लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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-विजय कुमार

इन दिनों भगवा आतंक के नाम पर आतंकवाद के रंग की चर्चा छिड़ गयी है। चिदम्बरम् के गृह मंत्री बनने से जिनके दिल जल रहे थे, वे कांग्रेसी ही अब मजा ले रहे हैं। यह सौ प्रतिशत सच है कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता। यदि कोई भगवा, हरा, काला, नीला या अन्य किसी रंग को आतंक का प्रतीक बताता है, तो वह गलत है। ये सब रंग प्रकृति की अनुपम देन हैं। भगवा शब्द भगवान या ईश्वर का प्रतीक है। श्रीमद्भगवद्गीता, भगवद्ध्वज, भगवद्कृपा आदि शब्दों का उद्गम एक ही है।

जहां तक आतंकवाद के धर्म की बात है, तो धर्म और आतंकवाद का भी कोई संबंध नहीं है। धर्म की परिभाषा ‘धारयति इति धर्मः’ है। अर्थात जो धारण करता है, वह धर्म है। धर्म का अर्थ है वे नियम, कानून, परम्परा और मान्यताएं, जिनसे किसी संस्था, समाज, परिवार या देश का अस्तित्व बना रहता है।

धर्म को दूसरे शब्दों में कर्तव्य भी कहा जा सकता है। इसलिए माता, पिता, गुरू, छात्र, पुत्र, पुत्री, अध्यापक, व्यापारी, किसान, न्यायाधीश, राजा आदि के धर्म कहे गये हैं। एक व्यक्ति कई धर्म एक साथ निभाता है। घर में वह पिता, पति और पुत्र का धर्म निभाता है, तो बाहर किसान, व्यापारी या कर्मचारी का।

धर्म का पूजा पद्धति से कोई संबंध नहीं है। मनु स्मृति के अनुसार –

धृति क्षमा दमो अस्तेयम्, शौचम् इन्द्रिय निग्रह

धीर्विद्या सत्यम् अक्रोधो दशकम् धर्म लक्षणम्।।

अर्थात- धैर्य, क्षमा, बुरे विचारों का दमन, चोरी न करना, अंतर्बाह्य शुद्धता, इंद्रियों पर नियन्त्रण, बुद्धि, विद्या, सत्य बोलना तथा क्रोध न करना धर्म के दस लक्षण हैं।

धर्म की इस लाक्षणिक परिभाषा में देवता, अवतार या किसी कर्मकांड की चर्चा नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने भी हिन्दू को पूजा पद्धति की बजाय एक जीवन शैली स्वीकार किया है।

सच तो यह है कि धर्म पूरे विश्व में एक ही है, जिसे मानव धर्म कह सकते हैं। इसकी एकमात्र पहचान मानवता है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार –

मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे।

यह पशु प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे।।

और

अष्टादश पुराणेशु व्यासस्य वचनम् द्वयम्

परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम्।।

अर्थात- अठारह पुराणों में व्यास जी ने दो ही बातें कही हैं कि परोपकार करना पुण्य और दूसरे को सताना पाप है।

मानव धर्म के इन लक्षणों को हिन्दुस्थान के मूल निवासियों ने इतनी गहराई से अपने मन, वचन और कर्म में समाहित कर लिया कि दोनों पर्याय हो गये। अब कोई मानव धर्म कहे या हिन्दू धर्म, बात एक ही है। ऐसे श्रेष्ठ विचार या धर्म को आतंक से जोड़ना मानसिक दिवालियेपन के अतिरिक्त कुछ और नहीं है।

लेकिन यही बात मजहब के साथ नहीं कही जा सकती। मजहब का पर्याय रिलीजन तो है; पर धर्म नहीं। धर्म किसी एक ग्रन्थ, अवतार या कर्मकांड से बंधा हुआ नहीं है; पर मजहब में एक किताब, एक व्यक्ति और एक निश्चित कर्मकांड जरूरी है। मजहब में विरोध के लिए कोई स्थान नहीं है। इसलिए जहां-जहां मजहब गया, वहां हिंसा, हत्या, आगजनी और अत्याचार भी पहुंचे। यद्यपि आगे चलकर मजहब में भी सत्ता, सम्पदा, व्यक्ति और कर्मकांड के आधार पर सैकड़ों गुट बने; पर वे भी अपने जन्मजात स्वभाव के अनुसार सदा लड़ते ही रहते हैं।

मुसलमानों में शिया, सुन्नी और अहमदियों के झगड़े; ईसाइयों में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के झगड़े तथा कम्युनिस्टों में माओवादी, नक्सली आदि के आपसी झगड़े इसी का परिणाम है। ये तो कुछ प्रमुख गुट हैं; पर इनमें भाषा, क्षेत्र, जाति, कबीलों आदि के नाम पर भी झगड़ों की भरमार रहती है।

विश्व में इस समय मुख्यतः तीन मजहब प्रचलित हैं। इस्लाम और ईसाई स्वयं को आस्तिक कहते हैं, जबकि कम्युनिस्ट नास्तिक; पर ये तीनों हैं मजहब ही। मजहब की एक विशेष पहचान यह है कि वह सदा अपने जन, धन और धरती का विस्तार करता रहता है और इसके लिए वह हर मार्ग को उचित मानता है। पूरी दुनिया में युद्धों का इतिहास इसका साक्षी है। रूस, चीन, अरब, इराक, ईरान, अफगानिस्तान, बंगलादेश, पाकिस्तान, अमरीका, इंग्लैंड आदि सदा लड़ते और दूसरों को लड़ाते ही रहते हैं।

कुछ विचारक मजहब को अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिक दल मानते हैं। इसलिए इस्लाम के पैगम्बर के कार्टून डेनमार्क में बनने पर भी दंगे भारत में किये जाते हैं। चीन और रूस में देशद्रोही मुसलमानों का दमन होने पर दुनिया भर के मुसलमान उत्तेजित हो जाते हैं। इसीलिए 1962 में भारत पर आक्रमण करने वाली चीन की सेनाओं का भारत के कम्युनिस्टों ने ‘मुक्ति सेना’ कहकर स्वागत किया था और इसीलिए जनता शासन (1977-79) में जब भारत में लोभ, लालच और जबरन धर्मान्तरण पर प्रतिबन्ध लगाने का विधेयक श्री ओमप्रकाश त्यागी ने संसद में प्रस्तुत किया, तो उसका दुनिया भर के ईसाइयों ने विरोध किया था।

भारत के क्षुद्र मनोवृत्ति वाले राजनेता अपने वोट बढ़ाने या बचाने के लिए प्रायः किसी क्षेत्र, वर्ग या जाति के लिए सदा विशेष मांगों को लेकर शोर करते रहते हैं। यही स्थिति मजहबों की है। जहां और जब भी मजहबी लोग एकत्र होंगे, वे अपने लिए कुछ विशेष अधिकारों, सुविधाओं और आरक्षण की मांग करेंगे। जनसंख्या कम होने पर वे सभ्यता का आवरण ओढ़कर प्यार और मनुहार की भाषा में बात करते हैं; पर जैसे-जैसे उनकी जनसंख्या बढ़ती है, वे आतंक की भाषा बोलने लगते हैं। कश्मीर को हिन्दुओं से खाली करा लेने के बाद अब सिखों को मुसलमान बनने या घाटी छोड़ने की धमकी इसका ताजा उदाहरण है।

आतंकवाद सदा मजहब के कंधों पर ही आगे बढ़ता है, क्योंकि मजहबी किताबें इसे ठीक बताती हैं। आतंकवादी इन किताबों से ही प्रेरणा लेते हैं। कभी इकबाल ने ‘सारे जहां से अच्छा..’ लिखा था, जिसे हम मूर्खतावश आज भी ‘कौमी तराने’ के रूप में गाते हैं। इसकी एक पंक्ति ‘मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना’ के उत्तर में किसी कवि ने लिखा था, ‘मजहब ही है सिखाता, आपस में बैर रखना’। 1947 के विभाजन और लाखों हिन्दुओं की हत्या ने बता दिया कि कौन सही था और कौन गलत।

चिदम्बरम्, दिग्विजय या पासवान मुस्लिम वोट के लालच में चाहे जो कहें; पर वैश्विक परिदृश्य चीख-चीख कर मजहब और आतंकवाद के गर्भनाल रिश्तों को सत्य सिद्ध कर रहा है।

6 Responses to “आंतकवाद का रंग, धर्म और मजहब”

  1. Anil Sehgal

    “आंतकवाद का रंग, धर्म और मजहब” – by – विजय कुमार

    मेरे विचार में विजय कुमार जी लिखते हैं कि :

    (१) आतंक वाद का कोई रंग नहीं होता
    (२) धर्म का अर्थ नियम, कानून, कर्तव्य है
    (३) धर्म का संबध पूजा करने के ढंग से नहीं है
    (४) मजहब का अर्थ रिलिजन है; धर्म नहीं
    (५) आतंकवाद सदा मजहब के कंधों पर आगे बढ़ता है
    (६) मजहब और आतंकवाद के गर्भनाल रिश्ते हैं

    महाशय चिदम्बरम ने कह दिया है:
    * उनका काम था देश में एक सन्देश देना, जो उन्होने सफलता पूर्वक दे दिया है;
    ** भगवा शब्द प्रयोग करने वाले वह पहले नहीं हैं.
    *** उन्हें इस शब्द के प्रयोग पर कोई खेद नहीं है – न ही किसी प्रकार की गयी कोई गलती की.

    कार्यक्रम क्या होना चाहिए जिससे होम मिनिस्टर को भगवा रंग का अर्थ समझ आ जाये ?

    क) साधू समाज नित्य भगवा कपडा धारण करते हैं.
    क्या भगवा वस्त्र धारियों को यह समाचार अभी नहीं पहुंचा है ?
    क्या सोये रहेगे ?
    उनके वस्त्रों के रंग का संबध आतंकवाद से जोड़ा है, देश के होम मिनिस्टर ने, जिसको वह तुरंत समझा सकते हैं. क्या साधू गुलजारी लाल नंदा जी को भूल गए हैं ?
    जागो साधू समाज.

    ख) हिंदी धर्म का क्या अर्थ है?
    उच्चतम न्यायालय ने हिन्दू धर्म को पूजा की पद्धती नहीं कहा है, बल्कि जीवन पद्धती बताया है.
    हिन्दू धर्म का क्या मतलब बताया है यह घर-घर कौन समझा पाएगा ?
    हिन्दू धर्म का संबध पूजा करने के ढंग से नहीं है – यह समझाने का कार्य कौन करेगा ?

    चिताम्बरम जी ने अपना काम सफलता पूर्वक कर लिया है.

    NOW THE BALL IS IN THE OTHER COURT of सो फार स्लीपिंग Sadhu Samaj whose color of their daily cloth / attire has been connected to terrorism by no other person than the Home Minister of the country. जागो जागो.

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  2. GOPAL K ARORA

    कहावत है कि “सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखाई देता है” इसी प्रकार आजकल हमारे “धर्म निर्पेक्ष” “मुस्लिम वोट बैंक के लालचियों” को भगवा ही भगवा दिखाई देता है

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  3. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    अत्यंत सुंदर लिखा है,ये तिनो मजहब हमेशा से इस विश्व को मौत का अखाडा बनाये हुवे है करोडो लोगो के खुन से सनी एनकि किताबे सिवाय क्रुसेड-जेहाद-सर्वहारा की तानाशाही के शाब्दिक मकड जाल मे अपने लोगो को मुर्ख बना कर निर्दोषों का खुन बहा रही है.धर्म तो प्रेम सिखता है पर “मजहब” ग्रिना,एक हिन्दु कभि भी हिन्दु-अहिन्दु का भेद नही करता,ज्यादातर सन्त्गण अपने संगटनॊ का नाम मानव से ही शरु करते है,एसे हि विवेकान्न्द जी ने विश्व धर्म कहा था,और शिव महिम्न स्त्रोत ही उस पंक्ति को उधरित किया था जो ईशवर को समुद्र समान और नडीयो को सब पंथो के समान बताति है जो अंत मे समुद्र से ही जाकर मिलति है…………………………………….जब तक इन हिन्सक जातियो का अस्तित्व है तब तक हे हिन्दुओ! तुम दुष्टो का नाश करने और अपनी रक्षा मे सनद रहो,शिव नाम धारि चिदम्बरम तो वोटो के लालच मे मजबुर है पर तुम नहीं………………………

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  4. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    नाहक परेशां न हों .अब कोई तुक की बात पर माथापच्ची करो . वह निहायत मंदबुद्धि है जिसे भगवा में आतंक दिख रहा है .मेरे तो जितने भी भगवा धारी परिचित हैं ;उनमे एक भी ऐसा नहीं जो मख्खी भी मार सके .भगवा धारी दो प्रकार के हैं -एक -वे जो स्वामी दयानद सरस्वती .रामकृष्ण परमहंस ;स्वामी विवेकनद और स्वामी रामानुजाचार्य जैसे हुआ करते हैं वे किसी भी धरम की बुराई नहीं करते किन्तु अपने धरम पर आजीवन adig rahe .-doosre bhagwadhari वे जो samprdayik dangon के liye prsiddh हैं .ye swymbhoo bhagwadharee jarman fasiwad और goywals की bhindi nakal bha करते rahte हैं inse hota jata kuchh नहीं sirf afwahon ko hawa dekar andh raashtrwad की davagni में jal rahe हैं .ishwar inhen sadbuddhi de .

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  5. ateet

    Bahut Acha Likha hai Apne Vijay je,
    Ye jin logo ke apne name likha ye Vastav me Orangjen ki Aulad hai aur ye kabhi Desh Prem ki bate nahi kar sakte ,
    Rahi Bat digvijay singh ki hai mai bahut ache se janta hoo ye ek number ka Ayyas vyakti iska koi Amman nahi hai janha mans ka tukda paya wahi chatne lagta hai,
    Isne mere MP ko 10 salo Barbad kar diya lekin ab halat bahut Achi hai.

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