केंद्रीय राजनीति से नीतीश की दूरी, थर्ड फ्रंट का संकेत तो नहीं !

                         -मुरली मनोहर श्रीवास्तव

राजनीति सत्ता का खेल है और इसमें कब कौन सी पार्टी चाल चलेगी इसको लेकर सिर्फ कयास ही लगाए जा सकते हैं। क्योंकि सिय़ासत में शह-मात का खेल तो चलता ही रहता है। दिल्ली में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दूसरी बार फिर से जदयू ने राष्ट्रीय अध्यक्ष की ताजपोशी की, उस दरम्यान कई बातें उड़ीं की अब जदयू केंद्रीय मंत्रीमंडल में शामिल होगी। इसके लिए बात दोनों दलों के बीच चल रही है। लेकिन अचानक से नीतीश कुमार का बयान आया कि जदयू के मंत्रिपरिषद में शामिल होने की बात सिरे से नकार दिया है। ज्ञात हो कि इस मसले पर जदयू राष्ट्रीय परिषद की बैठक में केसी त्यागी ने कहा था कि अगर केंद्र में उचित प्रतिनिधित्व मिला तो जदयू शामिल हो सकती है। जबकि पार्टी महासचिव पवन वर्मा ने त्यागी की बातों का समर्थन किया था। लेकिन ये लोग भूल गए कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी की सरकार में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने के कारण नाराजगी का इजहार करते हुए कह दिया था कि जदयू किसी भी कीमत पर मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हो सकती है। इस तरह मुख्यमंत्री के बयान आने के बाद अटकलबाजियों पर विराम जरुर लग गया है।

दिल्ली में जदयू अलग लड़ेगी चुनावः

दिल्ली में केजरीवाल की सरकार है। आम जनता के बीच उसकी अलग पैठ है। शिक्षा, स्वास्थ्य उसके मुख्य एजेंडों में शामिल है और उसमें वो पूरी तरह से कामयाब भी हैं। दिल्ली पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। जहां भाजपा मनोज तिवारी के बूते बिहारी वोटरों को रिझाने की कोशिश कर रही है। वहीं कांग्रेस ने भी नए चेहरे को पेश किया और उस टीम में बिहारी कीर्ति झा आजाद को भी स्थान दिया है। जबकि बिहार में पिछले तीन टर्म से राजनीति करने वाली जदयू इस बार सभी सीटों पर दिल्ली में चुनाव ल़ड़ने का ऐलान कर चुकी है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि बिहार में एनडीए तो दिल्ली में इसकी राहें अलग-अलग होंगी।

एनडीए में कितना अपनत्वः

एनडीए को अब तक सबसे सफल गठबंधन मानी जाती है। लेकिन आए दिन इसमें उठा पटक देखने को मिल ही रही है। चाहे महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा के बीच जीच हो तो बिहार में जदयू-भाजपा साथ चलने वाली दिल्ली में अलग-अलग विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। इतनी ही नहीं झारखंड में भी दोनों की राहें जुदा हैं। केंद्रीय सत्ता से जदयू ने दूरी बना रखी है। अगर देश में गठबंधन की एकजुटता सही तरीके से रहती तो शायद एनडीए के लिए डगर थोड़ी कठिन जरुर होती।

कहीं तीसरे मोर्चे की बुनियाद तो नहीः

देश में भाजपा अपना परचम लहरा रही है। मोदी-शाह की युगलबंदी जहां हाथ डाल रहे हैं वहां उनको सफलता मिल रही है। कांग्रेस पुनः अपने वजूद को तलाशने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है। छोटे-छोटे राजनीतिक दल अलग-अलग राज्यों में अकेले ही ताल ठोंक रहे हैं। अलग होने की वजह से इनके वजूद को खतरा बनना लाजिमी है। क्योंकि इनके समर्थक, वोट बैंक क्षेत्रिय स्तर पर ही सीमित है। जिस प्रकार एनडीए में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में राजनीति हो रही है, कांग्रेस गांधी परिवार की गोद में है, ऐसे में नीतीश कुमार का सरकार में होकर भी अलग राजनीति करना कहीं तीसरे मोर्चे की नींव तो नहीं पड़ रही है। क्योंकि देश में नरेंद्र मोदी की टक्कर में देश में नीतीश कुमार को ही बड़ा नेता माना जा रहा है। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि अभी वर्ष 2024 तक केंद्र में कोई वैकेंसी नहीं है। हां, इतना जरुर हो सकता है कि विपक्ष जो आज शैश्वावस्था में है उसको बल जरुर मिल जाएगा। अब ऐसे में देखना ये दिलचस्प होगा कि आखिर आगे की राजनीति में कब कौन किसको मात देगा या खुद ही मात खा जाएगा ये आगामी चुनाव से ही स्पष्ट हो पाएगा। लेकिन सियासत में चालें चलने के लिए हर कदम फूंक फूंककर सभी को चलनी होगी, चाहे वो सत्तारुढ़ दल हो या फिर टूकड़ों में बंटी विपक्ष।

1 thought on “केंद्रीय राजनीति से नीतीश की दूरी, थर्ड फ्रंट का संकेत तो नहीं !

  1. राजनीति में कोई किसी का नहीं होता , नितीश व पासवान भारत की राजनीति के बिहारी सितारे हैं जो रंग व नब्ज के खासे जानकार हैं , कुछ भी हो नितीश अभी तक पी एम् की कुर्सी से दूर किये जाने का गम भूले नहीं हैं वह बिहार के सी एम् पद को बचाये रखने व बने रहने के लिए बहुत मज़बूरी से भा ज पा के साथ हैं मोदी का दुबारा जीतना उनके सभी अरमानों की राख कर गया है इसलिए वे केवल अवसर की तलाश में हैं , लेकिन तीसरा मोर्चा बना कर वह कुछ हासिल कर पाएंगे यह भी एक पहेली ही है
    भारत में कई बार तीसरा मोर्चा नाम का भूत खड़ा करने की कोशिश hui है लेकिन वह सदा ही औंधे मुहँ ही पड़ी है अभी रा ज द मृत प्राय है समाजवादी, समाज भी छिन्न भिन्न हो रहा है , मायावती खुद जमीं तलाश रही हैं , लेकिन चार साल में क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता , कब कौन सा मुद्दा किसी पार्टी की नैया बढ़ा दे कब कोई मुद्दा किसी की लुटिया डुबो दे अंदाज नहीं लगाया जा सकता केवल इन्तजार ही करना होगा

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