देश बिलखता रहा; सोच बदलती रही

अनिल अनूप

हर रोज सुबह होने के बाद कैलेंडर की तारीख भी बदल जाती है। ऐसे ही दिन, हफ्ते, महीने और साल बीत जाते हैं। लेकिन साल 2019 में भारत को कई गंभीर बीमारियों ने तबाही मचा दी। चमकी बुखार से लेकर निपाह वायरस जैसी खतरनाक बीमारियों से देश को कई स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन बीमारियों की वजह से न जाने कितने लोगों की जान चली गई। आइए एक नजर उन चुनौतियों पर डालते हैं जिससे देश को गुजरना पड़ा।

निपाह वायरस

साल 2019 में निपाह वायरस ने करीब 17 लोगों की जान ले ली। इस वायरस के चपेट में आने से 2018 में भी 13 लोगों की मौत हो गई थी। निपाह एक ऐसा वायरस है जो जानवर से इंसान में फैलता है। चमगादड़ जब कोई फल खाते हैं तो उसमें अपना लार छोड़ देते हैं, जिससे फल संक्रमित हो जाता है। जब इस संक्रमित फल को कोई इंसान खा लेता है तो वो निपाह वायरस के चपेट में आ जाता है। निपाह प्रभावित लोगों या जानवरों के लिए अभी तक कोई इलाज या टीका उपलब्ध नहीं है। इस संक्रमण के लिए सिर्फ लक्षणों और सपॉर्टिव केयर को ध्यान में रखकर ही उपचार किया जाता है। भारत में इस संक्रमण से औसत मृत्यु दर 75 फीसदी से ज्यादा रही है।

चमकी बुखार

चमकी बुखार का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर होता है। इस बीमारी को विज्ञान की भाषा में एक्यूट इनसेफ्लाइटिस सिंड्रोम कहा जाता है। साल 2019 में इस बीमारी ने बिहार में तबाही मचा दी। इस बीमारी से मरने वाले बच्चों की संख्या 175 के पार पहुंच गई थी। बिहार में मानसून के दस्तक के बाद इस बुखार का प्रभआव कम हो गया। इस बुखार में बच्चे को लगातार तेज बुखार रहता है। बदन में ऐंठन होती है। बच्चे दांत पर दांत चढ़ाए रहते हैं। कमजोरी की वजह से बच्चा बार-बार बेहोश होता है। यहां तक कि शरीर भी सुन्न हो जाता है। इससे उसे झटके लगने लगते हैं। इसकी वजह से सेंट्रल नर्वस सिस्टम खराब हो जाता है।

वायु प्रदूषण

वैसे तो वायु प्रदूषण की समस्या से पूरा देश परेशान है लेकिन इस प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर देश की राजधानी दिल्ली में देखने को मिलता है। विश्व में लगभग 70 लाख लोग हर साल कैंसर, स्ट्रोक, हृदय और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों की चपेट में आकर मर जाते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह प्रदूषित हो रखा वातावरण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में दस में से नौ लोग हर दिन प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं।

शानदार रहा इन पत्रकारों को यह साल

कई पत्रकारों के लिए साल 2019 शानदार साबित हुआ। कुछ ने मीडिया में ही ऊंची छलांग लगाई, तो कुछ सियासत के गलियारों में अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे। इनमें से एक हैं वरिष्ठ 

पत्रकार पंकज शर्मा, जिन्हें हाल ही में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का मीडिया सलाहकार नियुक्त किया गया है। शर्मा के पास पत्रकारिता का लंबा अनुभव है, उन्होंने राजनीतिक पत्रकारिता के साथ ही अमेरिका सहित कई देशों में स्पेशल असाइनमेंट्स कवर किए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ भी वह यात्राएं कर चुके हैं। इसके अलावा विभिन्न सरकारी समितियों में भी रहे हैं। पंकज शर्मा को संविदा के आधार पर आवासीय आयुक्त, मप्र भवन, नई दिल्ली में पदस्थ किया गया है।

इसी तरह वरिष्ठ पत्रकार अमित आर्या को भी यह साल तोहफा दे गया। हरियाणा सरकार ने उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का मीडिया सलाहकर नियुक्त किया है। मुख्यमंत्री के रूप में खट्टर के पहले कार्यकाल के दौरान भी वह उनके मीडिया सलाहकार की जिम्मेदारी निभा रहे थे। आर्या को मीडिया के क्षेत्र में काम करने का लंबा अनुभव है। वह कई चैनलों और मीडिया हाउस की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा भी रह चुके हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘बीएजी फिल्म्स’ से की थी, फिर ‘दैनिक भास्कर’, शिमला के स्टाफ रिपोर्टर और ‘दैनिक भास्कर’, चंडीगढ़ में हिमाचल पेज के प्रभारी के रूप में काम किया। इसके बाद वह दोबारा ‘बीएजी’ के साथ जुड़ गए और कई वर्षों तक वहां अपनी सेवाएं दीं थीं।

वरिष्ठ पत्रकार अशोक मलिक ने इस साल बड़ी छलांग लगाई है। उन्हें विदेश मंत्रालय में बतौर पॉलिसी एडवाइजर नियुक्त किया गया है। वैसे, इससे पहले वह राष्ट्रपति रामनाथ गोविंद के प्रेस सचिव रहे चुके हैं और उनका कार्यकाल 31 जुलाई 2019 को खत्म हुआ था। उनके स्थान पर सीनियर जर्नलिस्ट अजय सिंह को नियुक्त किया गया। राष्ट्रपति के प्रेस सेक्रेटरी के पद पर नियुक्ति से पहले अशोक मलिक नीति संबंधी थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में डिस्टिंगग्विश्ड फैलो थे। पत्रकारिता में उन्हें दो दशक से भी ज्यादा का अनुभव है। वे ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘इंडिया टुडे’, ‘द टेलिग्राफ’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुके हैं। उनकी विशेषज्ञता देश की राजनीति, घरेलू-विदेशी व्यापार नीति और सामाजिक क्षेत्रों में ज्यादा है।

लखनऊ के पत्रकार रहीस सिंह भी उन पत्रकारों में शुमार हैं, जिन्हें राज्य की सरकारों में अहम जिम्मेदारी मिली है। रहीस सिंह को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सूचना विभाग में सलाहकार के पद पर नियुक्त किया है। वह प्रिंट मीडिया की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। रहीस सिंह लखनऊ की पत्रकारिता का जाना-माना नाम हैं और लेखन के क्षेत्र में भी काफी सक्रिय हैं। कुछ वक्त पहले वे ‘कर्मयोगी संन्यासी योगी आदित्यनाथ’ के नाम से एक किताब लिखकर भी चर्चा में आए थे।

वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता को भी इस साल मोदी सरकार में बड़ी जिम्मेदारी मिली है। उन्हें राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन का चेयरपर्सन बनाया गया है। ये फाउंडेशन भारत की तमाम पब्लिक लाइब्रेरीज को सपोर्ट करने के लिए केन्द्र सरकार की नोडल एजेंसी के तौर पर काम करती है और इसका मुख्यालय कोलकाता में है। बंगाली पत्रकार कंचन गुप्ता जमशेदपुर और पटना में पले-बढ़े हैं। कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज से ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने ‘द टेलिग्राफ’ अखबार से पत्रकारिता की पारी की शुरुआत की। वे एमजे अकबर और विनोद मेहता जैसे पत्रकारों के साथ काम कर चुके हैं।

वरिष्ठ पत्रकार टंकशाला अशोक  के लिए भी 2019 शानदार रहा। उन्हें तेलंगाना सरकार का स्पेशल एडवाइजर नियुक्त किया गया है। अशोक को अंतरराज्यीय मामलों की जिम्मेदारी सौंपने के साथ ही कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है। अशोक कई अखबारों में रिपोर्टर से लेकर संपादक की जिम्मेदारी निभा चुके हैं। उन्हें सरदार वल्लभ भाई पटेल की ऑटोबायोग्राफी के अनुवाद के लिए साहित्य अकादमी अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

मीडिया के लिहाज से वर्ष 2019 मिला-जुला रहा

हालांकि सरकारी स्तर पर कुछ ऐसे कदम उठाये गए, जिन्होंने कई आशंकाओं को जन्म दिया। इसमें सबसे प्रमुख रहा प्रेस और पत्रिका पंजीकरण (आरपीपी) विधेयक, 2019 का मसौदा। सरकार ने यह मसौदा करीब 150 साल पुराने प्रेस और पुस्तक पंजीकरण (पीआरबी) अधिनियम, 1867 में बदलाव के उद्देश्य से तैयार किया है। इसके तहत अखबारों, पत्रिकाओं और किताबों का पंजीकरण किया जाता है। माना जा रहा है कि मोदी सरकार की यह कवायद डिजिटल मीडिया पर अंकुश के लिए है, क्योंकि आरपीपी विधेयक 2019 के मसौदे में डिजिटल मीडिया को देश के समाचार पत्रों के रजिस्ट्रार या रजिस्ट्रार न्यूजपेपर ऑफ इंडिया (आरएनआई) के तहत लाने की तैयारी की जा रही है।

बता दें कि फिलहाल, डिजिटल मीडिया देश की किसी भी संस्था के साथ पंजीकृत नहीं है। मसौदे के अनुसार, सरकार ने प्रस्ताव दिया है कि डिजिटल मीडिया पर समाचार के प्रकाशक आरएनआई के साथ खुद को पंजीकृत करेंगे। साथ ही उन्हीं लोगों को प्रकाशन का अधिकार दिया जाएगा, जिन्हें आतंकवादी अधिनियम या गैरकानूनी गतिविधि से जुड़े अपराध या राज्य की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने के संबंध में किसी भी अदालत द्वारा दोषी नहीं ठहराया गया है। वैसे अच्छी बात यह है कि पीआरबी अधिनियम के विपरीत प्रिंट और ऑनलाइन समाचार प्लेटफॉर्म को विनियमित करने के लिए नए विधेयक में एक किये गए महत्वपूर्ण प्रावधान के अनुसार, प्रकाशक के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार किसी स्थानीय अधिकारी के पास नहीं होगा। प्रस्तावित कानून मजिस्ट्रेट जैसे स्थानीय अधिकारियों को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने या कानून के प्रावधानों के उल्लंघन के कारण उपकरण जब्त करने की शक्तियां नहीं देता है। हालांकि, नए विधेयक में प्रेस रजिस्ट्रार की नियुक्ति का प्रावधान है, जिसके पास कानून का उल्लंघन पाने पर प्रकाशन के पंजीकरण को रद्द करने अधिकार होगा।

सरकार का दूसरा कदम, जिसने संभावनाओं के साथ-साथ शंकाओं को जन्म दिया वो रहा डिजिटल मीडिया में 26 प्रतिशत विदेशी निवेश को मंजूरी। सरकार की तरफ से कहा गया कि इस फैसले से विदेशी निवेश को आकर्षित किया जा सकेगा और डिजिटल मीडिया की रफ्तार में तेजी आएगी। लेकिन सरकार की इन बातों में जानकारों को आशंकाएं अधिक नजर आईं। मसलन, डिजिटल मीडिया में 26 प्रतिशत सीमा से इंटरनेट मीडिया की आजादी सीमित होगी। कई वेबपोर्टल्स को अपनी फॉरेन होल्डिंग कम करनी पड़ेगी। सरकार ने इसी साल अगस्त में प्रिंट मीडिया की तरह डिजिटल मीडिया में भी समाचारों और सम-सामयिक विषयों को अपलोड /प्रसारित करने के क्षेत्र में सरकारी मार्ग से 26 प्रतिशत एफडीआई की मंजूरी दी थी।

वहीं, न्यूज़प्रिंट पर 10 फीसदी सीमा शुल्क लगाने का मोदी सरकार का फैसला प्रिंट मीडिया को 2019 का सबसे बड़ा ‘दर्द’ दे गया। अखबारों और पत्रिकाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, ऐसे में अतिरिक्त भार से उनके लिए मैदान में जमे रहना और भी मुश्किल हो गया है। हालांकि सरकार ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए फैसला वापस लेने से इनकार कर दिया है। ‘द इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी’ (आईएनएस) ने सरकार से न्यूजप्रिंट पर लगाए गए 10 प्रतिशत सीमा शुल्क को वापस लेने का आग्रह किया था। ‘आईएनएस’ की तरफ से कहा गया था कि समाचार पत्र-पत्रिकाएं पहले से कई समस्याओं के चलते गंभीर वित्तीय दबाव से जूझ रहे हैं। ऊंची लागत और विज्ञापन से कम आय होने की वजह से समाचार पत्र उद्योग दबाव में है। छोटे और मध्यम समाचार पत्रों को न्यूजप्रिंट पर सीमा शुल्क लगने से अधिक नुकसान होगा, कई समाचारपत्र तो बंद होने के कगार पर पहुंच जाएंगे, लेकिन वित्तमंत्री ने इस आग्रह को अनसुना कर दिया।

और भी कई ऐसे मामले रहे जहां सरकार के कदमों से आशंकाएं उत्पन्न हुईं। हाल ही में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हो रहे हिंसक विरोध-प्रदर्शन को न दिखाने संबंधी सरकार के आदेश को भी मीडिया पर अंकुश लगाने की कवायद के रूप में देखा गया।

दुखद रहा दिल्ली का यह साल

दुखद यह रहा कि दिल्ली ने एक वर्ष के भीतर ही अपने दो पूर्व मुख्यमंत्रियों को खो दिया। इस वर्ष 20 जुलाई को शीला दीक्षित की मृत्यु हो गई। इसके कुछ दिनों बात सात अगस्त को पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुषमा स्वराज का भी निधन हो गया।

वहीं लंबे समय से बीमार चल रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली का 24 अगस्त को निधन हो गया। उनका निधन भाजपा के लिए बड़ी क्षति है। डीयू से सियासत शुरू करने वाले भाजपा नेता अरुण जेटली की दिल्ली की सियासत में भी अच्छी पकड़ थी। प्रत्येक विधानसभा चुनाव में पार्टी की रणनीति बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी।

शीला दीक्षित के निधन से कांग्रेस को बड़ी क्षति

पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का निधन कांग्रेस के लिए बड़ी क्षति है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। चुनावों में मिल रही हार और नेताओं की गुटबाजी से हताश व निराश कार्यकर्ताओं में जान फूंकने के लिए पार्टी हाई कमान ने शीला दीक्षित पर विश्वास जताया।

लोकसभा चुनाव से पहले उनके हाथों में दिल्ली की कमान दे दी गई। बीमार होने के बावजूद उन्होंने पार्टी नेतृत्व के निर्देश का पालन किया। पार्टी को किसी भी सीट पर जीत तो नहीं मिली, लेकिन मत फीसद में बढ़ोतरी जरूर हुई। इस विधानसभा चुनाव में उनकी कमी पार्टी को खलेगी।

साल 2019 सचमुच बदलाव वाला साल भी कहा जायेगा।कहीं देश बदलता दिखा तो कहीं लोगों की सोच भी बदलती दिखी।साल के बीच मे सोशल  मीडिया में एक शब्द, हां, “मैं भी चौकीदार” यह लिखने की बाढ़ सी आई थी।लेकिन ये आज तक पता नहीं चल सका कि यह किसकी चौकीदारी की बात हो रही थी? 

ये सही है कि देश प्रगति कर रहा है, सड़कें बन रही हैं और उस पर विदेशी गाड़ियाँ दौड़ रही हैं। महिलाओं के उत्थान और बेटी बचाने की बात भी हो रही है और बेटी बचाव का नारा भी जोरशोर से बुलंद हुआ।शहरों और कस्बों की दीवारें इस नारे से रंगी दिखती थी।लेकिन ये सवाल सन 2019 मे भी ज्यों का त्यों खड़ा हुआ है कि आखिर ऐसे कैसे बचेंगी बेटियां?क्यों कि महिलाओं के प्रति अपराध के आंकड़े रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं।नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े देश को आईना दिखा रहे हैं। अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने अपने सालाना आंकडें जारी करने मे काफी देरी कर दी। लेकिन जो पुराने आंकडें जारी किये वह चौकाने वाले हैं।ताजा रिपोर्ट ने कई राज्यों के दावों की पोल खोल दी। 

अपराध के मामले में उत्तर भारत के राज्यों को इस रिपोर्ट ने जिस तरह से आईना दिखाया है, वह गौर करने वाली बात है।देश भर  मे तीन लाख 59 हज़ार 849 मामले महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित हैं जो ये बताने के लिए काफी हैं कि 70 साल का आजाद भारत का खुला आसमान और मजबूत लोकतंत्रीय ढ़ांचा भी बदलाव की राह पर चल रहे देश मे महिलाओं की ठीक से हिफाजत नही कर पा रहा है।उन्नाव के कांड और तेलंगाना मे महिला पशु चिकित्सक के साथ बर्बरता की दर्दनाक घटना आंकड़ों को गवाही दे रही हैं।मानों ये कह रही हैं कि अब ये समय आ गया है कि स्त्री को अपनी सुरक्षा की चौकीदार स्वयं बनना पड़ेगा।

 दरअसल साल 2019 को मोदी सरकार के कुछ साहसिक कदम के लिए देश के इतिहास मे जरूर याद किया जायेगा।इस साल मोदी वह काम कर गये जो दूसरे प्रधानमंत्रियों की सोच से आगे नही बढ़ सका था।दूसरी बार  2019 मे सत्ता में आते ही नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने कुछ ऐसे फैसले लिए जिससे देश का इतिहास, भूगोल और यूं कहें कि भारत को लेकर दुनिया की सोच भी बदल दी।हालांकि अयोध्या विवाद, तीन तलाक और  अनुच्छेद 370 को लेकर लिए गए निर्णय काफी चुनौतीपूर्ण भी रहे।लेकिन नरेन्द्र मोदी ने अपने इन तीन फैसलों पर बखूबी अमल कर के

दिख्राया।

दुनियाँ के दर्जनों इस्लामिक देशों ने तीन तलाक को बहुत पहले ही नकार दिया था।पर भारत के मुस्लिम समाज मे ये बदस्तूर जारी था,जिसे कानून बना कर मोदी सरकार ने गैर कानूनी घोषित कर दिया।

इस साल जम्मू-कश्मीर का मुद्दा देश में सबसे ऊपर रहा।5 अगस्त 2019 को कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला धारा 370 हटा दिया गया।इस फेसले ने देश का भूगोल बदल दिया। 

इन तमाम फैसलों के बीच 2019 को सबसे ज्यादा याद किया जाएगा अयोध्या विवाद को सुलझाने के लिए। शीर्ष अदालत ने इस साल अपने फैसले में राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद भूमि विवाद का समाधान निकाला। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने संबंधित पक्षों की दलीलें पूरे 40 दिन तक सुनीं। यह सुप्रिम कोर्ट के इतिहास में दूसरी सबसे लंबी सुनवाई है।राम की जन्मभूमि में उनके जन्म को साबित करने के लिए देश की आजादी के पहले से चल रहा विवाद आखिरकार साल 2019 मे सुलझ ही गया। 

इस साल उच्चतम न्यायालय ने सूचना का अधिकार के तहत सूचनाएं साझा करने को लेकर भी नरम रुख अपनाया और बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय सार्वजनिक प्राध्णिकार है और वह भी इस कानून के तहत आता है तथा उसे सूचनाएं साझा करनी चाहिए।इस साल सुप्रिम कोर्ट ने खुद को भी विवादों में पाया।जब भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश पर एक महिला ने आरोप लगाया ।बहरहाल, बाद में उन्हें इस मामले मेंक्लिन चिट मिल गई।

अपराधों का इतिहास भी रचा

 उच्चतम न्यायालय ने इस साल महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ रहे अपराधों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। उसने 2012 निर्भया सामूहिक बलात्कार-हत्या कांड के चार दोषियों में से एक की मौत की सजा बरकरार रखी। साथ ही निर्देश दिया कि जिन जिलों में पॉक्सो के तहत 100 से ज्यादा प्राथमिकियां दर्ज हैं वहां तत्काल प्रभाव से विशेष अदालतों का गठन किया जाए, जो सिर्फ इन्हीं मामलों की सुनवाई करेंगी।भाजपा के निष्कासित विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद जैसे राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों को यौन उत्पीड़न के मामलों में अदालती मार झेलनी पड़ी।न्यायालय ने सेंगर से जुड़े उन्नाव बलात्कार मामले की सुनवाई लखनऊ की अदालत से दिल्ली की अदालत में स्थानांतरित करवाई। दिल्ली की अदालत ने सेंगर को इस मामले में जीवन पर्यंत कैद की सजा सुनाई।इस साल अदालत का चाबुक अनिल अंबानी जैसों पर भी चला।

इस साल नये मोटर व्हीकल एक्ट ने भी देश मे खलबली मचा दी। इस कानून में जुर्माने की राशि इतनी तय की गई, जिसे लेकर देश भर में हड़कंप जैसी स्थिति है।चालान की राशि के चलते कई जगहों पर लोगों ने अपना वाहन ही पुलिस के पास छोड़ना मुनासिब समझा। 

 देश मे आर्थिक मंदी की आवाजों के  बीच मोदी सरकार ने कुछ बेंकों के विलय का फरमान भी जारी किया।नागरिकता संशोधन बिल के कानून बनने के बाद से देश भर मे धरना प्रदर्शनों का लम्बा दौर चला।हिंसा भी हुयी और पुलिस-छात्र मे भी टकराव हुआ।

ये साल भारत की बहादुर सेना के लिए भी दमखम दिखने वाला रहा।सीमा पार के आतंकी ठिकाने तहस-नहस किये और 139 से अधिक आंतकवादियों ढ़ेर किया।

बताया जाता है कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद पाकिस्तान द्वारा घुसपैठ के नए  प्रयास किए गए। इस साल के प्रथम आठ महीनों में पाकिस्तान द्वारा कुल 1,889 बार संघर्षविराम का उल्लंघन किया गया।लेकिन देश के जवानों ने हर  बार करारा जवाब दिया।और जाते-जाते इस साल ने ठंड के रिकार्ड को भी तोड़दिया।

दिल्ली मे 1901 के बाद 2019 का दिसंबर का महीना सबसे सर्द महीना साबित हुआ।।वहीं राजस्थान के माउंट आबू में तापमान ज़ीरो डिग्री से भी नीचे चला गया।उम्मीद है कि 2020 के सूरज का उजास जब फैलेगा तो भारत नई बुलंदियों की ओर उड़ान भरेगा।

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