सूचकांक से कहीं ज्यादा बड़ी है ‘भुखमरी’

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सचिन कुमार जैन

 

सतत विकास लक्ष्य के कई एजेंडो में लक्ष्य 2 का एजेंडा जब तय किया गया तो विश्व के सभी लीडर इस बात पर एकमत थें कि वर्ष 2030 तक दुनिया से भुखमरी को समाप्त किया जायेगा। साथ ही बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं के लिए विशेष रूप से खाद्य और पोषण की सुरक्षा की स्थिति को हासिल करना प्राथमिकता दी जाएगी। किन्तु समस्या यह है कि आज भी हम भुखमरी और कुपोषण की वास्तविक भयावहता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स यानि जी.एच.आई रिपोर्ट पर गंभीरता से चर्चा करने की बजाए बहस इस बात पर केन्द्रित कर दी गयी कि इसमें भारत का कौन सा स्थान है? 50वां या 100वां? यदि 100वां है तो यह सही है या नहीं?  पूरी कोशिश की गयी है कि भुखमरी के मूल कारणों से ध्यान बंटाया जा सके। यह असफल प्रयास केवल अपनी नाकामी छुपाने से अधिक कुछ नहीं है।इंटरनेश्नल फ़ूड पालिसी रिसर्च इंस्टीटयूट (आइ.ऍफ़.पी.आर.आई) विगत कई सालों से दुनिया में भुखमरी के स्तर को सूचकांक के जरिये सामने लाता रहा है।

ये सूचकांक महत्वपूर्ण इसलिए हैं क्योंकि इनमें बच्चों के पोषण को केंद्र में रखकर समाज की स्थिति का आंकलन किया जाता है,  अन्यथा रिपोर्टों से बच्चे तो अक्सर गुम हो ही जाते हैं। ये इंडेक्स अल्प-पोषण, कुपोषण,  ठिगनापन और 5 साल से कम उम्र की मृत्यु दर से जुड़े आंकड़ों को जोड़ कर तैयार किया जाता है। प्रथम दृष्टया से ऐसा लगता है कि भुखमरी के स्तर को मापने के लिए ये बहुत सीमित मानक है। बहुत हद तक यह बात सही भी है, सच तो यह है कि भुखमरी के सूचकांक को जीवन चक्र के नज़रिए से समझने की जरूरत है। इसमें लिंग भेद, बाल विवाह, हिंसा, शिक्षा, सुरक्षित प्रसव और प्रजनन का अधिकार, जन्म लेने पर बच्चे के जीवित रहने की संभावना, स्तनपान और बच्चों के भोजन की सुरक्षा, मातृत्व अधिकार, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और उन पर सामुदायिक हक, पहचान का अधिकार, साम्प्रदायिक-जातिवादी छुआछूत और हिंसा से मुक्ति से लेकर किसानों-मजदूरों के हित शामिल हैं।

सूचकांक में भारत की निम्न स्थिति समाज के पिछड़े और जनजातीय वर्गों की स्थिति को बयां करता है। भारत में 10.4 करोड़ लोग जनजातीय समाज से संबंध रखते हैं। उनकी अपनी सांस्कृतिक तथा सामाजिक पहचान और जीवन शैली है। वे प्राकृतिक संसाधनों के सजग उपयोग से भुखमरी को हराते आये हैं, किन्तु वैश्विक आर्थिक नीतियों ने उनसे जल-जंगल-जमीन और उनकी संस्कृति आधारित व्यवस्था को छीन लिया. यूनिसेफ की रिपोर्ट (2016-17) “न्यूट्रीशन एंड ट्राइबल पीपुल– अ रिपोर्ट आन न्यूट्रीशन- सिचुएशन आफ इंडियाज़ ट्राइबल चिल्ड्रन” के अनुसार जब परिवार और समाज में निरंतर खाद्य असुरक्षा रहती है, तब बच्चों में ठिगनापन होने का खतरा अधिक हो जाता है।

इससे बच्चे बीमार रहते हैं, स्कूल का वातावरण प्रतिकूल होने के कारण अच्छे से पढ़ नहीं पाते हैं और वयस्क होकर स्वस्थ नागरिक की भूमिका नहीं निभा पाते हैं। यह स्थिति गरीबी, खाद्य असुरक्षा, महिलाओं को पर्याप्त पोषण न मिलने, बच्चों को सही तरीके से माँ का दूध न मिलने और बदहाल जीवन शैली के कारण निर्मित होती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के नतीजों में यह जानकारी उपलब्ध नहीं है कि आदिवासी समुदाय में कितने बच्चे कुपोषित हैं, किन्तु वर्ष 2005-06 के सर्वेक्षण के मुताबिक 54 प्रतिशत यानी 62 लाख आदिवासी बच्चे सतत भुखमरी के कारण पैदा होने वाले वृद्धि बाधित कुपोषण के शिकार थें।

इन चुने हुए राज्यों-आँध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़,  गुजरात,  झारखंड,  मध्यप्रदेश,  महाराष्ट्र, ओड़ीसा, राजस्थान और तेलंगाना में ही 47 लाख आदिवासी बच्चे अपनी उम्र से ठिगने रह गए हैं।

आदिवासी समाज को भुखमरी से बाहर निकालना सभ्य सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। वर्ष 2006 में संसद ने वन अधिकार क़ानून बनाया था, ताकि आदिवासियों को वन भूमि के अतिक्रमण से मुक्त करा जाए. इस क़ानून के मुताबिक आदिवासी और अन्य वन निवासियों को उनके कब्ज़े की 10 एकड़ तक भूमि का कानूनी अधिकार दिया जाना था. इसके सामुदायिक हक़ भी शामिल किये गए ताकि वन उपज, सूखी लकड़ी, औषधियों, पानी और पानी के उत्पादों, फलों-सब्जियों पर भी उन्हें निर्बाध हक़ मिल सके. यह उनके गरिमामय जीवन और भुखमरी से मुक्ति के लिए एक अनिवार्य कदम था. इसका हश्र क्या हुआ? आदिम जाति विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक फ़रवरी 2017 तक भारत में व्यक्तिगत और सामुदायिक हकों के लिए कुल मिला कर 41.65 लाख दावें किये गए थे, इनमें से 18.47 लाख दावे खारिज कर दिए गए. अधिसंख्य मामलों में कानूनी प्रावधान के मुताबिक दावेदारों को आवेदन खारिज होने का कारण भी नहीं बताया गया.

बुनियादी रूप से यह मसला हमारी शासन व्यवस्था की प्रतिबद्धता से जुड़ा हुआ है. वास्तव में समाज को ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट का इंतज़ार करने की जरूरत नहीं पड़ती, यदि उसकी नीति भुखमरी की समस्या को जड़ से मिटाने की होती। किसी भी संकट को एक “फायदे के अवसर” के रूप में भुनाया जाता है. कुपोषण बढ़ गया, तो पोषणाहार कंपनियां पूरा जोर लगा रही हैं कि ठेका मिल जाए. कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं भोजन” को इतना जटिल विषय बना दे रही हैं, कि भूख अब एक बीमारी मानी जा रही है. इन पर सरकार का खूब विश्वास है, किन्तु देश के ग़रीब नागरिकों को पांच किलो अनाज लेने से पहले हर महीने अपनी पहचान साबित करना ही सबसे कठिन हो जाता है. ऐसे में फिर एक प्रश्न उठता है कि आखिर इस समस्या का स्थाई समाधान अथवा इसका विकल्प क्या है? विकल्प है खाद्य सुरक्षा और विपरीत परिस्थितियों से निपटने की भारतीय समाज का हज़ारों सालों का अनुभव। इसके लिए आधुनिक उत्पादन प्रणालियों के विपरीत पारंपरिक व्यवस्था-तकनीकों को अपनाने की जरूरत है।  खेती से लेकर बच्चों के लालन-पालन और प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख तक हमारी कई वैज्ञानिक पद्धातियाँ रहीं हैं। जिसे यूरोप और अमेरिका जैसी पश्चिमी सभ्यता ने भी स्वीकार किया है। अगर इसी क्रम में आगे बढ़ा जाए तो सतत विकास के लक्ष्य को पाना आसान हो सकता है।

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