लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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विजय कुमार

अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध किया जा रहा अपना आंदोलन समाप्त कर दिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी मंडली भी भंग कर दी है। कहना कठिन है कि वे हताश और निराश हैं या कोई और बात है ? यह निराशा किससे है ? स्वयं से या अपनी मंडली से; जनता से या राजनीतिक दलों और शासन से; या फिर सबसे ?

हां, अपनी मंडली को भंग कर अन्ना ने साहस जरूर दिखाया है। अब उनके तथाकथित साथियों में से कोई उनके नाम पर तमाशा नहीं कर सकेगा। 1947 के बाद गांधी जी भी चाहते थे कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाए, क्योंकि उसमें अलग-अलग विचारों के लोग एक तात्कालिक उद्देश्य के लिए एकत्र हुए थे। गांधी जी की इच्छा थी कि अब स्वाधीनता मिलने के बाद लोग अपनी-अपनी विचारधारा और कार्यप्रणाली के अनुसार राजनीतिक दल बनायें और चुनाव लड़ें। ऐसे में जनता जिसे चाहेगी, वह जीत कर शासन करेगा।

पर सत्ता की मलाई खाने को आतुर नेहरू और उनके चेलों ने गांधी जी की बात को ठुकरा दिया। गांधी जी मन मार कर इसे देखते रहे। गांधी जी की ऐसी क्या मजबूरी थी, जिसके कारण वे नेहरू के सामने कुछ बोल नहीं पाते थे; क्या नेहरू के पास गांधी जी के कुछ रहस्य सुरक्षित थे ? दक्षिण अफ्रीका से लौटने, और कांग्रेस में शामिल होने से पहले, गांधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उनकी ब्रिटिश सत्ताधीशों से जो भेंट एवं वार्ता कराई थी, क्या उसकी जानकारी नेहरू को भी थी ? ऐसे अनेक रहस्य आज भी पर्याप्त शोध की मांग करते हैं।

तो जो काम गांधी जी नहीं कर सके, वह अन्ना ने कर दिया। यद्यपि दोनों की तुलना अनुचित है। अन्ना का नैतिक कद गांधी जी के सामने बहुत छोटा है। 1947 में कांग्रेस के पास जेलयात्रा से तपे हुए लोगों का देशव्यापी संजाल था, जबकि अन्ना मंडली का आधार अंतरजाल और फेसबुक के माध्यम से जुड़े वे युवा हैं, जिनके लिए कैरियर सबसे महत्वपूर्ण चीज है। मनोरंजन के लिए वे कुछ दिन आंदोलन में शामिल भले ही हो गये हों; पर इससे आगे वे नहीं जा सकते। शायद इसी भय से अन्ना ने जेल भरो आंदोलन का आह्नान नहीं किया, अन्यथा दो दिन में ही उनके साथियों द्वारा फुलाए गुब्बारे की हवा निकल जाती।

सभी तरह के समाचार माध्यमों ने अन्ना के पहले दौर के आंदोलन को बहुत प्रमुखता दी; पर दूसरी बार नहीं। अन्ना मंडली इससे भी बहुत नाराज थी। उनका कहना है कि सरकार ने मीडिया को डराया है। यह बात ठीक हो सकती है, क्योंकि समाचार पत्र और दूरदर्शन के चैनल मालिक भी आखिर व्यापारी ही हैं, और व्यापारी को शासन ने डर कर चलना पड़ता है; पर अन्ना का जादू इस बार पहले जैसा नहीं चला, यह बात सौ प्रतिशत सत्य है।

जहां तक बाबा रामदेव के आंदोलन की बात है, पिछली बार की चोट उन्हें याद थी। फिर इस बार उनके दाहिने हाथ आचार्य बालकृष्ण भी जेल में हैं। ऐसे में बाबा ने भी उग्रता नहीं दिखाई और छह दिन बाद अपना सामान समेट लिया। यद्यपि उन्होंने भी आंदोलन जारी रखने की बात कही है; पर इस बार उनके आंदोलन में भी पहले जैसी गरमी नहीं दिखी।

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को यह समझना होगा कि किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए देशव्यापी तंत्र तथा जनता के मानस की तैयारी आवश्यक है। गांधी जी अपने हर बड़े आंदोलन के बीच में लगभग दस वर्ष का समय रखते थे। (खिलाफत 1920-21, सविनय अवज्ञा 1930, भारत छोड़ो 1942) इस दौरान वे देश भर में घूमकर जनता के मानस को समझते थे और अपनी बात जनता को समझाते थे। इस प्रवास से उनके देशव्यापी संजाल में वृद्धि होती थी, जिसका वे अगले आंदोलन में उपयोग करते थे।

पर यहां अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की कमजोरी प्रकट होती है। अन्ना के पास कम्प्यूटर और मोबाइल से सम्पर्क बनाने वालों का समूह था, जो पहली बार सड़कों पर उतरा; लेकिन दूसरी बार नहीं। बाबा रामदेव भगवा वस्त्र पहनते हैं, जिसके प्रति आम आदमी के मन में श्रद्धा रहती है। उनके पास देश भर में योगाचार्यों, दवा विक्रेताओं और उससे होने वाले लाभार्थियों का समूह है, जो उन्होंने पिछले 15 साल में बनाया है। पहली बार उस समूह के साथ जनता भी सक्रिय हुई; पर चार जून, 2011 को रामलीला मैदान से पलायन का प्रभाव जनमानस पर बहुत खराब पड़ा। इसलिए इस बार आंदोलन का पटाक्षेप उन्होंने बहुत सावधानी से किया। इससे आम जनता और उनके समर्थकों में उत्साह है।

अन्ना के आंदोलन से राजनेता दूर रहे; पर बाबा के मंच पर अंतिम दिन विपक्ष के नेता आये। बाबा ने भी खुलकर कांग्रेस का विरोध किया। इसका परिणाम क्या होगा, बाबा की जुगलबंदी इनके साथ कितने दिन चलेगी और उसका आगामी चुनाव पर क्या प्रभाव होगा, कहना कठिन है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जो विषय उठा रहे हैं, वे बिल्कुल ठीक हैं; पर कोई भी सरकार अपने हाथ से अपने ही गले में फंदा नहीं डाल सकती। इसलिए 2014 में यदि केन्द्र में किसी और दल या गठबंधन की सरकार आ जाए, तब भी इन दोनों की सभी मांगें पूरी नहीं की जा सकेंगी।

अन्ना और बाबा बार-बार ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की बात कहते हैं। यह बात 1974-75 में जयप्रकाश नारायण और 1988-89 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी कही थी; पर वे दोनों असफल हुए। जयप्रकाश जी चुनाव नहीं लड़े, जबकि वि.प्र.सिंह प्रधानमंत्री बन गये। इन दोनों की असफलता का कारण यह था कि इनके पास व्यवस्था परिवर्तन का कोई स्पष्ट प्रारूप नहीं था। जयप्रकाश जी की ‘समग्र क्रांति’ केवल नारा मात्र थी, जबकि वि.प्र.सिंह के नारों में धोखे के अलावा और कुछ नहीं था।

इसलिए अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को यदि व्यवस्था परिवर्तन करना है, तो इसका कोई प्रारूप जनता के सामने रखना होगा। फिर उस पर देश भर में बुद्धिजीवियों और संविधान विशेषज्ञों से लेकर गांवों में रहने वाले आम जन तक बहस चलानी होगी। जनता का मानस इसके लिए तैयार करना होगा। यदि जनता इसके लिए तैयार हुई, तो पहले सत्ता बदलेगी और फिर व्यवस्था।

देश में भ्रष्टाचार की जड़ ब्रिटेन से उधार ली गयी इस चुनाव प्रणाली में है। गांधी जी ने भी ‘बांझ’ कहकर इसकी आलोचना की थी। उनकी बात पूर्णतः सत्य सिद्ध हुई है। यह प्रणाली जनता को भाषा, जाति, मजहब, क्षेत्र और निजी स्वार्थों के आधार पर बांटती है। इसके द्वारा विधायक या सांसद बनने वाले नेता चुनाव जीतते ही अगले चुनाव का जुगाड़ करने लगते हैं।

इसीलिए मनमोहन सिंह जैसे शिक्षित और अनुभवी लोग लोकसभा में नहीं पहुंच पाते, जबकि पूर्व डकैत फूलनदेवी लोकसभा की सांसद और अपने पैरों पर खड़े न हो सकने वाले करुणानिधि मुख्यमंत्री बन जाते हैं। अन्ना और बाबा यदि चुनाव लड़ना चाहें, तो उन्हें भी अपने क्षेत्र और जातिगत समीकरण वाली सीट पर करोड़ों रुपये खर्च करने होंगे। इस पर भी वे जीत जाएंगे, यह निश्चित नहीं है।

काले धन के बल पर चुनाव जीते नेता, उन्हें लगातार धन पहुंचाने वाली पुलिस, प्रशासन, गुंडों और ठेकेदारों को हर तरह से सहायता देते हैं। इस दुष्चक्र का टूटना इस चुनाव प्रणाली में असंभव है। इसके चलते जाति, भाषा, क्षेत्र और मजहबवाद लगातार बढ़ेगा। यदि इन समस्याओं से निबटना है, तो संविधान, लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था की मर्यादा में ही ‘सूची प्रणाली’ को अपनाना होगा।

इसमें लोकसभा और विधानसभा का चुनाव व्यक्ति नहीं, अपितु राजनीतिक दल लड़ेंगे। केन्द्र और राज्य के चुनाव में क्रमशः राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय दलों को चुनाव से पहले अपनी पूरी सूची चुनाव आयोग को देनी होगी। फिर जिस दल को जितने प्रतिशत वोट मिलेंगे, उसके उतने सूचीबद्ध प्रत्याशी निर्वाचित मान लिये जाएंगे। इससे चुनाव का खर्च बहुत घट जाएगा। त्यागपत्र या मृत्यु की स्थिति में सूची का अगला व्यक्ति स्वतः सदस्य हो जाएगा। इससे कभी उपचुनाव नहीं होगा। योग्य, शिक्षित, अनुभवी तथा चरित्रवान लोग सांसद और विधायक बनेंगे। हर सांसद पूरे देश का प्रतिनिधि होगा तथा हर विधायक पूरे राज्य का।

इस प्रणाली से जाति, भाषा, मजहब और क्षेत्र की राजनीति करने वाले दल बहुत सीमित रह जाएंगे। अतः सब दलों और नेताओं को पूरे देश या राज्य की बात करनी होगी। एक-दो बार के चुनाव से लोग इसके अभ्यस्त हो जाएंगे और व्यापक सोच वाले दलों को पूरा बहुमत मिलने लगेगा। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि ग्राम, नगर और जिला पंचायत के चुनाव आज की व्यवस्था के अनुसार ही होने चाहिए, जिससे लोग अपने जन प्रतिनिधि को चुन सकें।

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के प्रति पूरे देश में आदर व श्रद्धा है; पर इस चुनाव प्रणाली के चलते भ्रष्टाचार नहीं घट सकता। जयप्रकाश जी और वि.प्र.सिंह के समय में जितना भ्रष्टाचार था, आज उससे कई गुना अधिक है। अतः जब तक सांप की मां को नहीं मारेंगे, तब तक सांप जन्म लेते रहेंगे। इसलिए भ्रष्ट बनाने वाली इस चुनाव प्रणाली की जड़ में ही जहर डालना होगा।

इस दूषित व्यवस्था को बदलने की जिम्मेदारी केवल अन्ना हजारे या बाबा रामदेव की ही नहीं है। यह काम उन सब संस्थाओं तथा संगठनों की प्राथमिकता सूची में भी आना चाहिए, जिनके लिए देश सर्वोपरि है। इन संस्थाओं के पास हजारों पत्र-पत्रिकाएं तथा विचार मंच आदि हैं, जिनके योजनाबद्ध प्रयास से पूरे देश में इस विषय पर जन जागरण किया जा सकता है।

3 Responses to “व्यवस्था परिवर्तन और वर्तमान आंदोलन”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbalhindustani

    अन्ना का पार्टी बनाने का फैसला बिलकुल सही है. व्यवस्था परिवर्तन और चुनाव सुधार सदन में जाकर ही सम्भव है, वर्तमान में किसी पार्टी से ये उम्मीद नही की जा सकती. ये लम्बा और मुश्किल रास्ता है लेकिन जनता के सामने विकल्प होगा तो आज नही तो कल सुधार आना शुरू हो जायेगा.

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  2. dr dhanakar thakur

    व्यवस्था परिवर्तनकी बात ठीक है पर सूची प्रणाली उसका जबबा नहीं है- आज की राज्य सभा में जैसे पैसे वाले , चमचे लोग जाते हैं वैसे ही तब भी होगा
    जागरण , संघर्ष और जरगर, संघर्ष ही उपाय है
    अन्ना , रामदेव ने जो किया वह बहुतों को करना होगा बार-बार करना होगा
    वर्तमान सभी राजनीतिक दल बेंमानी हो चुके हैं
    सामाजिक संघटनों में संघ भी जिसके आप लम्बे समय तक प्रचारक रहे (और मैंने भी पाने जीवन का बड़ा भाग लगाया) वह अपनी शतब्दी वर्ष तक डॉ हेडगेवार की साधना के प्रतिकूल लगने लगेगा यदि अभी से कड़ी आलोचना गलत निर्णयों की करने उनके सुनाने वलोंसे घृणा करना बंद न हो \पर हिंदुत्व मिटेगा नहीं वह बढेगा क्योंकि उसमे चिरंजीविने इ शक्ति है
    भारत घोटालों के चलते रहमे पर भी बढेगा पर ये रुके नहीं तो कम हो जाएँ इस प्रयास में अना – रामदेव का नाम हमेशा लिया जाएगा – जो जय प्रकाश नहीं कर सके जिस आन्दोलन को हम छात्रों ने इसी मुद्दे पर उठाया था वह राजनीतिक हुआ उसका दुःख नहीं उसने भी भ्रस्त राजनेताओं को ही जन्म दिया इसका दुःख है
    पर इसका अर्थ यह नही की उससे कुछ नहीं हुआ- लोगों मेनिर्भिकता आई
    अन्ना -रामदेव के आन्दोलन से भी भ्स्ताचार पर नकेल कसने की बात जरूर कुछ हद तक आगे बढ़ेगी

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  3. आर. सिंह

    आर.सिंह

    .विजय कुमार जी आपने बहुत विचार पूर्ण लेख लिखा है,पर आपकी बातों में निराशा झलकती है.देश के पास आज इतना समय नहीं है कि वह दस दस वर्षों का अन्तराल दे और न इसकी आवश्यकता है.संचार साधन न उपलब्ध होने कारण और बहुत दिनों तक लक्ष्य निर्धारण न होने के कारण भारत की आजादी की लड़ाई भी हचकोले लेती हुई चलती रही.इस आन्दोलन में आजादी की लड़ाई से दो भिन्नता तो साफ़ साफ़ है .एक लक्ष्य,जो कि व्यवस्था परिवर्तन है,दूसरा भ्रष्टाचार खत्म करना.मैं मानता हूँ की ये दोनों कठिन लक्ष्य हैं.यह बात इन आन्दोलनों की वर्तमान तथाकथित असफलता से दृष्टिगोचर हो रहा है.पर इसकी तह में जाने पर पता चलेगा कि इसमे कोई आन्दोलन असफल नहीं हुआ.इनदोनो आंदोलनों ने अपना काम का दिया उन्होंने जनता में जागरूकता ला दी.भूमि तैयार कर दी.जनता व्याकुल है भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए.यह भी सही है कि वर्तमान व्यवस्था ऐसा क़ानून नहीं लायेगी,जो व्यवस्था परिवर्तन में सहायक हो.अतः आवश्यकता हो जाती है विकल्प की. मैं मानता हूँ कि वर्तमान परिस्थतियों में विकल्प आसान नहीं है,पर वह उतना कठिन भी नहीं है.हो सकता है कि जो विकल्प लाने का प्रयत्न हो रहा है उसमें इतनी जल्दी सफलता नहीं हासिल हो,पर जनता के सामने कुछ नया तो आ जाएगा
    अन्ना का टीम आन्ना को तोडना आवश्यक था,क्योंकि इस टीम में जिस तरहं के विचार धारा के लोगों का जमाव था, उनको लेकर चुनाव के मैदान में नहीं उतरा जा सकता था.
    आज अन्ना की प्रसिद्धि गांधी से कम नहीं है.आज वे जेपी से आगे हैं.जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन की कमियों पर बहुत प्रकाश डाला जा चुका है.मेरे विचार से विकल्प लाने वाले उन कमियों को दूर करते चलेंगेअगर वास्तव में यह नयी पार्टी बन गयी और वे अपने को साफ़ सुथरा रखने में कामयाब हो गए तो बहुत कुछ परिवर्तित रूप में देखने को मिल सकता है.

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