संतोष कुमार तिवारी
केंद्र सरकार द्वारा विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) में संभावित बदलावों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इसको लेकर अमेरिका समेत तमाम ऐसे देश भारत को लेकर बौखला गए है और कुछ ऐसा कार्य कर रहे है जिससे उनके बौखलाहट का पता चल रहा है, अभी अमेरिका ने भारतीय जहाजो पर हमला किया, भारत पर टैरिफ़ लगाया और साथ ही कई उलूल जुलूल बयानबाजी भी की, इसके पीछे भारत सरकार द्वारा FCRA क़ानून में बदलाव की चर्चा प्रमुख है क्योंकि अमेरिका समेत कई यूरोपीय देश भारत की तरक्की को पचा नहीं पा रहे है और भारत को अस्थिर करने के लिए अवैध फंडिंग तमाम संस्थाओ द्वारा कराते है जो देश में रहकर देश और सरकार विरोधी गतिविधियों को बढ़ाते है. साथ ही लव जिहाद और धर्मान्तरण का भी खेल ऐसे ही अवैध पैसे से होता है, जब FCRA क़ानून संसोधित हो जायेगा तो विदेशी फंडिंग की मनमानी पर ब्रेक लग जायेगा और सरकार के पास संस्थाओं के पास आने वाले हर एक फण्ड की जानकारी लेने का अधिकार होगा, जिससे अमेरिका समेत कुछ ऐसे देश भारत के विरोध में अंतर्राष्ट्रीय साजिश करके भारत को कमजोर करना चाहते है।
हालांकि सरकार का कहना है कि विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग को रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में निगरानी बढ़ाने के लिए कानून को और प्रभावी बनाया जा रहा है। इस बीच कुछ राजनीतिक और सामाजिक संगठनों का मानना है कि ऐसे बदलावों से अवैध धर्मांतरण और कथित “लव जिहाद” जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम एक ऐसा कानून है, जिसके तहत भारत में कार्यरत गैर-सरकारी संगठनों, ट्रस्टों, संस्थाओं और अन्य संगठनों द्वारा प्राप्त विदेशी धन की निगरानी की जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से आने वाला धन देश की संप्रभुता, सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव और सार्वजनिक हित के विरुद्ध इस्तेमाल न हो।
वर्तमान में कोई भी संस्था विदेश से आर्थिक सहायता प्राप्त करना चाहती है तो उसे FCRA के तहत पंजीकरण कराना आवश्यक होता है। सरकार समय-समय पर इन संस्थाओं के खातों और गतिविधियों की जांच भी करती है। कुछ मामलों में विदेशी फंड का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के बजाय अन्य गतिविधियों में किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। ऐसे में फंड के स्रोत, उपयोग और लाभार्थियों की निगरानी को और मजबूत बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।सरकार का तर्क है कि पारदर्शिता बढ़ने से विदेशी धन के दुरुपयोग की संभावना कम होगी और केवल वास्तविक सामाजिक एवं विकास कार्यों में ही उसका उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा। देश के कई राज्यों में पहले से ही अवैध या जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए कानून लागू हैं। कुछ संगठनों और राजनीतिक दलों का आरोप रहा है कि विदेशी फंडिंग के माध्यम से कुछ संस्थाएं लोगों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करती हैं। हालांकि ऐसे आरोपों की पुष्टि प्रत्येक मामले में जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होती है।
FCRA में निगरानी बढ़ने से विदेशी फंड के उपयोग का अधिक विस्तृत लेखा-जोखा उपलब्ध होगा, जिससे किसी भी प्रकार की अनियमितता की जांच करना आसान हो सकता है। समर्थकों का मानना है कि इससे अवैध धर्मांतरण के मामलों पर प्रभावी नियंत्रण संभव होगा।लव जिहाद में कथित तौर पर पहचान छिपाकर या विवाह के माध्यम से धर्म परिवर्तन कराने के आरोप लगाए जाते हैं। वहीं कई अन्य समूह और विशेषज्ञ इस शब्द को विवादित मानते हैं तथा इसके अस्तित्व को लेकर अलग-अलग मत रखते हैं।
कई राज्यों ने विवाह के माध्यम से कथित जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए विशेष कानून बनाए हैं। FCRA में संभावित सख्ती का सीधा संबंध विवाह संबंधी मामलों से नहीं है, लेकिन यदि किसी संगठन द्वारा विदेशी फंड के दुरुपयोग की जांच होती है तो उससे जुड़े सभी वित्तीय लेन-देन और गतिविधियां जांच के दायरे में आ सकती हैं। FCRA में सख्ती के समर्थकों का कहना है कि इससे विदेशी धन के प्रवाह में पारदर्शिता आएगी, राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी और सामाजिक गतिविधियों की बेहतर निगरानी हो सकेगी। FCRA कानून में संभावित बदलावों का मुख्य उद्देश्य विदेशी फंडिंग की निगरानी और पारदर्शिता बढ़ाना बताया जा रहा है। धर्मांतरण और “लव जिहाद” जैसे मुद्दों को लेकर विभिन्न पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कानून के अंतिम स्वरूप और उसके वास्तविक प्रभाव का इंतजार करना होगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि विदेशी धन के उपयोग पर सरकार की निगरानी और सख्त होने की दिशा में कदम बढ़ रहे हैं जिसका असर कई क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है।
संतोष कुमार तिवारी