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जीवन के लिए जरूरी साइकल का साथ

‘विश्व साइकिल  दिवस’ (3 जून) पर विशेष

कुमार सिद्धार्थ

(तेज, आरामदायक और सुरक्षित सफर की खातिर दुनियाभर में स्वचालित, जीवाश्म ईंधन से चलने वाले वाहनों पर जोर दिया गया था, लेकिन करीब आधी सदी होते-होते तेजी, आराम और सुरक्षा को छोडिए, उलटे पर्यावरण का बंटाढार करते हुए दुनिया को जलवायु परिवर्तन तक पहुंचाने में परिवहन के इसी तरीके ने खासी भूमिका निभाई है। ऐसे में केवल मानवीय श्रम की बदौलत चलने वाली साईकल की क्या अहमियत है? प्रस्तुत है, ‘विश्व साइकल दिवस’ पर इसी की पडताल करता कुमार सिद्धार्थ का यह लेख।–संपादक)          

हर वर्ष 3 जून को ‘विश्व साइकिल दिवस’ मनाया जाता है। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ ने इस दिवस को इसलिए मान्यता दी ताकि दुनिया को यह याद दिलाया जा सके कि साइकिल केवल दोपहियों वाला साधारण वाहन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक बचत और टिकाऊ विकास का प्रभावी साधन है। आज जब दुनिया पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों, ऊर्जा संकट, प्रदूषण, और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब साइकिल फिर से चर्चा के केंद्र में आ गई है।

एक समय था, जब साइकिल भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में आम आदमी के जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। आधुनिकता की दौड़ में मोटर वाहनों की चमक-दमक के बीच साइकिल धीरे-धीरे सड़कों से हाशिये पर चली गई। अब दुनिया फिर समझ रही है कि विकास का अर्थ केवल तेज रफ्तार वाहन नहीं, बल्कि ऐसे साधन भी हैं, जो टिकाऊ हों और समाज के लिए लाभकारी हों।

आज जब पर्यावरण संरक्षण और ‘ग्रीन मोबिलिटी’ की बात होती है, तो इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी तकनीक, चार्जिंग स्टेशन और नई परिवहन योजनाओं की खूब चर्चा होती है। सरकारें इलेक्ट्रिक कारों और दो पहिया वाहनों को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं बना रही हैं। शहरों में चार्जिंग प्वाइंट स्थापित किए जा रहे हैं, लेकिन अफसोस है कि इन चर्चाओं के बीच पर्यावरण-अनुकूल साधन, पारंपरिक ‘साइकिल’ अक्सर गायब हो जाती है।

साइकिल ऐसा वाहन है, जिसे न पेट्रोल चाहिए, न डीजल, न बैटरी और न ही कोई चार्जिंग-स्टेशन। यह पूरी तरह मानव ऊर्जा पर आधारित है। इसके बावजूद शहरी परिवहन योजनाओं में इसे वह प्राथमिकता नहीं मिलती, जिसकी यह हकदार है। कई शहरों में ‘साइकिल लेन’ की योजनाएं बनीं, लेकिन अनेक जगहों पर वे अतिक्रमण, खराब डिजाइन और उपेक्षा के कारण सफल नहीं हो सकीं।

साइकिल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि एक समय सामाजिक समानता और सादगी का प्रतीक भी रही है। एक दौर में शिक्षक, विद्यार्थी, कर्मचारी, किसान और छोटे अधिकारी सभी साइकिल से यात्रा करते थे। इसमें वर्ग भेद कम दिखाई देता था। यही कारण है कि कई विचारकों ने साइकिल को लोकतांत्रिक वाहन कहा।

वर्ष 1960 के बाद जैसे-जैसे मोटर वाहनों की संख्या बढ़ी, साइकिल पीछे छूटने लगी। कारें और बड़े वाहन आधुनिकता और उपभोक्तावाद के प्रतीक बन गए। धीरे-धीरे साइकिल को पिछड़ेपन से जोड़कर देखा जाने लगा। परिणाम यह हुआ कि सड़कों पर कारों का कब्जा बढ़ता गया और साइकिल हाशिये पर चली गई। आज फिर परिस्थितियां बदल रही हैं। दुनिया समझ रही है कि महंगे ईंधन, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु संकट के दौर में साइकिल पिछड़ेपन का नहीं, बल्कि समझदारी और टिकाऊ जीवन शैली का प्रतीक है।

भारत आज भी दुनिया के बड़े साइकिल उपयोग करने वाले देशों में शामिल है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार देश में दस से 12 करोड़ से अधिक परिवारों के पास साइकिल उपलब्ध है। ग्रामीण भारत में इसका उपयोग और भी अधिक है। साइकिल उद्योग के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल एक करोड़ से अधिक नई साइकिलों की बिक्री होती है। पंजाब का लुधियाना देश के साइकिल निर्माण का बड़ा केंद्र माना जाता है। भारत दुनिया के बड़े साइकिल उत्पादक देशों में भी शामिल है।

दुनियाभर में साइकिल की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व में एक अरब से अधिक साइकिलें उपयोग में हैं। यूरोप, चीन, जापान और एशिया के कई देशों में साइकिल रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है। कई देशों में लाखों लोग प्रतिदिन साइकिल से अपने कार्यस्थल पहुंचते हैं। भारत में भी साइकिल प्रेमियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अब साइकिल केवल ग्रामीण या गरीब का वाहन नहीं रही, बल्कि शहरों में भी आर्थिक रूप से सम्‍पन्‍न युवा, पेशेवर, फिटनेस प्रेमी और पर्यावरण के प्रति जागरूक लोग इसे अपना रहे हैं।

आज दुनिया ऊर्जा संकट के दौर से गुजर रही है। अंतरराष्ट्रीय तनाव, युद्ध और आपूर्ति बाधाओं का असर सीधे पेट्रोल-डीजल की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ता है। भारत जैसे देशों में, जहां बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए जाते हैं, इसका असर आम आदमी की जेब पर साफ दिखाई देता है। इनकी कीमतें बढ़ने से न केवल यात्रा महंगी होती है, बल्कि परिवहन लागत बढ़ने से महंगाई भी बढ़ती है। ऐसे में साइकिल एक विकल्प है, जो पूरी तरह ईंधन मुक्त है।

छोटी दूरी के लिए अगर लोग साइकिल अपनाएं, तो ईंधन की खपत कम होगी, घरेलू खर्च घटेगा। यही कारण है कि ऊर्जा संकट के दौर में साइकिल फिर “भविष्य के परिवहन” के रूप में देखी जा रही है। देश-दुनिया में कई नेता, अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता साइकिल से आने-जाने या सार्वजनिक साइकिल अभियानों में भाग लेने का संदेश देते रहे हैं। यह केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि एक संकेत है कि सुविधा और जिम्मेदारी के बीच संतुलन संभव है।

आज दुनिया का सबसे बड़ा संकट जलवायु परिवर्तन है। पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहन बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसें छोड़ते हैं, जिससे वातावरण प्रदूषित होता है और धरती का तापमान बढ़ता है। साइकिल इस समस्या का सबसे सरल समाधान है। यह न धुआं छोड़ती है, न शोर करती है और न ही सड़क पर अधिक जगह घेरती है। शहरों में अगर छोटी दूरी के लिए साइकिल उपयोग को बढ़ावा मिले, तो प्रदूषण और ट्रैफिक दोनों कम हो सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया के कई शहरों में अलग ‘साइकिल लेन,’ सार्वजनिक साइकिल सेवा और सुरक्षित ट्रैक बनाए जा रहे हैं।साइकिल चलाना केवल सफर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का भी साथी है। यह हृदय को मजबूत बनाती है, वजन नियंत्रित रखती है, मांसपेशियों को सक्रिय करती है और मानसिक तनाव कम करती है। पर्यावरण-अनुकूल परिवहन की चर्चा में अगर साइकिल को फिर केंद्र में लाया जाए, सुरक्षित ‘साइकिल लेन’ बनाई जाएं और लोगों को इसे अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए, तो यह न केवल आम आदमी के लिए राहत होगी, बल्कि देश और दुनिया के लिए भी बड़ा समाधान साबित हो सकती है। सच तो यह है कि साइकिल केवल अतीत की याद नहीं, बल्कि वर्तमान की जरूरत और भविष्य की दिशा बनकर फिर हमारे सामने खड़ी है। दो पहियों पर चलने वाली यह साधारण सवारी हमें एक स्वस्थ, सस्ता, स्वच्छ और टिकाऊ भविष्य की ओर ले जा सकती है।