमितताओं पर त्वरित और कठोर कार्रवाई की जा रही है।
लेकिन राजनीतिक प्रभाव की भी सीमाएँ हैं। राजनीतिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि समस्या कितनी व्यापक थी। सरकार की प्रतिक्रिया कितनी तेज और प्रभावी रही। जांच में क्या निष्कर्ष निकले। दोषियों पर कार्रवाई हुई या नहीं। जनता इसे संस्थागत समस्या मानती है या सरकार की प्रत्यक्ष विफलता। भारतीय राजनीति में मतदाता अक्सर शिक्षा, रोजगार, महंगाई, कल्याण योजनाएँ, राष्ट्रीय सुरक्षा, स्थानीय मुद्दे और नेतृत्व जैसे अनेक कारकों को एक साथ देखते हैं। इसलिए किसी एक परीक्षा विवाद का चुनावी असर हमेशा सीधा और समान नहीं होता।
जहां तक व्यापक निष्कर्ष की बात है तो बार-बार होने वाली परीक्षा संबंधी अनियमितताएँ सरकार और शिक्षा मंत्रालय की विश्वसनीयता को चुनौती देती हैं, विशेषकर युवाओं के बीच। यदि ऐसी घटनाएँ लगातार होती रहें और सुधारात्मक कदम प्रभावी न दिखें, तो इससे शासन क्षमता और संस्थागत भरोसे पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। वहीं यदि जांच, जवाबदेही और सुधार तेजी से दिखें, तो राजनीतिक और प्रशासनिक नुकसान को काफी हद तक सीमित भी किया जा सकता है।
कमलेश पांडेय