Sonu Nigam

अज़ान पर फिजूल की बहस

क्या लाउडस्पीकर पर जोर-जोर से चिल्लाना इस्लाम है? इस्लाम का जन्म हुआ तब कौन से लाउडस्पीकर चल रहे थे? सच्ची प्रार्थना तो वहीं है, जो मन ही मन की जाती है। ईश्वर या अल्लाह बहरा नहीं है कि उसे कानफोड़ू आवाज़ में सुनाया जाए। शायद इसलिए कबीर ने कहा हैः
कांकर-पाथर जोड़ि के मस्जिद लई चुनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, बहरा हुआ खुदाय।।

ध्वनि प्रदूषण न हिन्दू न मुस्लिम,केवल हानिकारक

धर्मस्थलों पर नियमित रूप से निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार होने वाले इस शोर-शराबे से लगभग पूरा देश दु:खी है। ध्वनि प्रदूषण बच्चों की पढ़ाई खासतौर पर परीक्षा के दिनों में उनकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत बाधक साबित होता है। मरीज़ों तथा वृद्ध लोगों के लिए ध्वनि प्रदूषण किसी मुसीबत से कम नहीं। आए दिन होने वाले जगराते,कव्वालियां या दूसरे शोर-शराबे से परिपूर्ण धार्मिक आयोजन यह सब हमारे समाज के स्वास्थय पर बुरा असर डालते हैं।