18 जून 1576, हल्दीघाटी युद्ध
डॉ अर्पित शर्मा
शिक्षाविद और स्वतंत्र लेखक
अक्सर आधुनिक और तथाकथित इतिहासकार मेवाड़ के मुगलों के साथ संघर्ष को केवल हल्दीघाटी तक सीमित कर उसे महाराणा प्रताप की हार और त्याग की कथा के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि हल्दीघाटी महाराणा प्रताप के संघर्ष का अंत नहीं, बल्कि स्वाधीनता और मुगल साम्राज्य के विरुद्ध दीर्घकालीन प्रतिरोध की रक्तरंजित शुरुआत थी । यह युद्ध अकबर की विशाल सल्तनत के सामने मेवाड़ के अदम्य आत्मसम्मान, स्वतंत्र चेतना और अस्वीकार की उद्घोषणा था । युद्ध से पूर्व अकबर ने मेवाड़ को अधीन करने और महाराणा प्रताप को झुकाने के लिए चार दूत जलाल खां (1572), मान सिंह (1573), भगवान दास (1573) और टोडरमल (1573 ) भेजे, किन्तु महाराणा प्रताप ने स्पष्ट कर दिया कि मेवाड़ की अस्मिता किसी साम्राज्य की अधीनता स्वीकार नहीं करेगी । आइए इस ऐतिहासिक प्रक्षेपवक्र को समझते हैं ।
आज से 450 वर्ष पहले 18 जून 1576 अरावली की पर्वतमालाओं के बीच स्थित हल्दीघाटी की संकरी घाटी उस दिन रणभूमि में बदल चुकी थी। एक ओर था विशाल मुगल साम्राज्य और उसकी विस्तारवादी शक्ति, तो दूसरी ओर थे महाराणा प्रताप स्वाभिमान, स्वतंत्रता और मेवाड़ की अस्मिता के प्रतीक। सीमित संसाधनों , छोटी सेना ,अदम्य साहस, और रणकौशल के बल पर महाराणा प्रताप ने मुगल सेना को शिकस्त दी, उसने मुगल सल्तनत की विस्तारवादी महत्वाकांक्षा पर करारी चोट के रूप में स्थापित कर दिया । आज भी राजपूत वीरता, प्रतिरोध और स्वतंत्रता चेतना का सबसे प्रेरणादायक प्रतीक माना जाता है एक ऐसा संघर्ष जिसने यह सिद्ध कर दिया कि स्वाभिमान के लिए लड़ी गई लड़ाइयाँ केवल तलवारों से नहीं, बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति से जीती जाती हैं।
यह युद्ध महाराणा प्रताप के नेतृत्व में मेवाड़ की सेना और मुगल सेना के बीच लड़ा गया। संख्या और संसाधनों में अत्यंत कम होने के बावजूद महाराणा प्रताप ने अद्वितीय वीरता, नेतृत्व क्षमता और युद्ध कौशल का परिचय दिया। मुगल सेना में लगभग 85,000 सैनिक बताए जाते हैं, जिनमें लगभग 16,000 घुड़सवार, 8,000 तोपखाना , हाथियों की टुकड़ी तथा अन्य पैदल सैनिक, शामिल था। इसके विपरीत महाराणा प्रताप के पास लगभग 10000-12000 सैनिक, जिनमें 3,000–4,000 राजपूत घुड़सवार, सीमित हाथी, लगभग 3,000 भील योद्धा तथा हकीम खान सूरी के नेतृत्व में अफगान सैनिकों की टुकड़ी थी । वहीँ महाराणा की सेना के पास मुगलों जैसी आधुनिक तोपें और बंदूकें नहीं थीं ।
युद्ध अत्यंत भीषण, रोमांचकारी और अद्वितीय साहस से परिपूर्ण था। प्रारंभिक चरण से ही मेवाड़ की सेना ने आक्रामक रणनीति अपनाई। हरावल दस्ते का नेतृत्व कर रहे हकीम खान सूरी ने मुगल सेना पर इतना प्रचंड आक्रमण किया कि आरंभिक चरण में मुगल सेना लगभग सात किलोमीटर दूर मोलेला तक पीछे हटने को विवश हो गई। युद्ध अत्यंत रक्तरंजित और विनाशकारी था। मेवाड़ की सेना ने अपनी तीव्र गति, अरावली के पर्वतीय भूगोल की गहरी समझ और निकट युद्ध कौशल के आधार पर विशाल मुगल सेना को कड़ी चुनौती दी। गोवर्धन बोगसा, जो युद्ध के समय महाराणा प्रताप के साथ उपस्थित थे, उन्होंने अपनी रचना ‘बहलोल वध’ के अनुसार महाराणा प्रताप ने मुगल सेनापति बहलोल खान को एक ही वार में उसके घोड़े सहित मार गिराया, जिससे मुगल सेना में भय और भगदड़ फैल गई । मुगल दरबार के इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूंनी, जो मुगल सेना के साथ उपस्थित था, ने भी युद्ध की भयावहता और संघर्ष की तीव्रता का उल्लेख किया है । वर्णनों के अनुसार उसने लिखा कि मुगल सेना जान बचाती हुई लगभग 16 किलोमीटर दूर बनास नदी तक भागी । युद्ध के अंतिम क्षणों में महाराणा प्रताप अपने प्रिय और वीर अश्व चेतक को युद्ध भूमि में खो बैठे, जो भारतीय इतिहास और लोकस्मृति में आज भी जीवित है।
हल्दीघाटी के बाद संघर्ष समाप्त नहीं हुआ, बल्कि यहीं से मेवाड़ और मुगल साम्राज्य के बीच लंबे प्रतिरोध का वास्तविक आरंभ हुआ । हल्दीघाटी में मिली हार और नुकसान से अकबर अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने महाराणा प्रताप को अधीन करने के लिए लगातार कई प्रयास किए । 1577 से 1582 के बीच मुगलों ने बार-बार मेवाड़ पर विशाल सेनाओं के साथ आक्रमण किए। प्रत्येक वर्ष लगभग 60,000 से 100,000 सैनिकों की सेनाएँ मेवाड़ की ओर भेजी गईं । एक अवसर पर स्वयं अकबर भी विशाल सेना लेकर बांसवाड़ा तक पहुँचा, किंतु वह महाराणा प्रताप को पराजित करने में असफल रहा । महाराणा प्रताप ने अरावली के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों, जंगलों और स्थानीय भील समुदाय और जनजातीय सहयोग के आधार पर गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई। अरावली का भूगोल मेवाड़ की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति बन गया। संकरी घाटियाँ, वन क्षेत्र और कठिन पर्वतीय मार्ग मुगल सेना की विशाल संरचना और भारी तोपखाने के लिए चुनौती सिद्ध हुए। यही कारण था कि संसाधनों की कमी के बावजूद मुगलों को कभी स्थायी नियंत्रण स्थापित करने में सफलता नहीं मिली।
इस संघर्ष का निर्णायक मोड़ 1583 में दशहरे के अवसर पर हुए में आया, जिसे मेवाड़ के इतिहास की महानतम विजयों में माना जाता है। इस युद्ध में महाराणा प्रताप के साथ उनके पुत्र अमर सिंह प्रथम ने भी असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया। दिवेर में मेवाड़ की सेना ने मुगल शक्ति को निर्णायक रूप से परास्त कर दिया। युद्ध के बाद मेवाड़ से मुगलों का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया। कहा जाता है कि मुगलों की 36 चौकियाँ खाली करनी पड़ीं, हजारों सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया और शेष सेना युद्धभूमि छोड़कर भाग गई। इस विजय के बाद अकबर ने अपने जीवनकाल में पुनः मेवाड़ को जीतने का गंभीर प्रयास नहीं किया । इतिहासकार कर्नल टॉड ने दिवेर युद्ध को “मेवाड़ का मैराथन” कहा है। दिवेर के युद्ध के संबंध में प्रसिद्ध है कि युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप ने मुगल सेनापति उसके घोड़े को एक ही वार में दो भागों में विभाजित कर दिया। प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने मुगल सेनापति सुल्तान खान (अकबर का चाचा) पर भाले का ऐसा जोरदार वार किया कि वह घोड़े सहित मारा गया । मुगल सेना को करारी हार का सामना करना पड़ा । यह घटना केवल उनकी शारीरिक शक्ति का प्रमाण नहीं मानी जाती, बल्कि उनके अदम्य साहस, युद्ध कौशल और स्वाधीनता के प्रति अटूट संकल्प का प्रतीक मानी जाती है।
हल्दीघाटी से दिवेर तक का संघर्ष यह सिद्ध करता है कि इतिहास में युद्ध केवल सीमाओं के लिए नहीं लड़े जाते, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों की चेतना आत्मसम्मान और राष्ट्रीय स्मृति को आकार देते हैं । महाराणा प्रताप का संघर्ष इसी कारण केवल मेवाड़ का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय स्वाधीनता चेतना का शाश्वत प्रतीक बन गया।
( अदिति फीचर्स )
डॉ अर्पित शर्मा