कुमार कृष्णन
कृष्ण का जन्म केवल एक बालक का जन्म नहीं है। वह उस क्षण का नाम है जब अंधकार के बीच प्रकाश उतरता है, भय के बीच निर्भयता जन्म लेती है और अत्याचार के बीच प्रतिरोध की पहली आहट सुनाई देती है। इसलिए जन्माष्टमी केवल उत्सव नहीं, आत्मचिंतन का अवसर भी है। यह पूछने का अवसर कि कृष्ण हमारे समय में कहां हैं और हमारे भीतर उनका जन्म कब होगा।
भागवत कृष्ण को लीला-पुरुषोत्तम के रूप में देखता है, जबकि गीता उन्हें कर्म, ज्ञान और भक्ति के समन्वयकारी पुरुष के रूप में हमारे सामने रखती है। कृष्ण का व्यक्तित्व जितना विराट है, उतना ही मानवीय भी। वे जीवन से भागने की नहीं, जीवन के बीच जागने की शिक्षा देते हैं।
भगवान विष्णु ने द्वापर युग में कृष्ण के रूप में अवतार लिया—ऐसी भारतीय धार्मिक परंपरा की मान्यता है। भागवत पुराण की कथा के अनुसार, उनके जन्म से पहले ही देवकी और वसुदेव के सामने उनका चतुर्भुज रूप प्रकट हुआ। उन्होंने अपने माता-पिता को आश्वस्त किया कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने वाले हैं और कंस के अत्याचार का अंत करेंगे। देवकी और वसुदेव ने उनसे बाल रूप धारण करने का आग्रह किया और देखते-देखते वह विराट सत्ता एक नवजात शिशु के रूप में माता की गोद में आ गई।
कृष्ण का जन्म कंस के कारागार में हुआ था। बाहर सत्ता का आतंक था और भीतर एक नवजात शिशु। यह विरोधाभास ही कृष्ण-कथा का पहला बड़ा प्रतीक है। जहां अत्याचार अपने को अजेय समझता है, वहीं परिवर्तन अक्सर सबसे कमजोर और असहाय दिखाई देने वाले रूप में जन्म लेता है। कंस के पास सत्ता थी, सैनिक थे, कारागार था, भय पैदा करने की पूरी व्यवस्था थी; कृष्ण के पास केवल जीवन था। लेकिन इतिहास ने अंततः यह सिद्ध किया कि सत्ता की दीवारें जीवन की आहट को हमेशा कैद नहीं रख सकतीं।
कृष्ण के जन्म की रात मूसलाधार वर्षा हो रही थी। कारागार के द्वार खुल गए और पहरेदार निद्रा में पड़ गए। वसुदेव कृष्ण को टोकरी में लेकर गोकुल की ओर चल पड़े। रास्ते में उफनती यमुना मिली। वे बालक को सिर पर उठाए नदी पार करने लगे। कृष्ण के चरणों का स्पर्श पाने के लिए यमुना का जल ऊपर उठता गया और जैसे ही उसने भगवान के चरणों को छुआ, उसका वेग शांत हो गया।
यह प्रसंग केवल चमत्कार की कथा नहीं है। इसमें भारतीय अध्यात्म का एक गहरा संकेत छिपा है—जब मनुष्य अपने भीतर के प्रकाश को लेकर अंधकार से बाहर निकलता है, तब सबसे उफनती हुई बाधाएं भी रास्ता देने लगती हैं। जीवन की नदियां हमेशा शांत नहीं होतीं। कभी वे भय, मोह, संकट और असफलता के रूप में हमारे सामने आती हैं। लेकिन जिस मनुष्य के भीतर विश्वास का दीप जल रहा हो, वह अंधकार को अंतिम सत्य नहीं मानता।
गोकुल में यशोदा के घर कृष्ण का पालन हुआ। उनका जन्म देवकी से हुआ, लेकिन उनका बचपन यशोदा की गोद में बीता। यही कृष्ण के व्यक्तित्व की एक अद्भुत विशेषता है—वे रक्त के संबंध से अधिक प्रेम के संबंध को महत्त्व देते हैं। देवकी जन्मदात्री हैं, यशोदा पालनकर्त्री; लेकिन कृष्ण की स्मृति में दोनों मातृत्व की समान ऊंचाई पर हैं। कृष्ण इस अर्थ में भी प्रेम के देवता हैं कि वे संबंधों को केवल रक्त और जन्म से नहीं, संवेदना और समर्पण से परिभाषित करते हैं।
कृष्ण की बाल-लीलाएं—माखन चोरी, गोपियों के साथ रास, बांसुरी की धुन, कालिया-दमन और गोवर्धन धारण—भारतीय लोकमानस में आज भी जीवित हैं। भागवत इन लीलाओं में भक्ति की ऐसी अनुभूति देखता है जिसमें भक्त और भगवान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम सांसारिक आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण बन जाता है।
यही भावना आगे चलकर भक्ति योग का आधार बनती है। भक्ति केवल पूजा-पद्धति नहीं, अहंकार का विसर्जन है। जब मनुष्य अपने कर्म, फल और अहंकार को ईश्वर को समर्पित कर देता है, तब उसका जीवन साधना बन जाता है।
इसी संदर्भ में स्वामी निरंजनानंद सरस्वती कृष्ण को केवल किसी एक धार्मिक आख्यान में सीमित करके देखने के बजाय जीवन के व्यापक आध्यात्मिक अनुभव के रूप में समझाते हैं। गंगा दर्शन विश्व योग पीठ, मुंगेर में कृष्ण पर दिए गए उनके प्रवचनों में कृष्ण के व्यक्तित्व की एक विशेष व्याख्या सामने आती है। उनके अनुसार कृष्ण “मधुरता की प्रतिमूर्ति” हैं। लेकिन यह मधुरता कमजोरी नहीं है। इसमें करुणा है, प्रेम है, मनुष्य के प्रति गहरी संवेदना है और साथ ही जीवन की जिम्मेदारियों को स्वीकार करने का साहस भी है।
स्वामी जी की दृष्टि में कृष्ण को समझना केवल उनकी पूजा करना नहीं, बल्कि उनके जीवन-दर्शन को अपने जीवन में उतारना है। कृष्ण का हृदय मनुष्य के लिए धड़कता है, लेकिन वे मनुष्य को उसके कर्तव्य से मुक्त नहीं करते। उनकी करुणा पलायन नहीं सिखाती। उनका प्रेम निष्क्रिय नहीं बनाता। वे प्रेम को कर्म से, संवेदना को जिम्मेदारी से और आध्यात्मिकता को जीवन के यथार्थ से जोड़ते हैं।
इसीलिए कृष्ण की बांसुरी और कुरुक्षेत्र को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। जिस कृष्ण के हाथ में बांसुरी है, उसी कृष्ण के हाथ में जीवन के निर्णायक क्षण में सारथी की लगाम भी है। उनकी मधुरता और उनकी दृढ़ता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती की कृष्ण संबंधी शिक्षाओं का संकलन द योग ऑफ श्री कृष्ण में मिलता है। इन विचारों में भगवद्गीता को केवल धार्मिक या दार्शनिक ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला के मार्गदर्शक के रूप में देखा गया है। अर्जुन का संकट केवल कुरुक्षेत्र के मैदान का संकट नहीं है। वह हर उस मनुष्य का संकट है जो निर्णय के क्षण में मोह, भय, संशय और कर्तव्य के बीच खड़ा होता है।
कृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए उकसाने मात्र नहीं, बल्कि उसे स्वयं से परिचित कराने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। यह वाक्य भारतीय दर्शन की अमूल्य धरोहर है। इसका अर्थ कर्म के परिणाम से आंखें मूंद लेना नहीं, बल्कि परिणाम की चिंता से कर्म की ऊर्जा को नष्ट न होने देना है। फल की आसक्ति मनुष्य को भयभीत करती है; कर्तव्य की चेतना उसे स्वतंत्र करती है।
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि पलायन समाधान नहीं है। कर्तव्य से भागकर मनुष्य शांति नहीं पा सकता। कर्म करते हुए भी फलासक्ति से मुक्त रहना ही कर्मयोग है। यही कृष्ण के जीवन-दर्शन का केंद्रीय सूत्र है—जीवन को त्यागना नहीं, उसे सही चेतना के साथ जीना।
गीता में कृष्ण ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग को अलग-अलग रास्तों की तरह नहीं, बल्कि जीवन की समग्र साधना के रूप में देखते हैं। ज्ञान मनुष्य को विवेक देता है, कर्म उसे जीवन से जोड़ता है और भक्ति उसके भीतर विनम्रता पैदा करती है। जब ये तीनों एक साथ आते हैं, तब मनुष्य का व्यक्तित्व संतुलित होता है।
अंततः कृष्ण अर्जुन को पूर्ण समर्पण का मार्ग बताते हैं—
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।”
यह समर्पण जिम्मेदारी से पलायन नहीं है। यह उस अहंकार का विसर्जन है जो स्वयं को ही जीवन का केंद्र मान बैठता है। कृष्ण के यहां समर्पण का अर्थ निष्क्रियता नहीं, बल्कि अपने कर्म को व्यापक सत्य के प्रति समर्पित करना है।
कृष्ण की यही व्यापकता उन्हें केवल धार्मिक आख्यान का पात्र नहीं रहने देती। वे बालक भी हैं, मित्र भी; प्रेमी भी हैं, सारथी भी; नीति के ज्ञाता भी हैं और धर्म की रक्षा के लिए रणनीतिकार भी। वे जीवन के विरोधाभासों को अपने भीतर समेटते हैं। उनके व्यक्तित्व में प्रेम भी है और संघर्ष भी, संगीत भी है और युद्ध भी, करुणा भी है और निर्णय की कठोरता भी।
उनका जीवन बताता है कि धर्म जड़ नियमों का नाम नहीं, बल्कि न्याय और सत्य की रक्षा का सतत प्रयत्न है। इसलिए कृष्ण के लिए धर्म का अर्थ अन्याय के सामने चुप रहना नहीं है। जब अधर्म व्यवस्था बन जाए, तब सत्य की रक्षा के लिए सक्रिय होना भी धर्म है।
द्वारका में कृष्ण की अंतिम यात्रा और उनके देहत्याग के बाद द्वारका के समुद्र में समा जाने की कथा भी भारतीय स्मृति में एक गहरी प्रतीकात्मक उपस्थिति रखती है। उनके पौत्र वज्रनाभ को मथुरा का राजा बनाए जाने और कृष्ण की स्मृति में मंदिरों की स्थापना की परंपरा ने उनकी जन्मभूमि को सदियों तक आस्था का केंद्र बनाए रखा।
मथुरा की जन्मभूमि से जुड़ी स्मृतियां आज भी कृष्ण के जन्म की कथा को जीवित रखती हैं। परंपरा में माना जाता है कि जिस स्थान से जन्मभूमि की स्मृति जुड़ी है, वहीं कभी कंस का कारागार था और वहीं देवकी-वसुदेव के पुत्र कृष्ण ने जन्म लिया था। किंतु कृष्ण की सबसे बड़ी जन्मभूमि शायद कोई भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि मनुष्य का अपना अंतःकरण है।
जब भीतर भय का कंस सत्ता जमा ले, जब लोभ और अहंकार कारागार बना दें, जब विवेक अंधकार में कैद हो जाए और जब मनुष्य अपने ही भीतर के सत्य से दूर हो जाए, तब कृष्ण का जन्म आवश्यक हो जाता है।
जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ इसी आंतरिक जन्म में है।
कृष्ण बाहर कहीं जन्मे थे—यह आस्था का विषय है। लेकिन कृष्ण हमारे भीतर भी जन्म लें—यह साधना का विषय है। बाहर का उत्सव एक रात का हो सकता है, भीतर का जन्म पूरी जिंदगी बदल सकता है।
स्वामी निरंजनानंद की व्याख्या में कृष्ण की यही प्रासंगिकता सबसे अधिक दिखाई देती है। कृष्ण मनुष्य को संसार छोड़ने के लिए नहीं कहते। वे संसार में रहते हुए चेतना को बदलने की बात करते हैं। वे बताते हैं कि जीवन की प्रत्येक परिस्थिति साधना का अवसर हो सकती है। प्रेम हो तो वह मनुष्य को विस्तृत करे, ज्ञान हो तो अहंकार को कम करे और कर्म हो तो उसे लोकमंगल से जोड़े।
कृष्ण की मधुरता इसलिए महत्वपूर्ण है कि आज का मनुष्य भीतर से कठोर और बाहर से असुरक्षित होता जा रहा है। उसके पास साधन बढ़े हैं, लेकिन शांति कम हुई है; सूचना बढ़ी है, लेकिन विवेक का संकट गहरा हुआ है; संबंधों की संख्या बढ़ी है, लेकिन आत्मीयता कम हुई है। ऐसे समय में कृष्ण की बांसुरी हमें भीतर की मौन ध्वनि सुनने का आमंत्रण देती है।
भागवत हमें कृष्ण से प्रेम करना सिखाता है, गीता उनसे जीवन जीना और भक्ति योग उनसे अपने अहंकार को समर्पित करना। स्वामी निरंजनानंद की दृष्टि इन तीनों को एक सूत्र में जोड़ती है—कृष्ण को जानना अंततः स्वयं को जानने की यात्रा है।
शायद कृष्ण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, प्रकाश को जन्म लेने से कोई रोक नहीं सकता। कंस के कारागार में जन्मा शिशु एक दिन अत्याचार के विरुद्ध खड़ा होता है। यमुना की बाढ़ पार करने वाला बालक आगे चलकर अर्जुन का सारथी बनता है। बांसुरी बजाने वाला ग्वालबाल जीवन के सबसे कठिन प्रश्नों का उत्तर देता है।
इसलिए कृष्ण का जन्म केवल मथुरा में नहीं हुआ था। कृष्ण का जन्म हर उस क्षण होता है जब मनुष्य भय के ऊपर साहस को, घृणा के ऊपर प्रेम को, मोह के ऊपर विवेक को और निष्क्रियता के ऊपर कर्तव्य को चुनता है।
जन्माष्टमी का दीपक तभी सार्थक है जब उसकी लौ बाहर के मंदिर से भीतर के अंधकार तक पहुंचे।
कृष्ण हमारे भीतर जन्म लें—यही जन्माष्टमी की सबसे बड़ी प्रार्थना है।
कुमार कृष्णन