लेखक परिचय

अरुण जेटली

अरुण जेटली

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय छात्र संघ के लोकप्रिय अध्‍यक्ष रहे जेटली जी ने छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी के अध्‍यक्ष के नाते आपातकाल के विरोध में सशक्‍त संघर्ष किया। आप देश के जाने-माने वकील एवं राजनेता हैं। एनडीए शासन के दौरान केन्‍द्रीय कानून मंत्री का दायित्‍व संभाल चुके जेटली जी अपनी वाक्पटुता और कुशल चुनावी प्रबंधन के लिए मशहूर हैं। विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर आप लेख लिखकर जन-जागरण का काम सहजता से करते रहते हैं। संप्रति : राज्‍यसभा में विपक्ष के नेता

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अरूण जेटली

भारत के उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति को गैर-संवैधानिक और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के विरूध्द बताकर रद्द कर दिया है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय का असर यह हुआ कि छत्तीसगढ़ राज्य और इन्हीं हालात में देश के अन्य भागों में कार्य कर रही विशेष पुलिस अधिकारी संस्था बंद हो जाएगी। विशेष पुलिस अधिकारी उन क्षेत्रों में नियुक्त किए गए हैं, जहां पर उपद्रवों से वातावरण को खतरा पैदा हो गया है, ताकि वे अपनी स्वयं की तथा अपने साथी नागरिकों की रक्षा करके नियमित पुलिस के कृत्यों का निवर्हन कर सकें। जम्मू और कश्मीर में यही विशेष पुलिस अधिकारी ही ग्राम रक्षा समितियों का गठन करते हैं जो ग्रामवासियों की विद्रोहियों से रक्षा करती हैं। बगावत के दिनों में पंजाब में भी इसी तंत्र का कारगर ढंग से उपयोग किया गया था। विशेष पुलिस अधिकारी एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें समुदाय के सदस्यों को समुदाय की रक्षा करने हेतु शक्तियां प्रदान की जाती हैं। पुलिसमैन हर घर या हर गांव में उपस्थित नहीं रह सकते। जिन क्षेत्रों में विद्रोह के कारण शांति और सुरक्षा भंग होने की आशंका होती है, वहीं पर विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति करना जरूरी होता है।

पुलिस अधिनियम 1861 में विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति करने के प्रावधान हैं। विभिन्न राज्य के पुलिस कानूनों में इस प्रकार के विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति करने के ऐसे प्रावधान हैं। कानूनों की भाषा अलग-अलग हो सकती है। जो लोग भारत की वास्तविक स्थिति से परिचित हैं, वे ऐसे विशेष पुलिस अधिकारियों की उपयोगिता को बखूबी समझते हैं। वे समुदाय की रक्षा के लिए समुदाय के प्रतिनिधि होते हैं। वे आम पुलिस प्रशासन के पूरक हैं।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय से संकट की स्थिति पैदा हो गई है। राज्य को अब विशेष पुलिस अधिकारियों से हथियार वापस वसूलने पड़ेंगे। यह स्वयं में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। प्रत्येक विशेष पुलिस अधिकारी यह महसूस करता है कि वह माओवादियों की हिट लिस्ट में होगा। उसके पास केवल दो ही विकल्प बचे हैं – या तो वह माओवादियों में शामिल हो जाए या माओवादियों से अपने आप को बचाने के लिए अपने हथियारों को अपने पास ही रखें। बिना राज्य के समर्थन से अथवा अपने-आप की रक्षा के लिए बिना हथियारों के ये विशेष पुलिस अधिकारी अब सिटिंग डक्स बनकर रहेंगे। माओवादियों के विरूध्द लड़ाई भारत देश के विरूध्द लड़ाई हो जाएगी। अब माओवादी विशेष पुलिस अधिकारियों को आम माफी देने के लिए शर्तें निर्धारित कर रहे हैं। उनकी बर्खास्ती से हुए खाली स्थान स्थानीय पुलिस के द्वारा आसानी से नहीं भरे जा सकते।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पढ़ने से प्रथम दृष्टतया यह पता चलता है कि निर्णय देने वाले की विचारधारा संविधानवाद पर भारी पड़ी हैं। इससे उत्पन्न होने वाला जायज़ प्रश्न यह है कि क्या न्यायालय संविधान को लागू करते है या वे अपनी विचारधारा के अनुपालन को बाध्य बनाते हैं। माओवादी सुधारक नहीं हैं। उनका प्रमुख उद्देश्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र को बर्बाद करना है और भारत में एक साम्यवादी तानाशाही स्थापित करना है। माओवादी प्रत्येक सुस्थापित लोकतांत्रिक संस्था को बर्बाद करता है। यदि माओवादियों का भारत पर कब्जा हो जाता है, तो निर्णय देने वाला तथा उनकी तरह अन्य विद्वान जज उच्चतम न्यायालय में नहीं रह पायेंगे। न्यायालय पर विचारधारा और माओवादियों की विचारधारा वाले लोगों का नियंत्रण होगा। निर्णय पढ़ने में स्वत: ही बहुत दिलचस्प है। यह विचारधारा सम्बन्धी औचित्य है कि माओवादी क्यों अस्तित्व में हैं और वे अपने हितों के लिए क्यों लड़ रहे हैं। ऐसा करना उन लोगों की भर्त्सना करना है जो माओवादियों से लड़ते हैं। निर्णय में बताया गया है –

”छत्तीसगढ़ राज्य का दावा है कि उसे अनिश्चित काल के लिए अत्याचार करने, मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन करने का उसी तरीके से, उसी ढंग से अधिकार प्राप्त है, जो माओवादी अपनाते हैं।”

इसमें आगे बताया गया है – ”संसाधनों से भरपूर अफ्रीकी उष्ण कटिबंधीय वनों की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए यूरापीय शक्तियों की साम्राज्यवादी-पूंजीवादी-विस्तारवादी नीति के द्वारा ब्रुटल आइवरी ट्रेड को बढ़ाने की दृष्टि से जोसेफ कोनार्ड इसे भयावह एवं वीभत्स मनोदशा बताता है और उन व्यक्तियों द्वारा न्यायोचित बताता है, जो बिना औचित्य के शक्ति हासिल करते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं। उसमें मानवता और किसी प्रकार के संतुलन का ध्यान नहीं रखा जाता।”

निर्णय में माओवादी विचारधारा को यह बताते हुए उचित बताया गया है –

”लोग किसी राज्य या अन्य लोगों के खिलाफ बिना किसी ठोस कारण या औचित्य के संगठित रूप में हथियार नहीं उठाते। जीवित रहने की इच्छा को ध्यान में रखते हुए और थॉमस होब्स के अनुसार हमारी आत्मा में अव्यवस्था के डर के रहते हम एक व्यवस्था चाहते हैं। तथापि, जब वह व्यवस्था अमानवीयकरण, कमजोर, गरीब और वंचित लोगों पर सभी प्रकार के अत्याचार ढहाने से आती है, तो लोग विद्रोह करते हैं।”

निर्णय में स्वीकृति के तौर पर ”दि डार्क साइड ऑफ ग्लोबलाइजेशन” नामक पुस्तक का उल्लेख किया गया है, जिसमें यह बताया गया है – ‘इस प्रकार, उसी प्रकार के मुद्दे, विशेषरूप की राजनीति, हिंसात्मक आन्दोलन की राजनीति तथा सशस्त्र विद्रोह को बढ़ावा मिलता है। क्या भारत में सरकारें और राजनीतिक पार्टियां सामाजिक-आर्थिक डायनीमिक, जो इस प्रकार की राजनीति को प्रोत्साहित करती हैं, को समझने में सक्षम हैं अथवा क्या वे सुरक्षा-उन्मुख रवैया ही अपनाएगी, जो उन्हें और अधिक भड़काता है ?”

निर्णय में बाध्यकारी रवैये की निंदा की गई है, जहां यह बताया गया है –

”इस प्रकार की सलाह, जो हमारे संविधान के अनुरूप है, को मानने के बजाय हमने वर्तमान मामले में जो देखा है, वह बाहुबल और हिंसात्मक स्टेटक्राफ्ट की अपरिहार्यता को बार-बार बताना है। समस्या का असली कारण और उसका समाधान कहीं और है। आधुनिक नव-उदारवादी विचारधारा द्वारा सृजित अनियंत्रित स्वार्थ और लालच की संस्कृति और खपत के निरंतर बढ़ते स्पाइरल्स संबंधी इन झूठे आश्वासनों से कि इनसे आर्थिक विकास होगा और प्रत्येक व्यक्ति का उत्थान होगा, सामान्य रूप से भारत के अधिकांश क्षेत्रों में और विशेष रूप से छत्तीसगढ़ में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से ये अस्थिर परिस्थितियां मजबूत होंगी।”

निर्णय में भारत की कमजोर राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दी गई है। नि:संदेह जजों ने राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश किया है। न्यायालय ने एक विचारधारा बनाई है। इसने आर्थिक नीति का एक पसंदीदा तरीका चुना है। इसने कार्यपालिका के ज्ञान को अपना ज्ञान माना, जिसके तहत माओवाद से कैसे निपटा जा सकता है। निर्णय में शक्तियों को अलग करने के मूल संवैधानिक विशिष्टता को नकारा गया है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित कानून, जो सभी अधीनस्थ प्राधिकरणों के लिए अब बाध्यकारी है, इस प्रकार है – ‘राज्य द्वारा संवैधानिक मानदंडों और मूल्यों का प्रत्यक्ष रूप से उल्लंघन करके समर्थित और संबंधित पूंजीवाद का विनष्टकारी रूप प्राय: अतिरिक्त सक्रिय उद्योगों के इर्द-गिर्द गहरी जड़ें लेता है।”

एक विस्तृत वैचारिक चर्चा के बाद न्यायालय ने विशेष पुलिस अधिकारियों की तैनाती में खामियां पाई हैं। हालांकि, केन्द्र और राज्य के कानून इस संबंध में विशिष्ट शक्तियां प्रदान करते हैं। इसे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया गया है क्योंकि आदिवासियों में कम शिक्षित युवाओं को ये नियुक्तियां दी जा रही हैं। इसे अनुच्छेद 21 के तहत जीने और स्वतंत्रता के अधिकार का हनन माना गया है क्योंकि विशेष पुलिस अधिकारियों की शैक्षिक योग्यता कम है और उनसे माओवाद से लड़ने के खतरे को समझने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे विशेष पुलिस अधिकारियों को नौकरी देने से उनका जीवन और अन्य लोगों का जीवन खतरे में पड़ सकता है और इस प्रकार से उन्हें प्रोत्साहित करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। इस कठिन कार्य को करने के लिए मानदेय का भुगतान किया जाना उनकी नियुक्तियों को रद्द करने का एक अन्य कारण है।

यदि न्यायालय ने मानदेय को अपर्याप्त माना है तो वह और अधिक मानवीय मानदेय दिए जाने के लिए निर्देश दे सकता था। यदि न्यायालय ने यह पाया कि विशेष पुलिस अधिकारी बनने के लिए शैक्षिक योग्यताएं अपर्याप्त हैं, तो वह राज्य को एक ऐसी नीति बनाने का निर्देश दे सकता था ताकि उचित योग्यता वाले व्यक्तियों को ही विशेष पुलिस अधिकारी नियुक्त किया जाए।

न्यायालय ने यह महसूस नहीं किया कि विशेष पुलिस अधिकारियों सहित आम नागरिकों के जीवन को माओवादियों से खतरा है। उनका जीवन और स्वतंत्रता पहले से ही खतरे में है। विशेष पुलिस अधिकारियों को उपलब्ध सुविधा से वे अपने आपको और अन्य लोगों को माओवादी हमले से बचा सकते थे। परन्तु उच्चतम न्यायालय के निर्णय के कारण इसका फायदा माओवादियों को मिला है।

निर्णय को पढ़ने से नि:संदेह यह पता चलता है कि असंवैधानिकता के आधार पर विशेष पुलिस अधिकारियों की संस्था को समाप्त करने के कारण कमजोर हैं। निर्णय का औचित्य विचारधारा है न कि संविधान। जब कोई न्यायालय एक विचारधारा बना लेता है तो वह एक नीति बनाना तय कर लेता है। वह शक्तियों को अलग करने के संवैधानिक आदेश को नहीं मानता। वह विधानमंडल और कार्यपालिका के क्षेत्र में दाखिल हो जाता है। इस निर्णय में बताए गए औचित्य से संवैधानिक संतुलन बिगड़ गया है। यदि किसी जज की विचारधारा संवैधानिकता तय करती है, तो जज का सामाजिक एवं राजनीतिक दर्शनशास्त्र प्रासंगिक हो जाता है। जब किसी जज का सामाजिक दर्शनशास्त्र प्रासंगिक हो जाता है तो यह आपको आपातकाल लगाए जाने के पूर्व के दिनों की याद दिलाता है। यदि न्यायपालिका संविधान की जगह सामाजिक-राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबध्द हो जाए तो न्यायिक स्वतंत्रता को इससे बड़ा खतरा और कोई नहीं है। भारत की राजनीतिक प्रक्रिया और संसद को इस निर्णय के परिणामों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।

6 Responses to “क्या न्यायालय विचारधारा के अनुपालन को बाध्य कर सकता है”

  1. Javed Usmani

    जेटली जी ने फैसले को लेकर जो सवाल उठाये हैं , उसने फैसले को दोबारा पढ़ने पर मजबूर कर दिया हैं . राजनीती और कानून दो अलग चीजे हैं और जेटली जी को दोनों में महारत हासिल हैं , इन दोनों का किसी विषय को देखने का नजरिया भी अलग हैं .पर दोनों की अदा एक हैं . दोनों की इच्छा अपने लिए अनुकूलता की हैं जिसका व्यवाहरिक सच्चाई से कुछ लेना देना नहीं हैं .

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  2. vimlesh

    [LARGE][LINK=/index.php/yeduniya/49-swiss-magzine-swiss-bank-report]सोनिया गांधी का 84 हजार करोड़ काला धन स्विस बैंक में! [/LINK] [/LARGE]
    Written by अनिल सिंह Category: [LINK=/index.php/yeduniya]सियासत-ताकत-राजकाज-देश-प्रदेश-दुनिया-समाज-सरोकार[/LINK] Published on 18 June 2011 [LINK=/index.php/component/mailto/?tmpl=component&template=youmagazine&link=e0a3be497731dda8908e3dd4729a378965d59b0f][IMG]/templates/youmagazine/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK] [LINK=/index.php/yeduniya/49-swiss-magzine-swiss-bank-report?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/youmagazine/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK]
    [IMG]/images/stories/fruit/swissmag11.jpg[/IMG]एक स्विस पत्रिका की एक पुरानी रिपोर्ट ([LINK=http://www.schweizer-illustrierte.ch/zeitschrift/500-millionen-der-schweiz-imeldas-faule-tricks]http://www.schweizer-illustrierte.ch/zeitschrift/500-millionen-der-schweiz-imeldas-faule-tricks#[/LINK]) को आधार माने तो यूपीए अध्‍यक्ष सोनिया गांधी के अरबों रुपये स्विस बैंक के खाते में जमा है. इस खाते को राजीव गांधी ने खुलवाया था. इस पत्रिका ने तीसरी दुनिया के चौदह ऐसे नेताओं के बारे में जानकारी दी थी, जिनके खाते स्विस बैंकों में थे और उनमें करोड़ों का काला धन जमा था.

    रुसी खुफिया एजेंसी ने भी अपने दस्‍तावेजों में लिखा है कि रुस के साथ हुए सौदा में राजीव गांधी को अच्‍छी खासी रकम मिली थी, जिसे उन्‍होंने स्विस बैंके अपने खातों में जमा करा दिया था. पूर्व केन्‍द्रीय मंत्री एवं वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता राम जेठमलानी भी सोनिया गांधी और उनके परिवार के पास अरबों का काला धन होने का आरोप लगा चुके हैं.

    तो क्‍या केंद्र सरकार इसलिए भ्रष्‍टाचार और काले धन के मुद्दे को इसलिए गंभीरता से नहीं ले रही है कि सोनिया गांधी का काला धन स्विस बैंक जमा है?  क्‍या केंद्र सरकार अन्‍ना हजार और रामदेव के साथ यह रवैया यूपीए अध्‍यक्ष के इशारे पर अपनाया गया था? क्‍या केन्‍द्र सरकार देश को लूटने वालों के नाम इसलिए ही सार्वजनिक नहीं करना चाहती है? क्‍या इसलिए काले धन को देश की सम्‍पत्ति घोषित करने की बजाय सरकार इस पर टैक्‍स वसूलकर इसे जमा करने वालों  के पास ही रहने देने की योजना बना रही है?  ऐसे कई सवाल हैं जो इन दिनों लोगों के जेहन में उठ रहे हैं.

    काला धन देश में वापस लाने के मुद्दे पर बाबा रामदेव के आंदोलन से पहले सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र सरकार की खिंचाई कर चुकी है. विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाले भारतीयों के नाम सार्वजनिक किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बीते 19 जनवरी को सरकार की जमकर खिंचाई की थी. सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक पूछ लिया था कि आखिर देश को लूटने वालों का नाम सरकार क्‍यों नहीं बताना चाहती है?  इसके पहले 14 जनवरी को भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा था. पर सरकार कोई तार्किक जवाब देने की बजाय टालमटोल वाला रवैया अपनाकर बच निकली.

    केंद्र सरकार के इस ठुलमुल रवैये एवं काले धन संचयकों के नाम न बताने की अनिच्‍छा के पीछे गांधी परिवार का स्विस खाता हैं. इस खाता को राजीव गांधी ने खुलवाया था. इसमें इतनी रकम जमा है कि कई सालों तक मनरेगा का संचालन किया जा सकता है. यह बात कही थी एक स्विस पत्रिका ने. ‘Schweizer Illustrierte’ (http://www.schweizer-illustrierte.ch/ )  नामक इस पत्रिका ने अपने एक पुराने अंक में प्रकाशित एक खोजपरक रिपोर्ट में राजीव गांधी का नाम भी शामिल किया था. पत्रिका ने लिखा था कि तीसरी दुनिया के तेरह नेताओं के साथ राजीव गांधी का खाता भी स्विस बैंक में हैं.

    यह कोई मामूली पत्रिका नहीं है. बल्कि यह स्विट्जरलैंड की प्रतिष्ठित तथा मशहूर पत्रिका है. इस पत्रिका की 2 लाख 15 हजार से ज्‍यादा प्रतियां छपती हैं तथा इसके पाठकों की खंख्‍या 9 लाख 25 हजार के आसपास है.  इसके पहले राजीव गांधी पर बोफोर्स में दलाली खाने का आरोप लग चुका है. डा. येवजेनिया एलबर्टस भी अपनी पुस्‍तक ‘The state within a state – The KGB hold on Russia in past and future’ में इस बात का खुलाया किया है कि राजीव गांधी और उनके परिवार को रुस के व्‍यवसायिक सौदों के बदले में लाभ मिले हैं. इस लाभ का एक बड़ा भाग स्विस बैंक में जमा किया गया है.       

    रुस की जासूसी संस्‍था केजीबी के दस्‍तावेजों में भी राजीव गांधी के स्विस खाते होने की बात है. जिस वक्‍त केजीबी दस्‍तावेजों के अनुसार राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी अपने अवयस्‍क लड़के (जिस वक्‍त खुलासा किया गया था, उस वक्‍त राहुल गांधी वयस्‍क नहीं थे) के बदले संचालित करती हैं. इस खाते में 2.5 बिलियन स्विस फ्रैंक है, जो करीब 2.2 बिलियन डॉलर के बराबर है. यह 2.2 बिलियन डॉलर का खाता तब भी सक्रिय था, जब राहुल गांधी जून 1998 में वयस्‍क हो गए थे. अगर इस धन का मूल्‍यांकन भारतीय रुपयों में किया जाए तो उसकी कीमत लगभग 10, 000 करोड़ रुपये होती है. इस रिपोर्ट को आए काफी समय हो चुका है, फिर भी गांधी परिवार ने कभी इस रिपोर्ट का औपचारिक रूप से खंडन नहीं किया और ना ही इसके खिलाफ विधिक कार्रवाई की बात कही.  

    आपको जानकारी दे दें कि स्विस बैंक अपने यहां जमा धनराशि का निवेश करता है, जिससे जमाकर्ता की राशि बढ़ती रहती है. अगर केजीबी के दस्‍तावेजों के आधार पर गांधी परिवार के पास मौजूद धन को अमेरिकी शेयर बाजार में लगाया गया होगा तो यह रकम लगभग 12,71 बिलियन डॉलर यानी लगभग 48, 365 करोड़ रुपये हो चुका होगा. यदि इसे लंबी अवधि के शेयरों में निवेश किया गया होगा तो यह राशि लगभग 11. 21 बिलियन डॉलर होगी जो वर्तमान में लगभग 50, 355 करोड़ रुपये हो चुकी होगी.

    साल 2008 में आए वैश्विक आर्थिक मंदी के पहले यह राशि लगभग 18.66  बिलियन डॉलर यानी 83 हजार 700 करोड़ के आसपास हो चुकी होगी. वर्तमान स्थिति में गांधी परिवार के पास हर हाल में यह काला धन 45,000 करोड़ से लेकर 84, 000 करोड़ के बीच होगा. चर्चा है कि सकरार के पास ऐसे पचास लोगों की सूची आ चुकी है, जिनके पास टैक्‍स हैवेन देशों में बैंक एकाउंट हैं. पर सरकार ने अब तक मात्र 26 लोगों के नाम ही अदालत को सौंपे हैं. एक गैर सरकारी अनुमान के अनुसार 1948 से 2008 तक भारत अवैध वित्तीय प्रवाह (गैरकानूनी पूंजी पलायन) के चलते कुल 213 मिलियन डालर की राशि गंवा चुका है. भारत की वर्तमान कुल अवैध वित्तीय प्रवाह की वर्तमान कीमत कम से कम 462 बिलियन डालर के आसपास आंकी गई है, जो लगभग 20 लाख करोड़ के बराबर है, यानी भारत का इतना काला धन दूसरे देशों में जमा है.
    [IMG]/images/stories/fruit/swissmagzine.jpg[/IMG]

    यही कारण बताया जा रहा है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट से बराबर लताड़ खाने के बाद भी देश को लूटने वाले का नाम उजागर नहीं कर रही है. कहा जा रहा है कि इसी कारण बाबा रामदेव का आंदोलन एक रात में खतम करवा दिया गया तथा इसके पहले उन्‍हें इस मुद्दे पर मनाने के लिए चार-चार मंत्री हवाई अड्डे पर अगवानी करने गए. सरकार इसके चलते ही इस मामले की जांच जेपीसी से नहीं करवानी चा‍हती. इसके चलते ही भ्रष्‍टाचार के मामले में आरोपी थॉमस को सीवीसी यानी मुख्‍य सतर्कता आयुक्‍त बनाया गया, ताकि मामले को सामने आने से रोका जा सके.

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  3. vimlesh

    नकली नोट रिजर्व बैंक और सरकार

    April 10th, २०११

    देश के रिज़र्व बैंक के वाल्ट पर सीबीआई ने छापा डाला. उसे वहां पांच सौ और हज़ार रुपये के नक़ली नोट मिले. वरिष्ठ अधिकारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की. दरअसल सीबीआई ने नेपाल-भारत सीमा के साठ से सत्तर विभिन्न बैंकों की शाखाओं पर छापा डाला था, जहां से नक़ली नोटों का कारोबार चल रहा था. इन बैंकों के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा कि उन्हें ये नक़ली नोट भारत के रिजर्व बैंक से मिल रहे हैं. इस पूरी घटना को भारत सरकार ने देश से और देश की संसद से छुपा लिया. या शायद सीबीआई ने भारत सरकार को इस घटना के बारे में कुछ बताया ही नहीं. देश अंधेरे में और देश को तबाह करने वाले रोशनी में हैं. आइए, आपको

    आज़ाद भारत के सबसे बड़े आपराधिक षड्‌यंत्र के बारे में बताते हैं, जिसे हमने पांच महीने की तलाश के बाद आपके सामने रखने का फ़ैसला किया है. कहानी है रिज़र्व बैंक के माध्यम से देश के अपराधियों द्वारा नक़ली नोटों का कारोबार करने की.
    नक़ली नोटों के कारोबार ने देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह अपने जाल में जकड़ लिया है. आम जनता के हाथों में नक़ली नोट हैं, पर उसे ख़बर तक नहीं है. बैंक में नक़ली नोट मिल रहे हैं, एटीएम नक़ली नोट उगल रहे हैं. असली-नक़ली नोट पहचानने वाली मशीन नक़ली नोट को असली बता रही है. इस देश में क्या हो रहा है, यह समझ के बाहर है. चौथी दुनिया की तहक़ीक़ात से यह पता चला है कि जो कंपनी भारत के लिए करेंसी छापती रही, वही 500 और 1000 के नक़ली नोट भी छाप रही है. हमारी तहक़ीक़ात से यह अंदेशा होता है कि देश की सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया जाने-अनजाने में नोट छापने वाली विदेशी कंपनी के पार्टनर बन चुके हैं. अब सवाल यही है कि इस ख़तरनाक साज़िश पर देश की सरकार और एजेंसियां क्यों चुप हैं?

    एक जानकारी जो पूरे देश से छुपा ली गई, अगस्त 2010 में सीबीआई की टीम ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के वाल्ट में छापा मारा. सीबीआई के अधिकारियों का दिमाग़ उस समय सन्न रह गया, जब उन्हें पता चला कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के ख़ज़ाने में नक़ली नोट हैं. रिज़र्व बैंक से मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिसे पाकिस्तान की खु़फिया एजेंसी नेपाल के रास्ते भारत भेज रही है. सवाल यह है कि भारत के रिजर्व बैंक में नक़ली नोट कहां से आए? क्या आईएसआई की पहुंच रिज़र्व बैंक की तिजोरी तक है या फिर कोई बहुत ही भयंकर साज़िश है, जो हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को खोखला कर चुकी है. सीबीआई इस सनसनीखेज मामले की तहक़ीक़ात कर रही है. छह बैंक कर्मचारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की है. इतने महीने बीत जाने के बावजूद किसी को यह पता नहीं है कि जांच में क्या निकला? सीबीआई और वित्त मंत्रालय को देश को बताना चाहिए कि बैंक अधिकारियों ने जांच के दौरान क्या कहा? नक़ली नोटों के इस ख़तरनाक खेल पर सरकार, संसद और जांच एजेंसियां क्यों चुप है तथा संसद अंधेरे में क्यों है?

    अब सवाल यह है कि सीबीआई को मुंबई के रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया में छापा मारने की ज़रूरत क्यों पड़ी? रिजर्व बैंक से पहले नेपाल बॉर्डर से सटे बिहार और उत्तर प्रदेश के क़रीब 70-80 बैंकों में छापा पड़ा. इन बैंकों में इसलिए छापा पड़ा, क्योंकि जांच एजेंसियों को ख़बर मिली है कि पाकिस्तान की खु़फ़िया एजेंसी आईएसआई नेपाल के रास्ते भारत में नक़ली नोट भेज रही है. बॉर्डर के इलाक़े के बैंकों में नक़ली नोटों का लेन-देन हो रहा है. आईएसआई के रैकेट के ज़रिए 500 रुपये के नोट 250 रुपये में बेचे जा रहे हैं. छापे के दौरान इन बैंकों में असली नोट भी मिले और नक़ली नोट भी. जांच एजेंसियों को लगा कि नक़ली नोट नेपाल के ज़रिए बैंक तक पहुंचे हैं, लेकिन जब पूछताछ हुई तो सीबीआई के होश उड़ गए. कुछ बैंक अधिकारियों की पकड़-धकड़ हुई. ये बैंक अधिकारी रोने लगे, अपने बच्चों की कसमें खाने लगे. उन लोगों ने बताया कि उन्हें नक़ली नोटों के बारे में कोई जानकारी नहीं, क्योंकि ये नोट रिजर्व बैंक से आए हैं. यह किसी एक बैंक की कहानी होती तो इसे नकारा भी जा सकता था, लेकिन हर जगह यही पैटर्न मिला. यहां से मिली जानकारी के बाद ही सीबीआई ने फ़ैसला लिया कि अगर नक़ली नोट रिजर्व बैंक से आ रहे हैं तो वहीं जाकर देखा जाए कि मामला क्या है. सीबीआई ऱिजर्व बैंक ऑफ इंडिया पहुंची, यहां उसे नक़ली नोट मिले. हैरानी की बात यह है कि रिज़र्व बैंक में मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिन्हें आईएसआई नेपाल के ज़रिए भारत भेजती है.

    रिज़र्व बैंक आफ इंडिया में नक़ली नोट कहां से आए, इस गुत्थी को समझने के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश में नक़ली नोटों के मामले को समझना ज़रूरी है. दरअसल हुआ यह कि आईएसआई की गतिविधियों की वजह से यहां आएदिन नक़ली नोट पकड़े जाते हैं. मामला अदालत पहुंचता है. बहुत सारे केसों में वकीलों ने अनजाने में जज के सामने यह दलील दी कि पहले यह तो तय हो जाए कि ये नोट नक़ली हैं. इन वकीलों को शायद जाली नोट के कारोबार के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं था, स़िर्फ कोर्ट से व़क्त लेने के लिए उन्होंने यह दलील दी थी. कोर्ट ने जब्त हुए नोटों को जांच के लिए सरकारी लैब भेज दिया, ताकि यह तय हो सके कि ज़ब्त किए गए नोट नक़ली हैं. रिपोर्ट आती है कि नोट असली हैं. मतलब यह कि असली और नक़ली नोटों के कागज, इंक, छपाई और सुरक्षा चिन्ह सब एक जैसे हैं. जांच एजेंसियों के होश उड़ गए कि अगर ये नोट असली हैं तो फिर 500 का नोट 250 में क्यों बिक रहा है. उन्हें तसल्ली नहीं हुई. फिर इन्हीं नोटों को टोक्यो और हांगकांग की लैब में भेजा गया. वहां से भी रिपोर्ट आई कि ये नोट असली हैं. फिर इन्हें अमेरिका भेजा गया. नक़ली नोट कितने असली हैं, इसका पता तब चला, जब अमेरिका की एक लैब ने यह कहा कि ये नोट नक़ली हैं. लैब ने यह भी कहा कि दोनों में इतनी समानताएं हैं कि जिन्हें पकड़ना मुश्किल है और जो विषमताएं हैं, वे भी जानबूझ कर डाली गई हैं और नोट बनाने वाली कोई बेहतरीन कंपनी ही ऐसे नोट बना सकती है. अमेरिका की लैब ने जांच एजेंसियों को पूरा प्रूव दे दिया और तरीक़ा बताया कि कैसे नक़ली नोटों को पहचाना जा सकता है. इस लैब ने बताया कि इन नक़ली नोटों में एक छोटी सी जगह है, जहां छेड़छाड़ हुई है. इसके बाद ही नेपाल बॉर्डर से सटे बैंकों में छापेमारी का सिलसिला शुरू हुआ. नक़ली नोटों की पहचान हो गई, लेकिन एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया कि नेपाल से आने वाले 500 एवं 1000 के नोट और रिज़र्व बैंक में मिलने वाले नक़ली नोट एक ही तरह के कैसे हैं. जिस नक़ली नोट को आईएसआई भेज रही है, वही नोट रिजर्व बैंक में कैसे आया. दोनों जगह पकड़े गए नक़ली नोटों के काग़ज़, इंक और छपाई एक जैसी क्यों है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि भारत के 500 और 1000 के जो नोट हैं, उनकी क्वालिटी ऐसी है, जिसे आसानी से नहीं बनाया जा सकता है और पाकिस्तान के पास वह टेक्नोलॉजी है ही नहीं. इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि जहां से ये नक़ली नोट आईएसआई को मिल रहे हैं, वहीं से रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को भी सप्लाई हो रहे हैं. अब दो ही बातें हो सकती हैं. यह जांच एजेंसियों को तय करना है कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों की मिलीभगत से नक़ली नोट आया या फिर हमारी अर्थव्यवस्था ही अंतरराष्ट्रीय मा़फ़िया गैंग की साज़िश का शिकार हो गई है. अब सवाल उठता है कि ये नक़ली नोट छापता कौन है.

    हमारी तहक़ीक़ात डे ला रू नाम की कंपनी तक पहुंच गई. जो जानकारी हासिल हुई, उससे यह साबित होता है कि नक़ली नोटों के कारोबार की जड़ में यही कंपनी है. डे ला रू कंपनी का सबसे बड़ा करार रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ था, जिसे यह स्पेशल वॉटरमार्क वाला बैंक नोट पेपर सप्लाई करती रही है. पिछले कुछ समय से इस कंपनी में भूचाल आया हुआ है. जब रिजर्व बैंक में छापा पड़ा तो डे ला रू के शेयर लुढ़क गए. यूरोप में ख़राब करेंसी नोटों की सप्लाई का मामला छा गया. इस कंपनी ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को कुछ ऐसे नोट दे दिए, जो असली नहीं थे. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की टीम इंग्लैंड गई, उसने डे ला रू कंपनी के अधिकारियों से बातचीत की. नतीजा यह हुआ कि कंपनी ने हम्प्शायर की अपनी यूनिट में उत्पादन और आगे की शिपमेंट बंद कर दी. डे ला रू कंपनी के अधिकारियों ने भरोसा दिलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने यह कहा कि कंपनी से जुड़ी कई गंभीर चिंताएं हैं. अंग्रेजी में कहें तो सीरियस कंसर्नस. टीम वापस भारत आ गई.

    डे ला रू कंपनी की 25 फीसदी कमाई भारत से होती है. इस ख़बर के आते ही डे ला रू कंपनी के शेयर धराशायी हो गए. यूरोप में हंगामा मच गया, लेकिन हिंदुस्तान में न वित्त मंत्री ने कुछ कहा, न ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कोई बयान दिया. रिज़र्व बैंक के प्रतिनिधियों ने जो चिंताएं बताईं, वे चिंताएं कैसी हैं. इन चिंताओं की गंभीरता कितनी है. रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ डील बचाने के लिए कंपनी ने माना कि भारत के रिज़र्व बैंक को दिए जा रहे करेंसी पेपर के उत्पादन में जो ग़लतियां हुईं, वे गंभीर हैं. बाद में कंपनी के चीफ एक्जीक्यूटिव जेम्स हसी को 13 अगस्त, 2010 को इस्ती़फा देना पड़ा. ये ग़लतियां क्या हैं, सरकार चुप क्यों है, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया क्यों ख़ामोश है. मज़ेदार बात यह है कि कंपनी के अंदर इस बात को लेकर जांच चल रही थी और एक हमारी संसद है, जिसे कुछ पता नहीं है.

    5 जनवरी, 2011 को यह ख़बर आई कि भारत सरकार ने डे ला रू के साथ अपने संबंध ख़त्म कर लिए. पता यह चला कि 16,000 टन करेंसी पेपर के लिए रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने डे ला रू की चार प्रतियोगी कंपनियों को ठेका दे दिया. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने डे ला रू को इस टेंडर में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित भी नहीं किया. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और भारत सरकार ने इतना बड़ा फै़सला क्यों लिया. इस फै़सले के पीछे तर्क क्या है. सरकार ने संसद को भरोसे में क्यों नहीं लिया. 28 जनवरी को डे ला रू कंपनी के टिम कोबोल्ड ने यह भी कहा कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ उनकी बातचीत चल रही है, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि डे ला रू का अब आगे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ कोई समझौता होगा या नहीं. इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी डे ला रू से कौन बात कर रहा है और क्यों बात कर रहा है. मज़ेदार बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ख़ामोश रहा.

    इस तहक़ीक़ात के दौरान एक सनसनीखेज सच सामने आया. डे ला रू कैश सिस्टम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को 2005 में सरकार ने दफ्तर खोलने की अनुमति दी. यह कंपनी करेंसी पेपर के अलावा पासपोर्ट, हाई सिक्योरिटी पेपर, सिक्योरिटी प्रिंट, होलोग्राम और कैश प्रोसेसिंग सोल्यूशन में डील करती है. यह भारत में असली और नक़ली नोटों की पहचान करने वाली मशीन भी बेचती है. मतलब यह है कि यही कंपनी नक़ली नोट भारत भेजती है और यही कंपनी नक़ली नोटों की जांच करने वाली मशीन भी लगाती है. शायद यही वजह है कि देश में नक़ली नोट भी मशीन में असली नज़र आते हैं. इस मशीन के सॉफ्टवेयर की अभी तक जांच नहीं की गई है, किसके इशारे पर और क्यों? जांच एजेंसियों को अविलंब ऐसी मशीनों को जब्त करना चाहिए, जो नक़ली नोटों को असली बताती हैं. सरकार को इस बात की जांच करनी चाहिए कि डे ला रू कंपनी के रिश्ते किन-किन आर्थिक संस्थानों से हैं. नोटों की जांच करने वाली मशीन की सप्लाई कहां-कहां हुई है.

    हमारी जांच टीम को एक सूत्र ने बताया कि डे ला रू कंपनी का मालिक इटालियन मा़िफया के साथ मिलकर भारत के नक़ली नोटों का रैकेट चला रहा है. पाकिस्तान में आईएसआई या आतंकवादियों के पास जो नक़ली नोट आते हैं, वे सीधे यूरोप से आते हैं. भारत सरकार, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और देश की जांच एजेंसियां अब तक नक़ली नोटों पर नकेल इसलिए नहीं कस पाई हैं, क्योंकि जांच एजेंसियां अब तक इस मामले में पाकिस्तान, हांगकांग, नेपाल और मलेशिया से आगे नहीं देख पा रही हैं. जो कुछ यूरोप में हो रहा है, उस पर हिंदुस्तान की सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया चुप है.

    अब सवाल उठता है कि जब देश की सबसे अहम एजेंसी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताया, तब सरकार ने क्या किया. जब डे ला रू ने नक़ली नोट सप्लाई किए तो संसद को क्यों नहीं बताया गया. डे ला रू के साथ जब क़रार ़खत्म कर चार नई कंपनियों के साथ क़रार हुए तो विपक्ष को क्यों पता नहीं चला. क्या संसद में उन्हीं मामलों पर चर्चा होगी, जिनकी रिपोर्ट मीडिया में आती है. अगर जांच एजेंसियां ही कह रही हैं कि नक़ली नोट का काग़ज़ असली नोट के जैसा है तो फिर सप्लाई करने वाली कंपनी डे ला रू पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई. सरकार को किसके आदेश का इंतजार है. समझने वाली बात यह है कि एक हज़ार नोटों में से दस नोट अगर जाली हैं तो यह स्थिति देश की वित्तीय व्यवस्था को तबाह कर सकती है. हमारे देश में एक हज़ार नोटों में से कितने नोट जाली हैं, यह पता कर पाना भी मुश्किल है, क्योंकि जाली नोट अब हमारे बैंकों और एटीएम मशीनों से निकल रहे हैं.

    डे ला रू का नेपाल और आई एस आई कनेक्शन
    कंधार हाईजैक की कहानी बहुत पुरानी हो गई है, लेकिन इस अध्याय का एक ऐसा पहलू है, जो अब तक दुनिया की नज़र से छुपा हुआ है. इस खउ-814 में एक ऐसा शख्स बैठा था, जिसके बारे में सुनकर आप दंग रह जाएंगे. इस आदमी को दुनिया भर में करेंसी किंग के नाम से जाना जाता है. इसका असली नाम है रोबेर्टो ग्योरी. यह इस जहाज में दो महिलाओं के साथ स़फर कर रहा था. दोनों महिलाएं स्विट्जरलैंड की नागरिक थीं. रोबेर्टो़ खुद दो देशों की नागरिकता रखता है, जिसमें पहला है इटली और दूसरा स्विट्जरलैंड. रोबेर्टो को करेंसी किंग इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह डे ला रू नाम की कंपनी का मालिक है. रोबेर्टो ग्योरी को अपने पिता से यह कंपनी मिली. दुनिया की करेंसी छापने का 90 फी़सदी बिजनेस इस कंपनी के पास है. यह कंपनी दुनिया के कई देशों कें नोट छापती है. यही कंपनी पाकिस्तान की आईएसआई के लिए भी काम करती है. जैसे ही यह जहाज हाईजैक हुआ, स्विट्जरलैंड ने एक विशिष्ट दल को हाईजैकर्स से बातचीत करने कंधार भेजा. साथ ही उसने भारत सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह किसी भी क़ीमत पर करेंसी किंग रोबेर्टो ग्योरी और उनके मित्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करे. ग्योरी बिजनेस क्लास में स़फर कर रहा था. आतंकियों ने उसे प्लेन के सबसे पीछे वाली सीट पर बैठा दिया. लोग परेशान हो रहे थे, लेकिन ग्योरी आराम से अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था. उसके पास सैटेलाइट पेन ड्राइव और फोन थे.यह आदमी कंधार के हाईजैक जहाज में क्या कर रहा था, यह बात किसी की समझ में नहीं आई है. नेपाल में ऐसी क्या बात है, जिससे स्विट्जरलैंड के सबसे अमीर व्यक्ति और दुनिया भर के नोटों को छापने वाली कंपनी के मालिक को वहां आना पड़ा. क्या वह नेपाल जाने से पहले भारत आया था. ये स़िर्फ सवाल हैं, जिनका जवाब सरकार के पास होना चाहिए. संसद के सदस्यों को पता होना चाहिए, इसकी जांच होनी चाहिए थी. संसद में इस पर चर्चा होनी चाहिए थी. शायद हिंदुस्तान में फैले जाली नोटों का भेद खुल जाता.

    नकली नोंटों का मायाजाल
    सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि 2006 से 2009 के बीच 7.34 लाख सौ रुपये के नोट, 5.76 लाख पांच सौ रुपये के नोट और 1.09 लाख एक हज़ार रुपये के नोट बरामद किए गए. नायक कमेटी के मुताबिक़, देश में लगभग 1,69,000 करोड़ जाली नोट बाज़ार में हैं. नक़ली नोटों का कारोबार कितना ख़तरनाक रूप ले चुका है, यह जानने के लिए पिछले कुछ सालों में हुईं कुछ महत्वपूर्ण बैठकों के बारे में जानते हैं. इन बैठकों से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि देश की एजेंसियां सब कुछ जानते हुए भी बेबस और लाचार हैं. इस धंधे की जड़ में क्या है, यह हमारे ख़ुफिया विभाग को पता है. नक़ली नोटों के लिए बनी ज्वाइंट इंटेलिजेंस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारत नक़ली नोट प्रिंट करने वालों के स्रोत तक नहीं पहुंच सका है. नोट छापने वाले प्रेस विदेशों में लगे हैं. इसलिए इस मुहिम में विदेश मंत्रालय की मदद लेनी होगी, ताकि उन देशों पर दबाव डाला जा सके. 13 अगस्त, 2009 को सीबीआई ने एक बयान दिया कि नक़ली नोट छापने वालों के पास भारतीय नोट बनाने वाला गुप्त सांचा है, नोट बनाने वाली स्पेशल इंक और पेपर की पूरी जानकारी है. इसी वजह से देश में असली दिखने वाले नक़ली नोट भेजे जा रहे हैं. सीबीआई के प्रवक्ता ने कहा कि नक़ली नोटों के मामलों की तहक़ीक़ात के लिए देश की कई एजेंसियों के सहयोग से एक स्पेशल टीम बनाई गई है. 13 सितंबर, 2009 को नॉर्थ ब्लॉक में स्थित इंटेलिजेंस ब्यूरो के हेड क्वार्टर में एक मीटिंग हुई थी, जिसमें इकोनोमिक इंटेलिजेंस की सारी अहम एजेंसियों ने हिस्सा लिया. इसमें डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस, इंटेलिजेंस ब्यूरो, आईबी, वित्त मंत्रालय, सीबीआई और सेंट्रल इकोनोमिक इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस मीटिंग का निष्कर्ष यह निकला कि जाली नोटों का कारोबार अब अपराध से बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन गया है. इससे पहले कैबिनेट सेक्रेटरी ने एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी, जिसमें रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, आईबी, डीआरआई, ईडी, सीबीआई, सीईआईबी, कस्टम और अर्धसैनिक बलों के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस बैठक में यह तय हुआ कि ब्रिटेन के साथ यूरोप के दूसरे देशों से इस मामले में बातचीत होगी, जहां से नोट बनाने वाले पेपर और इंक की सप्लाई होती है. तो अब सवाल उठता है कि इतने दिनों बाद भी सरकार ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की, जांच एजेंसियों को किसके आदेश का इंतजार है?

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  4. आर. सिंह

    आर.सिंह

    यह सही है की अरुण जेटली एक ऐसे वकील का नाम है ,जिनके तर्क को काटने की जुर्रत करना किसी भी आम आदमी के बूते के बाहर की बात है.अरुण जेटली एक ऐसे राजनेता का नाम है जिनकी छवि अब तक साफ़ सुथरी मानी जाती है ,फिर भी विमलेश जी ने अपनी टूटी फूटी भाषा में जो समझाने की कोशिश की है वह प्रसंशा के योग्य है.अरुण जेटली साहब के लिए इन संशयों का समुचित समाधान कठिन नहीं होना चाहिए.एक अन्य प्रश्न भी मैं उठाना चाहूंगा.वह यह की श्री अरुण जेटली भी मानते हैं की ये तथाकथित बिशेष पुलिस अधिकारी माओवादियों से लड़ाई में उनके सेनापति हैं,क्योंकि वे आगे बढ़कर उन तथाकथित मानवता के शत्रुओं का सामना कर रहे हैं तो उनका वेतन मान और अन्य सुबिधायें इतनी कम क्यों?क्या सरकारी खजाना इतना खाली हो गया है ,क्या हम इतने संवेदन हीन हो गये हैं जो जान की इतनी कम कीमत लगा बैठे है.मैं समझता हूँ की छतीसगढ़ सरकार और उनके श्री जेटली जैसे रहनुमा अगर उन विशेष पुलिस अधिकारियों को विशेष दर्जा देते और दिखाते की वे बली के बकरे नहीं ,बल्कि हमारी हथियार बंद सेना के कमांडर है और उनका हमारे हेरारकी में वही रूतबा और वेतन मान है तो कोई भी न्यायाधीश चाहे वह किसी विचार धारा का होता उनके पद को नहीं समाप्त कर सकता था और जब उस तरह के लोगों की बहाली आम हो जाती तो ज्यादा से ज्यादा लोग विशेष पुलिस अधिकारी बनने की प्रतिस्प्रधा में आगे आते और धीरे धीरे उस आदिवासी बहुल इलाके में माओवादियों का पकड अपने आप कमजोर पड़ जाता.उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा कर सरकार को उसके उत्तर दायित्व के प्रति सजग किया है.

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  5. vimlesh

    जेटली जी सादर अभिवादन
    आप जैसे लोगो से सवाल जवाब करने की हम जैसो में जुर्रत नही ,और निश्चय ही आपकी छवि एक बेदाग राजनेता की है .
    मै अरुण जेटली से नही उस बेदाग छवि वाले राज नेता से चंद समाधान पाने की अपेक्षा करते हुए आपके लेख की ही चंद लाइने ले रहा हू
    -+-+-+-+-+-+-++-+-++–++–+
    माओवादी सुधारक नहीं हैं। उनका प्रमुख उद्देश्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र को बर्बाद करना है और भारत में एक साम्यवादी तानाशाही स्थापित करना है।

    लोक + तंत्र

    सर जी यह देश के कौन से हिस्से में पाया जाता है इसका स्वरूप ,स्वभाव कैसा है

    सर आप तो बेहतर जानते है की देश में एक और तन्त्र है
    नोट तन्त्र
    —————–
    ”लोग किसी राज्य या अन्य लोगों के खिलाफ बिना किसी ठोस कारण या औचित्य के संगठित रूप में हथियार नहीं उठाते। जीवित रहने की इच्छा को ध्यान में रखते हुए और थॉमस होब्स के अनुसार हमारी आत्मा में अव्यवस्था के डर के रहते हम एक व्यवस्था चाहते हैं। तथापि, जब वह व्यवस्था अमानवीयकरण, कमजोर, गरीब और वंचित लोगों पर सभी प्रकार के अत्याचार ढहाने से आती है, तो लोग विद्रोह करते हैं।”

    उपरोक्त चंद लाइने साफ़ कर देती है जब लोकतंत्र है ही नहीं ,
    सब जगह केवल नोट तन्त्र है
    और माओवादियों के पास इस तन्त्र का आभाव है

    तो वहा के लोगो ने जब एक अन्य तन्त्र माओवाद तन्त्र विकशित कर लिया
    और जब माओवाद तन्त्र वहा काम कर रहा है तो फिर लोकतन्त्र वहा क्यों घुसपैठ कर रहा है

    आज सभी जानते है की देश में कैसा लोकतंत्र है और यदि ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नही जब देश में हर जगह एक अलग तन्त्र होगा ,

    देश के लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिए अंग्रेजो की पुलिस की नही लोकतंत्र के सच्चे सिपाहियों की जरूरत है जो इस देश को अखंड बनाये रखे ,

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  6. Anil Gupta,Meerut,India

    माननीय सर्वोह्च न्यायालय ने ‘अमानवीय, कमजोर ,गरीब और वंचित लोगों पर अत्याचारों को माओवादी बगावत का कारन बताया है लेकिन इस तथ्य को नजरंदाज़ कर दिया है की माओवादी हिंसा आमतौर पर स्कूलों, अस्पतालों, पुलों, सडकों तथा विकास से जुड़े स्थानों पर ही ज्यादा होती है जिनका उल्लिखित वर्गों पर कथित अत्याचारों में कोई रोल नहीं होता है. यह हिंसा केवल अपनी विकृत राजनीतिक विचारधारा के अनुसार स्थापित व्यवस्था को उखाड कर अपनी विचारधार के अनुसार सत्ता स्थापित करने के लिए की जा रही है. रोमांटिसिज्म अलग है और हकीकत अलग. माननीय न्यायमुर्तिगन कमजोर लोगों की तकलीफ से द्रवित हों ये स्वाभाविक ही है लेकिन इसके लिए आम लोगों के बीच से कुछ लोगों द्वारा अपनी जान की परवाह न करके अपनी व अपने आसपास के लोगों की सुरक्षा के लिए सलवा जादुम के नाम से आत्म रक्षा दल बनाया जाना भी एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. जहाँ तक कम पढ़े लिखे होने का सवाल है तो क्या सेना व पुलिस बालों में सिपाही के स्टार पर भारती होने वाले उच्च शिक्षा प्राप्त होते हैं? नहीं.वो भी कम पढ़े लिखे ही होते हैं. श्री जेटली अपने आलेख के अंत में संविधान के अंतर्गत शक्तियों को अलग करने के सिद्धांत को न मानने की बात को उठाते हुए जब ये कहते हैं की न्यायालय द्वारा विधान मंडल व कार्यपालिका के छेत्र में घुस जाने से असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो वो प्रकारांतर से सरकार के इसी प्रकार के तर्कों की पुष्टि लरते प्रतीत होते हैं? आखिर सरकार भी तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कालेधन के मामले में एस आयी टी के आदेश के विरुद्ध यही तर्क उठा रही है. बेहतर होगा की छत्तीसगढ़ की सरकार सारी बातें विस्तार से रखकर निर्णय के पुनर्विचार हेतु याचिका प्रस्तुत करें और मामले को वृहद पीठ के सामने रखे जाने का अनुरोध करें तथा पुनर्विचार याचिका पर निर्णय होने तक मौजूदा निर्णय के अमल पर रोकादेश का अनुरोध करें

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