गावं और शहर के बीच झूलती जिंदगियां

जावेद अनीस

कोरोना संकट ने भारत के वर्ग विभाजन को बेनकाब कर दिया है, इसने हमारे कल्याणकारी राज्य होने के दावे के बुनियाद पर निर्णायक चोट करते हुये क्रोनी पूँजीवाद के चेहरे को पूरी तरह से सामने ला दिया है. लॉकडाउन लगाये जाने के बाद जिस तरह से लाखों की संख्या में मजदूर और कामगार अपने गावों की तरफ रिवर्स पलायन पर निकल पड़े उसकी मिसाल आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास में देखने को नहीं मिलती है. यह एक ऐसा वर्ग है जिसपर लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार पड़ी है या फिर यूं कहें कि उन्हें कष्ट कर दिया गया है, वे अपने देश में ही प्रवासी करार दिये गये.एक ऐसे समय में जब सबसे ज्यादा मदद की जरूरत थी तो उन्हें पूरी तरह से लावारिश छोड़ दिया गया जबकि इस देश के चुनावी राजनीति को चलाने वाले वही सबसे बड़े ईधन हैं. इस दौरान केंद्र और राज्य सरकारों का रवैया ऐसा रहा मानो इनका कोई वजूद ही ना हो. जब वे भूखे,प्यासे,बदहवाशी के आलम में सैकड़ों, हजारों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल ही निकल पड़े तब भी इस व्यवस्था का दिल नहीं पसीजा और उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज करते उनके हाल पर छोड़ दिया गया.

लॉकडाउन के दौरान शहरों में रोजगार पूरी तरह से ठप हो जाने के बाद मजदूरों को अपना गावं दिखाई पड़ा था जहाँ से वे शहर की तरफ पलायन करके आये थे ताकि वे अपने और अपने परिवार के लिये दो जून की रोटी का इंतजाम कर सकें और अब जब हम लॉकडाउन से अनलॉक की तरफ बढ़ रहे हैं तो एकबार फिर वे रोजगार की तलाश में उसी शहर की तरफ निकलने लगे हैं.

बीते कुछ दशकों के दौरान भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, इस दौरान  गांव में सीमित रोजगार, खेती के लगातार बिगड़ते हालात और शहरों में बढ़ते काम के अवसरों के कारण एक बड़ी आबादी शहरों की तरफ भागने को मजबूर हुई है. इनमें बड़ी संख्या छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों की है. ये वे लोग हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में भी हाशिये पर थे और शहरों में भी परिधि पर रहते हैं जिसे हम स्लम या झुग्गी बस्ती कहते हैं. शहरों के चमक-दमक के बीच इन बस्तियों में जीवन जीने के लिये सबसे बुनियादी जरुरतों का अभाव होता है. हालांकि यहां बसने वाली आबादी शहर की रीढ़ होती है जो अपने श्रम से शहर की अर्थव्यवस्था में बहुमूल्य योगदान देती है. ये श्रम शक्ति असंगठित औधोगिक श्रमिकों के अलावा निर्माण श्रमिक, छोटे दुकानदार, सब्जी-खाने का सामान बेचने वाले, अखबार बेचने वाले, धोबी, फेरी वाले, सफाई करने वाले,घरेलू कामगार इत्यादि जैसे काम करती है जिन्हें असंगठित क्षेत्र में गिना जाता है. नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण के तहत ‘‘विकास’’ का जो माडल अपनाया गया है उसकी परिधि से यह बड़ी आबादी बाहर है. उदारीकरण का असली लाभ कुछ लोगों को ही मिला है जबकि असंगठित का एक बड़ा हिस्सा जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी बेहतर जिंदगी जीने के लिए न्यूनतम सुविधाएं से भी दूर है. उनके बच्चों को न तो बेहतर शिक्षा मिल पाती है और न ही काम के बेहतर अवसर. ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक असमानता की खाई इस कदर चौड़ी हो गयी है कि देश के मात्र 57 अरबपतियों की संपत्ति देश के आर्थिक पायदान पर नीचे की 70 प्रतिशत आबादी की कुल संपत्ति के बराबर है.

दरअसल भारत में गावों से शहरों की तरफ पलायन और रिवर्स पलायन की समस्या इतनी बड़ी और व्यापक है कि इसे मनरेगा और गरीब कल्याण रोजगार अभियान जैसी योजनाओं के सहारे हल नहीं किया जा सकता हैं. इसके लिये व्यापक दृष्टि और दीर्घकालीन प्लानिंग की जरूरत है. इस दिशा में आगे बढ़ने के लिये सबसे पहले तो इसे राष्ट्र के एक ऐसे प्रमुख समस्या के तौर पर देखना होगा जिसके अंतर्गत देश की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी फंसी हुयी है तभी हम इसका कोई ठोस और स्थायी उपाय खोज सकेंगें. अगर हम ऐसे नहीं करेंगें तो इस आबादी के लिये शहर अस्थायी ही सराय बने रहेगें क्योंकि अब हमारे गावं इतने बड़े आबादी के पेट पालने की स्थिति में नहीं रह गये हैं. ऐसी स्थिति में करोड़ों जिंदगियां गावं और शहर के बीच झूलने को ही मजबूर रहेंगीं.   

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