लेखक परिचय

सुधा सिंह

सुधा सिंह

विजिटिंग प्रोफेसर, ओरिएंटल लैंग्वेज डिपार्टमेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड लैंग्वेज, तुर्कमेनिस्तान.

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-सुधा सिंह

यूरोपीय समुदाय स्त्रियों के लिए मातृत्व के अवकाश को बढ़ाने पर विचार कर रहा है। यूरोप में अभी चौदह हफ्ते का मातृत्व अवकाश स्त्रियों को मिला हुआ है। इसे बढ़ाकर इक्कीस हफ्ते करने पर यूरोपीय संसद विचार कर रही है। क्या इसे स्त्री आंदोलनों की सफलता माना जाए? या फिर स्त्री आंदोलनों के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि? अभी इस प्रस्ताव पर विचार चल रहा है, इसके पक्ष –विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं। इस विषय में कुछ भी कहने के पहले मैं कह दूँ कि व्यक्तिगत तौर पर मैं इस प्रस्ताव के पक्ष में हूँ और कोई भी स्त्री जिसके अंदर स्त्री की चेतना है वह इसके पक्ष में होगी।

इस प्रस्ताव के लाने के पक्ष – विपक्ष दोनों में तर्क दिए जा रहे हैं। जो पक्ष में हैं और जो इसका समर्थन कर रहे हैं उनका तर्क है कि स्त्रियों के लिए मातृत्व अवकाश बढ़ाने पर स्त्रियाँ गर्भाधान के लिए आकर्षित होंगी। उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा। आज स्त्रियाँ बाहर काम कर रही हैं और उन्हें बाहर के काम से गर्भाधान के समय अगर अवकाश मिलेगा तो वे प्रोत्साहित होंगी। यह समाज के लिए अच्छा होगा, देश के लिए अच्छा होगा, देश की जनसंख्या संतुलन के लिए अच्छा होगा। सभी स्त्रीवादी विचारों वाली महिलाएं इसके पक्ष में होंगी।

जाहिर है कि इस प्रस्ताव का यह पक्ष बड़ा मज़बूत है कि स्त्रियों को मातृत्व अवकाश के अंदर ज्यादा से ज्यादा समय मिले। बच्चा जनने के क्रम में स्त्री के स्वास्थ्य और शरीर की जो हानि होती है, उसकी रिकवरी के लिए उसे पर्याप्त समय मिलना ही चाहिए। बल्कि न केवल बच्चा जनने, उसके पालन-पोषण में भी औरत की केन्द्रीय भूमिका होती है। यह कहना सच के ज्यादा क़रीब होगा कि बच्चा पालना औरत की केन्द्रीय जिम्मेदारी समझी जाती है।

सवाल है कि यह स्थिति क्यों आई कि स्त्री को आज बच्चा पैदा करने के लिए किसी प्रोत्साहन की जरुरत आन पड़ी? और यह डर समाज में घर करने लगा कि भौगोलिक संतुलन गड़बड़ हो सकता है! जबकि हालत यह रही है कि सभी समाजों में स्त्री को बच्चा पैदा करने की मशीन समझा गया है। औरत की सार्थकता ही इस बात में मानी गई है कि वह संतान को जन्म दे। उसकी उर्वरता की तुलना धरती से की गई है। जो या तो फसल पैदा करती है या बांझ होती है। बीच की कोई स्थिति नहीं होती। धरती की तरह ही औरत की भी स्वतंत्र रूप से कोई सामाजिक भूमिका नहीं देखी गई। उसकी कोख, उसकी प्रजनन क्षमता, मासिक धर्म ये सब पुरुष के लिए रहस्यमय संसार थे। इससे भी ज्यादा रहस्यमय था औरत की कोख की अनिश्चतता। मर्द के लिए आज भी यह जानना आसान नहीं है कि औरत की कोख में उसी का बच्चा है या नहीं। हालांकि आज विज्ञान के पास इसका उत्तर है। विज्ञान के पुंसवादी ओरिएन्टेशन की तरक्की से अब ये तो जाना जा सकता है कि औरत की कोख का बीज किस मर्द का है। पर ये सब इतना सहज –सुलभ और वैध नहीं है। दूसरी चीज कि ऐसी कोई भी स्थिति औरत –मर्द के बीच अविश्वास, असामान्य स्थितियों और असभ्यता का ही पता देती है। (यह दीगर बात है कि इस तरह के कई सामाजिक असभ्यताओं की शिकार औरत सदियों से रही है और समाज ने इसे सामान्य स्थिति के तौर पर ही लिया है!)

ज्यादातर मर्दों के लिए आज भी औरत की कोख रहस्य भरी है। यह किसी तिलिस्म से कम नहीं! चूँकि हमारे समाज का ढ़ाँचा पुंसवादी है अत: मर्दों के लिए यह एक जनाना कार्यव्यापार ही रहा है। वह इसमें शामिल नहीं होता, दूर से देखता है। उसकी भूमिका तमाशबीन की होती है। चूँकि सारे परिवर्तन स्त्री के शरीर में घट रहे होते हैं, ये सब उसकी दिनचर्या, शरीर और मन की संरचनाओं में भी भारी परिवर्तन पैदा करते हैं। वह, वह नहीं होती जो गर्भाधान के पहले थी। ये सारे बदलाव स्त्री को बांधते हैं, वह अपनी स्वतंत्रता खोती है, स्त्री को सिखाया जाता है कि मर्द को बांधे रखने के लिए उसमें आवश्यक लावण्य होना चाहिए, मर्द भी स्त्री से ऐसी अपेक्षा रखते हैं; स्त्री वह भी ‘खोती’ है। इस प्रक्रिया में किसी भी महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका से वंचित स्त्री अपना आत्मविश्वास खोती है जिसके कारण वह आगे चलकर कई तरह की हीन ग्रंथियों का शिकार भी होती है। हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सच है कि हममें से ज्यादातर स्त्रियों के मन में बचपन से ही मातृत्व को भविष्य की एक सुखमय इच्छा और स्त्री-जीवन की सार्थकता के रूप में पोषा जाता है। खाद-पानी दिया जाता है। हममें से अधिकांश स्त्रयों की मांए हमें यह नहीं बतातीं कि मातृत्व एक कष्टकर अनुभव भी है। कि इसमें हमारी जान का ख़तरा भी शामिल है। हमें विज्ञान की उपलब्धियों के बारे में बताया जाता है, डॉक्टरों की दक्षता के बारे में बताया जाता है, इसमें शामिल सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, भावात्मक जोखिम के बारे में प्राय: बात नहीं की जाती। माँ तो माँ, एक सहेली भी दूसरी सहेली को यह नहीं बताती कि बच्चा पैदा करना स्त्री के लिए केवल एक सुखद अनुभव नहीं है। इसका एक नकारात्मक अर्थ भी है। बल्कि कोशिश यह होती है कि स्त्री के किसी भी कारण से बच्चा न होने को एक अभावमूलक संदर्भ दिया जाए।

इन सब के बावजूद यदि आज यह स्थिति यूरोपीय समाजों में आ गई है कि औरत को बच्चा पैदा करने के लिए प्रोत्साहन दिए जाने की बात की जा रही है तो यह विचारणीय मसला है। इसे सामान्य सरकारी नीति कहकर टालना ग़लत होगा। इसमें मोटे तौर पर जनसंख्या वृध्दि की वर्चस्वशाली सामाजिक मानसिकता की अभिव्यिक्ति तो है ही लेकिन उससे गंभीर बात है स्त्रियों में,तमाम स्वीकृतिमूलक और महिमामंडन करनेवाली सामाजिक संरचनाओं की मौजूदगी के बावजूद, इस भूमिका के प्रति उपेक्षा। ध्यान रखनेवाली बात है कि पितृसत्तात्मक सेटअप केवल विवाह व्यवस्था के भीतर मातृत्व का महिमामंडन करता है। अविवाहित मातृत्व उसके लिए कुफ्र है।

स्त्रियों का माँ बनकर सामाजिक भूमिका के प्रति उपेक्षा भाव का एक बड़ा कारण अपनी तमाम आलोचनामूलक भूमिकाओं के बावजूद पूंजीवाद ने पैदा किया है। स्त्री की आर्थिक स्व निर्भरता ने उसके लिए नई ज़मीन तैयार की है। वह अपनी पहचान के अन्य आधारों को बच्चे पैदा करने के अलावा भी पैदा कर सकती है। यह बड़ा फ़र्क है जो आज की औरत के लिए आम है। दूसरी चीज कि यह सच है कि बच्चे आज भी केवल औरत ही पैदा कर सकती है ( आगे कौन जाने कि मजबूरी में सही इस मामले में औरतों के विकल्प पर न सोचा जाएगा !) लेकिन ऐसा करने की प्रक्रिया में वह अकेली और असुरक्षित हो जाए तो वह यह नहीं चाहेगी। आज की समाजव्यवस्था में बच्चा स्त्री के लिए पूरा प्रोजेक्ट है। न्यूक्लियर समाजों में इसका निर्वाह वह अकेले करने में असमर्थ है। इसमें पति-पत्नी और समाज तीनों की जवाबदेहियाँ सुनिश्चत की जानी चाहिए। माँ बनने वाली स्त्री के लिए समाज में और काम की जगहों पर विशेष इन्सेंटिव दिया जाना चाहिए ताकि इसमें लगनेवाले समय के कारण वह अपने को दक्षता या कौशल में पिछड़ा हुआ न महसूस करे।

बात एक अच्छे प्रस्ताव और सदिच्छा भर की है तो इस पर किसी भी तरह की बहस से कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। प्रसंगवश जिक्र कर दूँ कि भारत में नौकरियों में स्त्री को मातृत्व अवकाश मिला हुआ है। उच्च शिक्षा संस्थानों में नौकरी के नियमों के नए निर्देशों के अनुसार स्त्री को दो वर्ष के मातृत्व अवकाश का प्रावधान है साथ ही पैतृक अवकाश की भी बात की गई है। यह नियम सन् 2006 से अमल में आया है। पर इसके व्यवहारिक पक्ष पर गौर करें तो चौंकानेवाले तथ्य सामने आएंगे। कई कॉलेजों में यह देखा गया है कि छुट्टी मांगी गई है, मातृत्व की अपेक्षा करनेवाली महिलाएं घर बैठ गईं हैं पर बाद में उन्हें छुट्टी एडजस्ट कराने में दिक्कतें पेश आईं हैं।

मेरा मानना है कि सदिच्छा, प्रस्ताव या किसी भी संवैधानिक स्थिति को अमली जामा पहनाने के लिए, उसके लागू किए जाने और मनवाने पर जोर दिया जाना चाहिए। इसके लिए एक मज़बूत तंत्र की जरुरत है। चाहे किसी भी देश या समाज की बात क्यों न हो स्त्री का मसला ऐसा नहीं है कि इसे केवल संवैधानिक जामा पहनाकर अमल के जनता और संस्थानों की इच्छा के हवाले कर दिया जाए। इच्छा से तो लोग ‘लेडीज़’ लिखे रहने बावजूद बसों में घन्टे-आध घन्टे के सफर में सीट तक नहीं छोड़ते फिर स्त्री के अधिकारों का सम्मान करना तो दीगर बात है।

5 Responses to “क्या औरत को माँ बनने के लिए प्रोत्साहन की ज़रूरत है?”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    लेखिका ने बड़ी मेहनत से मातृत्व के अनेक पहलुओं पर प्रकाश डालने का सार्थक प्रयास किया है. एक सुन्दर प्रयास है जिसे और विस्तार देने की गुंजाईश है. आशा है कि सुधा जी भविष्य में इस पर और लिखेंगी.
    – एक उपयोगी व मूल्यवान जानकारी माँ बनाने वाली महिलाओं के लिए है. प्रसव से कुछ देर पहले होमियोपैथी की दवा ‘ पल्सेटिला-200 या 1000 ‘ केवल एक बार खा लेने से प्रसव आश्चर्यजनक रूप से सहज, सरल और बिना विशेष कष्ट के होता है. सिजेरियन डिलीवरी की ज़रूरत भी नहीं पड़ती.
    हज़ारों माताओं पर हमारे होमियोपैथ इसे अनेक दशकों से आजमा रहे हैं जिसमें उन्हें सदा सफलता मिलती है.
    – दूसरी दवा ‘ वाईबर्नम प्रुनिफोलियम-Q ‘ है जिसकी ५-५ बून्दें प्रतिदिन दिन में तीन बार लेते रहने से प्रसव पीड़ा बहुत कम होती है और कभी भी गर्भस्राव ( मिसकैरिज ) नहीं होता. हो रहा मिसकैरिज भी रुक जाता है.
    – माइक्रो ओवन, नॉन स्टिक, प्लास्टिक कंटेनर, पैक्ड फ़ूड का प्रयोग भी गर्भाकालीन अवस्था में बहुत हानिकारक है. सफ़ेद चीनी का प्रयोग यदि गर्भ काल में न किया जाए तो पैदा होने वाले बच्चे के दांत खराब होने की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं. यानी सफ़ेद चीनी कैल्शियम की दुश्मन है. इसी प्रकार टूथपेस्ट भी हमारी हड्डियों और दांतों के दुश्मन हैं. इनमें डला फ्लोराईड दांतों व शरीर की सारी हड्डियों को गला डालता है. इस पर देश-विदेश में दर्जनों शोध हो चुके हैं.
    भावी माताओं को मेरी शुभकामनाएं !

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  2. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    श्री चतुर्वेदी जी के विचार से सहमत हूँ …केंद्र की विभिन्न सरकारों ने अतीत में भी स्त्री उन्नयन के सन्दर्भ में अधिकांस तौर पर उन महिलाओं पर ज्यादा ध्यान दिया जो संगठित क्षेत्रों में सेवारत थी या हैं या होंगी …भारत में तो जनसँख्या पर नियंत्रण हेतु ही प्रयास असफल हो रहे हैं …अतेव यह उचित होगा की असंगठित क्षेत्रों की ८० फीसदी आबादी जो ग्रामों में बस्ती है उसमें महिलाओं ,बच्चों और कमजोर आर्थिक स्थिति के पुरुषों को भी कुपोषण से बचाना चाहिए .

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  3. Yeshwant Kaushik

    लेखिका क्यों महिलाओं को फिर से बच्चे पैदा करने की मशीन बना देना चाहती हैं, जैसा की श्री तिवारी जी ने बताया की गावों मे ग़रीबी भुखमरी और बढ़ जाएगी महिलाओं की आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति में भी रूकावटे आएंगी.

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  4. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    aalekh prasangik hai.bharat men bhi gahe bagahe kendr sarkar sangthit kshetr ki kamkaji mahlaon ko ye jhunjhuna pakdati rahti hain.mano bachchon ki paidais ke liye sara theka inhi ne le rakha ho .chaturvedi ji sahi hain..bharat men 80%janta gaaon men rhti hai jahaan eksootri karykrm bachche paida karna hi rh gaya hai .jnmte hi bhoonkh ,kuposhan.mangaai.abhav or berojgari se joojhte huyeye matayen or unke bachchye amaanveey jeevan jeene ke liye abhshpt hain.

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  5. जगदीश्वर चतुर्वेदी

    आपने सही लिखा है। एक बात और है यूरोप में जनसंख्या वृद्धि नहीं हो रही इसलिए वहां प्रोत्साहनों पर जोर दिया जा रहा है।सुंदर लेख के लिए बधाई।

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