मनोरंजन राजनीति

भारतीय परंपरा में संदेशवाहकों की ऐतिहासिकता, आचार संहिता एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

-अशोक “प्रवृद्ध”

समकालीन वैश्विक परिदृश्य में प्रतिवर्ष 1 जुलाई को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय डाक कर्मचारी दिवस मात्र एक प्रशासनिक उत्सव नहीं है। यह समाज के उस मूक, कर्मठ एवं अहर्निश सेवारत घटक के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का पर्व है, जो भौगोलिक दूरियों को पाटकर मानवीय संवेदनाओं का विनिमय सुनिश्चित करता है। वर्तमान में जब सूचना प्रौद्योगिकी के अतिरेक ने संचार को आभासी बना दिया है, तब डाक कर्मचारियों का भौतिक अवदान राष्ट्र की एकता और अखंडता का मूर्त प्रतीक बनकर उभरता है। परन्तु, इस व्यवस्था का मूल ऐतिहासिक अथवा पाश्चात्य नव उदारवादी अवधारणाओं में निहित नहीं है। सनातन संस्कृति के मूलाधार- वेद, उपनिषद, पुराण एवं इतिहास (रामायण-महाभारत) इस सत्य के साक्ष्य हैं कि संदेश प्रेषण की यह विधा प्राचीन भारत में अत्यंत परिष्कृत, संस्थागत और आध्यात्मिक अधिष्ठान से युक्त थी। भारत की इस सनातन संवाहक परंपरा का अनुशीलन करने पर हमें इसके मूल में वसुधैव कुटुम्बकम् और अहर्निशं सेवामहे (भारतीय डाक विभाग का ध्येय वाक्य) का शाश्वत सत्य दृष्टिगोचर होता है।

ऋग्वेद से लेकर अथर्ववेद तक की संहिताओं में संदेश-प्रेषण, दूत-कर्म और सूचनाओं के विनिमय की एक सुदृढ़ प्रणाली का वर्णन मिलता है। वैदिक ऋषियों ने समष्टिगत चेतना के प्रसार के लिए जिस दूत पद का सृजन किया, वह आज के डाक कर्मचारी का आदि प्रारूप है। वैदिक दर्शन में अग्नि को देवताओं का दूत अर्थात ब्रह्मांडीय संदेशवाहक स्वीकार किया गया है। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त का प्रथम मंत्र ही इस सत्य को उद्घाटित करता है-
यज्ञस्य देवमृत्विजं होतारं रत्नधातमम्।
-ऋग्वेद 1/1/1
अग्नि केवल हविष्य को देवताओं तक नहीं पहुंचाते, अपितु वे मर्त्य लोक (मनुष्यों) की प्रार्थनाओं, संकल्पों और संदेशों को अमर्त्य लोक (देवताओं) तक पहुंचाने वाले शाश्वत संदेशवाहक हैं। ऋग्वेद में उन्हें स्पष्ट रूप स दूत कहा गया है-
अग्निं दूतं पुरोदधे हव्यवाहमुप ब्रुवे।
-ऋग्वेद 1/12/1
यह इस बात का प्रमाण है कि संदेश को गंतव्य तक पहुंचाने की क्रिया को वैदिक काल में अत्यंत पवित्र और यज्ञीय अनुष्ठान के समतुल्य माना जाता था। ऋग्वेद 10/108 में अंकित सरमा-पणि संवाद सूक्त प्राचीनतम संदेश प्रेषण और दूत कर्म का अनुपम उदाहरण है। इंद्र की दूती सरमा (देव-शुनी) पणियों (दस्युओं) द्वारा अपहृत गायों का संधान करने और इंद्र का संदेश देने हेतु दुर्गम पर्वतों और नदियों को पार करती है। जब पणि उससे पूछते हैं कि तुम यहां कैसे पहुंची, तो वह उत्तर देती है-
इन्द्रस्य दूती रिषिता चरामि मह इच्छन्ती पणयो वियन्ता।
-ऋग्वेद 10/108/2
यह आख्यान प्रमाणित करता है कि वैदिक काल में संदेशवाहकों के मार्ग में आने वाली भौगोलिक बाधाएं (यथा नदियां, पर्वत) उनके संकल्प को डिगा नहीं पाती थीं। यही दुर्गम यात्रा आज के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत डाककर्मियों के जीवन का यथार्थ है। अथर्ववेद में राष्ट्र के सुदृढ़ीकरण हेतु संदेशवाहकों की तीव्र गति और उनके मार्गों (पंथों) की सुरक्षा पर विशेष बल दिया गया है। देश के चारों कोनों में सूचनाओं के अविलंब प्रेषण के लिए अश्वारूढ़ एवं द्रुतगामी दूतों का प्रावधान था, जो राजाज्ञाओं और लोकसंदेशों को वहन करते थे।

उपनिषदों का प्रतिपाद्य यद्यपि ब्रह्मविद्या और आत्मज्ञान है, तथापि वहां व्यापक समष्टि में विचारों और प्राणिक ऊर्जा के संचरण को जिस प्रकार व्याख्यायित किया गया है, वह संदेश प्रेषण विज्ञान का सूक्ष्म धरातल है। बृहदारण्यक उपनिषद में वायु को समष्टिगत अंतःसूत्र माना गया है। वायु ही वह तत्व है जो संपूर्ण जगत को परस्पर संबद्ध रखता है। जिस प्रकार वर्तमान में डाक व्यवस्था पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोती है, उसी प्रकार औपनिषदिक ऋषि वायु की गति में परम संदेशवाहक का रूप देखते हैं। छान्दोग्य उपनिषद 8/62 में सूर्य की रश्मियों और मनुष्यों की नाड़ियों के मध्य के संबंध को समझाते हुए एक सुंदर रूपक मिलता है। ऋषि कहते हैं कि जिस प्रकार एक महापथ दो ग्रामों को परस्पर जोड़ता है, उसी प्रकार सूर्य की रश्मियाँ इस लोक और परलोक के मध्य संदेशवाहिका हैं। यह वैचारिक महापथ ही कालान्तर में राजपथ और डाक मार्ग के रूप में परिणत हुआ। पुराणों में संदेश-प्रेषण की विधा अधिक लोक कल्याणकारी और संस्थागत रूप में प्रगट होती है। यहां दिव्य और लौकिक दोनों ही स्तरों पर दूतों के चरित्र का विस्तृत विश्लेषण मिलता है। पौराणिक वाङ्मय में देवर्षि नारद को मात्र एक कलहप्रिय पात्र के रूप में देखना संकुचित दृष्टिकोण है। वास्तव में, वे ब्रह्मांड के प्रथम पत्रकार और सर्वोच्च संदेशवाहक हैं। वे नारायण के संदेशों को भक्तों तक और भक्तों की आर्तपुकार को ईश्वर तक पहुंचाते हैं। उनकी गति अबाधित है (नारद = जो ज्ञान और जल का दान करे)। उनका चरित्र यह सिखाता है कि एक आदर्श संदेशवाहक को निष्पक्ष, निर्भय और लोकहित के प्रति समर्पित होना चाहिए। महाभारत के वनपर्व में वर्णित नल-दमयंती की कथा में हंस को दूत बनाया गया है। राजा नल का संदेश लेकर हंस विदर्भ देश की राजकुमारी दमयंती के पास जाता है। यहां हंस की चतुरता, गोपनीयता बनाए रखने की क्षमता और सटीक प्रस्तुतीकरण आज की डाक व्यवस्था की गोपनीय विंग के समान है। रामायण और महाभारत काल तक आते-आते संदेश प्रेषण एक अत्यंत विधिक और रणनीतिक विधा बन चुका था। इन ग्रंथों में दूतों के लक्षण, उनकी योग्यता और उनकी सुरक्षा के नियम निर्धारित किए गए थे। रामायण का सुन्दरकाण्ड मूलतः एक संदेशवाहक के शौर्य, चातुर्य और कर्तव्यनिष्ठा की गाथा है। प्रभु श्रीराम का संदेश (मुद्रिका के रूप में) लेकर सीता जी तक पहुंचना और सीता जी का संदेश (चूड़ामणि के रूप में) पुनः श्रीराम तक लाना, यह इतिहास का सबसे दुर्गम और सफल डाक कर्म है।
हनुमान जी के दूतत्व की विशेषताओं का विश्लेषण करते हुए श्रीराम किष्किन्धा काण्ड में लक्ष्मण से कहते हैं-
न विस्वरं न विस्पष्टं न च संशायितं क्वचित्।
वाल्मीकि रामायण 4/3/32
अर्थात- उनका संदेश न तो अस्पष्ट है, न संदेहास्पद है और न ही उसमें सुर-ताल की कमी है। हनुमान जी ने लंका में विकट परिस्थितियों का सामना किया, बन्दी बने, कष्ट सहे, किन्तु अपने मूल दायित्व (संदेश-प्रदान) से विमुख नहीं हुए। आज का डाक कर्मचारी भी बाढ़, भूकंप, ग्रीष्म और शीत की परवाह किए बिना सुदूरतम क्षेत्रों में पत्र पहुंचाता है, जो हनुमान जी के इसी सेवा भाव का अनुकरण है।


महाभारत का उद्योग पर्व दूत संहिता का अप्रतिम दस्तावेज है। महाराज धृतराष्ट्र के पास पांडवों का संदेश लेकर जाने वाले संजय और स्वयं शांतिदूत बनकर कौरवों की सभा में जाने वाले श्रीकृष्ण, दोनों ने दूत-कर्म के उच्चतम मानदंड स्थापित किए। दिव्यदृष्टि से युक्त संजय सूचनाओं के संकलन और उनके निष्पक्ष संप्रेषण के प्रतीक हैं। वहीं श्रीकृष्ण शत्रु पक्ष के सम्मुख भी सत्य और न्याय के संदेश को बिना किसी भय के स्थापित करते हैं। आचार्य चाणक्य ने अपने कालजयी ग्रंथ अर्थशास्त्र में राज्य की सुरक्षा और स्थिरता के लिए दूत व्यवस्था को रीढ़ की हड्डी माना है। उन्होंने दूतों का वर्गीकरण तीन श्रेणियों में किया है-
निसृष्टार्थ- जिन्हें पूर्ण निर्णय लेने का अधिकार हो (मंत्रिस्तरीय दूत)।
परिमितार्थ- जिन्हें एक निश्चित सीमा या उद्देश्य के लिए भेजा गया हो।
शासनहर- जो केवल राजा के लिखित पत्र या शासन-आदेश को गंतव्य तक पहुँचाते हैं।
आधुनिक डाक कर्मचारी या पोस्टमेन मूलतः इसी शासनहर परंपरा के संवाहक हैं। कौटिल्य ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि शासनहर दूत को मार्ग में कोई भी अवरुद्ध न करे और उसे राज्य की ओर से विशेष सुरक्षा तथा भोजन-आवास की सुविधा प्राप्त हो। यदि कोई दूत को क्षति पहुँचाता था, तो उसे कठोरतम दण्ड (मृत्युदण्ड तक) का प्रावधान था।
मनुस्मृति 7/63-64 में भी राजा को परामर्श दिया गया है कि वह दूत की नियुक्ति में अत्यंत सावधानी बरते-
दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम्।
इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम्।।
अर्थात- दूत को सभी शास्त्रों का ज्ञाता, इंगित (संकेतों) को समझने वाला, पवित्र (ईमानदार), चतुर और कुलीन होना चाहिए। डाक कर्मचारी की शुचिता (ईमानदारी) और दक्षता ही किसी समाज के विश्वास का आधार बनती है।
यह सत्य है कि डाक केवल कागज़ के टुकड़ों का विनिमय नहीं है। यह राष्ट्र की सांस्कृतिक धमनियों में बहने वाला रक्त-प्रवाह है।
पाश्चात्य इतिहासकारों ने यह भ्रम फैलाया कि भारत में व्यवस्थित डाक प्रणाली का सूत्रपात लॉर्ड डलहौजी या ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया। परन्तु यह एक ऐतिहासिक मिथ्या प्रलाप है। ब्रिटिश शासन ने भारत की पूर्व स्थापित धावक व्यवस्था हरकारा प्रणाली और द्रुत दूत पद्धति का ही आधुनिकीकरण किया, जिसका मूल ढांचा मौर्य, गुप्त और हर्ष के साम्राज्यों में पहले से ही अत्यंत सुदृढ़ था। प्राचीन काल के हरकारे (जो पैरों में घुँघरू बाँधकर, हाथ में भाला लेकर बाघ-चीतों से लड़ते हुए घने जंगलों से राजाज्ञा और प्रजा के पत्र ले जाते थे) ही आज के डाक कर्मचारियों के पूर्वज हैं। इतिहास गवाह है कि इन हरकारों की निष्ठा इतनी अडिग होती थी कि वे प्राण दे देते थे, परन्तु पत्र की गोपनीयता और सुरक्षा से समझौता नहीं करते थे।

आज राष्ट्रीय डाक कर्मचारी दिवस के अवसर पर हमें यह समझना होगा कि प्रौद्योगिकी के इस युग में भी डाककर्मी की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उसका स्वरूप बदला है। इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक के माध्यम से आज एक ग्रामीण डाक सेवक देश के सुदूरतम कोने में रहने वाले वृद्ध की पेंशन उसके घर तक पहुंचा रहा है। यह महाभारत के उस आदर्श के अनुरूप है जहां राजा का यह कर्तव्य था कि वह वृद्धों और अनाथों तक सहायता पहुंचाए। कोरोना महामारी के भीषण संकट काल में, जब संपूर्ण विश्व घरों में कैद था, तब भारतीय डाक के कर्मचारियों ने कोरोना वॉरियर्स के रूप में जीवन रक्षक दवाएं, पीपीई किट और पार्सल घर-घर पहुंचाए। यह त्याग रामायण के लक्ष्मण-मूर्छा प्रसंग में संजीवनी बूटी लाने वाले हनुमान जी के लोक कल्याणकारी दूतत्व का आधुनिक रूपांतरण ही तो है। स्पष्ट है कि संदेशवाहक का पद केवल एक आजीविका नहीं, अपितु एक महत व्रत है। यह समाज को जोड़ने का, संवेदनाओं को जीवित रखने का और राष्ट्र के सुदूरतम अंग को मुख्यधारा से संबद्ध रखने का एक पवित्र अनुष्ठान है। वैदिक संज्ञान सूक्त की भावना- सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। अर्थात- हम साथ चलें, साथ बोलें और हमारे मन एक हों।, को यदि कोई वर्ग धरातल पर चरितार्थ करता है, तो वह हमारे डाक कर्मचारी हैं। अतः, इस दिवस की सार्थकता मात्र औपचारिकता में नहीं, बल्कि इन राष्ट्रसेवकों के श्रम का सम्मान करने, उनकी सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनकी सनातन गौरवमयी परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखने में है।