Home चुनाव जन-जागरण मदरसों की मान्यता खत्म करना स्वागतयोग्य फैसला !

मदरसों की मान्यता खत्म करना स्वागतयोग्य फैसला !

madarsaमदरसे का मामला हो और उसपर बीजेपी सरकार कोई फैसला ले तो तूफान खड़ा होना लाजमी है। अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान नहीं पढ़ाने वाले मदरसों से स्कूली मान्यता खत्म करने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले के बाद ठीक हुआ भी ऐसा ही। राजनीतिक दल तो राजनीतिक दल, मुस्लिम रहनुमा भी बिना सोचे-समझे बयान बाजी में जुट गए हैं। आम मुसलमानों को ऐसा लग रहा है कि महराष्ट्र की बीजेपी सरकार ने इस्लाम की जड़ पर हमला बोल दिया है। अब इस्लाम भारत में खतरे में हैं। भ्रम फैलाने में मीडिया भी अपना खूब योगदान दे रहा है। सही बात बताने के बजाए सीधे-सीधे खबरों की हेडिंग्स चल रही है ‘मदरसों की स्कूली मान्यता खत्म’ जबकि सच्चाई इससे बिलकुल अलग है।

महाराष्ट्र सरकार ने सिर्फ उन मदरसों की स्कूली मान्यता खत्म करने की बात कही है, जो इंग्लिश, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे जरूरी विषय नहीं पढ़ाते हैं। महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री एकनाथ खडसे ने सरकार के फैसले पर जो सफाई दी है, वह कहीं से भी गलत नहीं है। खडसे ने फैसले की मंशा बताते हुए ये साफ कर दिया है कि हमारा मकसद केवल इतना है कि अल्पसंख्यक समुदाय के प्रत्येक बच्चे को सीखने और मुख्यधारा में आने का मौका मिले, उसे अच्छी नौकरी मिले और उसका भविष्य उज्जवल हो। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों को औपचारिक शिक्षा प्रदान करने पर हम मदरसों को भुगतान करने को भी तैयार हैं। खडसे के मुताबिक महाराष्ट्र में पंजीकृत 1890 मदरसों में से 550 ने छात्रों को चार विषय पढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है। इसके बाद भी विरोध जारी है। लेकिन सरकार के फैसले पर थोड़ा सा सोचने मात्र से ये बात साफ हो जाती है कि सरकार के फैसले का विरोध वही करेगा, जो मुसलमानों का दुश्मन होगा। जो मुसलमानों को हमेशा पिछड़ा और अपना वोट बैंक बनाए रखने की रणनीतिक चाल चल रहा होगा।

सरकार का फैसला न तो कही से मुसलमान विरोधी है और न ही इस्लाम विरोधी। विरोधी इसका विरोध इस लिए कर रहे हैं, क्योंकि ये फैसला बीजेपी सरकार ने लिया है। जो मुस्लिम रहनुमा इंग्लिश, मैथ्स, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान का विरोध कर रहे हैं, उन्हें ये बताना होगा कि क्या ये विषय गैर इस्लामिक है। अगर गैर इस्लामिक नहीं हैं तो इसके पढ़ाने पर विरोध क्यों? सच्चाई ये है कि इस्लाम दुनिया का इकलौता मजहब है, जो कहता है ‘ला रहबानियत फिल इस्लाम’ यानी इस्लाम में अल्लाह को पाने के लिए दुनिया छोड़ने (सन्ंयस) की जरूरत नहीं है। इस्लाम के मुताबिक दुनिया के हर काम को अल्लाह और उसके रसूल के बताए तरीके से करना ही धर्म है। इतना ही नहीं इस्लाम में हलाल रिज़्क (जायज कमाई) के लिए संघर्ष करने को दुनिया का सबसे श्रेष्ठकर पुण्य बताया गया है। तो फिर हलाल रिज़्क कमाने के लिए इंग्लिश, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान पढ़ना कैसे गैर इस्लामी हो गया? पूरे कुरआन और हदीस में सिर्फ लफ़्ज इल्म (विद्या) आया है। कहीं भी दीनी (धामिर्क) और असरी (दुनयावी) इल्म की बात नहीं है। एक हदीस में मुहम्मद (स) ने खुद फरमाया है कि अगर तुम्हें इल्म सीखने के लएि चीन जाना पड़े तो चीन जाओ। इससे साफ जाहिर होता है कि इस्लाम हर तरह का इल्म सीखने के लिए प्रोतसाहित करता है। क्योंकि, जब मुसलमानों को ये शिक्षा दी गई थी, उस समय इस्लाम के सबसे बड़े शिक्षा दाता पैगम्बर मुहम्मद (स) खुद अरब में थे और लोगों को इल्म सीखने के लिए चीन तक जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे, जबकि चीन में तो इस्लाम नाम की कोई चीज उन दिनों थी ही नहीं। लेकिन, मुस्लिम रहनुमाओं ने इल्म को बांटकर मुसलमानों को भी दो तबकों (भागों) में बांट दिया है। आज एक वह मुसलमान है, जिसके पास दीनी तालीम है, लेकिन दुनिया की दौलत (अच्छे रोजगार) नहीं और दूसरा वह है, जिनके पास दुनिया की दौलत है, लेकिन दीन की तालीम नहीं। जिससे लोगों में ये संदेश गया कि इस्लाम तरक्की का दुश्मन है। अब भी मुसलमानों के लिए ये सोचने का वक्त है कि मुस्लिम समाज में ऐसे हालात क्यों पैदा हुए हैं?

इसलिए महाराष्ट्र के मदरसों के जिम्मेदारों को सरकार के इस फैसले का विरोध करने और राजनीतिक मुहरा बनने के बजाए, सरकार का सहयोगकर ज्यादा से ज्यादा सरकारी अनुदान लेकर गरीब बच्चों को उच्च शिक्षा पाने योग्य बनाने और अच्छे रोजगार के लिए तैयार करने में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए। ताकि, ये बच्चे दीन (धर्म) का ज्ञान सीखने के साथ ही जायज तरीके से दुनिया की दौलत (अच्छी नौकरी) हासिल कर समाज और देश के विकास में अपना अहम योगदान दे सकें।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here