गिरती साख

‘आप’ की लगातार गिरती साख

नीतियां सिर्फ शब्दों में हो और निष्ठा एवं नियत पर सन्देह की परतें पड़ने लगे तो राजनीति में शुचिता और शुद्धि कैसे आएगी? बिना जागती आंखों के सुुरक्षा की साक्षी भी कैसी! एक वफादार चैकीदार अच्छा सपना देखने पर भी इसलिए मालिक द्वारा तत्काल हटा दिया जाता है कि पहरेदारी में सपनों का खयाल चोर को खुला आमंत्रण है। केजरीवालजी! ईमानदारी अभिनय करके नहीं बताई जा सकती, उसे जीना पड़ता है कथनी और करनी की समानता के स्तर तक।